अनुशासन पर्व · अध्याय 118
सुरभि की सन्तानें
युधिष्ठिर पूछते हैं कि सुरभि की पहली सन्तानें कौन थीं। भीष्म उनके नाम गिनाते हैं: ग्यारह रुद्र, पृथ्वी, सोम, चार कन्याएँ (श्री, मेधा, कीर्ति, सरस्वती), दिव्य गोमाताओं की लम्बी सूची, और महेश्वर की ध्वजा बना दक्ष नामक वृषभ। अन्त में कपिला, रोहिणी तथा अन्य गौएँ इन्द्र, धर्मराज, वरुण और कुबेर आदि लोकपालों को दी जाती हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.118.1)
सुरभेः काः प्रजाः पूर्वं मार्ताण्डादभवन्पुरा । एतन्मे शंस तत्त्वेन गोषु मे प्रीयते मनः ॥
surabheḥ kāḥ prajāḥ pūrvaṃ mārtāṇḍādabhavanpurā | etanme śaṃsa tattvena goṣu me prīyate manaḥ
“प्राचीन काल में मार्ताण्ड से सुरभि की पहले कौन-सी सन्तानें उत्पन्न हुईं? यह मुझे यथार्थ रूप से बताइए, क्योंकि गौओं में मेरा मन रमता है।”
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.118.2)
शृणु नामानि दिव्यानि गोमातॄणां विशेषतः । याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः कल्याणीभिर्जनाधिप ॥
śṛṇu nāmāni divyāni gomātṝṇāṃ viśeṣataḥ | yābhirvyāptāstrayo lokāḥ kalyāṇībhirjanādhipa
“सुनो, गौओं की माताओं के दिव्य नाम विशेष रूप से, जिन कल्याणमयी माताओं से तीनों लोक व्याप्त हैं, हे जनाधिप।
श्लोक 3 (13.118.3)
सुरभ्यः प्रथमोद्भूता याश्च स्युः प्रथमाः प्रजाः । मयोच्यमानाः शृणु ताः प्राप्स्यसे विपुलं यशः ॥
surabhyaḥ prathamodbhūtā yāśca syuḥ prathamāḥ prajāḥ | mayocyamānāḥ śṛṇu tāḥ prāpsyase vipulaṃ yaśaḥ
जो सुरभियाँ सबसे पहले उत्पन्न हुईं और जो पहली सन्तानें थीं, मेरे बताने पर उन्हें सुनो; तुम्हें विपुल यश प्राप्त होगा।
श्लोक 4 (13.118.4)
तप्त्वा तपो घोरतपाः सुरभिर्दीप्ततेजसी । सुषावैकादश सुतान्रुद्रा ये च्छन्दसि स्तुताः ॥
taptvā tapo ghoratapāḥ surabhirdīptatejasī | suṣāvaikādaśa sutānrudrā ye cchandasi stutāḥ
घोर तप करने वाली, प्रदीप्त तेज वाली सुरभि ने तप करके ग्यारह पुत्रों को जन्म दिया, जो वेद में स्तुत रुद्र हैं:
श्लोक 5 (13.118.5)
अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्र्यम्बकश्च महायशाः । वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपाली रैवतस्तथा ॥
ajaikapādahirbudhnyastryambakaśca mahāyaśāḥ | vṛṣākapiśca śambhuśca kapālī raivatastathā
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और महायशस्वी त्र्यम्बक, वृषाकपि और शम्भु, कपाली और रैवत,
श्लोक 6 (13.118.6)
हरश्च बहुरूपश्च उग्र उग्रोऽथ वीर्यवान् । तस्य चैवात्मजः श्रीमान्विश्वरूपो महायशाः ॥
haraśca bahurūpaśca ugra ugro'tha vīryavān | tasya caivātmajaḥ śrīmānviśvarūpo mahāyaśāḥ
हर और बहुरूप, उग्र — भयंकर और पराक्रमी — और उसका पुत्र, श्रीमान् महायशस्वी विश्वरूप।
