अनुशासन पर्व · अध्याय 120
सुमित्र का फेनप नाम पड़ना
युधिष्ठिर पूछते हैं कि फेनप कौन था और वह गोलोक कैसे पहुँचा, और भीष्म कथा आरम्भ करते हैं। भार्गव सुमित्र त्रिशिखर पर्वत से निकली कुलजा नदी के तट पर वानप्रस्थी के रूप में रहते थे। अंगिरा के वंश के एक धर्मशील पुरुष ने उन्हें एक सुन्दर गाय दी, जिसे वे माता की तरह पालते रहे, और उसकी सन्तानों से हज़ारों गायों का झुण्ड बन गया। बछड़ों के प्रति स्नेह के कारण वे केवल उनके छोड़े हुए दूध पर निर्वाह करते थे, और इसी से उनका नाम फेनप पड़ा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.120.1)
कः फेनपेति नाम्नाऽसौ कथं वा भक्षितः पुरा । मृत उज्जीवितः कस्मात्कथं गोलोकमाश्रितः ॥
kaḥ phenapeti nāmnā'sau kathaṃ vā bhakṣitaḥ purā | mṛta ujjīvitaḥ kasmātkathaṃ golokamāśritaḥ
यह फेनप नाम का कौन था? पूर्वकाल में उसे कैसे खा लिया गया था? मरकर भी वह क्यों जी उठा, और वह गोलोक में कैसे पहुँचा?
श्लोक 2 (13.120.2)
विरुद्धे मानुषे लोके तथा समयवर्त्मसु । ऋते दैवं हि दुष्प्रापं मानुषेषु विशेषतः । संशयो मे महानत्र तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
viruddhe mānuṣe loke tathā samayavartmasu | ṛte daivaṃ hi duṣprāpaṃ mānuṣeṣu viśeṣataḥ | saṃśayo me mahānatra tanme vyākhyātumarhasi
मनुष्यों का यह संसार विरोधों से भरा है और नियम-व्यवस्थाओं के मार्ग भी बँधे हुए हैं; ऐसे में दैव के बिना कुछ भी पाना कठिन है, और मनुष्यों में तो विशेष रूप से। इस विषय में मुझे बड़ा संशय है; आप उसे मुझे समझाइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.120.3)
श्रूयते भार्गवे वंशे सुमित्रो नाम भारत । वेदाध्ययनसम्पन्नो विपुले तपसि स्थितः ॥
śrūyate bhārgave vaṃśe sumitro nāma bhārata | vedādhyayanasampanno vipule tapasi sthitaḥ
हे भारत, सुना जाता है कि भृगुवंश में सुमित्र नाम के एक पुरुष थे, जो वेदाध्ययन में निपुण और महान तप में स्थित थे।
श्लोक 4 (13.120.4)
वानप्रस्थाश्रमे युक्तः स्वकर्मनिरतः सदा । विनयाचारतत्वज्ञः सर्वधर्मार्थकोविदः ॥
vānaprasthāśrame yuktaḥ svakarmanirataḥ sadā | vinayācāratatvajñaḥ sarvadharmārthakovidaḥ
वे वानप्रस्थ आश्रम में रहते थे, सदा अपने कर्मों में लगे रहते थे, विनय और सदाचार के तत्त्व को जानते थे तथा सब प्रकार के धर्म और अर्थ में कुशल थे।
श्लोक 5 (13.120.5)
यत्नात्त्रिषवणस्नायी संध्योपासनतत्परः । अग्निहोत्ररतः क्षान्तो जपञ्जुह्वच्च नित्यदा ॥
yatnāttriṣavaṇasnāyī saṃdhyopāsanatatparaḥ | agnihotrarataḥ kṣānto japañjuhvacca nityadā
वे यत्नपूर्वक दिन के तीनों समय स्नान करते, सन्ध्योपासना में तत्पर रहते, अग्निहोत्र में रत और क्षमाशील थे, और सदा जप तथा हवन करते रहते थे।
श्लोक 6 (13.120.6)
पितृदेवांश्च नियतमतिथींश्च स पूजयन् । प्राणसन्धारणार्थं च यत्किंचिदुपहारयन् ॥
pitṛdevāṃśca niyatamatithīṃśca sa pūjayan | prāṇasandhāraṇārthaṃ ca yatkiṃcidupahārayan
