अनुशासन पर्व · अध्याय 121
गायों का सुमित्र के वध का निश्चय
गोलोक की गायें स्त्रियों का रूप धरकर एक सरोवर में क्रीड़ा कर रही थीं कि सुमित्र की गायों ने उन्हें देखा। उन्होंने बताया कि गोलोक पहुँचने का उपाय राजा रन्तिदेव के हज़ार वर्ष के यज्ञ में पशु बनना है। चूँकि उनके स्वामी उन्हें कभी नहीं देंगे, कपिला गायों ने सुमित्र का वध करने का निश्चय किया, और दूसरी गायों ने उन्हें सब गायों में श्रेष्ठता का वचन दिया।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.121.1)
कदाचित्कामरूपिण्यो गावः स्त्रीवेषमाश्रिताः । ह्रदे क्रीडन्ति संहृष्टा गायन्त्यः पुण्यलक्षणाः ॥
kadācitkāmarūpiṇyo gāvaḥ strīveṣamāśritāḥ | hrade krīḍanti saṃhṛṣṭā gāyantyaḥ puṇyalakṣaṇāḥ
एक बार कामरूपिणी गायें स्त्रियों का रूप धारण करके एक सरोवर में आनन्द से खेल रही थीं और गा रही थीं; वे शुभ लक्षणों से युक्त थीं।
श्लोक 2 (13.121.2)
ददृशुस्तस्य गावो वै विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । ऊचुश्च का यूयमिति स्त्रियो मानुषया गिरा ॥
dadṛśustasya gāvo vai vismayotphullalocanāḥ | ūcuśca kā yūyamiti striyo mānuṣayā girā
उनकी गायों ने उन्हें देखा; आश्चर्य से उनकी आँखें फैल गईं, और उन्होंने मनुष्य की वाणी में उन स्त्रियों से पूछा, "तुम कौन हो?"
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 3 (13.121.3)
गाव एव वयं सर्वकर्मभिः शोभनैर्युताः । सर्वाः स्त्रीवेषधारिण्यो यथाकामं चरामहे ॥
gāva eva vayaṃ sarvakarmabhiḥ śobhanairyutāḥ | sarvāḥ strīveṣadhāriṇyo yathākāmaṃ carāmahe
हम सब गायें ही हैं, शुभ कर्मों से युक्त। हम सबने स्त्री का वेष धारण किया है और अपनी इच्छा के अनुसार विचरती हैं।
गाव ऊचुः
श्लोक 4 (13.121.4)
गवां गावः परं दैवं गवां गावः परा गतिः । कथयध्वमिहास्माकं केन वः सुकृतां गतिः ॥
gavāṃ gāvaḥ paraṃ daivaṃ gavāṃ gāvaḥ parā gatiḥ | kathayadhvamihāsmākaṃ kena vaḥ sukṛtāṃ gatiḥ
गायों के लिए गायें ही परम देवता हैं, गायों के लिए गायें ही परम गति हैं। हमें यहाँ बताओ कि तुम पुण्यकर्म करनेवालियों ने किस उपाय से यह गति पाई।
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 5 (13.121.5)
अस्माकं हविषा देवा ब्राह्मणास्तर्पितास्तथा । कव्येन पितरश्चैव हव्येनाग्निश्च तर्पितः ॥
asmākaṃ haviṣā devā brāhmaṇāstarpitāstathā | kavyena pitaraścaiva havyenāgniśca tarpitaḥ
हमारे हविष्य से देवता और ब्राह्मण तृप्त हुए; कव्य से पितर और हव्य से अग्नि तृप्त हुआ।
श्लोक 6 (13.121.6)
प्रजया च तथाऽस्माकं कृषिरभ्युद्धृता सदा । शकटैश्चापि संयुक्ता दशवाहशतेन वै ॥
prajayā ca tathā'smākaṃ kṛṣirabhyuddhṛtā sadā | śakaṭaiścāpi saṃyuktā daśavāhaśatena vai
हमारी सन्तानों से खेती सदा चलती रही, और दस-दस के सौ जोड़ों से गाड़ियाँ भी जुती रहीं।
श्लोक 7 (13.121.7)
तदेतैः सुकृतैः स्फीतैर्वयं याश्चैव नः प्रजाः । गोलोकमनुसम्प्राप्ता यः परं कामगोचरः ॥
