अनुशासन पर्व · अध्याय 119
इन्द्र का सुरभि का दूध पीना; गौ में देवताओं का निवास
युधिष्ठिर पूछते हैं कि सुरभि की चार कन्याएँ गौओं से भिन्न हैं या उन्हीं में रहती हैं और गौओं में कौन-से देवता रहते हैं। भीष्म बताते हैं कि इन्द्र अमृत के लिए सुरभि के पास गए, बछड़ा बनकर उसका दूध पिया और अमरत्व पाया, और सुरभि ने उन्हें गौ-ब्राह्मण का आदर करने को कहा। इन्द्र की इच्छा पर सुरभि ने सब देवताओं को अपने शरीर के अलग-अलग अंगों में बसने दिया। भीष्म युधिष्ठिर से गौ की पूजा करने को कहकर फेनप का प्रसंग संकेत करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.119.1)
सुरभ्यास्तु तदा देव्याः कीर्तिर्लक्ष्मीः सरस्वती । मेधा च प्रवरा देवी याश्चतस्रोऽभिविश्रुताः ॥
surabhyāstu tadā devyāḥ kīrtirlakṣmīḥ sarasvatī | medhā ca pravarā devī yāścatasro'bhiviśrutāḥ
“देवी सुरभि की कीर्ति, लक्ष्मी, सरस्वती और श्रेष्ठ देवी मेधा — ये चार प्रसिद्ध हैं।
श्लोक 2 (13.119.2)
पृथग्गोभ्यः किमेताः स्युरुताहो गोषु संश्रिताः । देवाः के वाऽऽश्रिता गोषु तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
pṛthaggobhyaḥ kimetāḥ syurutāho goṣu saṃśritāḥ | devāḥ ke vā''śritā goṣu tanme brūhi pitāmaha
क्या ये गौओं से अलग हैं, अथवा गौओं में ही आश्रित हैं? और कौन-से देवता गौओं में निवास करते हैं? हे पितामह, यह मुझे बताइए।”
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.119.3)
यं देवं संश्रिता गावस्तं देवं देवसंज्ञितम् । यद्यद्देवाश्रितं दैवं तत्तद्दैवं द्विजा विदुः ॥
yaṃ devaṃ saṃśritā gāvastaṃ devaṃ devasaṃjñitam | yadyaddevāśritaṃ daivaṃ tattaddaivaṃ dvijā viduḥ
गौएँ जिस देवता का आश्रय लेती हैं, वह देवता “देव” नाम से जाना जाता है; और जो-जो दैवत जिस देवता पर आश्रित है, उसे द्विज उसी देवता का दैव मानते हैं।
श्लोक 4 (13.119.4)
सर्वेषामेव देवानां पूर्वं किल समुद्भवे । अमृतार्थे सुरपतिः सुरभिं समुपस्थितः ॥
sarveṣāmeva devānāṃ pūrvaṃ kila samudbhave | amṛtārthe surapatiḥ surabhiṃ samupasthitaḥ
पहले, सब देवताओं की उत्पत्ति के समय, देवराज इन्द्र अमृत के लिए सुरभि के पास आए।
इन्द्र उवाच
श्लोक 5 (13.119.5)
इच्छेयममृतं दत्तं त्वया देवि रसाधिकम् । त्वत्प्रसादाच्छिवं मह्यममरत्वं भवेदिति ॥
iccheyamamṛtaṃ dattaṃ tvayā devi rasādhikam | tvatprasādācchivaṃ mahyamamaratvaṃ bhavediti
“हे देवी, मैं आपका दिया हुआ अमृत चाहता हूँ, जो रस में सबसे बढ़कर है; आपकी कृपा से मुझे कल्याणकारी अमरत्व प्राप्त हो।”
सुरभिरुवाच
श्लोक 6 (13.119.6)
वत्सो भूत्वा सुरपते पिबस्व प्रस्रवं मम । ततोऽमरत्वमपि तत्स्थानमैन्द्रमवाप्स्यसि ॥
vatso bhūtvā surapate pibasva prasravaṃ mama | tato'maratvamapi tatsthānamaindramavāpsyasi
“हे देवराज, बछड़ा बनकर मेरा बहता हुआ दूध पियो; तब तुम अमरत्व और इन्द्र का वह स्थान प्राप्त करोगे।
श्लोक 7 (13.119.7)
न च ते वृत्रहन्युद्धे व्यथाऽरिभ्यो भविष्यति । बलार्थमात्मनः शक्र प्रस्रवं पिब मे विभो ॥
na ca te vṛtrahanyuddhe vyathā'ribhyo bhaviṣyati | balārthamātmanaḥ śakra prasravaṃ piba me vibho
“और हे वृत्रहन्, युद्ध में शत्रुओं से तुम्हें कोई व्यथा नहीं होगी। हे प्रभो शक्र, अपने बल के लिए मेरा दूध पियो।”
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (13.119.8)
ततोऽपिबत्स्तनं तस्याः सुरभ्याः सुरसत्तमः । अमरत्वं सुरूपत्वं बलं च पदमुत्तमम् ॥
tato'pibatstanaṃ tasyāḥ surabhyāḥ surasattamaḥ | amaratvaṃ surūpatvaṃ balaṃ ca padamuttamam
तब देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र ने सुरभि का दूध पिया, और अमरत्व, सुन्दर रूप, बल तथा उत्तम पद प्राप्त किया।
श्लोक 9 (13.119.9)
पुरंदरोऽमृतं पीत्वा प्रहृष्टः समुपस्थितः । पुत्रोऽहं तव भद्रं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
puraṃdaro'mṛtaṃ pītvā prahṛṣṭaḥ samupasthitaḥ | putro'haṃ tava bhadraṃ te brūhi kiṃ karavāṇi te
अमृत पीकर पुरन्दर प्रसन्न होकर सामने आए और बोले, “मैं आपका पुत्र हूँ, आपका कल्याण हो; बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?”
