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अनुशासन पर्व · अध्याय 124

व्यास का शुक को गायों की महिमा का उपदेश

युधिष्ठिर सबसे पवित्र और श्रेष्ठ व्रत के विषय में पूछते हैं, और भीष्म व्यास तथा उनके पुत्र शुक का एक पुराना संवाद सुनाते हैं। शुक पूछते हैं कि कौन-सा दान सबसे बड़ा है और यज्ञ किस पर टिका है। व्यास गायों की महिमा बताते हैं कि वे सब प्राणियों की माताएँ और सब देवताओं का निवास हैं, जिनके दूध, दही और घी से यज्ञ चलता है, और वे गोमती-पाठ का उपदेश देते हैं, जो पापों से मुक्ति, रक्षा, समृद्धि और विजय देता है।

अध्याय 123अध्याय-सूचीअध्याय 125

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.124.1)

पवित्राणां पवित्रं यच्छ्रेष्ठं लोकेषु पूजितम् । महाव्रतं महाभाग तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

pavitrāṇāṃ pavitraṃ yacchreṣṭhaṃ lokeṣu pūjitam | mahāvrataṃ mahābhāga tanme brūhi pitāmaha

हे महाभाग पितामह, पवित्रों में भी जो सबसे पवित्र और श्रेष्ठ है, लोकों में पूजित है, वह महाव्रत मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.124.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पितुः पुत्रस्य संवादं व्यासस्य च शुकस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | pituḥ putrasya saṃvādaṃ vyāsasya ca śukasya ca

इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, पिता और पुत्र, व्यास और शुक, का संवाद।

श्लोक 3 (13.124.3)

ऋषीणामुत्तमं कृष्णं भावितात्मानमच्युतम् । पारम्पर्यविशेषज्ञं सर्वशास्त्रार्थकोविदम् ॥

ṛṣīṇāmuttamaṃ kṛṣṇaṃ bhāvitātmānamacyutam | pāramparyaviśeṣajñaṃ sarvaśāstrārthakovidam

(वह संवाद) ऋषियों में श्रेष्ठ, संस्कारित आत्मावाले, अच्युत कृष्ण (व्यास) के विषय में है, जो परम्पराओं की सब विशेषताओं को जानते थे और सब शास्त्रों के अर्थ में निपुण थे।

श्लोक 4 (13.124.4)

कृतशौचः शुकस्तत्र कृतजप्यः कृताह्निकः । परं नियममास्थाय परं धर्ममुपाश्रितः ॥

kṛtaśaucaḥ śukastatra kṛtajapyaḥ kṛtāhnikaḥ | paraṃ niyamamāsthāya paraṃ dharmamupāśritaḥ

शुक ने वहाँ शौच, जप और नित्य कर्म पूर्ण करके परम नियम को अपनाया और परम धर्म का आश्रय लिया,

श्लोक 5 (13.124.5)

प्रणम्य शिरसा व्यासं सूक्ष्मतत्वार्थदर्शिनम् । शुकः पप्रच्छ वै प्रश्नं दानधर्मकुतूहलः ॥

praṇamya śirasā vyāsaṃ sūkṣmatatvārthadarśinam | śukaḥ papraccha vai praśnaṃ dānadharmakutūhalaḥ

और सूक्ष्म तत्त्वों के अर्थ को देखनेवाले व्यास को सिर झुकाकर प्रणाम किया, तथा दान-धर्म जानने की उत्सुकता से यह प्रश्न पूछा:

शुक उवाच

श्लोक 6 (13.124.6)

बहुचित्राणि दानानि बहुशः शंससे मुने । महार्थं पावनं पुण्यं किंस्विद्दानं महाफलम् ॥

bahucitrāṇi dānāni bahuśaḥ śaṃsase mune | mahārthaṃ pāvanaṃ puṇyaṃ kiṃsviddānaṃ mahāphalam

हे मुनि, आप अनेक प्रकार के विचित्र दानों का बार-बार वर्णन करते हैं। इनमें कौन-सा दान महान प्रयोजनवाला, पावन, पुण्यदायक और बड़े फलवाला है?

श्लोक 7 (13.124.7)

केन दुर्गाणि तरति केन लोकानवाप्नुते । केन वा महदाप्नोति इह लोके परत्र च ॥

kena durgāṇi tarati kena lokānavāpnute | kena vā mahadāpnoti iha loke paratra ca

किससे मनुष्य कठिनाइयों को पार करता है? किससे लोकों को पाता है? और किससे इस लोक तथा परलोक में महानता प्राप्त करता है?

