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अनुशासन पर्व · अध्याय 128

श्री का गोमय में निवा।

युधिष्ठिर पूछते हैं कि श्री (लक्ष्मी) का गोबर में निवास क्यों कहा जाता है। भीष्म वह प्राचीन संवाद सुनाते हैं जिसमें श्री सुन्दर रूप धारण कर गौओं के बीच आती हैं और उनके साथ रहना चाहती हैं। गौएँ उन्हें चंचल और सबके लिए सुलभ कहकर अस्वीकार करती हैं; श्री विनती करती हैं कि उन्हें ठुकराया न जाए और शरीर के किसी हीन अंग में ही रहने दिया जाए, तब गौएँ उन्हें अपना गोबर और मूत्र देती हैं। यह समझौता करके श्री अन्तर्धान हो जाती हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.128.1)

मया गवां पुरीषं वै श्रिया जुष्टमिति श्रुतम् । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं संशयोऽत्र हि मे महान् ॥

mayā gavāṃ purīṣaṃ vai śriyā juṣṭamiti śrutam | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ saṃśayo'tra hi me mahān

मैंने सुना है कि गौओं के गोबर में श्री का निवास है। मैं यह सुनना चाहता हूँ, क्योंकि इस विषय में मुझे बड़ा संशय है।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.128.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गोभिर्नृपेह संवादं श्रिया भारतसत्तम ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | gobhirnṛpeha saṃvādaṃ śriyā bhāratasattama

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, जो श्री और गौओं का संवाद है, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 3 (13.128.3)

श्रीः कृत्वेह वपुः कान्तं गोमध्येषु विवेश ह । गावोऽथ विस्मितास्तस्या दृष्ट्वा रूपस्य सम्पदम् ॥

śrīḥ kṛtveha vapuḥ kāntaṃ gomadhyeṣu viveśa ha | gāvo'tha vismitāstasyā dṛṣṭvā rūpasya sampadam

श्री ने मनोहर रूप धारण करके गौओं के बीच प्रवेश किया; और उसके रूप की शोभा देखकर गौएँ विस्मित हो गईं।

गाव ऊचुः

श्लोक 4 (13.128.4)

काऽसि देवि कुतो वा त्वं रूपेणाप्रतिमा भुवि । विस्मिताः स्म महाभागे तव रूपस्य सम्पदा ॥

kā'si devi kuto vā tvaṃ rūpeṇāpratimā bhuvi | vismitāḥ sma mahābhāge tava rūpasya sampadā

"हे देवी, तुम कौन हो और कहाँ से आई हो? तुम्हारे रूप की पृथ्वी पर कोई तुलना नहीं। हे महाभाग्यवती, तुम्हारे रूप की शोभा से हम चकित हैं।

श्लोक 5 (13.128.5)

इच्छामस्त्वां वयं ज्ञातुं का त्वं क्व च गमिष्यसि । तत्त्वेन हि सुवर्णाभे सर्वमेतद्ब्रवीहि नः ॥

icchāmastvāṃ vayaṃ jñātuṃ kā tvaṃ kva ca gamiṣyasi | tattvena hi suvarṇābhe sarvametadbravīhi naḥ

हम जानना चाहती हैं कि तुम कौन हो और कहाँ जाओगी। हे स्वर्ण-कान्ति वाली, यह सब हमें सच-सच बताओ।।

श्रीरुवाच

श्लोक 6 (13.128.6)

लोकस्य कान्तिर्भद्रं वः श्रीर्नामाहं परिश्रुता । मया दैत्याः परित्यक्ता विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥

lokasya kāntirbhadraṃ vaḥ śrīrnāmāhaṃ pariśrutā | mayā daityāḥ parityaktā vinaṣṭāḥ śāśvatīḥ samāḥ

"मैं लोक की कान्ति हूँ; तुम्हारा कल्याण हो। मैं श्री नाम से प्रसिद्ध हूँ। मेरे द्वारा त्यागे जाने पर दैत्य अनन्त वर्षों के लिए नष्ट हो गए।

श्लोक 7 (13.128.7)

