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अनुशासन पर्व · अध्याय 117

सुरभि और ब्रह्मा का वरदान

युधिष्ठिर पूछते हैं कि गोलोक देवताओं के रचयिता भगवान् के भी ऊपर कैसे हो सकता है। भीष्म बताते हैं कि तप से विश्वकर्मा द्वारा सुरभि (रोहिणी) की रचना हुई, उसके तेज से उत्पन्न पुरुष का नाम मार्ताण्ड रखा गया और उसे सुरभि दी गई। ब्रह्मा ने वर दिया कि उनकी सन्तान यज्ञ के लिए दूध देगी, लोकों को धारण करेगी और उनके अपने लोक से भी ऊपर रहेगी। सुरभि सन्तुष्ट होकर अपने लोक में प्रविष्ट हुई।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.117.1)

सुराणामसुराणां च भूतानां च पितामह । प्रभुः स्रष्टा च भगवान्मुनिभिः स्तूयते भुवि ॥

surāṇāmasurāṇāṃ ca bhūtānāṃ ca pitāmaha | prabhuḥ sraṣṭā ca bhagavānmunibhiḥ stūyate bhuvi

“हे पितामह, जो भगवान् देवताओं, असुरों और समस्त प्राणियों के स्वामी और स्रष्टा हैं, पृथ्वी पर मुनिजन उनकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 2 (13.117.2)

तस्योपरि कथं ह्येष गोलोकः स्थानतां गतः । संशयो मे महानेष तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

tasyopari kathaṃ hyeṣa golokaḥ sthānatāṃ gataḥ | saṃśayo me mahāneṣa tanme vyākhyātumarhasi

“फिर यह गोलोक उनके भी ऊपर कैसे स्थित हुआ? यह मेरा बहुत बड़ा संशय है; आप इसे मुझे समझाइए।”

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.117.3)

मनोवाग्बुद्धयस्तावदेकस्थाः कुरुसत्तम । ततो मे शृणु कार्त्स्न्येन गोमहाभाग्यमुत्तमम् ॥

manovāgbuddhayastāvadekasthāḥ kurusattama | tato me śṛṇu kārtsnyena gomahābhāgyamuttamam

“हे कुरुश्रेष्ठ, मन, वाणी और बुद्धि को एक जगह स्थिर करो; तब मुझसे गौ की परम महिमा पूरी तरह सुनो।

श्लोक 4 (13.117.4)

पुण्यं यशस्यमायुष्यं तथा स्वस्त्ययनं महत् । कीर्तिर्विहरता लोके गवां यो गोषु भक्तिमान् ॥

puṇyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ tathā svastyayanaṃ mahat | kīrtirviharatā loke gavāṃ yo goṣu bhaktimān

यह पुण्य, यश और आयु देने वाली तथा महान् मंगलकारी है; जो गौओं का भक्त है उसकी कीर्ति संसार में विचरते हुए फैलती है।

श्लोक 5 (13.117.5)

श्रूयते हि पुराणेषु महर्षीणां महात्मनाम् । संस्थाने सर्वलोकानां देवानां चापि सम्भवे ॥

śrūyate hi purāṇeṣu maharṣīṇāṃ mahātmanām | saṃsthāne sarvalokānāṃ devānāṃ cāpi sambhave

पुराणों में महान् आत्मा महर्षियों से यह सुना जाता है — सब लोकों की स्थिति और देवताओं की उत्पत्ति के विषय में —

श्लोक 6 (13.117.6)

देवतार्थेऽमृतार्थे च यज्ञार्थे चैव भारत । सुरभिर्नाम विख्याता रोहिणी कामरूपिणी ॥

devatārthe'mṛtārthe ca yajñārthe caiva bhārata | surabhirnāma vikhyātā rohiṇī kāmarūpiṇī

देवताओं के लिए, अमृत के लिए और यज्ञ के लिए, हे भारत, सुरभि नाम से प्रसिद्ध, रोहिणी, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली एक गौ थी।

श्लोक 7 (13.117.7)

सङ्कल्प्य मनसा पूर्वं रोहिणी ह्यमृतात्मना । घोरं तपः समास्थाय निर्मिता विश्वकर्मणा ॥

saṅkalpya manasā pūrvaṃ rohiṇī hyamṛtātmanā | ghoraṃ tapaḥ samāsthāya nirmitā viśvakarmaṇā

रोहिणी ने पहले मन में संकल्प करके, अमृतस्वरूपा होकर, घोर तप किया और विश्वकर्मा द्वारा उसकी रचना हुई।

श्लोक 8 (13.117.8)

पुरुषं चासृजद्भूयस्तेजसा तपसा च ह । देदीप्यमानं वपुषा समिद्धमिव पावकम् ॥

puruṣaṃ cāsṛjadbhūyastejasā tapasā ca ha | dedīpyamānaṃ vapuṣā samiddhamiva pāvakam