श्लोक 8 (13.124.8)

के वा यज्ञस्य वोढारः केषु यज्ञः प्रतिष्ठितः । किञ्च यज्ञस्य यज्ञत्वं किञ्च यज्ञस्य भेषजम् । यज्ञानामुत्तमं किञ्च तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥

ke vā yajñasya voḍhāraḥ keṣu yajñaḥ pratiṣṭhitaḥ | kiñca yajñasya yajñatvaṃ kiñca yajñasya bheṣajam | yajñānāmuttamaṃ kiñca tadbhavānprabravītu me

यज्ञ को वहन करनेवाले कौन हैं और यज्ञ किन पर प्रतिष्ठित है? यज्ञ का यज्ञत्व क्या है और यज्ञ का औषध क्या है? और यज्ञों में श्रेष्ठ क्या है? आप मुझे यह बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (13.124.9)

स तस्मै भजमानाय जातकौतूहलाय च । व्यासो व्रतनिधिः प्राह गवामिदमनुत्तमम् ॥

sa tasmai bhajamānāya jātakautūhalāya ca | vyāso vratanidhiḥ prāha gavāmidamanuttamam

उस श्रद्धापूर्वक सेवा करनेवाले और जिज्ञासा से भरे शुक से व्रतों के निधि व्यास ने गायों के विषय में यह सर्वोत्तम बात कही,

श्लोक 10 (13.124.10)

धन्यं यशस्यमायुष्यं लोके श्रुतिसुखावहम् । यत्पवित्रं पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् ॥

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ loke śrutisukhāvaham | yatpavitraṃ pavitrāṇāṃ maṅgalānāṃ ca maṅgalam

जो धन्य, यशस्वी, आयु बढ़ानेवाली, संसार में सुनने में सुखदायक, पवित्रों में भी पवित्र और मंगलों में भी मंगल है,

व्यास उवाच

श्लोक 11 (13.124.11)

सर्वपापप्रशमनं तत्समासेन मे शृणु । यदिदं तिष्ठते लोके जगत्स्थावरजङ्गमम् । गावस्तत्प्राप्य तिष्ठन्ति गोलोके पुण्यदर्शनाः ॥

sarvapāpapraśamanaṃ tatsamāsena me śṛṇu | yadidaṃ tiṣṭhate loke jagatsthāvarajaṅgamam | gāvastatprāpya tiṣṭhanti goloke puṇyadarśanāḥ

और जो सब पापों का नाश करनेवाली है। उसे मुझसे संक्षेप में सुनो। यह जो स्थावर और जंगम जगत् इस लोक में स्थित है, उसे पाकर पुण्य दर्शनवाली गायें गोलोक में रहती हैं।

श्लोक 12 (13.124.12)

मातरः सर्वभूतानां विश्वस्य जगतश्च ह । रुद्राणामिह साध्यानां गाव एव तु मातरः ॥

mātaraḥ sarvabhūtānāṃ viśvasya jagataśca ha | rudrāṇāmiha sādhyānāṃ gāva eva tu mātaraḥ

वे समस्त प्राणियों की और सारे विश्व की माताएँ हैं। यहाँ रुद्रों और साध्यों की भी माताएँ गायें ही हैं।

श्लोक 13 (13.124.13)

रुद्राणां मातरो ह्येता ह्यादित्यानां स्वसा स्मृताः । वसूनां च दुहित्रस्ता ब्रह्मसन्तानमूलजाः ॥

rudrāṇāṃ mātaro hyetā hyādityānāṃ svasā smṛtāḥ | vasūnāṃ ca duhitrastā brahmasantānamūlajāḥ

ये रुद्रों की माताएँ हैं, आदित्यों की बहनें मानी गई हैं और वसुओं की पुत्रियाँ हैं; ये ब्रह्मा की सृष्टि के मूल से उत्पन्न हुई हैं।

श्लोक 14 (13.124.14)

यासामधिपतिः पूषा मरुतो वालबन्धनाः । ऐश्वर्यं वरुणो राजा विश्वेदेवाः समाश्रिताः ॥

yāsāmadhipatiḥ pūṣā maruto vālabandhanāḥ | aiśvaryaṃ varuṇo rājā viśvedevāḥ samāśritāḥ