श्लोक 7 (13.118.7)
एकादशैते कथिता रुद्रास्ते नाम नामतः । महात्मानो महायोगास्तेजोयुक्ता महाबलाः ॥
ekādaśaite kathitā rudrāste nāma nāmataḥ | mahātmāno mahāyogāstejoyuktā mahābalāḥ
ये ग्यारह रुद्र तुम्हें एक-एक करके नाम से बता दिए गए — महात्मा, महायोगी, तेजस्वी और महाबली।
श्लोक 8 (13.118.8)
एते वरिष्ठजन्मानो देवानां ब्रह्मवादिनाम् । विप्राणां प्रकृतिर्लोके एत एव हि विश्रुताः ॥
ete variṣṭhajanmāno devānāṃ brahmavādinām | viprāṇāṃ prakṛtirloke eta eva hi viśrutāḥ
ये ब्रह्मवादी देवताओं में श्रेष्ठ जन्म वाले हैं और लोक में ब्राह्मणों की प्रकृति के रूप में ही प्रसिद्ध हैं।
श्लोक 9 (13.118.9)
एत एकादश प्रोक्ता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः । शतं त्वेतत्समाख्यातं शतरुद्रं महात्मनाम् ॥
eta ekādaśa proktā rudrāstribhuvaneśvarāḥ | śataṃ tvetatsamākhyātaṃ śatarudraṃ mahātmanām
ये ग्यारह रुद्र त्रिभुवन के स्वामी कहे गए हैं; और इन महात्माओं का यह समूह सौ के रूप में बताया गया है, जो शतरुद्र है।
श्लोक 10 (13.118.10)
सुषुवे प्रथमां कन्यां सुरभिः पृथिवीं तदा । विश्वकामदुघा धेनुर्या धारयति देहिनः ॥
suṣuve prathamāṃ kanyāṃ surabhiḥ pṛthivīṃ tadā | viśvakāmadughā dhenuryā dhārayati dehinaḥ
तब सुरभि ने पहली कन्या के रूप में पृथ्वी को जन्म दिया, जो सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली धेनु है और सब देहधारियों को धारण करती है।
श्लोक 11 (13.118.11)
सुतं गोब्राह्मणं राजन्नेकमित्यभिधीयते । गोब्राह्मणस्य जननी सुरभिः परिकीर्त्यते ॥
sutaṃ gobrāhmaṇaṃ rājannekamityabhidhīyate | gobrāhmaṇasya jananī surabhiḥ parikīrtyate
हे राजन्, उसका एक पुत्र गोब्राह्मण कहलाता है; और सुरभि गौ तथा ब्राह्मण की जननी कही जाती है।
श्लोक 12 (13.118.12)
सृष्ट्वा तु प्रथमं रुद्रान्वरदान्रुद्रसम्भवान् । पश्चात्प्रभुं ग्रहपतिं सुषुवे लोकसम्मतम् ॥
sṛṣṭvā tu prathamaṃ rudrānvaradānrudrasambhavān | paścātprabhuṃ grahapatiṃ suṣuve lokasammatam
पहले वरदायक, ब्रह्मा से उत्पन्न रुद्रों की रचना करके उसने फिर लोकमान्य प्रभु ग्रहपति को जन्म दिया:
श्लोक 13 (13.118.13)
सोमराजानममृतं यज्ञसर्वस्वमुत्तमम् । ओषधीनां रसानां च देवानां जीवितस्य च ॥
somarājānamamṛtaṃ yajñasarvasvamuttamam | oṣadhīnāṃ rasānāṃ ca devānāṃ jīvitasya ca
राजा सोम को, जो अमृत है, यज्ञ का सर्वस्व है, सर्वोत्तम है, और औषधियों, रसों तथा देवताओं का जीवन है।
श्लोक 14 (13.118.14)
ततः श्रियं च मेधां च कीर्तिं देवीं सरस्वतीम् । चतस्रः सुषुवे कन्या योगेषु नियताः स्थिताः ॥
tataḥ śriyaṃ ca medhāṃ ca kīrtiṃ devīṃ sarasvatīm | catasraḥ suṣuve kanyā yogeṣu niyatāḥ sthitāḥ
