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अनुशासन पर्व · अध्याय 112

कपिला गौओं की उत्पत्ति

युधिष्ठिर भीष्म से गोदान के गुण फिर से कहने का अनुरोध करते हैं। भीष्म बताते हैं कि कैसी गौएँ नहीं देनी चाहिए, सब गौओं में कपिला की प्रशंसा करते हैं और उसका कारण कहते हैं: प्रजापति ने प्रजा के पोषण के लिए अमृत पिया तो उनसे सुरभि और कपिला गौएँ प्रकट हुईं; अमृत का झाग शिव के मस्तक पर गिरा और उनके क्रोध से कुछ गौएँ अनेक रंगों की हो गईं; तब प्रजापति ने उन्हें वृषभ देकर प्रसन्न किया। इसके बाद युधिष्ठिर बड़ी संख्या में गौओं का दान करते हैं।

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (13.112.1)

ततो युधिष्ठिरे राजा भूयः शान्तनवं नृपम् । गोदानविस्तरं धीमान्पप्रच्छ विनयान्वितः ॥

tato yudhiṣṭhire rājā bhūyaḥ śāntanavaṃ nṛpam | godānavistaraṃ dhīmānpapraccha vinayānvitaḥ

तब बुद्धिमान् और विनयशील राजा युधिष्ठिर ने शान्तनु-पुत्र भीष्म से फिर विस्तार के साथ गोदान का वर्णन करने को कहा।

श्लोक 2 (13.112.2)

गोप्रदानगुणान्सम्यक् पुनर्मे ब्रूहि भारत । न हि तृप्याम्यहं वीर शृण्वानोऽमृतमीदृशम् ॥

gopradānaguṇānsamyak punarme brūhi bhārata | na hi tṛpyāmyahaṃ vīra śṛṇvāno'mṛtamīdṛśam

"हे भारत! गोदान के गुण मुझे फिर अच्छी तरह बताइए। हे वीर! ऐसा अमृत-तुल्य वचन सुनते हुए मैं तृप्त नहीं होता।"

श्लोक 3 (13.112.3)

इत्युक्तो धर्मराजेन तदा शान्तनवो नृपः । सम्यगाह गुणांस्तस्मै गोप्रदानस्य केवलान् ॥

ityukto dharmarājena tadā śāntanavo nṛpaḥ | samyagāha guṇāṃstasmai gopradānasya kevalān

धर्मराज के इस प्रकार कहने पर शान्तनु-पुत्र भीष्म ने तब उन्हें गोदान के गुणों का ही भली-भाँति वर्णन सुनाया।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (13.112.4)

वत्सलां गुणसम्पन्नां तरुणीं वस्त्रसंयुताम् । दत्त्वेदृशीं गां विप्राय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

vatsalāṃ guṇasampannāṃ taruṇīṃ vastrasaṃyutām | dattvedṛśīṃ gāṃ viprāya sarvapāpaiḥ pramucyate

जो मनुष्य बछड़े वाली, उत्तम गुणों से युक्त, तरुण और वस्त्र से ढकी हुई ऐसी गौ ब्राह्मण को देता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 5 (13.112.5)

असुर्या नाम ते लोका गां दत्त्वा तान्न गच्छति ॥

asuryā nāma te lokā gāṃ dattvā tānna gacchati

'असुर्य' नाम के जो लोक हैं, गौ का दान करने वाला उनमें नहीं जाता।

श्लोक 6 (13.112.6)

पीतोदकां जग्धतृणां नष्टक्षीरां निरिन्द्रियाम् । जरारोगोपसम्पन्नां जीर्णां वापीमिवाजलाम् । दत्त्वा तमः प्रविशति द्विजं क्लेशेन योजयेत् ॥

pītodakāṃ jagdhatṛṇāṃ naṣṭakṣīrāṃ nirindriyām | jarārogopasampannāṃ jīrṇāṃ vāpīmivājalām | dattvā tamaḥ praviśati dvijaṃ kleśena yojayet

