अनुशासन पर्व · अध्याय 110
व्रत, दम, सत्य और ब्रह्मचर्य के फल
युधिष्ठिर व्रत, नियम, स्वाध्याय, दम, अध्यापन, दान न लेने, सत्य, ब्रह्मचर्य तथा माता-पिता और गुरु की सेवा के फल पूछते हैं। भीष्म क्रम से उत्तर देते हैं: जितेन्द्रिय लोग सर्वत्र सुखी रहते हैं और दम दान से भी बढ़कर है; शूर अनेक प्रकार के होते हैं और सब अपने कर्मों से जीते हुए लोकों को पाते हैं; सत्य हज़ार अश्वमेध यज्ञों से भारी है; आजीवन ब्रह्मचारी के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं; और जो बिना द्वेष के पिता, माता, भाई और गुरु की सेवा करता है, वह स्वर्ग पाता है और नरक नहीं देखता।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.110.1)
विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान्प्रवदता विभो । प्रवक्ष्यामि तु संदेहं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
visrambhito'haṃ bhavatā dharmānpravadatā vibho | pravakṣyāmi tu saṃdehaṃ tanme brūhi pitāmaha
युधिष्ठिर बोले: हे विभो, आप धर्मों का उपदेश दे रहे हैं और इससे मुझे आप पर पूरा विश्वास हो गया है। अब मैं एक संदेह रखता हूँ; हे पितामह, उसे मुझे बताइए।
श्लोक 2 (13.110.2)
व्रतानां किं फलं प्रोक्तं कीदृशं वा महाद्युते । नियमानां फलं किं च स्वधीतस्य च किं फलम् ॥
vratānāṃ kiṃ phalaṃ proktaṃ kīdṛśaṃ vā mahādyute | niyamānāṃ phalaṃ kiṃ ca svadhītasya ca kiṃ phalam
हे महातेजस्वी, व्रतों का कैसा फल बताया गया है? नियमों का क्या फल है और भली-भाँति किए हुए अध्ययन का क्या फल है?
श्लोक 3 (13.110.3)
दमस्येह फलं किं च वेदानां धारणे च किम् । अध्यापने फलं किं च सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥
damasyeha phalaṃ kiṃ ca vedānāṃ dhāraṇe ca kim | adhyāpane phalaṃ kiṃ ca sarvamicchāmi veditum
यहाँ दम का क्या फल है, वेदों को धारण करने का क्या फल है और पढ़ाने का क्या फल है? मैं यह सब जानना चाहता हूँ।
श्लोक 4 (13.110.4)
अप्रतिग्राहके किं च फलं लोके पितामह । तस्य किञ्च फलं दृष्टं श्रुतं यस्तु प्रयच्छति ॥
apratigrāhake kiṃ ca phalaṃ loke pitāmaha | tasya kiñca phalaṃ dṛṣṭaṃ śrutaṃ yastu prayacchati
हे पितामह, जो दान नहीं लेता, उसे इस लोक में क्या फल मिलता है? और जो देता है, उसके लिए कौन-सा फल देखा या सुना गया है?
श्लोक 5 (13.110.5)
स्वकर्मनिरतानां च शूराणां चापि किं फलम् । सत्ये च किं फलं प्रोक्तं ब्रह्मचर्ये च किं फलम् ॥
svakarmaniratānāṃ ca śūrāṇāṃ cāpi kiṃ phalam | satye ca kiṃ phalaṃ proktaṃ brahmacarye ca kiṃ phalam
अपने कर्म में लगे हुए लोगों और शूरों को क्या फल मिलता है? सत्य का क्या फल बताया गया है और ब्रह्मचर्य का क्या फल है?
श्लोक 6 (13.110.6)
पितृशुश्रूषणे किञ्च मातृशुश्रूषणे तथा । आचार्यगुरुशुश्रूषा स्वनुक्रोशानुकम्पने ॥
pitṛśuśrūṣaṇe kiñca mātṛśuśrūṣaṇe tathā | ācāryaguruśuśrūṣā svanukrośānukampane
पिता की सेवा का क्या फल है और माता की सेवा का भी क्या? आचार्य और गुरु की सेवा का क्या, तथा दया और अनुकम्पा का क्या फल है?
