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अनुशासन पर्व · अध्याय 127

कपिला गौ के लक्षण

शुक पूछते हैं कि कपिला गौ की पहचान कैसे हो। व्यास छह अंग बताते हैं जिनमें कपिल रंग दिख सकता है (नेत्र, सींग, खुर, अण्ड, कान, नासिका), उनके देवता और कपिला के छह प्रकार के उद्भव का वर्णन करते हैं। फिर वे बताते हैं कि इनमें से प्रत्येक अंग में कपिल गौ को जोतने, दुहने या उससे जीविका चलाने वालों की क्या गति होती है: नरक, पशु-योनि, अन्धापन, निर्धनता, रोग और नीच कुल में जन्म।

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शुक उवाच

श्लोक 1 (13.127.1)

केन वर्णविभागेन विज्ञेया कपिला भवेत् । कति वा लक्षणान्यस्या दृष्टानि मुनिभिः पुरा ॥

kena varṇavibhāgena vijñeyā kapilā bhavet | kati vā lakṣaṇānyasyā dṛṣṭāni munibhiḥ purā

किस वर्ण-विभाग से कपिला गौ पहचानी जाती है? और प्राचीन काल में मुनियों ने उसके कितने लक्षण देखे थे?

श्रीव्यास उवाच

श्लोक 2 (13.127.2)

शृणु तात यथा गोषु विज्ञेया कपिला भवेत् । नेत्रयोः शृङ्गयोश्चैव खुरेषु वृषणेषु च । कर्णतो घ्राणतश्चापि षड्विधाः कपिलाः स्मृताः ॥

śṛṇu tāta yathā goṣu vijñeyā kapilā bhavet | netrayoḥ śṛṅgayoścaiva khureṣu vṛṣaṇeṣu ca | karṇato ghrāṇataścāpi ṣaḍvidhāḥ kapilāḥ smṛtāḥ

प्रिय पुत्र, सुनो, गौओं में कपिला कैसे पहचानी जाती है। नेत्र, सींग, खुर, अण्ड, कान और नासिका के भेद से कपिला गौएँ छह प्रकार की कही गई हैं।

श्लोक 3 (13.127.3)

एतेषां लक्षणानां तु यद्येकमपि दृश्यते । कपिलां तां विजानीयादेवमाहुर्मनीषिणः ॥

eteṣāṃ lakṣaṇānāṃ tu yadyekamapi dṛśyate | kapilāṃ tāṃ vijānīyādevamāhurmanīṣiṇaḥ

इन लक्षणों में से यदि एक भी दिखाई दे, तो उसे कपिला जानना चाहिए; ऐसा मनीषी कहते हैं।

श्लोक 4 (13.127.4)

आग्नेयी नेत्रकपिला खुरैर्माहेश्वरी भवेत् । ग्रीवायां वैष्णवी ज्ञेया पूष्णो घ्राणादजायत ॥

āgneyī netrakapilā khurairmāheśvarī bhavet | grīvāyāṃ vaiṣṇavī jñeyā pūṣṇo ghrāṇādajāyata

नेत्रों में कपिल गौ अग्नि की है; खुरों से वह माहेश्वरी होती है; गर्दन में उसे वैष्णवी जानना चाहिए; और नासिका से वह पूषा की उत्पत्ति है।

श्लोक 5 (13.127.5)

कर्णतस्तु वसन्तेन स्वयोनिमभिजायते । गायत्र्याश्च वृषणयोरुत्पत्तिः षड्गुणा स्मृता ॥

karṇatastu vasantena svayonimabhijāyate | gāyatryāśca vṛṣaṇayorutpattiḥ ṣaḍguṇā smṛtā

कान से वह वसन्त के द्वारा अपनी ही योनि से उत्पन्न होती है; और अण्डों से उसकी उत्पत्ति गायत्री से है। इस प्रकार उसकी उत्पत्ति छह प्रकार की कही गई है।

श्लोक 6 (13.127.6)

एवं गावश्च विप्राश्च गायत्री सत्यमेव च । वसन्तश्च सुवर्णश्च एकतः समजायत ॥

evaṃ gāvaśca viprāśca gāyatrī satyameva ca | vasantaśca suvarṇaśca ekataḥ samajāyata

इस प्रकार गौएँ, ब्राह्मण, गायत्री, सत्य, वसन्त और सुवर्ण, ये सब एक साथ उत्पन्न हुए।

श्लोक 7 (13.127.7)

नेत्रयोः कपिलां यस्तु वाहयेत दुहेत वा । स पापकर्मा नरकं प्रतिष्ठां प्रतिपद्यते ॥

netrayoḥ kapilāṃ yastu vāhayeta duheta vā | sa pāpakarmā narakaṃ pratiṣṭhāṃ pratipadyate

जो नेत्रों में कपिला गौ को जोतता या दुहता है, वह पापकर्मी नरक में स्थान पाता है।

श्लोक 8 (13.127.8)

नरकाद्विप्रमुक्तस्तु तिर्यग्योनिं निषेवते । यदा लभेत मानुष्यं जात्यन्धो जायते नरः ॥

narakādvipramuktastu tiryagyoniṃ niṣevate | yadā labheta mānuṣyaṃ jātyandho jāyate naraḥ