जो गौ पानी पी चुकी और घास चर चुकी हो, जिसका दूध नष्ट हो गया हो, जिसकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गई हों, जो बुढ़ापे और रोग से ग्रस्त हो और सूखी बावड़ी की तरह जीर्ण हो, ऐसी गौ को देकर मनुष्य अन्धकार में प्रवेश करता है और ब्राह्मण को कष्ट में डालता है।

श्लोक 7 (13.112.7)

रुष्टा दुष्टा व्याधिता दुर्बला वा । नो दातव्या याश्च मूल्यैरदत्तैः । क्लेशैर्विप्रं योऽफलैः संयुनक्ति । तस्याऽवीर्याश्चाफलाश्चैव लोकाः ॥

ruṣṭā duṣṭā vyādhitā durbalā vā | no dātavyā yāśca mūlyairadattaiḥ | kleśairvipraṃ yo'phalaiḥ saṃyunakti | tasyā'vīryāścāphalāścaiva lokāḥ

जो गौ क्रोधी, दुष्ट, रोगी या दुर्बल हो, उसे नहीं देना चाहिए; और जिसका मूल्य चुकाया न गया हो, उसे भी नहीं देना चाहिए। जो मनुष्य ऐसी निष्फल गौओं से ब्राह्मण को क्लेश में डालता है, उसके लोक बलहीन और निष्फल हो जाते हैं।

श्लोक 8 (13.112.8)

बलान्विताः शीलवीर्योपपन्नाः । सर्वे प्रशंसन्ति सुगन्धवत्यः । यथा हि गङ्गा सरितां वरिष्ठा । तथाऽर्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ॥

balānvitāḥ śīlavīryopapannāḥ | sarve praśaṃsanti sugandhavatyaḥ | yathā hi gaṅgā saritāṃ variṣṭhā | tathā'rjunīnāṃ kapilā variṣṭhā

बलवती, शील और वीर्य से सम्पन्न तथा सुगन्धित गौओं की सब लोग प्रशंसा करते हैं। जैसे गंगा नदियों में श्रेष्ठ है, वैसे ही गौओं में कपिला श्रेष्ठ है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 9 (13.112.9)

कस्मात्समाने बहुलाप्रदाने । सद्भिः प्रशस्तं कपिलाप्रदानम् । विशेषमिच्छामि महाप्रभावं । श्रोतुं समर्थोस्मि भवान्प्रवक्तुम् ॥

kasmātsamāne bahulāpradāne | sadbhiḥ praśastaṃ kapilāpradānam | viśeṣamicchāmi mahāprabhāvaṃ | śrotuṃ samarthosmi bhavānpravaktum

"जब किसी भी दुधारू गौ का दान समान ही है, तब सज्जन कपिला गौ के दान की ही विशेष प्रशंसा क्यों करते हैं? मैं इस विशेष और महान् प्रभाव वाली बात को सुनना चाहता हूँ; मैं सुनने में समर्थ हूँ और आप कहने में समर्थ हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (13.112.10)

वृद्धानां ब्रुवतां श्रुत्वा कपिलानामथोद्भवम् । वक्ष्यामि तदशेषेण रोहिण्यो निर्मिता यथा ॥

vṛddhānāṃ bruvatāṃ śrutvā kapilānāmathodbhavam | vakṣyāmi tadaśeṣeṇa rohiṇyo nirmitā yathā

वृद्धजनों से कपिला गौओं की उत्पत्ति के विषय में जो कुछ मैंने सुना है और रोहिणी गौएँ जिस प्रकार रची गईं, वह सब मैं पूरा-पूरा कहूँगा।

श्लोक 11 (13.112.11)

प्रजाः सृजेति चादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयंभुवा । नासृजद्वृत्तिमेवाग्रे प्रजानां हितकाम्यया ॥

prajāḥ sṛjeti cādiṣṭaḥ pūrvaṃ dakṣaḥ svayaṃbhuvā | nāsṛjadvṛttimevāgre prajānāṃ hitakāmyayā

पूर्वकाल में स्वयम्भू ने दक्ष को आज्ञा दी कि "प्रजाओं की सृष्टि करो।" प्रजा के हित की इच्छा से दक्ष ने पहले उनकी जीविका की सृष्टि नहीं की।

