अनुशासन पर्व · अध्याय 116
गौ की पवित्रता: व्यास का शुकदेव को उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पवित्रों में भी सबसे पवित्र क्या है; भीष्म गौ को ही ऐसा बताते हैं और गोदान से परम गति पाने वाले राजाओं का स्मरण कराते हैं। फिर वे शुकदेव के यही प्रश्न व्यास से पूछने और व्यास के उत्तर की कथा कहते हैं: ब्रह्मा ने गौओं को सींग कैसे दिए, गोदान करने वालों को मिलने वाला गौओं का तेजोमय लोक, गौओं का स्तवन तथा दूध, घी और गोमती से जुड़े शुद्धि-विधान। शुकदेव ने इसके बाद गौ की पूजा की, और युधिष्ठिर से भी वैसा ही करने को कहा जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.116.1)
पवित्राणां पवित्रं यच्छ्रेष्ठं लोके च यद्भवेत् । पावनं परमं चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
pavitrāṇāṃ pavitraṃ yacchreṣṭhaṃ loke ca yadbhavet | pāvanaṃ paramaṃ caiva tanme brūhi pitāmaha
हे पितामह, जो पवित्रों में भी सबसे पवित्र है, संसार में जो सर्वश्रेष्ठ है और जो परम पावन करने वाला है, वह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.116.2)
गावो महार्थाः पुण्याश्च तारयन्ति च मानवान् । धारयन्ति प्रजाश्चेमा हविषा पयसा तथा ॥
gāvo mahārthāḥ puṇyāśca tārayanti ca mānavān | dhārayanti prajāścemā haviṣā payasā tathā
गौएँ बड़े प्रयोजन सिद्ध करने वाली और पुण्यमयी हैं। वे मनुष्यों को तारती हैं और हवि तथा दूध से इन सब प्राणियों का पालन करती हैं।
श्लोक 3 (13.116.3)
न हि पुण्यतमं किञ्चिद्गोभ्यो भरतसत्तम । एताः पुण्याः पवित्राश्च त्रिषु लोकेषु सत्तमाः ॥
na hi puṇyatamaṃ kiñcidgobhyo bharatasattama | etāḥ puṇyāḥ pavitrāśca triṣu lokeṣu sattamāḥ
हे भरतश्रेष्ठ, गौओं से बढ़कर पुण्यतम कुछ भी नहीं है। ये पुण्यमयी और पवित्र हैं तथा तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
श्लोक 4 (13.116.4)
देवानामुपरिष्टाच्च गावः प्रतिवसन्ति वै । दत्त्वा चैतास्तारयते यान्ति स्वर्गं मनीषिणः ॥
devānāmupariṣṭācca gāvaḥ prativasanti vai | dattvā caitāstārayate yānti svargaṃ manīṣiṇaḥ
गौएँ देवताओं के भी ऊपर के लोक में निवास करती हैं। इन्हें दान करके दाता भवसागर से पार होता है और ज्ञानी जन स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 5 (13.116.5)
मान्धाता यौवनाश्वश्च ययातिर्नहुषस्तथा । गा वै ददन्तः सततं सहस्रशतसम्मिताः ॥
māndhātā yauvanāśvaśca yayātirnahuṣastathā | gā vai dadantaḥ satataṃ sahasraśatasammitāḥ
मान्धाता, युवनाश्वपुत्र, ययाति और नहुष सदा लाखों-लाखों गौओं का दान करते रहे,
श्लोक 6 (13.116.6)
गताः परमकं स्थानं देवैरपि सुदुर्लभम् । अपि चात्र पुरावृत्तं कथयिष्यामि तेऽनघ ॥
gatāḥ paramakaṃ sthānaṃ devairapi sudurlabham | api cātra purāvṛttaṃ kathayiṣyāmi te'nagha
और देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ परम स्थान को पहुँचे। हे निष्पाप, इस विषय में मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाऊँगा।
श्लोक 7 (13.116.7)
ऋषीणामुत्तमं धीमान्कृष्णद्वैपायनं शुकः । अभिवाद्याह्निकं कृत्वा शुचिः प्रयतमानसः ॥
ṛṣīṇāmuttamaṃ dhīmānkṛṣṇadvaipāyanaṃ śukaḥ | abhivādyāhnikaṃ kṛtvā śuciḥ prayatamānasaḥ
बुद्धिमान् शुकदेव ने ऋषियों में श्रेष्ठ कृष्णद्वैपायन को प्रणाम किया और अपना नित्य कर्म करके शुद्ध तथा एकाग्र मन से,
श्लोक 8 (13.116.8)
पितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् । को यज्ञः सर्वयज्ञानां वरिष्ठोऽभ्युपलक्ष्यते ॥
pitaraṃ paripapraccha dṛṣṭalokaparāvaram | ko yajñaḥ sarvayajñānāṃ variṣṭho'bhyupalakṣyate
लोक-परलोक को देख चुके अपने पिता से पूछा: “सब यज्ञों में कौन-सा यज्ञ सर्वश्रेष्ठ माना जाता है?