श्लोक 7 (13.110.7)
एतत्सर्वमशेषेण पितामह यथातथम् । वेत्तुमिच्छामि धर्मज्ञ परं कौतूहलं हि मे ॥
etatsarvamaśeṣeṇa pitāmaha yathātatham | vettumicchāmi dharmajña paraṃ kautūhalaṃ hi me
हे पितामह, हे धर्मज्ञ, यह सब मैं पूर्ण रूप से और यथार्थ जानना चाहता हूँ; मुझे बड़ी उत्सुकता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (13.110.8)
यो व्रतं वै यथोद्दिष्टं तथा सम्प्रतिपद्यते । अखण्डं सम्यगारभ्य तस्य लोकाः सनातनाः ॥
yo vrataṃ vai yathoddiṣṭaṃ tathā sampratipadyate | akhaṇḍaṃ samyagārabhya tasya lokāḥ sanātanāḥ
भीष्म बोले: जो व्रत को जैसा बताया गया है वैसा ही, भली-भाँति आरम्भ करके अखण्ड रूप से निभाता है, उसे सनातन लोक मिलते हैं।
श्लोक 9 (13.110.9)
नियमानां फलं राजन्प्रत्यक्षमिह दृश्यते । नियमानां क्रतूनां च त्वयाऽवाप्तमिदं फलम् ॥
niyamānāṃ phalaṃ rājanpratyakṣamiha dṛśyate | niyamānāṃ kratūnāṃ ca tvayā'vāptamidaṃ phalam
हे राजन्, नियमों का फल यहीं प्रत्यक्ष दिखाई देता है; नियमों और यज्ञों से तुमने यह फल पाया है।
श्लोक 10 (13.110.10)
स्वधीतस्यापि च फलं दृश्यतेऽमुत्र चेह च । इह लोकेऽर्थवान्नित्यं ब्रह्मलोके च मोदते ॥
svadhītasyāpi ca phalaṃ dṛśyate'mutra ceha ca | iha loke'rthavānnityaṃ brahmaloke ca modate
भली-भाँति किए हुए अध्ययन का फल परलोक में भी दिखता है और इस लोक में भी: इस लोक में वह सदा धनवान रहता है और ब्रह्मलोक में आनन्द करता है।
श्लोक 11 (13.110.11)
दमस्य तु फलं राजञ्शृणु त्वं विस्तरेण मे । दान्ताः सर्वत्र सुखिनो दान्ताः सर्वत्र निर्वृताः । यत्रेच्छागामिनो दान्ताः सर्वशत्रुनिषूदनाः ॥
damasya tu phalaṃ rājañśṛṇu tvaṃ vistareṇa me | dāntāḥ sarvatra sukhino dāntāḥ sarvatra nirvṛtāḥ | yatrecchāgāmino dāntāḥ sarvaśatruniṣūdanāḥ
हे राजन्, अब दम का फल मुझसे विस्तार से सुनो। जितेन्द्रिय लोग सर्वत्र सुखी रहते हैं, सर्वत्र सन्तुष्ट रहते हैं; वे जहाँ चाहें वहाँ जाते हैं और सब शत्रुओं का नाश करने वाले होते हैं।
श्लोक 12 (13.110.12)
प्रार्थयन्ति च यद्दान्ता लभन्ते तन्न संशयः । युज्यन्ते सर्वकामैर्हि दान्ताः सर्वत्र पाण्डव ॥
prārthayanti ca yaddāntā labhante tanna saṃśayaḥ | yujyante sarvakāmairhi dāntāḥ sarvatra pāṇḍava
जितेन्द्रिय लोग जो माँगते हैं, वह पा लेते हैं, इसमें संदेह नहीं। हे पाण्डव, वे सर्वत्र सब कामनाओं से युक्त रहते हैं।
श्लोक 13 (13.110.13)
स्वर्गे यथा प्रमोदन्ते तपसा विक्रमेण च । दानैर्यज्ञैश्च विविधैस्तथा दान्ताः क्षमान्विताः ॥
svarge yathā pramodante tapasā vikrameṇa ca | dānairyajñaiśca vividhaistathā dāntāḥ kṣamānvitāḥ
जैसे लोग तप, पराक्रम, दान और अनेक यज्ञों से स्वर्ग में आनन्द करते हैं, वैसे ही क्षमाशील जितेन्द्रिय लोग भी आनन्द करते हैं।
