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अनुशासन पर्व · अध्याय 122

सुमित्र का गोलोक जाना

कृतज्ञ गोमाताएँ सुमित्र के पास आती हैं, उनकी प्रशंसा करती हैं और वर देना चाहती हैं। वे केवल गायों में स्थायी भक्ति तथा गोहत्यारों और ब्राह्मण-द्रोहियों के विनाश का वर माँगते हैं, और अपनी गायों को छोड़कर जाने से इनकार करते हैं। गोमाताएँ उन्हें आकाश में उठा ले जाती हैं और योग से उनके प्राण खींच लेती हैं, शरीर वहीं छूट जाता है, और वे उन्हें कपिला गायों की योजना बता देती हैं। फिर कपिला गायें उनके शरीर को सींगों और खुरों से चूर कर देती हैं, और गोमाताएँ पृथ्वी की गायों को शाप देती हैं।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.122.1)

यास्तु गोमातरस्तस्य कामचारिण्य आगताः । समीपं हि सुमित्रस्य कृतज्ञाः समुपस्थिताः ॥

yāstu gomātarastasya kāmacāriṇya āgatāḥ | samīpaṃ hi sumitrasya kṛtajñāḥ samupasthitāḥ

परन्तु जो गोमाताएँ इच्छानुसार विचरनेवाली और कृतज्ञ थीं, वे आकर सुमित्र के समीप खड़ी हुईं।

श्लोक 2 (13.122.2)

अभिप्रशस्य चैवाहुस्तमृषिं पुण्यदर्शनाः । गोलोकादागता वेद वृषगोमातरो वयम् ॥

abhipraśasya caivāhustamṛṣiṃ puṇyadarśanāḥ | golokādāgatā veda vṛṣagomātaro vayam

उन पुण्य दर्शनवाली गायों ने उस ऋषि की प्रशंसा करके कहा, "जान लो कि हम गोलोक से आई हैं; हम बैलों और गायों की माताएँ हैं।

गोमातर ऊचुः

श्लोक 3 (13.122.3)

सुप्रीताः स्म वरं गृह्ण यमिच्छसि महामुने । यद्धि गोषु परां बुद्धिं कृतवानसि नित्यदा ॥

suprītāḥ sma varaṃ gṛhṇa yamicchasi mahāmune | yaddhi goṣu parāṃ buddhiṃ kṛtavānasi nityadā

हे महामुने, हम तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हैं; जो वर चाहो माँग लो, क्योंकि तुमने सदा गायों में परम बुद्धि लगाई है।"

सुमित्र उवाच

श्लोक 4 (13.122.4)

प्रीतोस्म्यनुगृहीतोस्मि यन्मां गोमातरः शुभाः । सुप्रीतमनसः सर्वास्तिष्ठन्ते च वरप्रदाः ॥

prītosmyanugṛhītosmi yanmāṃ gomātaraḥ śubhāḥ | suprītamanasaḥ sarvāstiṣṭhante ca varapradāḥ

मैं प्रसन्न हूँ और अनुगृहीत हूँ, क्योंकि आप शुभ गोमाताएँ प्रसन्न मन से सब यहाँ वर देने को उपस्थित हैं।

श्लोक 5 (13.122.5)

भवेद्गोष्वेव मे भक्तिर्यथैवाद्य तथा सदा । गोघ्नाश्चैवावसीदन्तु नरा ब्रह्मद्विषश्च ये ॥

bhavedgoṣveva me bhaktiryathaivādya tathā sadā | goghnāścaivāvasīdantu narā brahmadviṣaśca ye

मेरी भक्ति गायों में ही बनी रहे, जैसी आज है वैसी सदा रहे। और जो गोहत्यारे हैं तथा जो मनुष्य ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं, वे दुःख में डूब जाएँ।

गोमातर ऊचुः

श्लोक 6 (13.122.6)

एवमेतदृषिश्रेष्ठ हितं वदसि नः प्रियम् । एहि गच्छ सहाऽस्माभिर्गोलोकमृषिसत्तम ॥

evametadṛṣiśreṣṭha hitaṃ vadasi naḥ priyam | ehi gaccha sahā'smābhirgolokamṛṣisattama

ऐसा ही हो, ऋषिश्रेष्ठ; तुम हमारे लिए हितकर और प्रिय बात कहते हो। आओ, ऋषिसत्तम, हमारे साथ गोलोक चलो।

सुमित्र उवाच

श्लोक 7 (13.122.7)

