अनुशासन पर्व · अध्याय 123
रन्तिदेव का गो-यज्ञ
गायें राजा रन्तिदेव के यज्ञ में जाकर पशु-रूप में अर्पित होने की प्रार्थना करती हैं। रन्तिदेव उनके वध से डरते हैं, पर एक शर्त पर मान जाते हैं: यदि कभी एक भी गाय अनिच्छुक हुई तो यज्ञ समाप्त हो जाएगा। कई वर्षों तक प्रतिदिन हज़ारों गायें मारी जाती हैं, और उनके चर्मों के ढेर पर्वत बन जाते हैं, जिनसे चर्मण्वती नदी बहती है। अन्त में एक माता गाय अपने बछड़े को पुकारकर रोती है, राजा सुन लेते हैं और यज्ञ रोक देते हैं; मारी गई गायें गोलोक पहुँचती हैं और रन्तिदेव स्वर्ग जाते हैं। भीष्म युधिष्ठिर से गायों की पूजा और उनके दान का आग्रह करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.123.1)
ता गावो रन्तिदेवस्य गत्वा यज्ञं मनीषिणः । आत्मानं ज्ञापयामासुर्महर्षीणां समक्षतः ॥
tā gāvo rantidevasya gatvā yajñaṃ manīṣiṇaḥ | ātmānaṃ jñāpayāmāsurmaharṣīṇāṃ samakṣataḥ
वे बुद्धिमती गायें रन्तिदेव के यज्ञ में गईं और महर्षियों के सामने उन्हें अपना परिचय दिया।
श्लोक 2 (13.123.2)
रन्तिदेवस्ततो राजा प्रयतः प्राञ्जलिः शुचिः । उवाच गावः प्रणतः किमागमनमित्यपि ॥
rantidevastato rājā prayataḥ prāñjaliḥ śuciḥ | uvāca gāvaḥ praṇataḥ kimāgamanamityapi
तब राजा रन्तिदेव ने शुद्ध और संयत होकर हाथ जोड़कर प्रणाम किया और गायों से पूछा, "आप किसलिए आई हैं?"
गाव ऊचुः
श्लोक 3 (13.123.3)
इच्छामस्तव राजेन्द्र सत्रेऽस्मिन्विनियोजनम् । पशुत्वमुपसम्प्राप्तुं प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
icchāmastava rājendra satre'sminviniyojanam | paśutvamupasamprāptuṃ prasādaṃ kartumarhasi
हे राजेन्द्र, हम आपके इस यज्ञ में नियुक्त होना चाहती हैं। आप कृपा करके हमें पशु-रूप में स्वीकार कीजिए।
रन्तिदेव उवाच
श्लोक 4 (13.123.4)
नास्मि शक्तो गवां घातं कर्तुं शतसहस्रशः । घातयित्वा त्वहं युष्मान्कथमात्मानमुत्तरे ॥
nāsmi śakto gavāṃ ghātaṃ kartuṃ śatasahasraśaḥ | ghātayitvā tvahaṃ yuṣmānkathamātmānamuttare
मैं लाखों गायों का वध करने में समर्थ नहीं हूँ। आप सबको मरवाकर मैं अपना उद्धार कैसे करूँगा?
श्लोक 5 (13.123.5)
यः पशुत्वेन संयोज्य युष्मान्स्वर्गं नयेदिह । आत्मानं चैव तपसा गावः समुपगम्यताम् ॥
yaḥ paśutvena saṃyojya yuṣmānsvargaṃ nayediha | ātmānaṃ caiva tapasā gāvaḥ samupagamyatām
जो यहाँ आपको पशु बनाकर स्वर्ग पहुँचा सके और अपने को भी तप से तार सके, हे गायो, आप उसी के पास जाइए।
गाव ऊचुः
श्लोक 6 (13.123.6)
अस्माकं तारणे युक्तो धर्मात्मा तपसि स्थितः । श्रुतोऽस्माभिर्भवान्राजंस्ततस्तु स्वयमागताः ॥
asmākaṃ tāraṇe yukto dharmātmā tapasi sthitaḥ | śruto'smābhirbhavānrājaṃstatastu svayamāgatāḥ
आप हमारे उद्धार में लगे हुए हैं, धर्मात्मा हैं और तप में स्थित हैं। हे राजन्, हमने आपके विषय में सुना था, इसलिए हम स्वयं आई हैं।
रन्तिदेव उवाच
श्लोक 7 (13.123.7)
मम सत्रे पशुत्वं वो यद्येवं हि मनीषितम् । समयेनाहमेतेन जुहुयां वो हुताशने ॥