श्लोक 14 (13.110.14)
दानाद्दमो विशिष्टो हि ददत्किञ्चिद्द्विजातये । दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद्दानात्परंदमः । यस्तु दद्यादकुप्यन्हि तस्य लोकाः सनातनाः । क्रोधो हन्ति हि यद्दानं तस्माद्दानाद्वरो दमः ॥
dānāddamo viśiṣṭo hi dadatkiñciddvijātaye | dātā kupyati no dāntastasmāddānātparaṃdamaḥ | yastu dadyādakupyanhi tasya lokāḥ sanātanāḥ | krodho hanti hi yaddānaṃ tasmāddānādvaro damaḥ
दान से दम श्रेष्ठ है; जो ब्राह्मण को कुछ देता है, वह दाता क्रोध कर सकता है, पर संयमी क्रोध नहीं करता, इसलिए दान से दम बढ़कर है। जो बिना क्रोध किए देता है, उसे सनातन लोक मिलते हैं। क्रोध दान को नष्ट कर देता है, इसलिए दान से दम श्रेष्ठ है।
श्लोक 15 (13.110.15)
अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि । ऋषीणां सर्वलोकेषु यानि ते यान्ति देवताः ॥
adṛśyāni mahārāja sthānānyayutaśo divi | ṛṣīṇāṃ sarvalokeṣu yāni te yānti devatāḥ
हे महाराज, स्वर्ग में ऋषियों के सब लोकों में अदृश्य स्थान हज़ारों की संख्या में हैं, जहाँ देवता जाते हैं।
श्लोक 16 (13.110.16)
दमेन यानि नृपते गच्छन्ति परमर्षयः । कामयाना महत्स्थानं तस्माद्दानात्परं दमः ॥
damena yāni nṛpate gacchanti paramarṣayaḥ | kāmayānā mahatsthānaṃ tasmāddānātparaṃ damaḥ
हे नरपति, जिन महान स्थानों को परम ऋषि उनकी कामना करके दम के द्वारा पाते हैं, उसी कारण दान से दम श्रेष्ठ है।
श्लोक 17 (13.110.17)
विद्यादानाद्वरं नास्ति वेदविद्या महाफलाः । अध्यापकः परिक्लेशादक्षयं फलमश्नुते ॥
vidyādānādvaraṃ nāsti vedavidyā mahāphalāḥ | adhyāpakaḥ parikleśādakṣayaṃ phalamaśnute
विद्यादान से बढ़कर कुछ नहीं है; वेदविद्या महान फल देने वाली है। अध्यापक अपने परिश्रम के कारण अक्षय फल भोगता है।
श्लोक 18 (13.110.18)
विधिवत्पावकं हुत्वा ब्रह्मलोके नराधिप । अधीत्यापि हि यो वेदान्न्यायविद्भ्यः प्रयच्छति । गुरुकर्मप्रशंसी तु सोपि स्वर्गे महीयते ॥
vidhivatpāvakaṃ hutvā brahmaloke narādhipa | adhītyāpi hi yo vedānnyāyavidbhyaḥ prayacchati | gurukarmapraśaṃsī tu sopi svarge mahīyate
हे नरेश्वर, विधिपूर्वक अग्नि में हवन करके वह ब्रह्मलोक में आनन्द करता है। और जो वेद पढ़कर उन्हें विधि जानने वालों को देता है तथा गुरु के कर्म की प्रशंसा करता है, वह भी स्वर्ग में सम्मानित होता है।
श्लोक 19 (13.110.19)
क्षत्रियोऽध्ययने युक्तो यजने दानकर्मणि । युद्धे यश्च परित्राता सोपि स्वर्गे महीयते ॥
kṣatriyo'dhyayane yukto yajane dānakarmaṇi | yuddhe yaśca paritrātā sopi svarge mahīyate
जो क्षत्रिय अध्ययन, यज्ञ और दान में लगा रहता है और युद्ध में रक्षा करता है, वह भी स्वर्ग में सम्मानित होता है।