तब फिर उसने अपने तेज और तप से एक पुरुष को रचा, जो शरीर से प्रज्वलित अग्नि के समान दीप्तिमान था।

श्लोक 9 (13.117.9)

सोऽपश्यदिष्टरूपां तां सुरभिं रोहिणीं तदा । दृष्ट्वैव चातिविमनाः सोऽभवत्काममोहितः ॥

so'paśyadiṣṭarūpāṃ tāṃ surabhiṃ rohiṇīṃ tadā | dṛṣṭvaiva cātivimanāḥ so'bhavatkāmamohitaḥ

उसने उस मनोहर रूप वाली सुरभि रोहिणी को देखा, और देखते ही वह बहुत विचलित होकर काम से मोहित हो गया।

श्लोक 10 (13.117.10)

तं कामार्तमथो ज्ञात्वा स्वयंभूर्लोकभावनः । माऽऽर्तो भव तथा चैष भगवानभ्यभाषत ॥

taṃ kāmārtamatho jñātvā svayaṃbhūrlokabhāvanaḥ | mā''rto bhava tathā caiṣa bhagavānabhyabhāṣata

उसे काम से पीड़ित जानकर लोकों की रचना करने वाले स्वयंभू भगवान् ने तब कहा, “व्याकुल मत हो।”

श्लोक 11 (13.117.11)

ततः स भगवांस्तत्र मार्ताण्ड इति विश्रुतः । चकार नाम तं दृष्ट्वा तस्यार्तीभावमुत्तमम् ॥

tataḥ sa bhagavāṃstatra mārtāṇḍa iti viśrutaḥ | cakāra nāma taṃ dṛṣṭvā tasyārtībhāvamuttamam

उसकी उस श्रेष्ठ आर्त-दशा को देखकर भगवान् ने तब उसका नाम मार्ताण्ड रखा, जिससे वह प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 12 (13.117.12)

सोऽददाद्भगवांस्तस्मै मार्ताण्डाय महात्मने । सुरूपां सुरभिं कन्यां तपस्तेजोमयीं शुभाम् ॥

so'dadādbhagavāṃstasmai mārtāṇḍāya mahātmane | surūpāṃ surabhiṃ kanyāṃ tapastejomayīṃ śubhām

भगवान् ने महात्मा मार्ताण्ड को सुरभि नाम की सुन्दर कन्या दी, जो रूपवती, तप और तेज से बनी तथा शुभ थी।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 13 (13.117.13)

यथा मयैष चोद्भूतस्त्वं चैवेषा च रोहिणी । मैथुनं गतवन्तौ च तथा चोत्पत्स्यति प्रजा ॥

yathā mayaiṣa codbhūtastvaṃ caiveṣā ca rohiṇī | maithunaṃ gatavantau ca tathā cotpatsyati prajā

“जैसे यह मेरे द्वारा उत्पन्न हुआ, और तुम तथा यह रोहिणी भी, और जैसे तुम दोनों मिले, वैसे ही सन्तान उत्पन्न होगी।

श्लोक 14 (13.117.14)

प्रजा भविष्यते पुण्या पवित्रं परमं च वाम् । न चाप्यगम्यागमनाद्दोषं प्राप्स्यसि कर्हिचित् ॥

prajā bhaviṣyate puṇyā pavitraṃ paramaṃ ca vām | na cāpyagamyāgamanāddoṣaṃ prāpsyasi karhicit

“तुम दोनों की सन्तान पुण्यमयी और परम पवित्र होगी; और अगम्या-गमन के कारण तुम्हें कभी दोष नहीं लगेगा।

श्लोक 15 (13.117.15)

त्वत्प्रजासम्भवं क्षीरं भविष्यति परं हविः । यज्ञेषु चाज्यभागानां त्वत्प्रजामूलजो विधिः ॥

tvatprajāsambhavaṃ kṣīraṃ bhaviṣyati paraṃ haviḥ | yajñeṣu cājyabhāgānāṃ tvatprajāmūlajo vidhiḥ

“तुम्हारी सन्तान से उत्पन्न दूध परम हवि होगा, और यज्ञों में घृत-भागों का विधान तुम्हारी सन्तान पर आधारित होगा।

श्लोक 16 (13.117.16)

प्रजाशुश्रूषवश्चैव ये भविष्यन्ति रोहिणि । तव तेनैव पुण्येन गोलोकं यान्तु मानवाः ॥

prajāśuśrūṣavaścaiva ye bhaviṣyanti rohiṇi | tava tenaiva puṇyena golokaṃ yāntu mānavāḥ

“हे रोहिणी, जो मनुष्य तुम्हारी सन्तान की सेवा करेंगे, वे तुम्हारे उसी पुण्य से गोलोक को जाएँ।

श्लोक 17 (13.117.17)