यूयमिष्टां गतिं यान्तु न ह्यहं गन्तुमुत्सहे । इमा गावः समुत्सृज्य तपस्विन्यो मम प्रियाः ॥

yūyamiṣṭāṃ gatiṃ yāntu na hyahaṃ gantumutsahe | imā gāvaḥ samutsṛjya tapasvinyo mama priyāḥ

आप अपनी इष्ट गति को जाइए; मैं इन गायों को, अपनी प्रिय तपस्विनी गायों को छोड़कर जाने का साहस नहीं कर सकता।

भीष्म उवाच

श्लोक 8 (13.122.8)

तास्तु तस्य वचः श्रुत्वा कपिलानां सुदारुणम् । निन्युस्तमृषिमुत्क्षिप्य भार्गवं नभ उद्वहन् ॥

tāstu tasya vacaḥ śrutvā kapilānāṃ sudāruṇam | ninyustamṛṣimutkṣipya bhārgavaṃ nabha udvahan

उसका वचन और कपिला गायों का वह भयंकर निश्चय सुनकर वे उस भार्गव ऋषि को उठाकर आकाश में ले चलीं।

श्लोक 9 (13.122.9)

कलेवरं तु तत्रैव तस्य संन्यस्य मातरः । निष्कृष्य करणं योगादानयन्भार्गवस्य वै ॥

kalevaraṃ tu tatraiva tasya saṃnyasya mātaraḥ | niṣkṛṣya karaṇaṃ yogādānayanbhārgavasya vai

माताओं ने उनके शरीर को वहीं छोड़ दिया और योग के बल से भार्गव के अन्तःकरण को खींचकर उसे ले चलीं।

श्लोक 10 (13.122.10)

सर्वं चास्य तदाचख्युः कपिलानां विचेष्टितम् । यदर्थं हरणं गोभिर्गोलोकं लोकमातरः ॥

sarvaṃ cāsya tadācakhyuḥ kapilānāṃ viceṣṭitam | yadarthaṃ haraṇaṃ gobhirgolokaṃ lokamātaraḥ

उन्होंने उन्हें कपिला गायों का सारा कर्म बता दिया, और यह भी कि लोकमाता गायें उन्हें किसलिए गोलोक ले जा रही थीं।

श्लोक 11 (13.122.11)

ततस्तु कपिलास्तत्र तस्य दृष्ट्वा कलेवरम् । यथाप्रतिज्ञं शृङ्गैश्च खुरैश्चाप्यवचूर्णयन् ॥

tatastu kapilāstatra tasya dṛṣṭvā kalevaram | yathāpratijñaṃ śṛṅgaiśca khuraiścāpyavacūrṇayan

तब कपिला गायों ने वहाँ उनका शरीर देखकर अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उसे सींगों और खुरों से चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 12 (13.122.12)

ततः संछिद्य बहुधा भार्गवं नृपसत्तम । ययुर्यत्रेतरा गावस्तच्च सर्वं न्यवेदयन् ॥

tataḥ saṃchidya bahudhā bhārgavaṃ nṛpasattama | yayuryatretarā gāvastacca sarvaṃ nyavedayan

हे नृपश्रेष्ठ, भार्गव के अनेक टुकड़े करके वे वहाँ गईं जहाँ दूसरी गायें थीं और यह सब उन्हें बता दिया।

श्लोक 13 (13.122.13)

अथ गोमातृभिः शप्तास्ता गावः पृथिवीचराः । अमेध्यवदनाः क्षिप्रं भवध्वं ब्रह्मघातकाः ॥

atha gomātṛbhiḥ śaptāstā gāvaḥ pṛthivīcarāḥ | amedhyavadanāḥ kṣipraṃ bhavadhvaṃ brahmaghātakāḥ

तब गोमाताओं ने उन पृथ्वी पर विचरनेवाली गायों को शाप दिया, "तुम शीघ्र ही अपवित्र मुखवाली और ब्रह्महत्यारी हो जाओ!"

श्लोक 14 (13.122.14)

एवं कृतज्ञा गावो हि यथा गोमातरो नृप । ऋषिश्च प्राप्तवाँल्लोकं गावश्च परिमोक्षिताः ॥

evaṃ kṛtajñā gāvo hi yathā gomātaro nṛpa | ṛṣiśca prāptavām̐llokaṃ gāvaśca parimokṣitāḥ

हे राजन्, इस प्रकार गायें कृतज्ञ होती हैं, जैसी गोमाताएँ थीं। ऋषि को उत्तम लोक प्राप्त हुआ और गायें मुक्त हो गईं।

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