अनुशासन पर्व · अध्याय 115
गौ-स्तुति के मन्त्र और सौदास का गोदान
वसिष्ठ सौदास को दिए अपने उपदेश को पूरा करते हैं: गौओं के लिए जपने योग्य मन्त्र, सहस्र गौओं के दाताओं के लोकों में घी की नदियाँ, लाख गौओं या तिलों की धेनु के दान का फल, गौ के सम्मान की विधि और अन्त में चर-अचर की माता गौ की स्तुति। अन्त में भीष्म बताते हैं कि सौदास ने ऋषि के उपदेश को श्रेष्ठ मानकर ब्राह्मणों को बहुत-सी गौएँ दीं और लोकों को पाया।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 1 (13.115.1)
घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः । घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे ॥
ghṛtakṣīrapradā gāvo ghṛtayonyo ghṛtodbhavāḥ | ghṛtanadyo ghṛtāvartāstā me santu sadā gṛhe
घी और दूध देने वाली, घी की उत्पत्ति-स्थान, घी से उत्पन्न होने वाली, घी की नदियाँ और घी के भँवर बनने वाली वे गौएँ सदा मेरे घर में रहें।
श्लोक 2 (13.115.2)
घृतं मे हृदये नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम् । घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम् ॥
ghṛtaṃ me hṛdaye nityaṃ ghṛtaṃ nābhyāṃ pratiṣṭhitam | ghṛtaṃ sarveṣu gātreṣu ghṛtaṃ me manasi sthitam
घी मेरे हृदय में सदा रहे, घी मेरी नाभि में प्रतिष्ठित हो, घी मेरे सब अंगों में और घी मेरे मन में स्थित हो।
श्लोक 3 (13.115.3)
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च । गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥
gāvo mamāgrato nityaṃ gāvaḥ pṛṣṭhata eva ca | gāvo me sarvataścaiva gavāṃ madhye vasāmyaham
गौएँ सदा मेरे आगे रहें, गौएँ मेरे पीछे रहें और गौएँ मेरे चारों ओर रहें; मैं गौओं के बीच में निवास करता हूँ।
श्लोक 4 (13.115.4)
इत्याचम्य जपेत्सायं प्रातश्च पुरुषः सदा । यदह्ना कुरुते पापं तस्मात्स परिमुच्यते ॥
ityācamya japetsāyaṃ prātaśca puruṣaḥ sadā | yadahnā kurute pāpaṃ tasmātsa parimucyate
जो मनुष्य आचमन करके सायं और प्रातः सदा इसका जप करता है, वह दिन में जो पाप करता है, उससे मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (13.115.5)
प्रासादा यत्र सौवर्णा वसोर्धाराश्च कामदाः । गन्धर्वाप्सरसो यत्र तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥
prāsādā yatra sauvarṇā vasordhārāśca kāmadāḥ | gandharvāpsaraso yatra tatra yānti sahasradāḥ
जहाँ सोने के महल हैं, कामनाएँ पूरी करने वाली वसुधाराएँ हैं और जहाँ गन्धर्व तथा अप्सराएँ रहती हैं, वहाँ हजार गौएँ देने वाले जाते हैं।
श्लोक 6 (13.115.6)
नवनीतपङ्काः क्षीरोदा दधिशैवलसङ्कुलाः । वहन्ति यत्र वै नद्यस्तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥
navanītapaṅkāḥ kṣīrodā dadhiśaivalasaṅkulāḥ | vahanti yatra vai nadyastatra yānti sahasradāḥ
जहाँ मक्खन के कीचड़ वाली, दूध के जल वाली और दही की काई से भरी नदियाँ बहती हैं, वहाँ हजार गौएँ देने वाले जाते हैं।
श्लोक 7 (13.115.7)
गवां शतसहस्रं तु यः प्रयच्छेद्यथाविधि । परां वृद्धिमवाप्याथ स्वर्गलोके महीयते ॥
gavāṃ śatasahasraṃ tu yaḥ prayacchedyathāvidhi | parāṃ vṛddhimavāpyātha svargaloke mahīyate
जो मनुष्य विधिपूर्वक एक लाख गौएँ देता है, वह परम समृद्धि पाकर स्वर्गलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 8 (13.115.8)
दश चोभयतः प्रेत्य मातापित्रोः पितामहान् । दधाति सुकृताँल्लोकान्पुनाति च कुलं नरः ॥
daśa cobhayataḥ pretya mātāpitroḥ pitāmahān | dadhāti sukṛtām̐llokānpunāti ca kulaṃ naraḥ
वह मरने के बाद माता और पिता दोनों ओर के दस-दस पूर्वजों को पुण्य लोकों में स्थापित करता है और अपने कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 9 (13.115.9)
धेन्वाः प्रमाणेन समप्रमाणां । धेनुं तिलानामपि च प्रदाय । पानीयवापीः स यमस्य लोके । न यातनां काञ्चिदुपैति तत्र ॥