फिर उसने चार कन्याओं को जन्म दिया, जो योग में स्थित रहती हैं: श्री, मेधा, कीर्ति और देवी सरस्वती।
श्लोक 15 (13.118.15)
एताः सृष्ट्वा प्रजा एषा सुरभिः कामरूपिणी । सुषुवे परमं भूयो दिव्या गोमातरः शुभाः ॥
etāḥ sṛṣṭvā prajā eṣā surabhiḥ kāmarūpiṇī | suṣuve paramaṃ bhūyo divyā gomātaraḥ śubhāḥ
इन सन्तानों को रचकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सुरभि ने फिर दिव्य और शुभ गोमाताओं को, जो सर्वोच्च हैं, जन्म दिया।
श्लोक 16 (13.118.16)
पुण्यां मायां मधुश्च्योतां शिवां शीघ्रां सरिद्वराम् । हिरण्यवर्णां सुभगां गव्यां पृश्नीं कुथावतीम् ॥
puṇyāṃ māyāṃ madhuścyotāṃ śivāṃ śīghrāṃ saridvarām | hiraṇyavarṇāṃ subhagāṃ gavyāṃ pṛśnīṃ kuthāvatīm
पुण्या, माया, मधुस्रावी, शिवा, शीघ्रा, नदियों में श्रेष्ठ, स्वर्ण-वर्णा, सौभाग्यवती, गव्या, पृश्नी, कुथावती,
श्लोक 17 (13.118.17)
अङ्गावतीं घृतवतीं दधिक्षीरपयोवतीम् । अमोघां सुरसां सत्यां रेवतीं मारुतीं रसाम् ॥
aṅgāvatīṃ ghṛtavatīṃ dadhikṣīrapayovatīm | amoghāṃ surasāṃ satyāṃ revatīṃ mārutīṃ rasām
अङ्गावती, घृतवती, दही, दूध और जल से भरी हुई, अमोघा, सुरसा, सत्या, रेवती, मारुती और रसा,
श्लोक 18 (13.118.18)
अजां च सिकतां चैव शुद्धधूमामधारिणीम् । जीवां प्राणवतीं धन्यां शुद्धां धेनुं धनावहाम् ॥
ajāṃ ca sikatāṃ caiva śuddhadhūmāmadhāriṇīm | jīvāṃ prāṇavatīṃ dhanyāṃ śuddhāṃ dhenuṃ dhanāvahām
अजा और सिकता, शुद्धधूमा और अधारिणी, जीवा, प्राणवती, धन्या, शुद्धा, और धन लाने वाली धेनु धनावहा,
श्लोक 19 (13.118.19)
इन्द्रामृद्धिं च शान्तिं च शान्तपापां सरिद्वराम् । चत्वारिंशतिमेकां च धन्यास्ता दिवि पूजिताः ॥
indrāmṛddhiṃ ca śāntiṃ ca śāntapāpāṃ saridvarām | catvāriṃśatimekāṃ ca dhanyāstā divi pūjitāḥ
इन्द्रा, ऋद्धि और शान्ति, शान्तपापा, नदियों में श्रेष्ठ, और चालीस से एक अधिक — ये धन्य गौएँ स्वर्ग में पूजित हैं।
श्लोक 20 (13.118.20)
भूयो जज्ञे सुरभ्याश्च श्रीमांश्चन्द्रांशुसप्रभः । वृषो दक्ष इति ख्यातः कण्ठे मणितलप्रभः ॥
bhūyo jajñe surabhyāśca śrīmāṃścandrāṃśusaprabhaḥ | vṛṣo dakṣa iti khyātaḥ kaṇṭhe maṇitalaprabhaḥ
फिर सुरभि से एक श्रीमान् उत्पन्न हुआ, चन्द्रकिरणों के समान प्रभा वाला, दक्ष नाम से प्रसिद्ध बैल, जिसके कण्ठ पर मणि के तल जैसी आभा थी,
श्लोक 21 (13.118.21)
स्रग्वी ककुद्मान्द्युतिमान्मृणालसदृशप्रभः । सुरभ्यनुमते दत्तो ध्वजो माहेश्वरस्तु सः ॥
sragvī kakudmāndyutimānmṛṇālasadṛśaprabhaḥ | surabhyanumate datto dhvajo māheśvarastu saḥ
माला पहने हुए, कूबड़ वाला, कान्तिमान्, मृणाल के समान प्रभा वाला; सुरभि की अनुमति से वह महेश्वर की ध्वजा के रूप में दिया गया।
श्लोक 22 (13.118.22)
सुरभ्यः कामरूपिण्यो गावः पुण्यार्थमुत्कटाः । आदित्येभ्यो वसुभ्यश्च विश्वेभ्यश्च ददौ वरान् ॥