इनके अधिपति पूषा हैं, मरुत् इनकी पूँछ बाँधनेवाले हैं; राजा वरुण इन पर ऐश्वर्य रखते हैं और विश्वेदेव इनके आश्रित हैं।

श्लोक 15 (13.124.15)

य एवं वेद ता गावो मातरो देवपूजिताः । स विप्रो ब्रह्मलोकाय गवां लोकाय वा ध्रुवः ॥

ya evaṃ veda tā gāvo mātaro devapūjitāḥ | sa vipro brahmalokāya gavāṃ lokāya vā dhruvaḥ

जो ब्राह्मण इस प्रकार जानता है कि गायें देवताओं से पूजित माताएँ हैं, वह निश्चय ही ब्रह्मलोक या गोलोक को पाता है।

श्लोक 16 (13.124.16)

गावस्तु नावमन्येत कर्मणा मनसा गिरा । गवां स्थानं परं लोके प्रार्थयेद्यः परां गतिम् ॥

gāvastu nāvamanyeta karmaṇā manasā girā | gavāṃ sthānaṃ paraṃ loke prārthayedyaḥ parāṃ gatim

जो संसार में गायों का परम स्थान, परम गति पाना चाहता है, उसे कर्म, मन या वाणी से गायों का अपमान नहीं करना चाहिए।

श्लोक 17 (13.124.17)

न पद्भ्यां ताडयेद्गा वै न दण्डेन न मुष्टिना । इमां विद्यामुपाश्रित्य पावनीं ब्रह्मनिर्मिताम् ॥

na padbhyāṃ tāḍayedgā vai na daṇḍena na muṣṭinā | imāṃ vidyāmupāśritya pāvanīṃ brahmanirmitām

ब्रह्मा की बनाई हुई इस पावन विद्या का आश्रय लेकर वह गाय को न पैरों से मारे, न डंडे से, न मुट्ठी से।

श्लोक 18 (13.124.18)

मातॄणामन्ववाये च न गोमध्ये न गोव्रजे । नरो मूत्रपुरीषस्य दृष्ट्वा कुर्याद्विसर्जनम् ॥

mātṝṇāmanvavāye ca na gomadhye na govraje | naro mūtrapurīṣasya dṛṣṭvā kuryādvisarjanam

और गायों को देखकर मनुष्य माताओं के चलने के मार्ग में, गायों के बीच या गोशाला में मल-मूत्र का त्याग न करे।

श्लोक 19 (13.124.19)

शुद्धाश्चन्दनशीताङ्ग्यश्चन्द्ररश्मिसमप्रभाः । सौम्याः सुरभ्यः सुभगा गावो गुग्गुलुगन्धयः ॥

śuddhāścandanaśītāṅgyaścandraraśmisamaprabhāḥ | saumyāḥ surabhyaḥ subhagā gāvo guggulugandhayaḥ

गायें शुद्ध हैं, उनके अंग चन्दन के समान शीतल हैं, वे चन्द्रमा की किरणों-सी उजली, सौम्य, सुगन्धित और सौभाग्यवती हैं, और गुग्गुल की गन्ध वाली हैं।

श्लोक 20 (13.124.20)

सर्वे देवाऽविशन्गा वै समुद्रमिव सिन्धवः । दिवं चैवान्तरिक्षं च गवां व्युष्टिं समश्नुते ॥

sarve devā'viśangā vai samudramiva sindhavaḥ | divaṃ caivāntarikṣaṃ ca gavāṃ vyuṣṭiṃ samaśnute

सब देवता गायों में उसी प्रकार प्रविष्ट हुए हैं जैसे नदियाँ समुद्र में। मनुष्य स्वर्ग और अन्तरिक्ष को तथा गायों से मिलनेवाली समृद्धि को पाता है।

श्लोक 21 (13.124.21)

दधिना जुहुयादग्निं दधिना स्वस्ति वाचयेत् । दधि दद्याच्च प्राशेत गवां व्युष्टिं समश्नुते ॥

dadhinā juhuyādagniṃ dadhinā svasti vācayet | dadhi dadyācca prāśeta gavāṃ vyuṣṭiṃ samaśnute

दही से अग्नि में हवन करे, दही से स्वस्तिवाचन कराए, दही का दान करे और उसे खाए; इस प्रकार वह गायों से मिलनेवाली समृद्धि पाता है।