श्लोक 20 (13.110.20)
वैश्यः स्वकर्मनिरतः प्रदानाल्लभते महत् । शूद्रः स्वकर्मनिरतः स्वर्गं शुश्रूषयाऽऽर्च्छति ॥
vaiśyaḥ svakarmanirataḥ pradānāllabhate mahat | śūdraḥ svakarmanirataḥ svargaṃ śuśrūṣayā''rcchati
अपने कर्म में लगा हुआ वैश्य दान से महान फल पाता है; अपने कर्म में लगा हुआ शूद्र सेवा से स्वर्ग पाता है।
श्लोक 21 (13.110.21)
शूरा बहुविधाः प्रोक्तास्तेषामर्थास्तु मे शृणु । शूरान्वयानां निर्दिष्टं फलं शूरस्य चैव हि ॥
śūrā bahuvidhāḥ proktāsteṣāmarthāstu me śṛṇu | śūrānvayānāṃ nirdiṣṭaṃ phalaṃ śūrasya caiva hi
शूर अनेक प्रकार के कहे गए हैं; उनके भेद मुझसे सुनो। शूरों के वंशों का और स्वयं शूर का फल बताया गया है।
श्लोक 22 (13.110.22)
यज्ञशूरा दमे शूराः सत्यशूरास्तथा परे । युद्धशूरास्तथैवोक्ता दानशूराश्च मानवाः ॥
yajñaśūrā dame śūrāḥ satyaśūrāstathā pare | yuddhaśūrāstathaivoktā dānaśūrāśca mānavāḥ
यज्ञ में शूर, दम में शूर, सत्य में शूर और दूसरे शूर बताए गए हैं; वैसे ही युद्ध के शूर और दान के शूर मनुष्य भी कहे गए हैं।
श्लोक 23 (13.110.23)
बुद्धिशूरास्तथैवान्ये क्षमाशूरास्तथा परे । साङ्ख्यशूराश्च बहवो योगशूरास्तथा परे । अरण्ये गृहवासे च त्यागे शूरास्तथा परे ॥
buddhiśūrāstathaivānye kṣamāśūrāstathā pare | sāṅkhyaśūrāśca bahavo yogaśūrāstathā pare | araṇye gṛhavāse ca tyāge śūrāstathā pare
कुछ बुद्धि के शूर हैं, कुछ क्षमा के शूर; बहुत से साङ्ख्य के शूर हैं और दूसरे योग के शूर; और कुछ वन में, कुछ गृहस्थी में और कुछ त्याग में शूर हैं।
श्लोक 24 (13.110.24)
आर्जवे च तथा शूराः शमे वर्तन्ति मानवाः । तैस्तैश्च नियमैः शूरा बहवः सन्ति चापरे । वेदाध्ययनशूराश्च शूराश्चाध्यापने रताः ॥
ārjave ca tathā śūrāḥ śame vartanti mānavāḥ | taistaiśca niyamaiḥ śūrā bahavaḥ santi cāpare | vedādhyayanaśūrāśca śūrāścādhyāpane ratāḥ
मनुष्य सरलता में भी शूर होते हैं और शान्ति में स्थित रहते हैं; और भी बहुत-से लोग अलग-अलग नियमों के पालन में शूर हैं — वेदाध्ययन के शूर और अध्यापन में लगे हुए शूर।
श्लोक 25 (13.110.25)
गुरुशुश्रूषया शूराः पितृशुश्रूषया परे । मातृशुश्रूषया शूरा भैक्ष्यशूरास्तथा परे ॥
guruśuśrūṣayā śūrāḥ pitṛśuśrūṣayā pare | mātṛśuśrūṣayā śūrā bhaikṣyaśūrāstathā pare
कुछ गुरु की सेवा से शूर हैं, कुछ पिता की सेवा से; कुछ माता की सेवा से शूर हैं और कुछ भिक्षा से निर्वाह करने में शूर हैं।
श्लोक 26 (13.110.26)
अरण्ये गृहवासे च शूराश्चातिथिपूजने । सर्वे यान्ति पराँल्लोकान्स्वकर्मफलनिर्जितान् ॥
araṇye gṛhavāse ca śūrāścātithipūjane | sarve yānti parām̐llokānsvakarmaphalanirjitān