शुक उवाच
श्लोक 9 (13.116.9)
किञ्च कृत्वा परं स्थानं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः । केन देवाः पवित्रेण स्वर्गमश्नन्ति वा विभो ॥
kiñca kṛtvā paraṃ sthānaṃ prāpnuvanti manīṣiṇaḥ | kena devāḥ pavitreṇa svargamaśnanti vā vibho
“क्या करके ज्ञानी जन परम स्थान को पाते हैं? हे प्रभो, किस पवित्र करने वाले साधन से देवता स्वर्ग का भोग करते हैं?
श्लोक 10 (13.116.10)
किञ्च यज्ञस्य यज्ञत्वं क्व च यज्ञः प्रतिष्ठितः । दानानामुत्तमं किञ्च किञ्च सत्रमितः परम् । पवित्राणां पवित्रं च यत्तद्ब्रूहि महामुने ॥
kiñca yajñasya yajñatvaṃ kva ca yajñaḥ pratiṣṭhitaḥ | dānānāmuttamaṃ kiñca kiñca satramitaḥ param | pavitrāṇāṃ pavitraṃ ca yattadbrūhi mahāmune
“यज्ञ का यज्ञपन क्या है और यज्ञ किस पर प्रतिष्ठित है? दानों में उत्तम दान कौन-सा है और इससे परे सत्र क्या है? और जो पवित्रों में भी पवित्र है, हे महामुनि, वह मुझे बताइए।”
भीष्म उवाच
श्लोक 11 (13.116.11)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः परमधर्मवित् । पुत्रायाकथयत्सर्वं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ vyāsaḥ paramadharmavit | putrāyākathayatsarvaṃ tattvena bharatarṣabha
यह सुनकर परम धर्म को जानने वाले व्यास ने अपने पुत्र को सब कुछ यथार्थ रूप से बताया, हे भरतश्रेष्ठ।
व्यास उवाच
श्लोक 12 (13.116.12)
गावः प्रतिष्ठा भूतानां तथा गावः परायणम् । गावः पुण्याः पवित्राश्च गोधनं पावनं तथा ॥
gāvaḥ pratiṣṭhā bhūtānāṃ tathā gāvaḥ parāyaṇam | gāvaḥ puṇyāḥ pavitrāśca godhanaṃ pāvanaṃ tathā
“गौएँ प्राणियों की प्रतिष्ठा हैं और गौएँ ही उनकी परम गति हैं। गौएँ पुण्यमयी और पवित्र हैं, और गोधन पावन करने वाला है।
श्लोक 13 (13.116.13)
पूर्वमासन्नशृङ्गा वै गाव इत्यनुशश्रुम । शृङ्गार्थे समुपासन्त ताः किल प्रभुमव्ययम् ॥
pūrvamāsannaśṛṅgā vai gāva ityanuśaśruma | śṛṅgārthe samupāsanta tāḥ kila prabhumavyayam
“हमने सुना है कि आरम्भ में गौओं के सींग नहीं थे। सींगों के लिए उन्होंने उन अविनाशी प्रभु की उपासना की।
श्लोक 14 (13.116.14)
ततो ब्रह्मा तु गाः सत्रमुपविष्टाः समीक्ष्य ह । ईप्सितं प्रददौ ताभ्यो गोभ्यः प्रत्येकशः प्रभुः ॥
tato brahmā tu gāḥ satramupaviṣṭāḥ samīkṣya ha | īpsitaṃ pradadau tābhyo gobhyaḥ pratyekaśaḥ prabhuḥ
“तब प्रभु ब्रह्मा ने गौओं को यज्ञ-सत्र में बैठे देखकर उनमें से प्रत्येक को उसकी इच्छित वस्तु प्रदान की।
श्लोक 15 (13.116.15)