श्लोक 22 (13.124.22)

घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् । घृतमालभ्य प्राश्नीयाद्गवां व्युष्टिं समश्नुते ॥

ghṛtena juhuyādagniṃ ghṛtena svasti vācayet | ghṛtamālabhya prāśnīyādgavāṃ vyuṣṭiṃ samaśnute

घी से अग्नि में हवन करे, घी से स्वस्तिवाचन कराए, घी का स्पर्श करके उसे खाए; इस प्रकार वह गायों से मिलनेवाली समृद्धि पाता है।

श्लोक 23 (13.124.23)

गावः संजीवना यास्तु गावो दानमनुत्तमम् । ताः पुण्यगोपाः सुफला भजमानं भजन्तु माम् ॥

gāvaḥ saṃjīvanā yāstu gāvo dānamanuttamam | tāḥ puṇyagopāḥ suphalā bhajamānaṃ bhajantu mām

गायें जीवन देनेवाली हैं, गायें परम दान हैं। पुण्य की रक्षा करनेवाली और उत्तम फल देनेवाली वे गायें मुझ पर, जो उनकी सेवा करता है, कृपा करें।

श्लोक 24 (13.124.24)

येन देवाः पवित्रेण स्वर्गलोकमितो गताः । तत्पवित्रं पवित्राणां मम मूर्ध्नि प्रतिष्ठितम् ॥

yena devāḥ pavitreṇa svargalokamito gatāḥ | tatpavitraṃ pavitrāṇāṃ mama mūrdhni pratiṣṭhitam

जिस पवित्र साधन से देवता यहाँ से स्वर्गलोक को गए, पवित्रों में भी वह पवित्र मेरे मस्तक पर प्रतिष्ठित है।

श्लोक 25 (13.124.25)

वीणामृदङ्गपणवा गवां गात्रं प्रतिष्ठिताः । क्रीडारतिविहारार्थे त्रिषु लोकेषु वर्तते ॥

vīṇāmṛdaṅgapaṇavā gavāṃ gātraṃ pratiṣṭhitāḥ | krīḍārativihārārthe triṣu lokeṣu vartate

वीणा, मृदंग और पणव गायों के शरीर पर आश्रित हैं; क्रीड़ा, आनन्द और विहार के लिए वे तीनों लोकों में विद्यमान हैं।

श्लोक 26 (13.124.26)

न तत्र देवा वर्तन्ते नाग्निहोत्राणि जुह्वति । न यज्ञैरिज्यते चात्र यत्र गौर्वै न दृश्यते ॥

na tatra devā vartante nāgnihotrāṇi juhvati | na yajñairijyate cātra yatra gaurvai na dṛśyate

जहाँ गाय दिखाई नहीं देती, वहाँ देवता नहीं रहते, अग्निहोत्र की आहुतियाँ नहीं दी जातीं और यज्ञ भी नहीं किए जाते।

श्लोक 27 (13.124.27)

क्षीरं दधि घृतं यासां रसानामुत्तमो रसः । अमृतप्रभवा गावस्त्रैलोक्यं येन जीवति ॥

kṣīraṃ dadhi ghṛtaṃ yāsāṃ rasānāmuttamo rasaḥ | amṛtaprabhavā gāvastrailokyaṃ yena jīvati

उनका दूध, दही और घी रसों में सर्वोत्तम रस है। गायें अमृत से उत्पन्न हुई हैं और उन्हीं से तीनों लोक जीते हैं।

श्लोक 28 (13.124.28)

इमामाहूय धेनुं च सवत्सां यज्ञमातरम् । उपाह्वयन्ति यां विप्रा गावो यज्ञहविष्कृतम् ॥

imāmāhūya dhenuṃ ca savatsāṃ yajñamātaram | upāhvayanti yāṃ viprā gāvo yajñahaviṣkṛtam

बछड़े सहित इस धेनु को, जो यज्ञ की माता है, बुलाकर ब्राह्मण उसका आह्वान करते हैं; गायें यज्ञ की हवि तैयार करनेवाली हैं।

श्लोक 29 (13.124.29)

या मेध्या प्रथमं कर्म इयं धेनुः सरस्वती । पौर्णमासेन वत्सेन कामं कामगुणान्विता ॥

yā medhyā prathamaṃ karma iyaṃ dhenuḥ sarasvatī | paurṇamāsena vatsena kāmaṃ kāmaguṇānvitā