वे संयत चित्त से सदा पितरों, देवताओं और अतिथियों का पूजन करते थे, और प्राणों को बनाए रखने के लिए जो थोड़ा-बहुत मिलता, उसे अर्पित करते थे।
श्लोक 7 (13.120.7)
गिरिस्त्रिशिखरो नाम यतः प्रभवते नदी । कुलजेति पुराणेषु विश्रुता रुद्रनिर्मिता ॥
giristriśikharo nāma yataḥ prabhavate nadī | kulajeti purāṇeṣu viśrutā rudranirmitā
त्रिशिखर नाम का एक पर्वत है, जिससे एक नदी निकलती है; पुराणों में वह रुद्र की बनाई हुई नदी कुलजा के नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 8 (13.120.8)
तस्यास्तीरे समे देशे पुष्पमालासमाकुले । वन्यौषधिद्रुमोपेते नानापक्षिमृगायुते ॥
tasyāstīre same deśe puṣpamālāsamākule | vanyauṣadhidrumopete nānāpakṣimṛgāyute
उसके तट पर एक समतल प्रदेश था, जो फूलों की मालाओं से सजा-सा था, वन की ओषधियों और वृक्षों से भरा था और अनेक प्रकार के पक्षियों तथा मृगों से बसा था।
श्लोक 9 (13.120.9)
व्यपेतदंशमशके ध्वाङ्क्षगृध्रैरसेविते । कृष्णदर्भतृणप्राये सुरम्ये ज्योतिरश्मिनि ॥
vyapetadaṃśamaśake dhvāṅkṣagṛdhrairasevite | kṛṣṇadarbhatṛṇaprāye suramye jyotiraśmini
वहाँ डाँस और मच्छर नहीं थे, कौओं और गिद्धों का आना-जाना नहीं था, अधिकतर काली कुशा का तृण उगा था; वह स्थान अत्यन्त रमणीय था और चमकते पत्थरों से जगमगाता था।
श्लोक 10 (13.120.10)
सर्वोन्नतैः समैः श्यामैर्याज्ञीयैस्तरुभिर्वृते । तत्राश्रमपदं पुण्यं भृगूणामभवत्पुरा ॥
sarvonnataiḥ samaiḥ śyāmairyājñīyaistarubhirvṛte | tatrāśramapadaṃ puṇyaṃ bhṛgūṇāmabhavatpurā
वह ऊँचे, समान और श्याम वर्ण के यज्ञोपयोगी वृक्षों से घिरा था। वहीं पूर्वकाल में भृगुओं का एक पवित्र आश्रम था।
श्लोक 11 (13.120.11)
उवास तत्र नियतः सुमित्रो नाम भार्गवः । यथोद्दिष्टेन पूर्वेषां भृगूणां साधुवर्त्मना ॥
uvāsa tatra niyataḥ sumitro nāma bhārgavaḥ | yathoddiṣṭena pūrveṣāṃ bhṛgūṇāṃ sādhuvartmanā
वहीं भार्गव सुमित्र संयमपूर्वक रहते थे और पूर्वज भृगुओं के बताए हुए सन्मार्ग का पालन करते थे।
श्लोक 12 (13.120.12)
तस्मा आङ्गिरसः कश्चिद्ददौ गां शर्करीं शुभाम् । वर्षासु पश्चिमे मासि पौर्णमास्यां शुचिव्रतः ॥
tasmā āṅgirasaḥ kaściddadau gāṃ śarkarīṃ śubhām | varṣāsu paścime māsi paurṇamāsyāṃ śucivrataḥ
अंगिरा के वंश के किसी व्रतशील पुरुष ने वर्षा ऋतु के अन्तिम मास की पूर्णिमा के दिन उन्हें शर्करी नाम की एक सुन्दर गाय दी।
श्लोक 13 (13.120.13)
स तां लब्ध्वा धर्मशीलश्चिन्तयामास तत्परः । सुमित्रः परया भक्त्या जननीमिव मातरम् ॥
sa tāṃ labdhvā dharmaśīlaścintayāmāsa tatparaḥ | sumitraḥ parayā bhaktyā jananīmiva mātaram
उसे पाकर धर्मशील सुमित्र ने एकाग्र होकर परम भक्ति से उसकी देखभाल की, मानो वह उनकी अपनी माता हो।
श्लोक 14 (13.120.14)
तेन सन्धुक्ष्यमाणा सा रोहिणी कामरूपिणी । प्रवृद्धिमगमच्छ्रेष्ठा प्राणतश्च सुदर्शना ॥