श्लोक 12 (13.112.12)

यथा ह्यमृतमाश्रित्य वर्तयन्ति दिवौकसः । तथा वृत्तिं समाश्रित्य वर्तयन्ति प्रजा विभो ॥

yathā hyamṛtamāśritya vartayanti divaukasaḥ | tathā vṛttiṃ samāśritya vartayanti prajā vibho

हे प्रभो! जैसे देवता अमृत के आश्रय से जीवित रहते हैं, वैसे ही प्रजा जीविका के आश्रय से जीवित रहती है।

श्लोक 13 (13.112.13)

अचरेभ्यश्च भूतेभ्यश्चराः श्रेष्ठास्ततो नराः । ब्राह्मणाश्च ततः श्रेष्ठास्तेषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥

acarebhyaśca bhūtebhyaścarāḥ śreṣṭhāstato narāḥ | brāhmaṇāśca tataḥ śreṣṭhāsteṣu yajñāḥ pratiṣṭhitāḥ

अचर प्राणियों से चर श्रेष्ठ हैं, उनसे मनुष्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, और उन्हीं में यज्ञ प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 14 (13.112.14)

यज्ञैराप्यायते सोमः स च गोषु प्रतिष्ठितः । ताभ्यो देवाः प्रमोदन्ते प्रजानां वृत्तिरासु च ॥

yajñairāpyāyate somaḥ sa ca goṣu pratiṣṭhitaḥ | tābhyo devāḥ pramodante prajānāṃ vṛttirāsu ca

यज्ञों से सोम पुष्ट होता है और वह सोम गौओं में प्रतिष्ठित है। उन्हीं से देवता आनन्दित होते हैं और उन्हीं में प्रजा की जीविका है।

श्लोक 15 (13.112.15)

ततः प्रजासु सृष्टासु दक्षाद्यैः क्षुधिताः प्रजाः । प्रजापतिमुपाधावन्विनिश्चित्य चतुर्मुखम् ॥

tataḥ prajāsu sṛṣṭāsu dakṣādyaiḥ kṣudhitāḥ prajāḥ | prajāpatimupādhāvanviniścitya caturmukham

तब दक्ष आदि के द्वारा प्रजा की सृष्टि हो जाने पर भूखी प्रजा ने चार मुख वाले प्रजापति के पास जाने का निश्चय किया और उनके पास दौड़ी।

श्लोक 16 (13.112.16)

प्रजातान्येव भूतानि प्राक्रोशन्वृत्तिकाङ्क्षया । वृत्तिदं चान्वपद्यन्त तृषिताः पितृमातृवत् ॥

prajātānyeva bhūtāni prākrośanvṛttikāṅkṣayā | vṛttidaṃ cānvapadyanta tṛṣitāḥ pitṛmātṛvat

उत्पन्न हुए प्राणी जीविका की इच्छा से पुकारने लगे और प्यासे होकर जीविका देने वाले के पास वैसे ही पहुँचे, जैसे बालक माता-पिता के पास जाते हैं।

श्लोक 17 (13.112.17)

इतीदं मनसा गत्वा प्रजासर्गार्थमात्मनः । प्रजापतिर्बलाधानममृतं प्रापिबत्तदा । शंसतस्तस्य तृप्तिं तु गन्धात्सुरभिरुत्थिता ॥

itīdaṃ manasā gatvā prajāsargārthamātmanaḥ | prajāpatirbalādhānamamṛtaṃ prāpibattadā | śaṃsatastasya tṛptiṃ tu gandhātsurabhirutthitā

ऐसा मन में विचारकर प्रजा की सृष्टि के लिए प्रजापति ने तब बल देने वाला अमृत पिया। जब वे अपनी तृप्ति प्रकट कर रहे थे, तब उसकी गन्ध से सुरभि प्रकट हुई।

श्लोक 18 (13.112.18)