जो यज्ञ के योग्य और कर्मों में प्रथम है, वही यह धेनु सरस्वती है; पूर्णमासी के बछड़े के साथ वह इच्छानुसार सब अभीष्ट गुणों से युक्त है।

श्लोक 30 (13.124.30)

यत्र सर्वमिदं प्रोतं यत्किंचिज्जङ्गमं जगत् । स गौर्वै प्रथमा पुण्या सर्वभूतहिते रता ॥

yatra sarvamidaṃ protaṃ yatkiṃcijjaṅgamaṃ jagat | sa gaurvai prathamā puṇyā sarvabhūtahite ratā

जिसमें यह सब कुछ पिरोया हुआ है, जो कुछ भी चलनेवाला जगत् है, वही गाय प्रथम, पुण्य और सब प्राणियों के हित में रत है।

श्लोक 31 (13.124.31)

धारणाः पावनाः पुण्या भावना भूतभावनाः । गावो मामभिरक्षन्तु इह लोके परत्र च ॥

dhāraṇāḥ pāvanāḥ puṇyā bhāvanā bhūtabhāvanāḥ | gāvo māmabhirakṣantu iha loke paratra ca

धारण करनेवाली, पवित्र करनेवाली, पुण्यमयी, पोषण करनेवाली और प्राणियों को उत्पन्न करनेवाली गायें इस लोक और परलोक में मेरी रक्षा करें।

श्लोक 32 (13.124.32)

एष यज्ञः सहोपाङ्ग एष यज्ञः सनातनः । वेदाः सहोपनिषदो गवां रूपाः प्रतिष्ठिताः ॥

eṣa yajñaḥ sahopāṅga eṣa yajñaḥ sanātanaḥ | vedāḥ sahopaniṣado gavāṃ rūpāḥ pratiṣṭhitāḥ

यही अंगोंसहित यज्ञ है, यही सनातन यज्ञ है। उपनिषदोंसहित वेद गायों के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 33 (13.124.33)

एतत्तात मया प्रोक्तं गवामिह परं मतम् । सर्वतः श्रावयेन्नित्यं प्रयतो ब्रह्मसंसदि ॥

etattāta mayā proktaṃ gavāmiha paraṃ matam | sarvataḥ śrāvayennityaṃ prayato brahmasaṃsadi

हे तात, यही मैंने तुम्हें गायों के विषय में इस लोक का परम मत बताया है। संयत होकर इसे सदा सब कहीं, ब्राह्मणों की सभा में, सुनाना चाहिए।

श्लोक 34 (13.124.34)

श्रुत्वा लभेत ताँल्लोकान्ये मया परिकीर्तिताः । श्रावयित्वापि प्रीतात्मा लोकांस्तान्प्रतिपद्यते ॥

śrutvā labheta tām̐llokānye mayā parikīrtitāḥ | śrāvayitvāpi prītātmā lokāṃstānpratipadyate

इसे सुनकर मनुष्य उन लोकों को पाता है जिनका मैंने वर्णन किया है, और प्रसन्न मन से दूसरों को सुनानेवाला भी उन्हीं लोकों को प्राप्त करता है।

श्लोक 35 (13.124.35)

धेनुमेकां समादद्यादहन्यहनि पावनीम् । तत्तथा प्राप्नुयाद्विप्रः पठन्वै गोमतीं सदा ॥

dhenumekāṃ samādadyādahanyahani pāvanīm | tattathā prāpnuyādvipraḥ paṭhanvai gomatīṃ sadā

प्रतिदिन एक पावन गाय का दान करना अपनाए; जो ब्राह्मण सदा गोमती का पाठ करता है, वह वही फल पाता है।

श्लोक 36 (13.124.36)

अथ धेनुर्न विद्यते तिलधेनुमनुत्तमाम् । दद्याद्गोमतिकल्पेन तां धेनुं सर्वपावनीम् ॥

atha dhenurna vidyate tiladhenumanuttamām | dadyādgomatikalpena tāṃ dhenuṃ sarvapāvanīm

यदि गाय न हो, तो वह गोमती-विधि से उत्तम तिलधेनु का दान करे, जो सबको पवित्र करनेवाली धेनु है।