तासां शृङ्गाण्यजायन्त तस्या यादृङ्मनोगतम् । नानावर्णाः शृङ्गवन्त्यस्ता व्यरोचन्त पुत्रक ॥
tāsāṃ śṛṅgāṇyajāyanta tasyā yādṛṅmanogatam | nānāvarṇāḥ śṛṅgavantyastā vyarocanta putraka
“उनके सींग निकल आए, जिसने जैसे सींग मन में चाहे थे वैसे ही। रंग-बिरंगे सींगों वाली वे गौएँ शोभित हुईं, पुत्र।
श्लोक 16 (13.116.16)
ब्रह्मणा वरदत्तास्ता हव्यकव्यप्रदाः शुभाः । पुण्याः पवित्राः सुभगा दिव्यसंस्थानलक्षणाः ॥
brahmaṇā varadattāstā havyakavyapradāḥ śubhāḥ | puṇyāḥ pavitrāḥ subhagā divyasaṃsthānalakṣaṇāḥ
“ब्रह्मा से वर पाकर वे देवताओं के लिए हव्य और पितरों के लिए कव्य देने वाली हुईं: शुभ, पुण्यमयी, पवित्र, सौभाग्यवती, दिव्य आकृति और लक्षणों वाली।
श्लोक 17 (13.116.17)
गावस्तेजो महद्दिव्यं गवां दानं प्रशस्यते । ये चैताः सम्प्रयच्छन्ति साधवो वीतमत्सराः ॥
gāvastejo mahaddivyaṃ gavāṃ dānaṃ praśasyate | ye caitāḥ samprayacchanti sādhavo vītamatsarāḥ
“गौएँ महान् दिव्य तेज हैं और गोदान की प्रशंसा की जाती है। जो मत्सरहीन सज्जन इनका दान करते हैं,
श्लोक 18 (13.116.18)
ते वै सुकृतिनः प्रोक्ताः सर्वदानप्रदाश्च ते । गवां लोकं तथा पुण्यमाप्नुवन्ति च तेऽनघ ॥
te vai sukṛtinaḥ proktāḥ sarvadānapradāśca te | gavāṃ lokaṃ tathā puṇyamāpnuvanti ca te'nagha
“वे पुण्यात्मा कहे गए हैं और वे सब प्रकार के दान देने वाले हैं। हे निष्पाप, वे गौओं का पुण्य लोक पाते हैं।
श्लोक 19 (13.116.19)
यत्र वृक्षा मधुफला दिव्यपुष्पफलोपगाः । पुष्पाणि च सुगन्धीनि दिव्यानि द्विजसत्तम ॥
yatra vṛkṣā madhuphalā divyapuṣpaphalopagāḥ | puṣpāṇi ca sugandhīni divyāni dvijasattama
“वहाँ के वृक्ष मधुर फलों वाले हैं और दिव्य फूलों-फलों से लदे हैं; फूल सुगन्धित और दिव्य हैं, हे द्विजश्रेष्ठ।
श्लोक 20 (13.116.20)
सर्वा मणिमयी भूमिः सर्वकाञ्चनवालुकाः । सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पङ्का निरजाः शुभाः ॥
sarvā maṇimayī bhūmiḥ sarvakāñcanavālukāḥ | sarvartusukhasaṃsparśā niṣpaṅkā nirajāḥ śubhāḥ
“वहाँ की सारी भूमि मणिमय है, उसकी रेत सोने की है; वह सब ऋतुओं में सुखद स्पर्श वाली, कीचड़ और धूल से रहित तथा शुभ है।
श्लोक 21 (13.116.21)
रक्तोत्पलवनैश्चैव मणिखण्डैर्हिरण्मयैः । तरुणादित्यसङ्काशैर्भान्ति तत्र जलाशयाः ॥
raktotpalavanaiścaiva maṇikhaṇḍairhiraṇmayaiḥ | taruṇādityasaṅkāśairbhānti tatra jalāśayāḥ
“वहाँ के सरोवर लाल कमलों के वनों और मणि के सुनहरे खण्डों से, नवोदित सूर्य के समान, जगमगाते हैं,
श्लोक 22 (13.116.22)
महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः । नीलोत्पलविमिश्रैश्च सरोभिर्बहुपङ्कजैः ॥
mahārhamaṇipatraiśca kāñcanaprabhakesaraiḥ | nīlotpalavimiśraiśca sarobhirbahupaṅkajaiḥ
“वे बहुत कमलों वाले, नील कमलों से मिले हुए तालाबों से भी शोभित हैं, जिनके पत्ते बहुमूल्य मणियों के और केसर सोने की आभा वाले हैं,
श्लोक 23 (13.116.23)
करवीरवनैः फुल्लैः सहस्रावर्तसंवृतैः । सन्तानकवनैः फुल्लैर्वृक्षेश्च समलङ्कृताः ॥
karavīravanaiḥ phullaiḥ sahasrāvartasaṃvṛtaiḥ | santānakavanaiḥ phullairvṛkṣeśca samalaṅkṛtāḥ
“वे खिले हुए कनेर के वनों से, जो हज़ारों भँवरों जैसे गुच्छों से घिरे हैं, तथा खिले हुए सन्तानक के वनों और वृक्षों से सजे हुए हैं।
श्लोक 24 (13.116.24)
निर्मलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाप्रभैः । उद्भूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः ॥
nirmalābhiśca muktābhirmaṇibhiśca mahāprabhaiḥ | udbhūtapulināstatra jātarūpaiśca nimnagāḥ
“वहाँ की नदियों के तट निर्मल मोतियों, महान् आभा वाले मणियों और सोने से उभरे हुए हैं।
श्लोक 25 (13.116.25)
सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमैः । जातरूपमयैश्चान्यैर्हुताशनसमप्रभैः ॥
sarvaratnamayaiścitrairavagāḍhā drumottamaiḥ | jātarūpamayaiścānyairhutāśanasamaprabhaiḥ
“वे सर्वथा रत्नमय, विचित्र श्रेष्ठ वृक्षों के बीच गहराई तक बहती हैं, और सोने के बने अन्य वृक्षों के बीच भी, जो अग्नि के समान दमकते हैं।
श्लोक 26 (13.116.26)
सौवर्णगिरयस्तत्र मणिरत्नशिलोच्चयाः । सर्वरत्नमयैर्भान्ति शृङ्गैश्चारुभिरुच्छ्रितैः ॥
sauvarṇagirayastatra maṇiratnaśiloccayāḥ | sarvaratnamayairbhānti śṛṅgaiścārubhirucchritaiḥ
“वहाँ सोने के पर्वत हैं, जिनकी चट्टानों के ढेर मणि-रत्नों के हैं; वे सब रत्नों से बनी ऊँची, सुन्दर चोटियों से चमकते हैं।
श्लोक 27 (13.116.27)
नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः । दिव्यगन्धरसैः पुष्पैः फलैश्च भरतर्षभ ॥
nityapuṣpaphalāstatra nagāḥ patrarathākulāḥ | divyagandharasaiḥ puṣpaiḥ phalaiśca bharatarṣabha
“वहाँ के वृक्ष सदा फूलों-फलों से लदे और पक्षियों से भरे रहते हैं; उनके फूल और फल दिव्य गन्ध और रस वाले हैं, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 28 (13.116.28)
रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर । सर्वकामसमृद्धार्था निःशोका गतमन्यवः ॥
ramante puṇyakarmāṇastatra nityaṃ yudhiṣṭhira | sarvakāmasamṛddhārthā niḥśokā gatamanyavaḥ
