अनुशासन पर्व · अध्याय 114
गौओं का वरदान और गोदान से प्राप्त लोक
वसिष्ठ सौदास को बताते हैं कि आदि में रची गई गौओं ने एक लाख वर्ष तपस्या की और ब्रह्मा से श्रेष्ठता, पवित्र करने वाले गोबर और अपने दाताओं को लोकों में पहुँचाने का वरदान पाया। फिर वे भिन्न-भिन्न रंग की गौ के दान से मिलने वाले लोक गिनाते हैं (ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, कुबेर, पितर, विश्वेदेव, वसु, साध्य, मरुत्, गन्धर्व-अप्सरा और प्रजापति के लोक) और स्वर्ग में दाता के सुखों का वर्णन करते हैं।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 1 (13.114.1)
शतं वर्षसहस्राणां तपस्तप्तं सुदुष्करम् । गोभिः पूर्वं विसृष्टाभिर्गच्छेम श्रेष्ठतामिति ॥
śataṃ varṣasahasrāṇāṃ tapastaptaṃ suduṣkaram | gobhiḥ pūrvaṃ visṛṣṭābhirgacchema śreṣṭhatāmiti
आदि में रची गई गौओं ने एक लाख वर्ष तक अत्यन्त कठिन तपस्या की, यह सोचकर: हम श्रेष्ठता को प्राप्त करें।
श्लोक 2 (13.114.2)
लोकेऽस्मिन्दक्षिणानां च सर्वासां वयमुत्तमाः । भवेम न च लिप्येम दोषेणेति परन्तप ॥
loke'smindakṣiṇānāṃ ca sarvāsāṃ vayamuttamāḥ | bhavema na ca lipyema doṣeṇeti parantapa
इस लोक में हम सभी दक्षिणाओं में उत्तम हों और किसी दोष से लिप्त न हों, हे शत्रुओं को तपाने वाले!
श्लोक 3 (13.114.3)
अस्मत्पुरीषस्नानेन जनः पूयेत सर्वदा । शकृता च पवित्रार्थं कुर्वीरन्देवमानुषाः ॥
asmatpurīṣasnānena janaḥ pūyeta sarvadā | śakṛtā ca pavitrārthaṃ kurvīrandevamānuṣāḥ
हमारे गोबर से स्नान करने से लोग सदा पवित्र हों, और देवता तथा मनुष्य पवित्रता के लिए हमारे गोबर का उपयोग करें।
श्लोक 4 (13.114.4)
तथा सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । प्रदातारश्च लोकान्नो गच्छेयुरिति मानद ॥
tathā sarvāṇi bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | pradātāraśca lokānno gaccheyuriti mānada
और सभी चर-अचर प्राणी तथा हमें देने वाले हमारे लोकों में जाएँ, हे मान देने वाले!
श्लोक 5 (13.114.5)
ताभ्यो वरं ददौ ब्रह्मा तपसोऽन्ते स्वयं प्रभुः । एवं भवन्विति विभुर्लोकांस्तारयतेति च ॥
tābhyo varaṃ dadau brahmā tapaso'nte svayaṃ prabhuḥ | evaṃ bhavanviti vibhurlokāṃstārayateti ca
तपस्या के अन्त में स्वयं प्रभु ब्रह्मा ने उन्हें वर दिया: "ऐसा ही हो," सर्वव्यापी ने कहा, "और लोकों को तारो।"
श्लोक 6 (13.114.6)
उत्तस्थुः सिद्धकामास्ता भूतभव्यस्य मातरः । तपसोऽन्ते महाराज गावो लोकपरायणाः ॥
uttasthuḥ siddhakāmāstā bhūtabhavyasya mātaraḥ | tapaso'nte mahārāja gāvo lokaparāyaṇāḥ
हे महाराज! तपस्या के अन्त में भूत और भविष्य की माताएँ, लोकों की शरण गौएँ, सिद्ध मनोरथ होकर उठ खड़ी हुईं।
श्लोक 7 (13.114.7)
तस्माद्गावो महाभागाः पवित्रं परमुच्यते । तथैव सर्वभूतानां समतिष्ठन्त मूर्धनि ॥
tasmādgāvo mahābhāgāḥ pavitraṃ paramucyate | tathaiva sarvabhūtānāṃ samatiṣṭhanta mūrdhani
इसलिए गौएँ महाभाग्यवती हैं और परम पवित्र कही जाती हैं; और इसी प्रकार वे सब प्राणियों के मस्तक पर प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 8 (13.114.8)
समानवत्सां कपिलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां ब्रह्मलोके महीयते ॥
samānavatsāṃ kapilāṃ dhenuṃ dattvā payasvinīm | suvratāṃ vastrasaṃvītāṃ brahmaloke mahīyate
बछड़े के समान रंग वाली, दूध देने वाली, शान्त स्वभाव की और वस्त्र से ढकी हुई कपिला धेनु का दान करके मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 9 (13.114.9)
लोहितां तुल्यवत्सां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सूर्यलोके महीयते ॥