मुखजा साऽसृजद्धातुः सुरभिर्लोकमातरम् । दर्शनीयरसं वृत्तिं सुरभिं मुखजां सुताम् ॥

mukhajā sā'sṛjaddhātuḥ surabhirlokamātaram | darśanīyarasaṃ vṛttiṃ surabhiṃ mukhajāṃ sutām

धाता के मुख से उत्पन्न लोकमाता सुरभि ने अपने मुख से उत्पन्न होने वाली पुत्री को रचा, दूसरी सुरभि को, जो जीविका का साधन और सुन्दर रस वाली थी।

श्लोक 19 (13.112.19)

साऽसृजत्सौरभेयीस्तु सुरभिर्लोकमातृकाः । सुवर्णवर्णाः कपिलाः प्रजानां वृत्तिधेनवः ॥

sā'sṛjatsaurabheyīstu surabhirlokamātṛkāḥ | suvarṇavarṇāḥ kapilāḥ prajānāṃ vṛttidhenavaḥ

लोकमाता सुरभि ने फिर सौरभेयी गौओं को रचा, जो सुनहरे रंग की कपिला गौएँ हैं और प्रजा की जीविका देने वाली धेनुएँ हैं।

श्लोक 20 (13.112.20)

तासाममृतवृत्तीनां क्षरन्तीनां समन्ततः । बभूवामृतजः फेनः स्रवन्तीनामिवोर्मिजः ॥

tāsāmamṛtavṛttīnāṃ kṣarantīnāṃ samantataḥ | babhūvāmṛtajaḥ phenaḥ sravantīnāmivormijaḥ

अमृत ही जिनकी जीविका था, वे गौएँ जब चारों ओर दूध बहाने लगीं, तब बहती नदियों की लहरों के झाग की तरह अमृत से उत्पन्न झाग उठा।

श्लोक 21 (13.112.21)

स वत्समुखविभ्रष्टो भवस्य भुवि तिष्ठतः । शिरस्यवापतत्क्रुद्धः स तदैक्षत च प्रभुः । ललाटप्रभवेणाक्ष्णा रोहिणीं प्रदहन्निव ॥

sa vatsamukhavibhraṣṭo bhavasya bhuvi tiṣṭhataḥ | śirasyavāpatatkruddhaḥ sa tadaikṣata ca prabhuḥ | lalāṭaprabhaveṇākṣṇā rohiṇīṃ pradahanniva

बछड़े के मुँह से गिरा हुआ वह झाग पृथ्वी पर खड़े हुए भव के मस्तक पर जा पड़ा। तब क्रुद्ध हुए प्रभु ने मानो रोहिणी गौओं को जला देने के लिए अपने ललाट में उत्पन्न नेत्र से देखा।

श्लोक 22 (13.112.22)

तत्तेजस्तु ततो रौद्रं कपिलां गां विशाम्पते । नानावर्णत्वमनयन्मेघानिव दिवाकरः ॥

tattejastu tato raudraṃ kapilāṃ gāṃ viśāmpate | nānāvarṇatvamanayanmeghāniva divākaraḥ

हे प्रजापालक! तब उनके उस भयंकर तेज ने कपिला गौओं को अनेक रंगों का बना दिया, जैसे सूर्य बादलों को अनेक रंगों का कर देता है।

श्लोक 23 (13.112.23)

यास्तु तस्मादपक्रम्य सोममेवाभिसंश्रिताः । यथोत्पन्नाः स्ववर्णस्था न नीताश्चान्यवर्णतां ॥

yāstu tasmādapakramya somamevābhisaṃśritāḥ | yathotpannāḥ svavarṇasthā na nītāścānyavarṇatāṃ

किन्तु जो गौएँ उनके पास से हटकर सोम की शरण में चली गईं, वे अपने जन्म के रंग में ही रहीं; वे दूसरे रंग की नहीं की गईं।

श्लोक 24 (13.112.24)

अथ क्रुद्धं महादेवं प्रजापतिरभाषत । अमृतेनावसिक्तस्त्वं नोच्छिष्टं विद्यते गवाम् ॥

atha kruddhaṃ mahādevaṃ prajāpatirabhāṣata | amṛtenāvasiktastvaṃ nocchiṣṭaṃ vidyate gavām