“वहाँ पुण्यकर्मा लोग सदा आनन्द करते हैं, हे युधिष्ठिर; उनकी सब कामनाएँ पूर्ण रहती हैं, वे शोक और क्रोध से रहित हैं,
श्लोक 29 (13.116.29)
विमानेषु विचित्रेषु रमणीयेषु भारत । मोदन्ते पुण्यकर्माणो विहरन्तो यशस्विनः ॥
vimāneṣu vicitreṣu ramaṇīyeṣu bhārata | modante puṇyakarmāṇo viharanto yaśasvinaḥ
“सुन्दर और विचित्र विमानों में, हे भारत, यशस्वी होकर वे विहार करते हुए आनन्द मनाते हैं।
श्लोक 30 (13.116.30)
उपक्रीडन्ति तान्राजञ्शुभाश्चाप्सरसां गणाः । एतान्लोकानवाप्नोति गां दत्त्वा वै युधिष्ठिर ॥
upakrīḍanti tānrājañśubhāścāpsarasāṃ gaṇāḥ | etānlokānavāpnoti gāṃ dattvā vai yudhiṣṭhira
“हे राजन्, अप्सराओं के सुन्दर दल उनके साथ क्रीड़ा करते हैं। हे युधिष्ठिर, गौ का दान करके मनुष्य इन लोकों को पाता है।
श्लोक 31 (13.116.31)
यासामधिपतिः पूषा मारुतो बलवान्बले । ऐश्वर्ये वरुणो राजा ता मां पान्तु युगन्धराः ॥
yāsāmadhipatiḥ pūṣā māruto balavānbale | aiśvarye varuṇo rājā tā māṃ pāntu yugandharāḥ
“‘जिनके अधिपति पूषा हैं, जिनके बल में बलवान् मारुत हैं और जिनके ऐश्वर्य में राजा वरुण हैं, वे युगन्धरा गौएँ मेरी रक्षा करें।’
श्लोक 32 (13.116.32)
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः । प्राजापत्या इति ब्रह्मञ्जपेन्नित्यं यतव्रतः ॥
surūpā bahurūpāśca viśvarūpāśca mātaraḥ | prājāpatyā iti brahmañjapennityaṃ yatavrataḥ
“‘सुरूपा, बहुरूपा और विश्वरूपा माताएँ, प्रजापति की सन्तानें’ — हे ब्रह्मन्, व्रत में स्थिर रहकर मनुष्य को यह नित्य जपना चाहिए।
श्लोक 33 (13.116.33)
गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः । तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान् ॥
gāśca śuśrūṣate yaśca samanveti ca sarvaśaḥ | tasmai tuṣṭāḥ prayacchanti varānapi sudurlabhān
“जो गौओं की सेवा करता है और सर्वत्र उनके पीछे चलता है, उस पर प्रसन्न होकर वे अत्यन्त दुर्लभ वर भी देती हैं।
श्लोक 34 (13.116.34)
द्रुह्येन्न मनसा वाऽपि गोषु ता हि सुखप्रदाः । अर्चयेत सदा चैव नमस्कारैश्च पूजयेत् ॥
druhyenna manasā vā'pi goṣu tā hi sukhapradāḥ | arcayeta sadā caiva namaskāraiśca pūjayet
“मन से भी उनसे द्रोह नहीं करना चाहिए, क्योंकि गौएँ सुख देने वाली हैं। उनका सदा आदर करे और नमस्कारों से उनकी पूजा करे;
श्लोक 35 (13.116.35)
दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाऽश्नुते । त्र्यहमुष्णं पिबेन्मूत्रं त्र्यहमुष्णं पिबेत्पयः ॥