मयाऽभिपन्ना देवाश्च मोदन्ते शाश्वतीः समाः । इन्द्रो विवस्वान्सोमश्च विष्णुरापोऽग्निरेव च ॥

mayā'bhipannā devāśca modante śāśvatīḥ samāḥ | indro vivasvānsomaśca viṣṇurāpo'gnireva ca

मेरी कृपा पाकर देवता अनन्त वर्षों तक आनन्द करते हैं: इन्द्र, विवस्वान्, सोम, विष्णु, जल और अग्नि भी।

श्लोक 8 (13.128.8)

मयाऽभिपन्ना दीप्यन्ते ऋषयो देवतास्तथा । यान्नाविशाम्यहं गावस्ते विनश्यन्ति सर्वशः ॥

mayā'bhipannā dīpyante ṛṣayo devatāstathā | yānnāviśāmyahaṃ gāvaste vinaśyanti sarvaśaḥ

मेरी कृपा पाकर ऋषि और देवता दीप्त होते हैं। हे गौओ, जिनमें मैं प्रवेश नहीं करती, वे सब प्रकार से नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 9 (13.128.9)

धर्मश्चार्थश्च कामश्च मया जुष्टाः सुखान्विताः । एवंप्रभावां मां गावो विजानीत सुखप्रदाम् ॥

dharmaścārthaśca kāmaśca mayā juṣṭāḥ sukhānvitāḥ | evaṃprabhāvāṃ māṃ gāvo vijānīta sukhapradām

धर्म, अर्थ और काम मेरी कृपा पाकर सुख से युक्त होते हैं। हे गौओ, मुझे ऐसे प्रभाव वाली और सुख देने वाली जानो।

श्लोक 10 (13.128.10)

इच्छामि चापि युष्मासु वस्तुं सर्वासु नित्यदा । आगत्य प्रार्थये युष्माञ्श्रीजुष्टा भवताऽनघाः ॥

icchāmi cāpi yuṣmāsu vastuṃ sarvāsu nityadā | āgatya prārthaye yuṣmāñśrījuṣṭā bhavatā'naghāḥ

और मैं सदा तुम सबमें निवास करना चाहती हूँ। मैं यही माँगने तुम्हारे पास आई हूँ; हे निष्पाप गौओ, श्री से सम्पन्न हो जाओ।।

गाव ऊचुः

श्लोक 11 (13.128.11)

अध्रुवा चपला च त्वं सामान्या बहुभिः सह । न त्वामिच्छाम भद्रं ते गम्यतां यत्र रोचते ॥

adhruvā capalā ca tvaṃ sāmānyā bahubhiḥ saha | na tvāmicchāma bhadraṃ te gamyatāṃ yatra rocate

"तुम अस्थिर और चंचल हो और बहुतों के साथ साझा हो। हम तुम्हें नहीं चाहतीं; तुम्हारा कल्याण हो, जहाँ तुम्हारी रुचि हो वहाँ जाओ।

श्लोक 12 (13.128.12)

वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयाऽद्य वै । यथेष्टं गम्यतां तत्र कृतकार्या वयं त्वया ॥

vapuṣmantyo vayaṃ sarvāḥ kimasmākaṃ tvayā'dya vai | yatheṣṭaṃ gamyatāṃ tatra kṛtakāryā vayaṃ tvayā

हम सब सुन्दर रूप वाली हैं; अब हमें तुमसे क्या प्रयोजन? जहाँ तुम चाहो वहाँ जाओ; तुमसे हमारा कोई काम नहीं।।

श्रीरुवाच

श्लोक 13 (13.128.13)

किमेतद्वः क्षमं गावो यन्मां नेहाभिनन्दथ । न मां सम्प्रतिगृह्णीध्वं कस्माद्वै दुर्लभां सतीम् ॥

kimetadvaḥ kṣamaṃ gāvo yanmāṃ nehābhinandatha | na māṃ sampratigṛhṇīdhvaṃ kasmādvai durlabhāṃ satīm