तब प्रजापति ने क्रोधित महादेव से कहा: "तुम अमृत से सींचे गए हो; गौओं में जूठन नाम की कोई वस्तु नहीं होती।"

प्रजापतिरुवाच

श्लोक 25 (13.112.25)

यथा ह्यमृतमादाय सोमो विष्यन्दते पुनः । तथा क्षीरं क्षरन्त्येता रोहिण्योऽमृतसम्भवाः ॥

yathā hyamṛtamādāya somo viṣyandate punaḥ | tathā kṣīraṃ kṣarantyetā rohiṇyo'mṛtasambhavāḥ

"जैसे सोम अमृत को ग्रहण करके फिर उसे बहाता है, वैसे ही अमृत से उत्पन्न ये रोहिणी गौएँ दूध बहाती हैं।"

श्लोक 26 (13.112.26)

न दुष्यत्यनिलो नाग्निर्न सुवर्णं न चोदधिः । नामृतेनामृतं पीतं न वत्सैर्दुष्यते पयः ॥

na duṣyatyanilo nāgnirna suvarṇaṃ na codadhiḥ | nāmṛtenāmṛtaṃ pītaṃ na vatsairduṣyate payaḥ

"न वायु दूषित होता है, न अग्नि, न सोना और न समुद्र; अमृत के द्वारा पिया गया अमृत दूषित नहीं होता और बछड़ों के पीने से दूध दूषित नहीं होता।"

श्लोक 27 (13.112.27)

इमाँल्लोकान्भरिष्यन्ति हविषा प्रस्रवेण च । आसामैश्वर्यमिच्छन्ति सर्वेऽमृतमयं शुभम् ॥

imām̐llokānbhariṣyanti haviṣā prasraveṇa ca | āsāmaiśvaryamicchanti sarve'mṛtamayaṃ śubham

"ये हविष्य और दूध की धारा से इन लोकों का भरण-पोषण करेंगी। सब लोग इनका स्वामित्व चाहते हैं; ये अमृतमय और शुभ हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 28 (13.112.28)

वृषभं च ददौ तस्मै भगवाँल्लोकभावनः । प्रसादयामास मनस्तेन रुद्रस्य भारत ॥

vṛṣabhaṃ ca dadau tasmai bhagavām̐llokabhāvanaḥ | prasādayāmāsa manastena rudrasya bhārata

फिर लोकों को रचने वाले भगवान् ने उन्हें एक वृषभ दिया और हे भारत! उसके द्वारा रुद्र के मन को प्रसन्न किया।

श्लोक 29 (13.112.29)

प्रीतश्चापि महादेवश्चकार वृषभं तदा । ध्वजं च वाहनं चैव तस्मात्स वृषभध्वजः ॥

prītaścāpi mahādevaścakāra vṛṣabhaṃ tadā | dhvajaṃ ca vāhanaṃ caiva tasmātsa vṛṣabhadhvajaḥ

महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने उस वृषभ को अपना ध्वज और वाहन बना लिया; इसी से वे वृषभध्वज कहलाते हैं।

श्लोक 30 (13.112.30)

ततो देवैर्महादेवस्तदा पशुपतिः कृतः । ईश्वरः स गवां मध्ये वृषभाङ्कः प्रकीर्तितः ॥

tato devairmahādevastadā paśupatiḥ kṛtaḥ | īśvaraḥ sa gavāṃ madhye vṛṣabhāṅkaḥ prakīrtitaḥ

तब देवताओं ने महादेव को पशुपति बनाया; गौओं के बीच वे ईश्वर और वृषभ के चिह्न वाले कहे जाते हैं।

श्लोक 31 (13.112.31)

एवमव्यग्रवर्णानां कपिलानां महौजसाम् । प्रदाने प्रथमः कल्पः सर्वासामेव कीर्तितः ॥

evamavyagravarṇānāṃ kapilānāṃ mahaujasām | pradāne prathamaḥ kalpaḥ sarvāsāmeva kīrtitaḥ