mama satre paśutvaṃ vo yadyevaṃ hi manīṣitam | samayenāhametena juhuyāṃ vo hutāśane
यदि तुम सब यही चाहती हो कि मेरे यज्ञ में पशु बनो, तो मैं इस शर्त पर तुम्हें अग्नि में आहुति दूँगा:
श्लोक 8 (13.123.8)
कदाचिद्यदि वः काचिदकामा विनियुज्यते । तदा समाप्तिः सत्रस्य गवां स्यादिति नैष्ठिकी ॥
kadācidyadi vaḥ kācidakāmā viniyujyate | tadā samāptiḥ satrasya gavāṃ syāditi naiṣṭhikī
यदि कभी तुममें से किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध नियुक्त किया जाएगा, तो उसी समय गायों का यह यज्ञ समाप्त हो जाएगा। यह मेरा अटल निश्चय है।
गाव ऊचुः
श्लोक 9 (13.123.9)
एवमस्तु महाराज यथा त्वं प्रब्रवीषि नः । अकामाः स्युर्यदा गावस्तदा सत्रं समाप्यताम् ॥
evamastu mahārāja yathā tvaṃ prabravīṣi naḥ | akāmāḥ syuryadā gāvastadā satraṃ samāpyatām
ऐसा ही हो, महाराज, जैसा आप हमसे कहते हैं। जब गायें अनिच्छुक हो जाएँ, तब यज्ञ समाप्त कर दिया जाए।
भीष्म उवाच
श्लोक 10 (13.123.10)
ततः प्रवृत्ते गोसत्रे रन्तिदेवस्य धीमतः । गोसहस्राण्यहरहर्नियुज्यन्ते शमीतृभिः ॥
tataḥ pravṛtte gosatre rantidevasya dhīmataḥ | gosahasrāṇyaharaharniyujyante śamītṛbhiḥ
तब बुद्धिमान रन्तिदेव का गो-यज्ञ आरम्भ होने पर प्रतिदिन हज़ारों गायें वध करनेवालों को सौंपी जाने लगीं।
श्लोक 11 (13.123.11)
एवं बहूनि वर्षाणि व्यतीतानि नराधिप । गवां वै वध्यमानानां न चान्तः प्रत्यदृश्यत ॥
evaṃ bahūni varṣāṇi vyatītāni narādhipa | gavāṃ vai vadhyamānānāṃ na cāntaḥ pratyadṛśyata
हे नराधिप, इस प्रकार बहुत वर्ष बीत गए, और मारी जा रही गायों का कोई अन्त दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 12 (13.123.12)
गवां चर्मसहस्रैस्तु राशयः पर्वतोपमाः । बभूवुः कुरुशार्दूल बहुधा मेघसंनिभाः ॥
gavāṃ carmasahasraistu rāśayaḥ parvatopamāḥ | babhūvuḥ kuruśārdūla bahudhā meghasaṃnibhāḥ
हे कुरुशार्दूल, हज़ारों गायों के चर्मों से पर्वत के समान ढेर लग गए, जो जगह-जगह बादलों के समूह-जैसे दिखते थे।
श्लोक 13 (13.123.13)
मेदःक्लेदवहा चैव प्रावर्तत महानदी । अद्यापि भुवि विख्याता नदी चर्मण्वती शुभा ॥
medaḥkledavahā caiva prāvartata mahānadī | adyāpi bhuvi vikhyātā nadī carmaṇvatī śubhā
उनसे चर्बी और गीलेपन को बहाती हुई एक महानदी निकल पड़ी; वही सुन्दर चर्मण्वती नदी आज भी पृथ्वी पर प्रसिद्ध है।
श्लोक 14 (13.123.14)
ततः कदाचित्स्वं वत्सं गौरुपामन्त्र्य दुःखिता । एहि वत्स स्तनं पाहि मा त्वं पश्चात्क्षुदार्दितः ॥
tataḥ kadācitsvaṃ vatsaṃ gaurupāmantrya duḥkhitā | ehi vatsa stanaṃ pāhi mā tvaṃ paścātkṣudārditaḥ
तब एक दिन एक दुःखी गाय ने अपने बछड़े को पुकारकर कहा, "आ बेटा, मेरे थन से दूध पी ले, कहीं बाद में भूख तुझे न सताए।
गौरुवाच
श्लोक 15 (13.123.15)
तप्स्यसे विमना दुःखं घातितायां मयि ध्रुवम् । एते ह्यायान्ति चण्डालाः सशस्त्रा मां जिघांसवः ॥
tapsyase vimanā duḥkhaṃ ghātitāyāṃ mayi dhruvam | ete hyāyānti caṇḍālāḥ saśastrā māṃ jighāṃsavaḥ