surabhyaḥ kāmarūpiṇyo gāvaḥ puṇyārthamutkaṭāḥ | ādityebhyo vasubhyaśca viśvebhyaśca dadau varān
इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सुरभियों ने, जो पुण्य के लिए समर्थ गौएँ हैं, आदित्यों, वसुओं और विश्वेदेवों को वर दिए।
श्लोक 23 (13.118.23)
सुरभिस्तु तपस्तप्त्वा सुषुवे गास्ततः पुनः । या दत्ता लोकपालानामिन्द्रादीनां युधिष्ठिर ॥
surabhistu tapastaptvā suṣuve gāstataḥ punaḥ | yā dattā lokapālānāmindrādīnāṃ yudhiṣṭhira
सुरभि ने तप करके फिर गौओं को जन्म दिया, जो इन्द्र आदि लोकपालों को दी गईं, हे युधिष्ठिर:
श्लोक 24 (13.118.24)
सुष्टुतां कपिलां चैव रोहिणीं च यशस्विनीम् । सर्वकामदुघां चैव मरुतां कामरूपिणीम् ॥
suṣṭutāṃ kapilāṃ caiva rohiṇīṃ ca yaśasvinīm | sarvakāmadughāṃ caiva marutāṃ kāmarūpiṇīm
सुष्टुता, कपिला और यशस्विनी रोहिणी, तथा मरुतों की सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली गौ।
श्लोक 25 (13.118.25)
गावो मृष्टदुघा ह्येतास्ताश्चतस्रोऽत्र संस्तुताः । यासां भूत्वा पुरा वत्साः पिबन्त्यमृतमुत्तमम् ॥
gāvo mṛṣṭadughā hyetāstāścatasro'tra saṃstutāḥ | yāsāṃ bhūtvā purā vatsāḥ pibantyamṛtamuttamam
ये चारों गौएँ निर्मल दूध देने वाली हैं और यहाँ स्तुत हैं; पूर्वकाल में जो इनके बछड़े बने, वे उत्तम अमृत पीते हैं।
श्लोक 26 (13.118.26)
सुष्टुतां देवराजाय वासवाय महात्मने । कपिलां धर्मराजाय वरुणाय च रोहिणीम् ॥
suṣṭutāṃ devarājāya vāsavāya mahātmane | kapilāṃ dharmarājāya varuṇāya ca rohiṇīm
सुष्टुता देवराज महात्मा इन्द्र (वासव) को दी गई; कपिला धर्मराज को, और रोहिणी वरुण को;
श्लोक 27 (13.118.27)
सर्वकामदुघां धेनुं राज्ञे वैश्रवणाय च । इत्येता लोकमहिता विश्रुताः सुरभेः प्रजाः ॥
sarvakāmadughāṃ dhenuṃ rājñe vaiśravaṇāya ca | ityetā lokamahitā viśrutāḥ surabheḥ prajāḥ
और सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली धेनु राजा वैश्रवण को। इस प्रकार सुरभि की ये सन्तानें लोक में पूजित और प्रसिद्ध हैं।
श्लोक 28 (13.118.28)
एतासां प्रजया पूर्णा पृथिवी मुनिपुङ्गवः । गोभ्यः प्रभवते सर्वं यत्किंचिदिह शोभनम् ॥
etāsāṃ prajayā pūrṇā pṛthivī munipuṅgavaḥ | gobhyaḥ prabhavate sarvaṃ yatkiṃcidiha śobhanam
इन गौओं की सन्तानों से पृथ्वी भरी हुई है, हे मुनिश्रेष्ठ; यहाँ जो कुछ भी शुभ है, वह सब गौओं से ही उत्पन्न होता है।
श्लोक 29 (13.118.29)
सुरभ्यपत्यमित्येतन्नामतस्तेऽनुपूर्वशः । कीर्तितं ब्रूहि राजेन्द्र किं भूयः कथयामि ते ॥
surabhyapatyamityetannāmataste'nupūrvaśaḥ | kīrtitaṃ brūhi rājendra kiṃ bhūyaḥ kathayāmi te
सुरभि की सन्तानों का यह वर्णन नाम लेकर क्रम से तुम्हें सुना दिया गया। हे राजेन्द्र, कहो, अब और क्या सुनाऊँ?”