सुरभिरुवाच
श्लोक 10 (13.119.10)
कृतं पुत्र त्वया सर्वमुपयाहि त्रिविष्टपम् । पालयस्व सुरान्सर्वाञ्जहि ये सुरशत्रवः ॥
kṛtaṃ putra tvayā sarvamupayāhi triviṣṭapam | pālayasva surānsarvāñjahi ye suraśatravaḥ
“पुत्र, तुमने सब कर दिया; अब स्वर्ग को लौट जाओ। सब देवताओं की रक्षा करो और जो देवताओं के शत्रु हैं उन्हें मारो।
श्लोक 11 (13.119.11)
न च गोब्राह्मणेऽवज्ञा कार्या ते शान्तिमिच्छता । गोब्राह्मणस्य निश्वासः शोषयेदपि देवताः ॥
na ca gobrāhmaṇe'vajñā kāryā te śāntimicchatā | gobrāhmaṇasya niśvāsaḥ śoṣayedapi devatāḥ
“यदि शान्ति चाहते हो तो गौ और ब्राह्मण का कभी अनादर न करना; गौ और ब्राह्मण का निःश्वास देवताओं को भी सुखा सकता है।
श्लोक 12 (13.119.12)
गोब्राह्मणप्रियो नित्यं स्वस्तिशब्दमुदाहरन् । पृथिव्यामन्तरिक्षे च नाकपृष्ठे च विक्रमेत् ॥
gobrāhmaṇapriyo nityaṃ svastiśabdamudāharan | pṛthivyāmantarikṣe ca nākapṛṣṭhe ca vikramet
“गौ और ब्राह्मण के प्रिय बने रहकर, सदा कल्याण के शब्द बोलते हुए, तुम पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग के शिखर पर पराक्रम से विचरो।
श्लोक 13 (13.119.13)
यच्च तेऽन्यद्भवेत्कृत्यं तन्मे ब्रूयाः समासतः । तत्ते सर्वं करिष्यामि सत्येनैतद्ब्रवीमि ते ॥
yacca te'nyadbhavetkṛtyaṃ tanme brūyāḥ samāsataḥ | tatte sarvaṃ kariṣyāmi satyenaitadbravīmi te
“तुम्हारा और जो भी कार्य हो, वह मुझे संक्षेप में कहना; मैं वह सब तुम्हारे लिए करूँगी। यह मैं सत्य के साथ कहती हूँ।”
इन्द्र उवाच
श्लोक 14 (13.119.14)
इच्छेयं गोषु नियतं वस्तुं देवि ब्रवीमि ते । एभिः सुरगणैः सार्धं ममानुग्रहमाचर ॥
iccheyaṃ goṣu niyataṃ vastuṃ devi bravīmi te | ebhiḥ suragaṇaiḥ sārdhaṃ mamānugrahamācara
“हे देवी, मैं सदा गौओं में निवास करना चाहता हूँ, मैं आपसे यह कहता हूँ। इन देवगणों के साथ मुझ पर अनुग्रह कीजिए।”
सुरभिरुवाच
श्लोक 15 (13.119.15)
गवां शरीरं प्रत्यक्षमेतत्कौशिक लक्षये । यो यत्रोत्सहते वस्तुं स तत्र वसतां सुरः ॥
gavāṃ śarīraṃ pratyakṣametatkauśika lakṣaye | yo yatrotsahate vastuṃ sa tatra vasatāṃ suraḥ
“हे कौशिक, गौओं का शरीर प्रत्यक्ष है, मैं ऐसा देखती हूँ; जो देवता जिस अंग में रहना चाहे, वह वहाँ रहे।
श्लोक 16 (13.119.16)
सर्वं पवित्रं परमं गवां गात्रं सुपूजितम् । तथा कुरुष्व भद्रं ते यथा त्वं शक्र मन्यसे ॥
sarvaṃ pavitraṃ paramaṃ gavāṃ gātraṃ supūjitam | tathā kuruṣva bhadraṃ te yathā tvaṃ śakra manyase
“गौ का सारा शरीर, भली-भाँति पूजित होने पर, परम पवित्र है। हे शक्र, जैसा तुम ठीक समझो वैसा करो; तुम्हारा कल्याण हो।”
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (13.119.17)
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा सुरभ्याः सुरसत्तमः । सह सर्वैः सुरगणैरभजत्सौरभीं प्रजाम् ॥
tasyāstadvacanaṃ śrutvā surabhyāḥ surasattamaḥ | saha sarvaiḥ suragaṇairabhajatsaurabhīṃ prajām