lohitāṃ tulyavatsāṃ tu dhenuṃ dattvā payasvinīm | suvratāṃ vastrasaṃvītāṃ sūryaloke mahīyate
बछड़े के समान रंग वाली, दूध देने वाली, शान्त स्वभाव की और वस्त्र से ढकी हुई लाल गौ का दान करके मनुष्य सूर्यलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 10 (13.114.10)
समानवत्सां शबलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सोमलोके महीयते ॥
samānavatsāṃ śabalāṃ dhenuṃ dattvā payasvinīm | suvratāṃ vastrasaṃvītāṃ somaloke mahīyate
बछड़े के समान रंग वाली, दूध देने वाली, शान्त स्वभाव की और वस्त्र से ढकी हुई चितकबरी गौ का दान करके मनुष्य चन्द्रलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 11 (13.114.11)
समानवत्सां श्वेतां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतामिन्द्रलोके महीयते ॥
samānavatsāṃ śvetāṃ tu dhenuṃ dattvā payasvinīm | suvratāṃ vastrasaṃvītāmindraloke mahīyate
बछड़े के समान रंग वाली, दूध देने वाली, शान्त स्वभाव की और वस्त्र से ढकी हुई श्वेत गौ का दान करके मनुष्य इन्द्रलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 12 (13.114.12)
समानवत्सां कृष्णां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतामग्निलोके महीयते ॥
samānavatsāṃ kṛṣṇāṃ tu dhenuṃ dattvā payasvinīm | suvratāṃ vastrasaṃvītāmagniloke mahīyate
बछड़े के समान रंग वाली, दूध देने वाली, शान्त स्वभाव की और वस्त्र से ढकी हुई काली गौ का दान करके मनुष्य अग्निलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 13 (13.114.13)
समानवत्सां धूम्रां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां याम्यलोके महीयते ॥
samānavatsāṃ dhūmrāṃ tu dhenuṃ dattvā payasvinīm | suvratāṃ vastrasaṃvītāṃ yāmyaloke mahīyate
बछड़े के समान रंग वाली, दूध देने वाली, शान्त स्वभाव की और वस्त्र से ढकी हुई धूमिल रंग की गौ का दान करके मनुष्य यमलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 14 (13.114.14)
अपां फेनसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां वारुणं लोकमाप्नुते ॥
apāṃ phenasavarṇāṃ tu savatsāṃ kāṃsyadohanām | pradāya vastrasaṃvītāṃ vāruṇaṃ lokamāpnute
जल के झाग के रंग वाली, बछड़े और काँसे की दोहनी सहित, वस्त्र से ढकी हुई गौ का दान करके मनुष्य वरुणलोक को पाता है।
श्लोक 15 (13.114.15)
वातरेणुसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां वायुलोके महीयते ॥
vātareṇusavarṇāṃ tu savatsāṃ kāṃsyadohanām | pradāya vastrasaṃvītāṃ vāyuloke mahīyate
हवा से उड़ी धूल के रंग वाली, बछड़े और काँसे की दोहनी सहित, वस्त्र से ढकी हुई गौ का दान करके मनुष्य वायुलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 16 (13.114.16)
हिरण्यवर्णां पिङ्गाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां कौबेरं लोकमश्नुते ॥
hiraṇyavarṇāṃ piṅgākṣīṃ savatsāṃ kāṃsyadohanām | pradāya vastrasaṃvītāṃ kauberaṃ lokamaśnute
सुनहरे रंग की, पीली आँखों वाली, बछड़े और काँसे की दोहनी सहित, वस्त्र से ढकी हुई गौ का दान करके मनुष्य कुबेरलोक को पाता है।
श्लोक 17 (13.114.17)
पलालधूम्रवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां पितृलोके महीयते ॥
palāladhūmravarṇāṃ tu savatsāṃ kāṃsyadohanām | pradāya vastrasaṃvītāṃ pitṛloke mahīyate
पुआल के धुएँ जैसे रंग वाली, बछड़े और काँसे की दोहनी सहित, वस्त्र से ढकी हुई गौ का दान करके मनुष्य पितृलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 18 (13.114.18)
सवत्सां पीवरीं दत्त्वा दृतिकण्ठामलङ्कृताम् । वैश्वदेवमसम्बाधं स्थानं श्रेष्ठं प्रपद्यते ॥
savatsāṃ pīvarīṃ dattvā dṛtikaṇṭhāmalaṅkṛtām | vaiśvadevamasambādhaṃ sthānaṃ śreṣṭhaṃ prapadyate