इस प्रकार अपने रंग में स्थिर रहने वाली, महान् तेज वाली कपिला गौओं के दान में यही सब गौओं के लिए पहला और श्रेष्ठ नियम बताया गया है।

श्लोक 32 (13.112.32)

लोकज्येष्ठा लोकवृत्तिप्रवृत्ता । रुद्रोद्भूताः सोमविष्यन्दभूताः । सौम्याः पुण्याः कामदाः प्राणदाश्च । गा वै दत्त्वा सर्वकामप्रदः स्यात् ॥

lokajyeṣṭhā lokavṛttipravṛttā | rudrodbhūtāḥ somaviṣyandabhūtāḥ | saumyāḥ puṇyāḥ kāmadāḥ prāṇadāśca | gā vai dattvā sarvakāmapradaḥ syāt

लोक में सबसे बड़ी, लोक की जीविका में लगी हुई, रुद्र से उत्पन्न, सोम के स्राव से उत्पन्न, सौम्य, पवित्र, कामनाएँ पूरी करने वाली और प्राण देने वाली इन गौओं का दान करके मनुष्य सब कामनाओं को देने वाला हो जाता है।

श्लोक 33 (13.112.33)

इदं गवां प्रभवविधानमुत्तमं । पठन्सदा शुचिरपि मङ्गलप्रियः । विमुच्यते कलिकलुषेण मानवः । प्रियान्सुतान्धनपशुमाप्नुयात्सदा ॥

idaṃ gavāṃ prabhavavidhānamuttamaṃ | paṭhansadā śucirapi maṅgalapriyaḥ | vimucyate kalikaluṣeṇa mānavaḥ | priyānsutāndhanapaśumāpnuyātsadā

जो पवित्र और मंगलप्रिय मनुष्य गौओं की उत्पत्ति के इस उत्तम वृत्तान्त का सदा पाठ करता है, वह कलियुग के दोष से छूट जाता है और सदा प्रिय पुत्र, धन और पशु पाता है।

श्लोक 34 (13.112.34)

हव्यं कव्यं तर्पणं शान्तिकर्म । यानं वासो वृद्धबालस्य तुष्टिः । एतान्सर्वान्गोप्रदाने गुणान्वै । दाता राजन्नाप्नुयाद्वै सदैव ॥

havyaṃ kavyaṃ tarpaṇaṃ śāntikarma | yānaṃ vāso vṛddhabālasya tuṣṭiḥ | etānsarvāngopradāne guṇānvai | dātā rājannāpnuyādvai sadaiva

हव्य, कव्य, तर्पण, शान्तिकर्म, वाहन, वस्त्र और वृद्धों तथा बालकों की तुष्टि: हे राजन्! गोदान करने वाला इन सभी गुणों को सदा पाता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (13.112.35)

पितामहस्याथ निशम्य वाक्यं । राजा सह भ्रातृभिराजमीढः । सुवर्णवर्णानडुहस्तथा गाः । पार्थो ददौ ब्राह्मणसत्तमेभ्यः ॥

pitāmahasyātha niśamya vākyaṃ | rājā saha bhrātṛbhirājamīḍhaḥ | suvarṇavarṇānaḍuhastathā gāḥ | pārtho dadau brāhmaṇasattamebhyaḥ

पितामह के वचन सुनकर अजमीढ-वंशी राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सुनहरे रंग के बैल और गौएँ दीं।

श्लोक 36 (13.112.36)

तथैव तेभ्योपि ददौ द्विजेभ्यो । गवां सहस्राणि शतानि चैव । यज्ञान्समुद्धिश्य च दक्षिणार्थे । लोकान्विजेतुं परमां च कीर्तिम् ॥

tathaiva tebhyopi dadau dvijebhyo | gavāṃ sahasrāṇi śatāni caiva | yajñānsamuddhiśya ca dakṣiṇārthe | lokānvijetuṃ paramāṃ ca kīrtim

उसी प्रकार उन ब्राह्मणों को उन्होंने सैकड़ों और हजारों गौएँ दीं, लोकों को जीतने और परम कीर्ति पाने के लिए यज्ञों के उद्देश्य से और दक्षिणा के लिए।

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