उसकी यह बात सुनकर देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र ने सब देवगणों के साथ सुरभि की सन्तान गौओं का आश्रय लिया।
श्लोक 18 (13.119.18)
शृङ्गे वक्त्रे च जिह्वायां देवराजः समाविशत् । सर्वच्छिद्रेषु पवनः पादेषु मरुतां गणाः ॥
śṛṅge vaktre ca jihvāyāṃ devarājaḥ samāviśat | sarvacchidreṣu pavanaḥ pādeṣu marutāṃ gaṇāḥ
देवराज सींगों, मुख और जीभ में प्रविष्ट हुए; वायु सब छिद्रों में, और मरुद्गण पैरों में।
श्लोक 19 (13.119.19)
ककुदं सर्वगो रुद्रः कुक्षौ चैव हुताशनः । सरस्वती स्तनेष्वग्र्या श्रीः पुरीषे जगत्प्रिया ॥
kakudaṃ sarvago rudraḥ kukṣau caiva hutāśanaḥ | sarasvatī staneṣvagryā śrīḥ purīṣe jagatpriyā
सर्वव्यापी रुद्र कूबड़ में, अग्नि कुक्षि में, सरस्वती प्रमुख रूप से थनों में, और जगत् की प्रिय श्री गोबर में स्थित हुईं।
श्लोक 20 (13.119.20)
मूत्रे कीर्तिश्च गङ्गा च मेधा पयसि शाश्वती । वक्त्रे सोमश्च वै देवो हृदये भगवान्यमः ॥
mūtre kīrtiśca gaṅgā ca medhā payasi śāśvatī | vaktre somaśca vai devo hṛdaye bhagavānyamaḥ
कीर्ति और गंगा मूत्र में, शाश्वत मेधा दूध में; देव सोम मुख में और भगवान् यम हृदय में स्थित हैं।
श्लोक 21 (13.119.21)
धर्मः पुच्छे क्रिया लोम्नि भास्करश्चक्षुषी श्रितः । सिद्धाः सन्धिषु सिद्धिश्च तपस्तेजश्च चेष्टने ॥
dharmaḥ pucche kriyā lomni bhāskaraścakṣuṣī śritaḥ | siddhāḥ sandhiṣu siddhiśca tapastejaśca ceṣṭane
धर्म पूँछ में, क्रिया रोमों में, सूर्य दोनों नेत्रों में स्थित है; सिद्ध जोड़ों में, सिद्धि भी, और तप तथा तेज उसकी चेष्टा में हैं।
श्लोक 22 (13.119.22)
एवं सर्वे सुरगणा नियता गात्रवर्त्मसु । महती देवता गावो ब्राह्मणैः परिसंस्कृताः ॥
evaṃ sarve suragaṇā niyatā gātravartmasu | mahatī devatā gāvo brāhmaṇaiḥ parisaṃskṛtāḥ
इस प्रकार सब देवगण उसके अंगों के मार्गों में नियत रूप से रहते हैं। गौएँ महान् देवता हैं, ब्राह्मणों द्वारा संस्कृत।
श्लोक 23 (13.119.23)
गामाश्रयन्ति सहिता देवा हि प्रभविष्णवः । किमासां सर्वभावेन विदध्याद्भगवान्प्रियम् ॥
gāmāśrayanti sahitā devā hi prabhaviṣṇavaḥ | kimāsāṃ sarvabhāvena vidadhyādbhagavānpriyam
सामर्थ्यवान् देवता एकत्र होकर गौ का आश्रय लेते हैं। भगवान् पूरे भाव से उनके लिए कौन-सा प्रिय कार्य नहीं करेंगे?
श्लोक 24 (13.119.24)
भवांश्च परया भक्त्या पूजयस्व नरेश्वर । गावस्तु परमं लोके पवित्रं पावनं हविः ॥
bhavāṃśca parayā bhaktyā pūjayasva nareśvara | gāvastu paramaṃ loke pavitraṃ pāvanaṃ haviḥ
और हे नरेश्वर, तुम भी परम भक्ति से उनकी पूजा करो; क्योंकि लोक में गौएँ परम पवित्र, पावन करने वाली हवि हैं।
श्लोक 25 (13.119.25)
निपात्य भक्षितः स्वर्गाद्भार्गवः फेनपः किल । स च प्राणान्पुनर्लब्ध्वा ततो गोलोकमाश्रितः ॥
nipātya bhakṣitaḥ svargādbhārgavaḥ phenapaḥ kila | sa ca prāṇānpunarlabdhvā tato golokamāśritaḥ
कहा जाता है कि भार्गव फेनप को स्वर्ग से गिराकर खा लिया गया था; फिर प्राण पुनः पाकर वह गोलोक में जा बसा।”