नरक से छूटकर वह पशु-योनि में जाता है; और जब मनुष्य-जन्म पाता है तो जन्म से अन्धा होता है।

श्लोक 9 (13.127.9)

शृङ्गयोः कपिलां यस्तु वाहयेत दुहेत वा । तिर्यग्योनिं स लभते जायमानः पुनः पुनः ॥

śṛṅgayoḥ kapilāṃ yastu vāhayeta duheta vā | tiryagyoniṃ sa labhate jāyamānaḥ punaḥ punaḥ

जो सींगों में कपिला गौ को जोतता या दुहता है, वह बार-बार जन्म लेकर पशु-योनि पाता है।

श्लोक 10 (13.127.10)

खुरेषु कपिलां यस्तु वाहयेत दुहेत वा । तमस्यपारे मज्जेत धनहीनो नराधमः ॥

khureṣu kapilāṃ yastu vāhayeta duheta vā | tamasyapāre majjeta dhanahīno narādhamaḥ

जो खुरों में कपिला गौ को जोतता या दुहता है, वह नराधम निर्धन होकर अपार अन्धकार में डूबता है।

श्लोक 11 (13.127.11)

कपिलां वालधानेषु वाहयेत दुहेत वा । निराश्रयः सदा चैव जायते यदि चेत्कृमिः ॥

kapilāṃ vāladhāneṣu vāhayeta duheta vā | nirāśrayaḥ sadā caiva jāyate yadi cetkṛmiḥ

जो पूँछ के बालों में कपिला गौ को जोतता या दुहता है, वह सदा निराश्रय उत्पन्न होता है, यदि कृमि के रूप में भी जन्म ले।

श्लोक 12 (13.127.12)

कर्णेन कपिलां यस्तु जानन्नप्युपजीवति । सहस्रशः शुचिर्भूत्वा मानुष्यं प्राप्नुयादथ । चण्डालः पापयोनिश्च जायते स नराधमः ॥

karṇena kapilāṃ yastu jānannapyupajīvati | sahasraśaḥ śucirbhūtvā mānuṣyaṃ prāpnuyādatha | caṇḍālaḥ pāpayoniśca jāyate sa narādhamaḥ

जो जानते हुए भी कान में कपिला गौ से जीविका चलाता है, वह सहस्रों बार शुद्ध होकर फिर मनुष्य-जन्म पा सकता है; फिर भी वह नराधम चाण्डाल और पापयोनि में उत्पन्न होता है।

श्लोक 13 (13.127.13)

घ्राणेन कपिलां यस्तु प्रमादादुपजीवति । सोऽपि वर्षसहस्राणि तिर्यग्योनौ प्रजायते ॥

ghrāṇena kapilāṃ yastu pramādādupajīvati | so'pi varṣasahasrāṇi tiryagyonau prajāyate

जो प्रमादवश नासिका में कपिला गौ से जीविका चलाता है, वह भी सहस्रों वर्ष पशु-योनि में उत्पन्न होता है।

श्लोक 14 (13.127.14)

व्याधिग्रस्तो जडो रोगी भवेन्मानुष्यमागतः ॥

vyādhigrasto jaḍo rogī bhavenmānuṣyamāgataḥ

मनुष्य-जन्म पाकर वह रोगग्रस्त, जड़ और रोगी होता है।

श्लोक 15 (13.127.15)

मधुसर्पिस्सुगन्धास्तु कपिलाः शास्त्रतः स्मृताः । एताः समुपजीवेत सोऽपि तिर्यक्षु जायते ॥

madhusarpissugandhāstu kapilāḥ śāstrataḥ smṛtāḥ | etāḥ samupajīveta so'pi tiryakṣu jāyate

मधु और घी के समान सुगन्धित कपिला गौएँ शास्त्र में ऐसी कही गई हैं; जो इनसे जीविका चलाता है, वह भी पशुओं में जन्म लेता है।

श्लोक 16 (13.127.16)

स्थावरत्वमनुप्राप्तो यदि मानुष्यतां लभेत् । अल्पायुः स भवेज्जातो हीनवर्णकुलोद्भवः ॥

sthāvaratvamanuprāpto yadi mānuṣyatāṃ labhet | alpāyuḥ sa bhavejjāto hīnavarṇakulodbhavaḥ

स्थावर योनि को प्राप्त होकर यदि वह मनुष्य-जन्म पाता है, तो अल्पायु और हीन वर्ण तथा कुल में उत्पन्न होता है।

श्लोक 17 (13.127.17)

ये तु पापा ह्यसूयन्ते कपिलां वाहयन्ति च । निरयेषु प्रतिष्ठन्ते यावदाभूतसम्प्लवम् ॥

ye tu pāpā hyasūyante kapilāṃ vāhayanti ca | nirayeṣu pratiṣṭhante yāvadābhūtasamplavam

जो पापी कपिला गौ का तिरस्कार करते हैं और उसे जोतते हैं, वे प्राणियों के महाप्रलय तक नरकों में पड़े रहते हैं।

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