dhenvāḥ pramāṇena samapramāṇāṃ | dhenuṃ tilānāmapi ca pradāya | pānīyavāpīḥ sa yamasya loke | na yātanāṃ kāñcidupaiti tatra
जीवित धेनु के बराबर तिलों की धेनु का दान करके वह यमलोक में जल से भरी बावड़ियाँ पाता है और वहाँ किसी प्रकार की यातना नहीं पाता।
श्लोक 10 (13.115.10)
पवित्रमग्र्यं जगतः प्रतिष्ठा । दिवौकसां मातरोऽथाप्रमेयाः । अन्वालभेद्दक्षिणतो व्रजेच्च । दद्याच्च पात्रे प्रसमीक्ष्य कालम् ॥
pavitramagryaṃ jagataḥ pratiṣṭhā | divaukasāṃ mātaro'thāprameyāḥ | anvālabheddakṣiṇato vrajecca | dadyācca pātre prasamīkṣya kālam
गौएँ परम पवित्र, जगत् का आधार और देवताओं की अपरिमित माताएँ हैं। उन्हें आदर से छूना चाहिए, उनके दाहिनी ओर से चलना चाहिए और समय का विचार करके योग्य पात्र को देना चाहिए।
श्लोक 11 (13.115.11)
धेनुं सवत्सां कपिलां भूरिशृङ्गीं । कांस्योपदोहां वसनोत्तरीयाम् । प्रदाय तां गाहति दुर्विगाह्यां । याम्यां सभां वीतभयो मनुष्यः ॥
dhenuṃ savatsāṃ kapilāṃ bhūriśṛṅgīṃ | kāṃsyopadohāṃ vasanottarīyām | pradāya tāṃ gāhati durvigāhyāṃ | yāmyāṃ sabhāṃ vītabhayo manuṣyaḥ
जो मनुष्य बछड़े सहित, बड़े सींगों वाली, काँसे की दोहनी और वस्त्र के ओढ़ने सहित कपिला धेनु का दान करता है, वह यम की उस दुर्गम सभा में निर्भय होकर प्रवेश करता है।
श्लोक 12 (13.115.12)
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः । गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तयेत् ॥
surūpā bahurūpāśca viśvarūpāśca mātaraḥ | gāvo māmupatiṣṭhantāmiti nityaṃ prakīrtayet
"सुन्दर रूप वाली, अनेक रूप वाली और सब रूप वाली माताएँ गौएँ मेरे पास आएँ" — ऐसा सदा कीर्तन करना चाहिए।
श्लोक 13 (13.115.13)
नातः पुण्यतरं दानं नातः पुण्यतरं फलम् । नातो विशिष्टं लोकेषु भूतं भवितुमर्हति ॥
nātaḥ puṇyataraṃ dānaṃ nātaḥ puṇyataraṃ phalam | nāto viśiṣṭaṃ lokeṣu bhūtaṃ bhavitumarhati
इससे अधिक पुण्यमय कोई दान नहीं, इससे अधिक पुण्यमय कोई फल नहीं; लोकों में कोई भी वस्तु इससे बढ़कर नहीं हो सकती।
श्लोक 14 (13.115.14)
त्वचा लोम्नाऽथ शृङ्गैर्वा वालैः क्षीरेण मेदसा । यज्ञं वहति सम्भूय किमस्त्यभ्यधिकं ततः ॥
tvacā lomnā'tha śṛṅgairvā vālaiḥ kṣīreṇa medasā | yajñaṃ vahati sambhūya kimastyabhyadhikaṃ tataḥ
चमड़े, रोम, सींग, पूँछ के बाल, दूध और चर्बी से मिलकर वे यज्ञ को वहन करती हैं; इससे बढ़कर और क्या है?
श्लोक 15 (13.115.15)
यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत्स्थावरजङ्गमम् । तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम् ॥
yayā sarvamidaṃ vyāptaṃ jagatsthāvarajaṅgamam | tāṃ dhenuṃ śirasā vande bhūtabhavyasya mātaram
जिस धेनु से यह चर-अचर सारा जगत् व्याप्त है, भूत और भविष्य की उस माता को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 16 (13.115.16)
गुणवचनसमुच्चयैकदेशो । नृवर मयैष गवां प्रकीर्तितस्ते । न च परमिह दानमस्ति गोभ्यो । भवति न चापि परायणं ततोऽन्यम् ॥
guṇavacanasamuccayaikadeśo | nṛvara mayaiṣa gavāṃ prakīrtitaste | na ca paramiha dānamasti gobhyo | bhavati na cāpi parāyaṇaṃ tato'nyam
हे नरश्रेष्ठ! गौओं के गुणों के वचनों के समूह का यह केवल एक अंश ही मैंने तुम्हें सुनाया है। यहाँ गौओं से बढ़कर कोई दान नहीं है और उनसे बढ़कर कोई दूसरा आश्रय भी नहीं है।
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (13.115.17)
वरमिदमिति भूमिपो विचिन्त्य । प्रवरमृषेर्वचनं ततो महात्मा । व्यसृजत नियतात्मवान्द्विजेभ्यः । सुबहु च गोधनमाप्तवांश्च लोकान् ॥
varamidamiti bhūmipo vicintya | pravaramṛṣervacanaṃ tato mahātmā | vyasṛjata niyatātmavāndvijebhyaḥ | subahu ca godhanamāptavāṃśca lokān
"यह श्रेष्ठ है" ऐसा सोचकर संयमी महात्मा राजा ने ऋषि के उस उत्तम उपदेश को स्वीकार किया, ब्राह्मणों को बहुत-सा गोधन दान किया और लोकों को पाया।