"गौओ, क्या यह तुम्हारे लिए उचित है कि तुम यहाँ मेरा स्वागत नहीं करतीं? दुर्लभ और सती होने पर भी तुम मुझे स्वीकार क्यों नहीं करतीं।

श्लोक 14 (13.128.14)

सत्यश्च लोकवादोऽयं लोके चरति सुव्रताः । स्वयं प्राप्ते परिभवो भवतीति विनिश्चयः ॥

satyaśca lokavādo'yaṃ loke carati suvratāḥ | svayaṃ prāpte paribhavo bhavatīti viniścayaḥ

हे सुव्रता गौओ, लोक में यह कथन चलता है और सत्य है कि जो वस्तु स्वयं आ जाती है, उसका निरादर होता ही है।

श्लोक 15 (13.128.15)

महदुग्रं तपः कृत्वा मां निषेवन्ति मानवाः । देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ॥

mahadugraṃ tapaḥ kṛtvā māṃ niṣevanti mānavāḥ | devadānavagandharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ

मनुष्य महान् और उग्र तप करके मेरी उपासना करते हैं; देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षस भी करते हैं।

श्लोक 16 (13.128.16)

क्षममेतद्धि वो गावः प्रतिगृह्णीत मामिह । नावमन्या ह्यहं सौम्यास्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥

kṣamametaddhi vo gāvaḥ pratigṛhṇīta māmiha | nāvamanyā hyahaṃ saumyāstrailokye sacarācare

गौओ, तुम्हारे लिए उचित है कि यहाँ मुझे स्वीकार करो। हे सौम्य गौओ, चर और अचर सहित तीनों लोकों में मैं अपमान के योग्य नहीं हूँ।।

गाव ऊचुः

श्लोक 17 (13.128.17)

नावमान्यामहे देवि न त्वां परिभवामहे । अध्रुवा चलचित्तासि ततस्त्वां वर्जयामहे ॥

nāvamānyāmahe devi na tvāṃ paribhavāmahe | adhruvā calacittāsi tatastvāṃ varjayāmahe

"देवी, हम तुम्हारा अपमान या तिरस्कार नहीं करतीं; परन्तु तुम अस्थिर और चंचल चित्त वाली हो, इसीलिए हम तुम्हें छोड़ती हैं।

श्लोक 18 (13.128.18)

बहुना च किमुक्तेन गम्यतां यत्र वाञ्छसि । वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयाऽनघे ॥

bahunā ca kimuktena gamyatāṃ yatra vāñchasi | vapuṣmantyo vayaṃ sarvāḥ kimasmākaṃ tvayā'naghe

अधिक कहने से क्या लाभ? जहाँ चाहो चली जाओ। हम सब सुन्दर रूप वाली हैं; हे निर्दोष, तुमसे हमें क्या लेना है।।

श्रीरुवाच

श्लोक 19 (13.128.19)

अवज्ञाता भविष्यामि सर्वलोकेषु मानवैः । प्रत्याख्यातेति युष्माभिः प्रसादः क्रियतां मम ॥

avajñātā bhaviṣyāmi sarvalokeṣu mānavaiḥ | pratyākhyāteti yuṣmābhiḥ prasādaḥ kriyatāṃ mama

"सब लोकों में मनुष्य मेरा अनादर करेंगे। तुम्हारे द्वारा ठुकराई जाने पर भी तुम मुझ पर कृपा करो।

श्लोक 20 (13.128.20)

महाभागा भवत्यो वै शरण्याः शरणागताम् । परित्रायन्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् ॥

mahābhāgā bhavatyo vai śaraṇyāḥ śaraṇāgatām | paritrāyantu māṃ nityaṃ bhajamānāmaninditām

तुम महाभाग्यवती हो और शरणागत को शरण देने वाली हो; मुझ निर्दोष सेविका की सदा रक्षा करो।

श्लोक 21 (13.128.21)

माननामहमिच्छामि भवत्यः सततं शिवाः । अप्येकाङ्गेष्वधो वस्तुमिच्छामि च सुकुत्सिते ॥

mānanāmahamicchāmi bhavatyaḥ satataṃ śivāḥ | apyekāṅgeṣvadho vastumicchāmi ca sukutsite