श्लोक 37 (13.124.37)

आह्निकं गोमतीं नित्यं यः पठेत सदा नरः । सर्वपापात्प्रमुच्येत प्रयतात्मा य आचरेत् ॥

āhnikaṃ gomatīṃ nityaṃ yaḥ paṭheta sadā naraḥ | sarvapāpātpramucyeta prayatātmā ya ācaret

जो मनुष्य नित्य नियम से गोमती का पाठ करता है, वह यदि संयत मन से इसका आचरण करे तो सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 38 (13.124.38)

घृतं वा नित्यमालभ्य प्राश्य वा गोमतीं जपेत् । स्नात्वा वा गोकरीषेण पठन्पापात्प्रमुच्यते ॥

ghṛtaṃ vā nityamālabhya prāśya vā gomatīṃ japet | snātvā vā gokarīṣeṇa paṭhanpāpātpramucyate

अथवा घी का स्पर्श करके या उसे खाकर गोमती का जप करे; या गोबर से स्नान करके पाठ करता हुआ वह पाप से छूट जाता है।

श्लोक 39 (13.124.39)

मनसा गोमतीं जप्येद्गोमत्या नित्यमाह्निकम् । न त्वेव दिवसं कुर्याद्व्यर्थं गोमत्यपाठकः ॥

manasā gomatīṃ japyedgomatyā nityamāhnikam | na tveva divasaṃ kuryādvyarthaṃ gomatyapāṭhakaḥ

वह मन में गोमती का जप करे, गोमती ही उसका नित्य नियम हो; जो गोमती का पाठ नहीं करता, वह कभी दिन को व्यर्थ न जाने दे।

श्लोक 40 (13.124.40)

गोमतीं जपमाना हि देवा देवत्वमाप्नुवन् । ऋषित्वमृषयश्चापि गोमत्या सर्वमाप्नुवन् ॥

gomatīṃ japamānā hi devā devatvamāpnuvan | ṛṣitvamṛṣayaścāpi gomatyā sarvamāpnuvan

गोमती का जप करके देवताओं ने देवत्व पाया, और ऋषियों ने भी ऋषित्व; सब कुछ उन्होंने गोमती से ही पाया।

श्लोक 41 (13.124.41)

बद्धो बन्धात्प्रमुच्येत कृच्छ्रान्मुच्येत सङ्कटात् । गोमतीं सेवते यस्तु लभते प्रियसङ्गमम् ॥

baddho bandhātpramucyeta kṛcchrānmucyeta saṅkaṭāt | gomatīṃ sevate yastu labhate priyasaṅgamam

बँधा हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है, और मनुष्य कष्ट तथा संकट से मुक्त होता है। जो गोमती का सेवन करता है, वह प्रियजनों का समागम पाता है।

श्लोक 42 (13.124.42)

एतत्पवित्रं कार्त्स्न्येन एतद्व्रतमनुत्तमम् । एतत्तु पृथिवीपाल पावनं शृण्वतां सदा ॥

etatpavitraṃ kārtsnyena etadvratamanuttamam | etattu pṛthivīpāla pāvanaṃ śṛṇvatāṃ sadā

यह सम्पूर्ण रूप से पवित्र है, यही उत्तम व्रत है। हे पृथिवीपाल, यह सुननेवालों को सदा पवित्र करता है।

श्लोक 43 (13.124.43)

पुत्रकामाश्च ये केचिद्धनकामाश्च मानवाः । अध्वाने चोरवैरिभ्यो मुच्यते गोमतीं पठन् ॥

putrakāmāśca ye keciddhanakāmāśca mānavāḥ | adhvāne coravairibhyo mucyate gomatīṃ paṭhan

जो कोई मनुष्य पुत्र या धन चाहते हैं, और जो मार्ग में चोरों और शत्रुओं के भय में हैं, वे गोमती का पाठ करने से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 44 (13.124.44)

पूर्ववैरानुबन्धेषु रणे चाप्याततायिनः । लभेत जयमेवाशु सदा गोमतिपाठकः ॥

pūrvavairānubandheṣu raṇe cāpyātatāyinaḥ | labheta jayamevāśu sadā gomatipāṭhakaḥ

पुराने वैरों के सिलसिले में, या युद्ध में आक्रमणकारियों के विरुद्ध, गोमती का पाठ करनेवाला सदा शीघ्र विजय पाता है।

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