tadetaiḥ sukṛtaiḥ sphītairvayaṃ yāścaiva naḥ prajāḥ | golokamanusamprāptā yaḥ paraṃ kāmagocaraḥ
इन्हीं प्रचुर पुण्य कर्मों से हम और हमारी सन्तानें गोलोक को प्राप्त हुई हैं, जो परम धाम है और जहाँ सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
श्लोक 8 (13.121.8)
यूयं तु सर्वा रोहिण्यः सप्रजाः सहपुङ्गवाः । अधोगामिन्य इत्येव पश्यामो दिव्यचक्षुषा ॥
yūyaṃ tu sarvā rohiṇyaḥ saprajāḥ sahapuṅgavāḥ | adhogāminya ityeva paśyāmo divyacakṣuṣā
परन्तु तुम सब लाल गायें, अपनी सन्तानों और साँड़ों सहित, नीचे की ओर जानेवाली हो — ऐसा हम दिव्य दृष्टि से देखती हैं।
गाव ऊचुः
श्लोक 9 (13.121.9)
एवं गवां परं दैवं गाव एव परायणम् । स्वपक्ष्यास्तारणीया वः शरणाय गता वयम् ॥
evaṃ gavāṃ paraṃ daivaṃ gāva eva parāyaṇam | svapakṣyāstāraṇīyā vaḥ śaraṇāya gatā vayam
ऐसा ही है: गायों के लिए गायें ही परम देवता और परम आश्रय हैं। अपने पक्ष की गायों का तुम्हें उद्धार करना चाहिए; हम तुम्हारी शरण में आई हैं।
श्लोक 10 (13.121.10)
किमस्माभिः करणीयं वर्तितव्यं कथञ्चन । प्राप्नुयाम च गोलोकं भवाम न च गर्हिताः ॥
kimasmābhiḥ karaṇīyaṃ vartitavyaṃ kathañcana | prāpnuyāma ca golokaṃ bhavāma na ca garhitāḥ
हमें क्या करना चाहिए और कैसे रहना चाहिए, जिससे हम गोलोक पा सकें और निन्दा की पात्र न बनें?
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 11 (13.121.11)
वर्तते रन्तिदेवस्य सत्रं वर्षसहस्रकम् । तत्र तस्य नृपस्याशु पशुत्वमुपगच्छत ॥
vartate rantidevasya satraṃ varṣasahasrakam | tatra tasya nṛpasyāśu paśutvamupagacchata
राजा रन्तिदेव का हज़ार वर्ष लम्बा यज्ञ चल रहा है। वहाँ शीघ्र उस राजा के पास पशु-भाव में जाओ।
श्लोक 12 (13.121.12)
ततस्तस्योपयोगेन पशुत्वे यज्ञसंस्कृताः । गोलोकान्प्राप्स्यथ शुभांस्तेन पुण्येन संयुताः ॥
tatastasyopayogena paśutve yajñasaṃskṛtāḥ | golokānprāpsyatha śubhāṃstena puṇyena saṃyutāḥ
तब उसके उपयोग में आकर, पशु-भाव में यज्ञ से संस्कारित होकर, उस पुण्य से युक्त तुम शुभ गोलोकों को प्राप्त करोगी।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (13.121.13)
एतत्तासां वचः श्रुत्वा गवां संहृष्टमानसाः । गमनाय मनश्चक्रुरौत्सुक्यं चागमन्परम् ॥
etattāsāṃ vacaḥ śrutvā gavāṃ saṃhṛṣṭamānasāḥ | gamanāya manaścakrurautsukyaṃ cāgamanparam
उनकी यह बात सुनकर गायों का मन प्रसन्न हो गया; उन्होंने जाने का निश्चय कर लिया और उनकी उत्सुकता बहुत बढ़ गई।
गाव ऊचुः
श्लोक 14 (13.121.14)
न हि नो भार्गवो दाता पशुत्वेनोपयोजनम् । यज्ञस्तस्य नरेन्द्रस्य वर्तते धर्मतस्तथा ॥
na hi no bhārgavo dātā paśutvenopayojanam | yajñastasya narendrasya vartate dharmatastathā
हमारे स्वामी भार्गव हमें पशु के रूप में उपयोग के लिए नहीं देंगे; और उस राजा का यज्ञ धर्मपूर्वक चल रहा है।
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (13.121.15)