dāntaḥ prītamanā nityaṃ gavāṃ vyuṣṭiṃ tathā'śnute | tryahamuṣṇaṃ pibenmūtraṃ tryahamuṣṇaṃ pibetpayaḥ
“संयमी और सदा प्रसन्न मन वाला होकर वह गौओं की समृद्धि पाता है। तीन दिन गरम गोमूत्र पिए, तीन दिन गरम दूध;
श्लोक 36 (13.116.36)
गवामुष्णं पयः पीत्वा त्र्यहमुष्णं घृतं पिबेत् । त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो भवेत्र्यहम् ॥
gavāmuṣṇaṃ payaḥ pītvā tryahamuṣṇaṃ ghṛtaṃ pibet | tryahamuṣṇaṃ ghṛtaṃ pītvā vāyubhakṣo bhavetryaham
“गौओं का गरम दूध पीकर तीन दिन गरम घी पिए; और तीन दिन गरम घी पीकर तीन दिन केवल वायु का आहार करे।
श्लोक 37 (13.116.37)
येन देवाः पवित्रेण भुञ्जते लोकमुत्तमम् । यत्पवित्रं पवित्राणां तद्धृतं शिरसा वहेत् ॥
yena devāḥ pavitreṇa bhuñjate lokamuttamam | yatpavitraṃ pavitrāṇāṃ taddhṛtaṃ śirasā vahet
“जिस पवित्र करने वाले साधन से देवता उत्तम लोक का भोग करते हैं, जो पवित्रों को भी पवित्र करता है, उस घी को सिर पर धारण करे।
श्लोक 38 (13.116.38)
घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् । घृतं प्राशेद्धृतं दद्याद्गवां पुष्टिं तथाऽश्नुते ॥
ghṛtena juhuyādagniṃ ghṛtena svasti vācayet | ghṛtaṃ prāśeddhṛtaṃ dadyādgavāṃ puṣṭiṃ tathā'śnute
“घी से अग्नि में आहुति दे और घी से स्वस्ति-वाचन कराए; घी खाए और घी दान करे, इस प्रकार गौओं की वृद्धि पाता है।
श्लोक 39 (13.116.39)
निर्हृतैश्च यवैर्गोभिर्मासं प्रसृतयावकः । ब्रह्महत्यासमं पापं सर्वमेतेन शुध्यते ॥
nirhṛtaiśca yavairgobhirmāsaṃ prasṛtayāvakaḥ | brahmahatyāsamaṃ pāpaṃ sarvametena śudhyate
“जो गोबर से निकाले हुए जौ से बनी यावक (जौ की लपसी) को महीने भर, एक-एक अंजलि मात्र खाकर रहता है, वह इससे ब्रह्महत्या के समान पाप सहित सब पापों से शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 40 (13.116.40)
पराभवार्थं दैत्यानां देवैः शौचमिदं कृतम् । ते देवत्वमपि प्राप्ताः संसिद्धाश्च महाबलाः ॥
parābhavārthaṃ daityānāṃ devaiḥ śaucamidaṃ kṛtam | te devatvamapi prāptāḥ saṃsiddhāśca mahābalāḥ
“दैत्यों को पराजित करने के लिए देवताओं ने यह शुद्धि-विधान किया था; इसी से वे भी देवत्व को प्राप्त हुए, सिद्ध और महाबली बने।
श्लोक 41 (13.116.41)
गावः पवित्राः पुण्याश्च पावनं परमं महत् । ताश्च दत्त्वा द्विजातिभ्यो नरः स्वर्गमुपाश्नुते ॥
gāvaḥ pavitrāḥ puṇyāśca pāvanaṃ paramaṃ mahat | tāśca dattvā dvijātibhyo naraḥ svargamupāśnute
“गौएँ पवित्र और पुण्यमयी हैं, महान् और परम पावन करने वाली हैं। उन्हें द्विजों को देकर मनुष्य स्वर्ग पाता है।