tena sandhukṣyamāṇā sā rohiṇī kāmarūpiṇī | pravṛddhimagamacchreṣṭhā prāṇataśca sudarśanā
उनके पोषण से वह कामरूपिणी लाल गाय बढ़ती गई; वह श्रेष्ठ, बलवती और देखने में सुन्दर थी।
श्लोक 15 (13.120.15)
सिराविमुक्तपार्श्वान्ता विपुलां कान्तिमुद्वहत् । श्यामपार्श्वान्तपृष्ठा सा सुरभिर्मधुपिङ्गला ॥
sirāvimuktapārśvāntā vipulāṃ kāntimudvahat | śyāmapārśvāntapṛṣṭhā sā surabhirmadhupiṅgalā
उसके पार्श्वों के किनारे नसों से रहित थे और वह बड़ी कान्ति धारण करती थी; पार्श्वों और पीठ के छोरों पर वह श्याम थी, सुगन्धित और मधु के समान पिंगल वर्ण की थी।
श्लोक 16 (13.120.16)
बृहती सूक्ष्मरोमान्ता रूपोदग्रा तनुत्वचा । कृष्णपुच्छा श्वेतवक्त्रा समवृत्तपयोधरा ॥
bṛhatī sūkṣmaromāntā rūpodagrā tanutvacā | kṛṣṇapucchā śvetavaktrā samavṛttapayodharā
वह विशाल थी, छोरों पर उसके रोम सूक्ष्म थे, वह रूप में उत्कृष्ट और पतली त्वचा वाली थी, उसकी पूँछ काली और मुख सफ़ेद था, तथा थन सम और गोल थे।
श्लोक 17 (13.120.17)
पृष्ठोन्नता पूर्वनता शङ्कुकर्णी सुलोचना । दीर्घजिह्वा ह्रस्वशृङ्गी सम्पूर्णदशनान्तरा ॥
pṛṣṭhonnatā pūrvanatā śaṅkukarṇī sulocanā | dīrghajihvā hrasvaśṛṅgī sampūrṇadaśanāntarā
उसकी पीठ ऊँची और आगे का भाग नीचा था; कान खूँटी की तरह नुकीले और आँखें सुन्दर थीं; जीभ लम्बी, सींग छोटे और दाँतों की पंक्ति पूरी थी।
श्लोक 18 (13.120.18)
मांसाधिकगलान्ता सा प्रसन्ना शुभदर्शना । नित्यं शमयुता स्निग्धा सम्पूर्णोदात्तनिस्वना ॥
māṃsādhikagalāntā sā prasannā śubhadarśanā | nityaṃ śamayutā snigdhā sampūrṇodāttanisvanā
उसकी गर्दन का छोर मांसल था; वह प्रसन्न और देखने में शुभ थी, सदा शान्त और चिकनी काया वाली थी, और उसकी वाणी पूर्ण तथा गम्भीर थी।
श्लोक 19 (13.120.19)
प्राजापत्यैर्गवां नित्यं प्रशस्तैर्लक्षणैर्युता । यौवनस्थेव वनिता शुशुभे रूपशोभया ॥
prājāpatyairgavāṃ nityaṃ praśastairlakṣaṇairyutā | yauvanastheva vanitā śuśubhe rūpaśobhayā
प्रजापति की गायों के सदा प्रशंसित लक्षणों से युक्त वह अपने रूप की शोभा से यौवन में स्थित युवती-सी दमकती थी।
श्लोक 20 (13.120.20)
वृषेणोपगता सा तु कल्या मधुरदर्शना । मिथुनं जनयामास तुल्यरूपमिवात्मनः ॥
vṛṣeṇopagatā sā tu kalyā madhuradarśanā | mithunaṃ janayāmāsa tulyarūpamivātmanaḥ
बैल से संयोग पाकर उस स्वस्थ और मधुर दर्शन वाली गाय ने अपने ही रूप के-से एक जोड़े को जन्म दिया, एक बछड़ा और एक बछिया।
श्लोक 21 (13.120.21)
संवर्धयामास स तां सवत्सां भार्गवो मुनिः । तयोः प्रजाधिसंसर्गात्सहस्रं च गवामभूत् ॥
saṃvardhayāmāsa sa tāṃ savatsāṃ bhārgavo muniḥ | tayoḥ prajādhisaṃsargātsahasraṃ ca gavāmabhūt
भार्गव मुनि ने उसे बछड़े सहित पाला, और उन दोनों की सन्तानों से उनके पास एक हज़ार गायें हो गईं।
श्लोक 22 (13.120.22)
गवां जातिसहस्राणि सम्भूतानि परस्परम् । ऋषभाणां च राजेन्द्र नैवान्तः प्रतिदृश्यते ॥