बछड़े सहित, हृष्ट-पुष्ट, गलकम्बल वाली और सजी हुई गौ का दान करके मनुष्य विश्वेदेवों के उस श्रेष्ठ और निर्बाध स्थान को पाता है।
श्लोक 19 (13.114.19)
समानवत्सां गौरीं तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां वसूनां लोकमाप्नुयात् ॥
samānavatsāṃ gaurīṃ tu dhenuṃ dattvā payasvinīm | suvratāṃ vastrasaṃvītāṃ vasūnāṃ lokamāpnuyāt
बछड़े के समान रंग वाली, दूध देने वाली, शान्त स्वभाव की और वस्त्र से ढकी हुई गौरी गौ का दान करके मनुष्य वसुओं के लोक को पाता है।
श्लोक 20 (13.114.20)
पाण्डुकम्बलवर्णाभां सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां साध्यानां लोकमाप्नुते ॥
pāṇḍukambalavarṇābhāṃ savatsāṃ kāṃsyadohanām | pradāya vastrasaṃvītāṃ sādhyānāṃ lokamāpnute
पीले कम्बल जैसे रंग वाली, बछड़े और काँसे की दोहनी सहित, वस्त्र से ढकी हुई गौ का दान करके मनुष्य साध्यों के लोक को पाता है।
श्लोक 21 (13.114.21)
वैराटपृष्ठमुक्षाणं सर्वरत्नैरलङ्कृतम् । प्रददन्मरुतां लोकान्स राजन्प्रतिपद्यते ॥
vairāṭapṛṣṭhamukṣāṇaṃ sarvaratnairalaṅkṛtam | pradadanmarutāṃ lokānsa rājanpratipadyate
हे राजन्! सब प्रकार के रत्नों से सजे हुए, विशाल पीठ वाले बैल का दान करने वाला मरुतों के लोकों को पाता है।
श्लोक 22 (13.114.22)
वत्सोपपन्नां नीलां गां सर्वरत्नसमन्विताम् । गन्धर्वाप्सरसां लोकान्दत्त्वा प्राप्नोति मानवः ॥
vatsopapannāṃ nīlāṃ gāṃ sarvaratnasamanvitām | gandharvāpsarasāṃ lokāndattvā prāpnoti mānavaḥ
बछड़े सहित, सब प्रकार के रत्नों से युक्त नीली गौ का दान करके मनुष्य गन्धर्वों और अप्सराओं के लोकों को पाता है।
श्लोक 23 (13.114.23)
दृतिकण्ठमनड्वाहं सर्वरत्नैरलङ्कृतम् । दत्त्वा प्रजापतेर्लोकान्विशोकः प्रतिपद्यते ॥
dṛtikaṇṭhamanaḍvāhaṃ sarvaratnairalaṅkṛtam | dattvā prajāpaterlokānviśokaḥ pratipadyate
गलकम्बल वाले और सब प्रकार के रत्नों से सजे बैल का दान करके मनुष्य शोकरहित होकर प्रजापति के लोकों को पाता है।
श्लोक 24 (13.114.24)
गोप्रदानरतो याति भित्त्वा जलदसञ्चयान् । विमानेनार्कवर्णेन दिवि राजन्विराजता ॥
gopradānarato yāti bhittvā jaladasañcayān | vimānenārkavarṇena divi rājanvirājatā
हे राजन्! गोदान में लगा हुआ मनुष्य बादलों के समूहों को चीरता हुआ, सूर्य के रंग के तेजस्वी विमान में आकाश में जाता है।
श्लोक 25 (13.114.25)
तं चारुवेषाः सुश्रोण्यः सहस्रं वारयोषितः । रमयन्ति नरश्रेष्ठं गोप्रदानरतं नरम् ॥
taṃ cāruveṣāḥ suśroṇyaḥ sahasraṃ vārayoṣitaḥ | ramayanti naraśreṣṭhaṃ gopradānarataṃ naram
सुन्दर वेश वाली, सुन्दर कटि वाली एक हजार गणिकाएँ गोदान में लगे हुए उस नरश्रेष्ठ को आनन्दित करती हैं।
श्लोक 26 (13.114.26)
वीणानां वल्लकीनां च नूपुराणां च शिञ्जितैः । हासैश्च हरिणाक्षीणां सुप्तः सुप्रतिबोध्यते ॥
vīṇānāṃ vallakīnāṃ ca nūpurāṇāṃ ca śiñjitaiḥ | hāsaiśca hariṇākṣīṇāṃ suptaḥ supratibodhyate
सोते हुए उसे वीणाओं, वल्लकियों और नूपुरों की झंकार से और हरिणी जैसी आँखों वाली स्त्रियों की हँसी से जगाया जाता है।
श्लोक 27 (13.114.27)
यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वाः । तावन्ति वर्षाणि महीयते सः । स्वर्गच्युतश्चापि ततो नृलोके । कुले प्रसूतो विपुले विशोकः ॥
yāvanti romāṇi bhavanti dhenvāḥ | tāvanti varṣāṇi mahīyate saḥ | svargacyutaścāpi tato nṛloke | kule prasūto vipule viśokaḥ
धेनु के शरीर पर जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक वह सम्मान पाता है; और स्वर्ग से च्युत होने पर वह मनुष्य-लोक में बड़े कुल में उत्पन्न होता है और शोकरहित रहता है।