वन में, गृहस्थी में और अतिथि-पूजन में जो शूर हैं, वे सब अपने कर्मों के फल से जीते हुए उच्चतम लोकों को जाते हैं।
श्लोक 27 (13.110.27)
धारणं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् । सत्यं च ब्रुवतो नित्यं समं वा स्यान्नवा समम् ॥
dhāraṇaṃ sarvavedānāṃ sarvatīrthāvagāhanam | satyaṃ ca bruvato nityaṃ samaṃ vā syānnavā samam
सब वेदों को धारण करना, सब तीर्थों में स्नान करना और सदा सत्य बोलना — ये समान हो भी सकते हैं और नहीं भी।
श्लोक 28 (13.110.28)
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥
aśvamedhasahasraṃ ca satyaṃ ca tulayā dhṛtam | aśvamedhasahasrāddhi satyameva viśiṣyate
हज़ार अश्वमेध यज्ञ और सत्य को तराजू पर तोला जाए तो सत्य ही हज़ार अश्वमेधों से भारी ठहरता है।
श्लोक 29 (13.110.29)
सत्येन सूर्यस्तपति सत्येनाग्निः प्रदीप्यते । सत्येन मरुतो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
satyena sūryastapati satyenāgniḥ pradīpyate | satyena maruto vānti sarvaṃ satye pratiṣṭhitam
सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से अग्नि प्रज्वलित होती है, सत्य से वायु चलती है; सब कुछ सत्य में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 30 (13.110.30)
सत्येन देवाः प्रीयन्ते पितरो ब्राह्मणास्तथा । सत्यमाहुः परो धर्मस्तस्मात्सत्यं न लोपयेत् ॥
satyena devāḥ prīyante pitaro brāhmaṇāstathā | satyamāhuḥ paro dharmastasmātsatyaṃ na lopayet
सत्य से देवता, पितर और ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं। सत्य को परम धर्म कहा गया है, इसलिए सत्य का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
श्लोक 31 (13.110.31)
मुनयः सत्यनिरता मुनयः सत्यविक्रमाः । मुनयः सत्यशपथास्तस्मात्सत्यं विशिष्यते ॥
munayaḥ satyaniratā munayaḥ satyavikramāḥ | munayaḥ satyaśapathāstasmātsatyaṃ viśiṣyate
मुनि सत्य में लगे रहते हैं, मुनि सत्य के बल से पराक्रमी हैं, मुनि सत्य की ही शपथ खाते हैं; इसलिए सत्य सबसे श्रेष्ठ है।
श्लोक 32 (13.110.32)
सत्यवन्तः सत्यलोके मोदन्ते भरतर्षभ । दमः सत्यफलावाप्तिरुक्ता सर्वात्मना मया ॥
satyavantaḥ satyaloke modante bharatarṣabha | damaḥ satyaphalāvāptiruktā sarvātmanā mayā
हे भरतश्रेष्ठ, सत्यवादी लोग सत्यलोक में आनन्द करते हैं। दम और सत्य का फल पाना, ये दोनों मैंने तुम्हें पूर्ण रूप से बता दिए।
श्लोक 33 (13.110.33)
असंशयं विनीतात्मा स वै स्वर्गे महीयते । ब्रह्मचर्यस्य च गुणं शृणु त्वं वसुधाधिप ॥
asaṃśayaṃ vinītātmā sa vai svarge mahīyate | brahmacaryasya ca guṇaṃ śṛṇu tvaṃ vasudhādhipa
इसमें संदेह नहीं कि संयत चित्त वाला पुरुष स्वर्ग में सम्मानित होता है। हे पृथ्वीपति, अब ब्रह्मचर्य के गुण सुनो।
श्लोक 34 (13.110.34)