gavāṃ jātisahasrāṇi sambhūtāni parasparam | ṛṣabhāṇāṃ ca rājendra naivāntaḥ pratidṛśyate
हे राजेन्द्र, गायों की हज़ारों जातियाँ एक-दूसरे से उत्पन्न होती गईं, और साँड़ों का तो कोई अन्त ही नहीं दिखाई देता था।
श्लोक 23 (13.120.23)
तैराश्रमपदं रम्यमरण्यं चैव सर्वशः । समाकुलं समभवन्मेघैरिव नभस्थलम् ॥
tairāśramapadaṃ ramyamaraṇyaṃ caiva sarvaśaḥ | samākulaṃ samabhavanmeghairiva nabhasthalam
उनसे वह रमणीय आश्रम और सारा वन सब ओर ऐसा भर गया, जैसे बादलों से आकाश भर जाता है।
श्लोक 24 (13.120.24)
कानि चित्पद्मवर्णानि किंशुकाभानि कानिचित् । रुक्मवर्णानि चान्यानि चन्द्रांशुसदृशानि च ॥
kāni citpadmavarṇāni kiṃśukābhāni kānicit | rukmavarṇāni cānyāni candrāṃśusadṛśāni ca
कोई कमल के रंग की थीं, कोई किंशुक के फूल-सी दमकती थीं; कुछ सोने के रंग की थीं और कुछ चन्द्रकिरणों जैसी उजली।
श्लोक 25 (13.120.25)
तथा राजतवर्णानि कानिचिल्लोहितानि वै । नीललोहितताम्राणि कृष्णानि कपिलानि च । नानारागविचित्राणि यूथानि कुलयूथप ॥
tathā rājatavarṇāni kānicillohitāni vai | nīlalohitatāmrāṇi kṛṣṇāni kapilāni ca | nānārāgavicitrāṇi yūthāni kulayūthapa
कुछ चाँदी के रंग की थीं, कुछ लाल, कुछ नीललोहित या ताँबे के रंग की, और कुछ काली या कपिल। हे कुल के अधिपति, वे अनेक रंगों से विचित्र झुण्ड थे।
श्लोक 26 (13.120.26)
न च क्षीरं सुतस्नेहाद्वत्सानामुपजीवति । भार्गवः केवलं चासीद्गवां प्राणायने रतः ॥
na ca kṣīraṃ sutasnehādvatsānāmupajīvati | bhārgavaḥ kevalaṃ cāsīdgavāṃ prāṇāyane rataḥ
बछड़ों के प्रति स्नेह के कारण वे गायों के दूध पर निर्वाह नहीं करते थे; भार्गव केवल गायों के प्राणों की रक्षा में ही लगे रहते थे।
श्लोक 27 (13.120.27)
तथा शुश्रूषतस्तस्य गवां हितमवेक्षतः । व्यतीयात्सुमहान्कालो वत्सोच्छिष्टेन वर्ततः ॥
tathā śuśrūṣatastasya gavāṃ hitamavekṣataḥ | vyatīyātsumahānkālo vatsocchiṣṭena vartataḥ
इस प्रकार गायों की सेवा करते और उनके हित का ध्यान रखते हुए उनका बहुत लम्बा समय बीत गया, जिसमें वे बछड़ों के छोड़े हुए अंश पर ही निर्वाह करते रहे।
श्लोक 28 (13.120.28)
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तः सततं प्रस्रवं गवाम् । वत्सैरुच्छिष्टमुदितं बहुक्षीरतया बहु ॥
kṣutpipāsāpariśrāntaḥ satataṃ prasravaṃ gavām | vatsairucchiṣṭamuditaṃ bahukṣīratayā bahu
भूख-प्यास से थके हुए वे निरन्तर गायों के उस बहते दूध के पास जाते थे जिसे बछड़े छोड़ देते थे और जो गायों के बहुत दूध देने के कारण बहुत अधिक होता था,
श्लोक 29 (13.120.29)
पीतवांस्तेन नामास्य फेनपेत्यभिविश्रुतम् । गौतमस्याभिनिष्पन्नमेवं नाम युधिष्ठिर ॥
pītavāṃstena nāmāsya phenapetyabhiviśrutam | gautamasyābhiniṣpannamevaṃ nāma yudhiṣṭhira
और उसे पीते थे। इसी कारण वे फेनप (झाग पीनेवाले) नाम से प्रसिद्ध हुए। हे युधिष्ठिर, इस प्रकार गौतम को यह नाम प्राप्त हुआ।