इदं पवित्रं परममृषभं नाम कर्हिचित् । यद्वै ज्ञात्वा द्विजा लोके मोक्ष्यन्ते योनिसङ्करात् ॥

idaṃ pavitraṃ paramamṛṣabhaṃ nāma karhicit | yadvai jñātvā dvijā loke mokṣyante yonisaṅkarāt

“यह परम पवित्र करने वाला साधन है, जिसे कभी ऋषभ कहा जाता है; इसे जानकर द्विज लोक में योनि-संकर के दोष से मुक्त होंगे।

श्लोक 18 (13.117.18)

एतत्क्रियाः प्रवर्तन्ते मन्त्रब्राह्मणसंस्कृताः । देवतानां पितॄणां च हव्यकव्यपुरोगमाः ॥

etatkriyāḥ pravartante mantrabrāhmaṇasaṃskṛtāḥ | devatānāṃ pitṝṇāṃ ca havyakavyapurogamāḥ

“मन्त्रों और ब्राह्मण-ग्रन्थों से संस्कृत क्रियाएँ इसी के सहारे चलेंगी, जिनमें देवताओं के हव्य और पितरों के कव्य सबसे आगे होंगे।

श्लोक 19 (13.117.19)

तत एतेन पुण्येन प्रजास्तव तु रोहिणि । ऊर्ध्वं ममापि लोकस्य वत्स्यन्ते निरुपद्रवाः ॥

tata etena puṇyena prajāstava tu rohiṇi | ūrdhvaṃ mamāpi lokasya vatsyante nirupadravāḥ

“तब, हे रोहिणी, इसी पुण्य से तुम्हारी सन्तान उपद्रव से रहित होकर मेरे लोक से भी ऊपर निवास करेगी।

श्लोक 20 (13.117.20)

भद्रं तेभ्यश्च भद्रं ते ये प्रजासु भवन्ति वै । युगन्धराश्च ते पुत्राः सन्तु लोकस्य धारणे ॥

bhadraṃ tebhyaśca bhadraṃ te ye prajāsu bhavanti vai | yugandharāśca te putrāḥ santu lokasya dhāraṇe

“उनका कल्याण हो और तुम्हारा भी कल्याण हो, जो तुम्हारी सन्तानों में उत्पन्न होंगे। तुम्हारे वे पुत्र युगन्धर बनकर जगत् को धारण करने में समर्थ हों।

श्लोक 21 (13.117.21)

यान्यान्कामयसे लोकांस्ताँल्लोकाननुयास्यसि । सर्वदेवगणश्चैव तव यास्यन्ति पुत्रताम् । तव स्तनसमुद्भूतं पिबन्तोऽमृतमुत्तमम् ॥

yānyānkāmayase lokāṃstām̐llokānanuyāsyasi | sarvadevagaṇaścaiva tava yāsyanti putratām | tava stanasamudbhūtaṃ pibanto'mṛtamuttamam

“तुम जिन-जिन लोकों की इच्छा करोगी, उन्हीं लोकों में जाओगी, और सारे देवगण तुम्हारे पुत्र बनेंगे, तुम्हारे स्तनों से उत्पन्न उत्तम अमृत का पान करते हुए।”

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (13.117.22)

एवमेतान्वरान्सर्वानगृह्णात्सुरभिस्तदा । ब्रुवतः सर्वलोकेशान्निर्वृतिं चागमत्पराम् ॥

evametānvarānsarvānagṛhṇātsurabhistadā | bruvataḥ sarvalokeśānnirvṛtiṃ cāgamatparām

इस प्रकार सुरभि ने तब ये सब वर ग्रहण किए, और सब लोकों के स्वामी के ऐसा कहने पर वह परम तृप्ति को प्राप्त हुई।

श्लोक 23 (13.117.23)

सृष्ट्वा प्रजाश्च विपुला लोकसन्धारणाय वै । ब्रह्मणा समनुज्ञाता सुरभिर्लोकमाविशत् ॥

sṛṣṭvā prajāśca vipulā lokasandhāraṇāya vai | brahmaṇā samanujñātā surabhirlokamāviśat

लोकों के धारण के लिए बहुत सी सन्तान रचकर और ब्रह्मा की अनुमति पाकर सुरभि अपने लोक में प्रविष्ट हो गई।

श्लोक 24 (13.117.24)

एवं वरप्रदानेन स्वयंभोरेव भारत । उपरिष्टाद्गवां लोकः प्रोक्तस्ते सर्वमादितः ॥

evaṃ varapradānena svayaṃbhoreva bhārata | upariṣṭādgavāṃ lokaḥ proktaste sarvamāditaḥ

इस प्रकार स्वयंभू के ही वरदान से, हे भारत, गौओं का लोक ऊपर स्थित है; यह सब मैंने तुम्हें आदि से कह सुनाया।

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