श्लोक 42 (13.116.42)
गवां मध्ये शुचिर्भूत्वा गोमतीं मनसा जपेत् । पूताभिरद्भिराचम्य शुचिर्भवति निर्मलः ॥
gavāṃ madhye śucirbhūtvā gomatīṃ manasā japet | pūtābhiradbhirācamya śucirbhavati nirmalaḥ
“गौओं के बीच शुद्ध होकर मन में गोमती का जप करे; शुद्ध जल से आचमन करके वह पवित्र और निर्मल हो जाता है।
श्लोक 43 (13.116.43)
अग्निमध्ये गवां मध्ये ब्राह्मणानां च संसदि । विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः पुण्यकर्मिणः ॥
agnimadhye gavāṃ madhye brāhmaṇānāṃ ca saṃsadi | vidyāvedavratasnātā brāhmaṇāḥ puṇyakarmiṇaḥ
“अग्नि के बीच, गौओं के बीच और ब्राह्मणों की सभा में — विद्या, वेद और व्रतों से स्नात, पुण्यकर्मा ब्राह्मण —
श्लोक 44 (13.116.44)
अध्यापयेरञ्शिष्यान्वै गोमतीं यज्ञसम्मिताम् । त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा गोमतीं लभते वरम् ॥
adhyāpayerañśiṣyānvai gomatīṃ yajñasammitām | trirātropoṣito bhūtvā gomatīṃ labhate varam
“अपने शिष्यों को यज्ञ के समान गोमती का अध्ययन कराएँ। तीन रात उपवास करके मनुष्य गोमती का वर पाता है।
श्लोक 45 (13.116.45)
पुत्रकामश्च लभते पुत्रं धनमथापि वा । पतिकामा च भर्तारं सर्वकामांश्च मानवः ॥
putrakāmaśca labhate putraṃ dhanamathāpi vā | patikāmā ca bhartāraṃ sarvakāmāṃśca mānavaḥ
“पुत्र की कामना वाला पुत्र पाता है, अथवा धन; पति की कामना वाली स्त्री पति पाती है; और मनुष्य सब कामनाएँ पाता है।
श्लोक 46 (13.116.46)
गावस्तुष्टाः प्रयच्छन्ति सेविता वै न संशयः । एवमेता महाभागा यज्ञियाः सर्वकामदाः । रोहिण्य इति जानीहि नैताभ्यो विद्यते परम् ॥
gāvastuṣṭāḥ prayacchanti sevitā vai na saṃśayaḥ | evametā mahābhāgā yajñiyāḥ sarvakāmadāḥ | rohiṇya iti jānīhi naitābhyo vidyate param
“सेवा किए जाने पर गौएँ प्रसन्न होकर सब कुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं। इस प्रकार इन महाभाग्यशालिनी, यज्ञ के योग्य, सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली गौओं को रोहिणी जानो; इनसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है।”
भीष्म उवाच
श्लोक 47 (13.116.47)
इत्युक्तः स महातेजाः शुकः पित्रा महात्मना । पूजयामास तां नित्यं तस्मात्त्वमपि पूजय ॥
ityuktaḥ sa mahātejāḥ śukaḥ pitrā mahātmanā | pūjayāmāsa tāṃ nityaṃ tasmāttvamapi pūjaya
अपने महात्मा पिता के ऐसा कहने पर महातेजस्वी शुकदेव ने उस दिन से गौ की नित्य पूजा की; इसलिए तुम भी उसकी पूजा करो।