अनुशासन पर्व · अध्याय 125
कपिला गौ का उपयोग: व्यास का शुक को निर्णय
शुक पूछते हैं कि क्षत्रिय, शूद्र और मन्त्रहीन ब्राह्मण कपिला गौ से अपनी जीविका कैसे चला सकते हैं। व्यास बताते हैं कि कपिला गौओं में श्रेष्ठ है, उसके दान से स्वर्ग मिलता है, और उसे मन्त्र के साथ ही जोतना और काम में लाना चाहिए। जो उसे मारता है, कष्ट देता है या बिना मन्त्र के काम में लेता है, वह कृमि-योनि में जन्म लेता है और उसके रक्त की जितनी बूँदें भूमि पर गिरती हैं उतने सहस्र वर्ष नरक भोगता है।
शुक उवाच
श्लोक 1 (13.125.1)
क्षत्रियाश्चैव शूद्राश्च मन्त्रहीनाश्च ये द्विजाः । कपिलामुपजीवन्ति कथमेतत्पितर्भवेत् ॥
kṣatriyāścaiva śūdrāśca mantrahīnāśca ye dvijāḥ | kapilāmupajīvanti kathametatpitarbhavet
क्षत्रिय, शूद्र और जो ब्राह्मण मन्त्रहीन हैं, वे कपिला गौ से अपनी जीविका चलाते हैं। पिताजी, यह कैसे उचित हो सकता है?
श्रीव्यास उवाच
श्लोक 2 (13.125.2)
क्षत्रियाश्चैव शूद्राश्च मन्त्रहीनाश्च ये द्विजाः । कपिलामुपजीवन्ति तेषां वक्ष्यामि निर्णयम् ॥
kṣatriyāścaiva śūdrāśca mantrahīnāśca ye dvijāḥ | kapilāmupajīvanti teṣāṃ vakṣyāmi nirṇayam
क्षत्रिय, शूद्र और मन्त्रहीन ब्राह्मण जो कपिला गौ से जीविका चलाते हैं, उनके विषय में मैं तुम्हें निर्णय बताऊँगा।
श्लोक 3 (13.125.3)
कपिलास्तूत्तमा लोके गोषु चैवोत्तमा मताः । तासां दाता लभेत्स्वर्गं विधिना यश्च सेवते ॥
kapilāstūttamā loke goṣu caivottamā matāḥ | tāsāṃ dātā labhetsvargaṃ vidhinā yaśca sevate
संसार में कपिला गौएँ सर्वश्रेष्ठ हैं और गौओं में भी उत्तम मानी गई हैं। जो उन्हें दान देता है और जो विधि के अनुसार उनकी सेवा करता है, वह स्वर्ग प्राप्त करता है।
श्लोक 4 (13.125.4)
स्पृशेत कपिलां यस्तु दण्डेन चरणेन वा । स तेन स्पर्शमात्रेण नरकायोपपद्यते ॥
spṛśeta kapilāṃ yastu daṇḍena caraṇena vā | sa tena sparśamātreṇa narakāyopapadyate
जो मनुष्य कपिला गौ को डंडे से या पैर से छूता है, वह केवल उस स्पर्श के कारण नरक में जाता है।
श्लोक 5 (13.125.5)
मन्त्रेण युञ्ज्यात्कपिलां मन्त्रेणैव प्रमुञ्चते । मन्त्रहीनं तु यो युञ्जात्कृमियोनौ प्रसूयते ॥
mantreṇa yuñjyātkapilāṃ mantreṇaiva pramuñcate | mantrahīnaṃ tu yo yuñjātkṛmiyonau prasūyate
यदि कोई कपिला गौ को मन्त्र के साथ जोतता है तो मन्त्र से ही दोष से मुक्त हो जाता है; पर जो बिना मन्त्र के जोतता है, वह कृमि की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 6 (13.125.6)
प्रहाराहतमर्माङ्गा दुःखेन च जडीकृता । पदानि यावद्गच्छेत तावल्लोकान्कृमिर्भवेत् ॥
prahārāhatamarmāṅgā duḥkhena ca jaḍīkṛtā | padāni yāvadgaccheta tāvallokānkṛmirbhavet
मर्मस्थानों पर मार खाकर और पीड़ा से जड़ हुई वह गौ जितने पग चलती है, उतने लोकों तक वह मारने वाला कृमि बनता है।
श्लोक 7 (13.125.7)
यावन्तो बिन्दवस्तस्याः शोणितस्य क्षितिं गताः । तावद्वर्षसहस्राणि नरकं प्रतिपद्यते ॥
yāvanto bindavastasyāḥ śoṇitasya kṣitiṃ gatāḥ | tāvadvarṣasahasrāṇi narakaṃ pratipadyate
उसके रक्त की जितनी बूँदें भूमि पर गिरती हैं, उतने सहस्र वर्ष तक वह नरक में पड़ा रहता है।
श्लोक 8 (13.125.8)
मन्त्रेण युञ्ज्यात्कपिलां मन्त्रेण विनियोजयेत् । मन्त्रहीनैरनुयुतो मज्जयेत्तमसि प्रभो ॥
mantreṇa yuñjyātkapilāṃ mantreṇa viniyojayet | mantrahīnairanuyuto majjayettamasi prabho
कपिला गौ को मन्त्र से जोतना चाहिए और मन्त्र से ही काम में लगाना चाहिए। हे प्रभो, जो मन्त्रहीन लोगों के साथ रहकर यह करता है, वह अन्धकार में डूबता है।
श्लोक 9 (13.125.9)
कपिलां येऽपि जीवन्ति बुद्धिमोहान्विता नराः । तेऽपि वर्षसहस्राणि पतन्ति नरके नृप ॥
kapilāṃ ye'pi jīvanti buddhimohānvitā narāḥ | te'pi varṣasahasrāṇi patanti narake nṛpa
और जो मनुष्य बुद्धि के मोह में पड़कर कपिला गौ से जीविका चलाते हैं, वे भी, हे राजन्, सहस्रों वर्ष नरक में पड़ते हैं।
श्लोक 10 (13.125.10)
अथ न्यायेन ये विप्राः कपिलामुपयुञ्जते । तस्मिंल्लोके प्रमोदन्ते लोकाश्चैषामनामयाः ॥
atha nyāyena ye viprāḥ kapilāmupayuñjate | tasmiṃlloke pramodante lokāścaiṣāmanāmayāḥ
किन्तु जो ब्राह्मण न्याय के अनुसार कपिला गौ का उपयोग करते हैं, वे उस लोक में आनन्द करते हैं और उनके लोक रोग-शोक से रहित होते हैं।
श्लोक 11 (13.125.11)
विधिना ये न कुर्वन्ति शूद्रांस्तानुपधारय ॥
vidhinā ye na kurvanti śūdrāṃstānupadhāraya
जो लोग विधि के अनुसार ऐसा नहीं करते, उन्हें शूद्र ही समझो।