आजन्ममरणाद्यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह । न तस्य किञ्चिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप ॥
ājanmamaraṇādyastu brahmacārī bhavediha | na tasya kiñcidaprāpyamiti viddhi narādhipa
जो जन्म से मृत्यु तक ब्रह्मचारी रहता है, हे नराधिप, जानो कि उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है।
श्लोक 35 (13.110.35)
बह्व्यः कोट्यस्त्वृषीणां तु ब्रह्मलोके वसन्त्युत । सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम् ॥
bahvyaḥ koṭyastvṛṣīṇāṃ tu brahmaloke vasantyuta | satye ratānāṃ satataṃ dāntānāmūrdhvaretasām
ब्रह्मलोक में ऋषियों की अनेक करोड़ संख्या निवास करती है, जो सदा सत्य में रत, संयमी और ऊर्ध्वरेता हैं।
श्लोक 36 (13.110.36)
ब्रह्मचर्यं दहेद्राजन्सर्वपापान्युपासितम् । ब्राह्मणेन विशेषेण ब्राह्मणो ह्यग्निरुच्यते ॥
brahmacaryaṃ dahedrājansarvapāpānyupāsitam | brāhmaṇena viśeṣeṇa brāhmaṇo hyagnirucyate
हे राजन्, पालन किया हुआ ब्रह्मचर्य सब पापों को जला देता है; ब्राह्मण के द्वारा पालन करने पर विशेष रूप से, क्योंकि ब्राह्मण को अग्नि कहा जाता है।
श्लोक 37 (13.110.37)
प्रत्यक्षं हि तथा ह्येतद्ब्राह्मणेषु तपस्विषु । बिभेति हि यथा शक्रो ब्रह्मचारिप्रधर्षितः ॥
pratyakṣaṃ hi tathā hyetadbrāhmaṇeṣu tapasviṣu | bibheti hi yathā śakro brahmacāripradharṣitaḥ
तपस्वी ब्राह्मणों में यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है: ब्रह्मचारी से पराजित होने पर शक्र भी भयभीत हो जाते हैं।
श्लोक 38 (13.110.38)
तद्ब्रह्मचर्यस्य फलमृषीणामिह दृश्यते । मातापित्रोः पूजने यो धर्मस्तमपि मे शृणु ॥
tadbrahmacaryasya phalamṛṣīṇāmiha dṛśyate | mātāpitroḥ pūjane yo dharmastamapi me śṛṇu
ऋषियों में ब्रह्मचर्य का फल यहाँ इस प्रकार दिखाई देता है। अब माता-पिता की पूजा का जो धर्म है, उसे भी मुझसे सुनो।
श्लोक 39 (13.110.39)
शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत्कदाचन । मातरं भ्रातरं वाऽपि गुरुमाचार्यमेव च ॥
śuśrūṣate yaḥ pitaraṃ na cāsūyetkadācana | mātaraṃ bhrātaraṃ vā'pi gurumācāryameva ca
जो पिता की सेवा करता है और कभी उनसे द्वेष नहीं करता, और माता, भाई, गुरु और आचार्य की भी इसी प्रकार सेवा करता है —
श्लोक 40 (13.110.40)
तस्य राजन्फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमर्चितम् । न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषयाऽऽत्मवान् ॥
tasya rājanphalaṃ viddhi svarloke sthānamarcitam | na ca paśyeta narakaṃ guruśuśrūṣayā''tmavān
हे राजन्, जानो कि उसका फल स्वर्गलोक में सम्मानित स्थान है; और गुरुजनों की सेवा करने वाला आत्मसंयमी पुरुष नरक नहीं देखता।