जब मुझे मार डाला जाएगा, तब तू निश्चय ही उदास होकर दुःख पाएगा। देख, ये हथियार लिए हुए चाण्डाल मुझे मारने की इच्छा से आ रहे हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 16 (13.123.16)
अथ शुश्राव तां वाणीं मानुषीं समुदाहृताम् । रन्तिदेवो महाराज ततस्तां समवारयत् ॥
atha śuśrāva tāṃ vāṇīṃ mānuṣīṃ samudāhṛtām | rantidevo mahārāja tatastāṃ samavārayat
हे महाराज, तब रन्तिदेव ने मनुष्य की वाणी में कही गई वह बात सुनी और उस गाय को वध से रोक लिया।
श्लोक 17 (13.123.17)
स्थापयामास गोसत्रमथ तं पार्थिवर्षभ । सत्रोत्सृष्टाः परित्यक्ता गावोऽन्याः समुपाश्रिताः ॥
sthāpayāmāsa gosatramatha taṃ pārthivarṣabha | satrotsṛṣṭāḥ parityaktā gāvo'nyāḥ samupāśritāḥ
हे पार्थिवश्रेष्ठ, तब उन्होंने गो-यज्ञ को रोक दिया। यज्ञ से छोड़ी गई और मुक्त की गई शेष गायें आश्रय पा गईं।
श्लोक 18 (13.123.18)
यास्तस्य राज्ञो निहता गावो यज्ञे महात्मनः । ता गोलोकमुपाजग्मुः प्रेक्षिता ब्रह्मवादिभिः ॥
yāstasya rājño nihatā gāvo yajñe mahātmanaḥ | tā golokamupājagmuḥ prekṣitā brahmavādibhiḥ
उस महात्मा राजा के यज्ञ में जो गायें मारी गई थीं, वे वेदवादी ब्राह्मणों की दृष्टि से पवित्र होकर गोलोक को गईं।
श्लोक 19 (13.123.19)
रन्तिदेवोपि राजर्षिरिष्ट्वा यज्ञं यथाविधि । ततः सख्यं सुरपतेस्त्रिदिवं चाक्षयं ययौ ॥
rantidevopi rājarṣiriṣṭvā yajñaṃ yathāvidhi | tataḥ sakhyaṃ surapatestridivaṃ cākṣayaṃ yayau
राजर्षि रन्तिदेव भी विधिपूर्वक यज्ञ करके देवराज इन्द्र की मित्रता पाकर अक्षय स्वर्ग को गए।
श्लोक 20 (13.123.20)
फेनपो दिवि गोलोके मुमुदे शाश्वतीः समाः । अवशिष्टाश्च या गावस्ता बभूवुर्वनेचराः ॥
phenapo divi goloke mumude śāśvatīḥ samāḥ | avaśiṣṭāśca yā gāvastā babhūvurvanecarāḥ
फेनप स्वर्ग में गोलोक में अनन्त वर्षों तक आनन्दित रहा। और जो गायें शेष रह गई थीं, वे वन में विचरनेवाली हो गईं।
श्लोक 21 (13.123.21)
फेनपाख्यानमेतत्ते गवां माहात्म्यमेव च । कथितं पावनं पुण्यं कृष्णद्वैपायनेरितम् ॥
phenapākhyānametatte gavāṃ māhātmyameva ca | kathitaṃ pāvanaṃ puṇyaṃ kṛṣṇadvaipāyaneritam
तुम्हें यह फेनप का आख्यान और गायों का माहात्म्य सुनाया गया; यह पावन और पुण्यदायक है और इसे कृष्ण द्वैपायन ने कहा था।
श्लोक 22 (13.123.22)
नारायणोऽपि भगवान्दृष्ट्वा गोषु परं यशः । शुश्रूषां परमां चक्रे भक्तिं च भरतर्षभ ॥
nārāyaṇo'pi bhagavāndṛṣṭvā goṣu paraṃ yaśaḥ | śuśrūṣāṃ paramāṃ cakre bhaktiṃ ca bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, भगवान नारायण ने भी गायों में परम यश देखकर उनकी परम सेवा और भक्ति की।
श्लोक 23 (13.123.23)
तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र गा वै पूजय भारत । द्विजेभ्यश्चैव सततं प्रयच्छ कुरुसत्तम ॥
tasmāttvamapi rājendra gā vai pūjaya bhārata | dvijebhyaścaiva satataṃ prayaccha kurusattama
इसलिए हे राजेन्द्र, तुम भी गायों की पूजा करो, हे भारत, और हे कुरुश्रेष्ठ, ब्राह्मणों को सदा गायें दान करो।