वयं न चाननुज्ञाताः शक्ता गन्तुं कथञ्चन । अवोचन्नथ तत्रत्या भार्गवो वध्यतामयम् ॥
vayaṃ na cānanujñātāḥ śaktā gantuṃ kathañcana | avocannatha tatratyā bhārgavo vadhyatāmayam
और उनकी आज्ञा के बिना हम किसी प्रकार जा नहीं सकतीं। तब वहाँ की गायों ने कहा, "इस भार्गव का वध कर दिया जाए।"
गाव ऊचुः
श्लोक 16 (13.121.16)
एतत्सर्वा रोचयत न हि शक्यमतोऽन्यथा । लोकान्प्राप्तुं सहास्माभिर्निश्चयः क्रियतामयम् ॥
etatsarvā rocayata na hi śakyamato'nyathā | lokānprāptuṃ sahāsmābhirniścayaḥ kriyatāmayam
तुम सब इससे सहमत हो जाओ; दूसरे किसी प्रकार हम साथ मिलकर उन लोकों को नहीं पा सकतीं। यही निश्चय किया जाए।
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (13.121.17)
न तु तासां समेतानां काचिद्धोरेण चक्षुषा । शक्नोति भार्गवं द्रष्टुं सत्कृतेनोपसंयुता ॥
na tu tāsāṃ sametānāṃ kāciddhoreṇa cakṣuṣā | śaknoti bhārgavaṃ draṣṭuṃ satkṛtenopasaṃyutā
परन्तु एकत्र होने पर भी उनमें से कोई उग्र दृष्टि से भार्गव की ओर देख नहीं सकती थी, क्योंकि वे उनसे पाए हुए सत्कार से बँधी हुई थीं।
श्लोक 18 (13.121.18)
अथ पद्मसवर्णाभा भास्करांशुसमप्रभाः । जपालोहितताम्राक्ष्यो निर्मांसकठिनाननाः ॥
atha padmasavarṇābhā bhāskarāṃśusamaprabhāḥ | japālohitatāmrākṣyo nirmāṃsakaṭhinānanāḥ
तब कमल के-से रंग की, सूर्य की किरणों के समान प्रभावाली, जपा-पुष्प के समान लाल-ताँबई आँखों वाली, मांसरहित और कठोर मुखों वाली,
श्लोक 19 (13.121.19)
रोहिण्यः कपिलाः प्राहुः सर्वासां वै समक्षतः । मेघस्तनितनिर्घोषास्तेजोभिरभिरञ्चिताः ॥
rohiṇyaḥ kapilāḥ prāhuḥ sarvāsāṃ vai samakṣataḥ | meghastanitanirghoṣāstejobhirabhirañcitāḥ
बादलों की गर्जना-जैसी ध्वनि वाली और तेज से दीप्त रोहिणी कपिला गायें सबके सामने बोलीं।
कपिला ऊचुः
श्लोक 20 (13.121.20)
वयं हि तं वधिष्यामः सुमित्रं नात्र संशयः । सुकृतं पृष्ठतः कृत्वा किं नः श्रेयो विधास्यथ ॥
vayaṃ hi taṃ vadhiṣyāmaḥ sumitraṃ nātra saṃśayaḥ | sukṛtaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā kiṃ naḥ śreyo vidhāsyatha
"हम उस सुमित्र का वध करेंगी, इसमें कोई संशय नहीं। उसके उपकार को पीछे रखकर तुम हमारा कौन-सा कल्याण करोगी?"
गाव ऊचुः
श्लोक 21 (13.121.21)
कपिलाः सर्ववर्णेषु प्रधानत्वमवाप्स्यथ । गवां शतफला चैकां दत्त्वा फलमवाप्स्यति ॥
kapilāḥ sarvavarṇeṣu pradhānatvamavāpsyatha | gavāṃ śataphalā caikāṃ dattvā phalamavāpsyati
"तुम कपिला गायें सब रंगों में श्रेष्ठता पाओगी, और जो तुममें से एक को भी दान देगा, वह सौ गायों के फल को प्राप्त करेगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 22 (13.121.22)
एतद्गवां वचः श्रुत्वा कपिला हृष्टमानसाः । चक्रुः सर्वा भार्गवस्य सुमित्रस्य वधे मतिम् ॥
etadgavāṃ vacaḥ śrutvā kapilā hṛṣṭamānasāḥ | cakruḥ sarvā bhārgavasya sumitrasya vadhe matim
गायों की यह बात सुनकर कपिला गायें प्रसन्न मन से सब मिलकर भार्गव सुमित्र के वध का निश्चय कर बैठीं।