हे कल्याणी गौओ, मैं सदा तुमसे सम्मान चाहती हूँ। मैं तुम्हारे शरीर के किसी एक निम्न और निन्दित अंग में भी रहना चाहती हूँ।

श्लोक 22 (13.128.22)

न वोऽस्ति कुत्सितं किञ्चिदङ्गेष्वालक्ष्यतेऽनघाः । पुण्याः पवित्राः सुभगा अवाग्देशं प्रयच्छथ । वसेयं यत्र वो देहे तन्मे व्याख्यातुमर्हथ ॥

na vo'sti kutsitaṃ kiñcidaṅgeṣvālakṣyate'naghāḥ | puṇyāḥ pavitrāḥ subhagā avāgdeśaṃ prayacchatha | vaseyaṃ yatra vo dehe tanme vyākhyātumarhatha

हे निष्पाप गौओ, तुम्हारे किसी अंग में कुछ भी निन्दित नहीं दिखता। तुम पुण्यशालिनी, पवित्र और सौभाग्यवती हो; मुझे कोई नीचे का स्थान दो, और बताओ कि तुम्हारे शरीर में मैं कहाँ रहूँ।।

भीष्म उवाच

श्लोक 23 (13.128.23)

एवमुक्तास्तु ता गावः शुभाः करुणवत्सलाः । सम्मान्य सहिताः सर्वाः श्रियमुचुर्नराधिप ॥

evamuktāstu tā gāvaḥ śubhāḥ karuṇavatsalāḥ | sammānya sahitāḥ sarvāḥ śriyamucurnarādhipa

इस प्रकार कहे जाने पर वे शुभ, दयालु और स्नेहमयी गौएँ सब मिलकर श्री का सम्मान करके बोलीं, हे राजन्।

गाव ऊचुः

श्लोक 24 (13.128.24)

अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यशस्विनि । शकृन्मूत्रे निवसतां पुण्यमेतद्धि नः शुभे ॥

avaśyaṃ mānanā kāryā tavāsmābhiryaśasvini | śakṛnmūtre nivasatāṃ puṇyametaddhi naḥ śubhe

"हे यशस्विनी, हमें तुम्हारा सम्मान अवश्य करना चाहिए। हमारे गोबर और मूत्र में तुम्हारा निवास हो; हे शुभे, यह हमारे लिए पुण्य की बात है।।

श्रीरुवाच

श्लोक 25 (13.128.25)

दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः । एवं भवतु भद्रं वः पूजिताऽस्मि सुखप्रदाः ॥

diṣṭyā prasādo yuṣmābhiḥ kṛto me'nugrahātmakaḥ | evaṃ bhavatu bhadraṃ vaḥ pūjitā'smi sukhapradāḥ

"सौभाग्य से तुमने कृपा करके मुझ पर यह अनुग्रह किया। ऐसा ही हो; हे सुख देने वाली गौओ, तुम्हारा कल्याण हो। मैं सम्मानित हुई।।

भीष्म उवाच

श्लोक 26 (13.128.26)

एवं कृत्वा तु समयं श्रीर्गोभिः सह भारत । पश्यन्तीनां ततस्तासां तत्रैवान्तरधीयत ॥

evaṃ kṛtvā tu samayaṃ śrīrgobhiḥ saha bhārata | paśyantīnāṃ tatastāsāṃ tatraivāntaradhīyata

हे भारत, गौओं के साथ यह समझौता करके श्री उनके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गईं।

श्लोक 27 (13.128.27)

एवं गोशकृतः पुत्र माहात्म्यं तेऽनुवर्णितम् । माहात्म्यं च गवां भूयः श्रूयतां गदतो मम ॥

evaṃ gośakṛtaḥ putra māhātmyaṃ te'nuvarṇitam | māhātmyaṃ ca gavāṃ bhūyaḥ śrūyatāṃ gadato mama

इस प्रकार, पुत्र, मैंने तुम्हें गोबर का माहात्म्य बता दिया। अब गौओं का माहात्म्य फिर सुनो, मैं बताता हूँ।

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