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अनुशासन पर्व · अध्याय 130

सुवर्ण की उत्पत्ति और उसके दान का माहात्म्य

युधिष्ठिर पूछते हैं कि सुवर्ण सर्वोत्तम दक्षिणा और पावन करने वाला क्यों है। भीष्म बताते हैं कि श्राद्ध में हाथ को पिण्ड न देकर कुशों पर पिण्ड रखने के बाद स्वप्न में उनके पितरों ने उन्हें सुवर्ण-दान की प्रेरणा दी। फिर वे परशुराम की कथा कहते हैं, जो अश्वमेध के बाद भी शुद्ध नहीं हुए थे और जिन्हें वसिष्ठ ने बताया कि सुवर्ण अग्नि और सोम से बना है। इसके बाद रुद्र के तेज और रुद्राणी के शाप की वह कथा आरम्भ होती है जिससे सुवर्ण का जन्म हुआ।

अध्याय 129अध्याय-सूचीअध्याय 131

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.130.1)

उक्तं पितामहेनेदं गवां दानमनुत्तमम् । विशेषेण नरेन्द्राणामिह धर्ममवेक्षताम् ॥

uktaṃ pitāmahenedaṃ gavāṃ dānamanuttamam | viśeṣeṇa narendrāṇāmiha dharmamavekṣatām

पितामह, आपने गोदान को सर्वोत्तम दान बताया है, विशेषकर उन राजाओं के लिए जो इस लोक में धर्म का ध्यान रखते हैं।

श्लोक 2 (13.130.2)

राज्यं हि सततं दुःखमाश्रमाश्च सुदुर्विदाः । परिचारेषु वै दुःखं दुर्धरं चाकृतात्मभिः । भूयिष्ठं च नरेन्द्राणां विद्यते न शुभा गतिः ॥

rājyaṃ hi satataṃ duḥkhamāśramāśca sudurvidāḥ | paricāreṣu vai duḥkhaṃ durdharaṃ cākṛtātmabhiḥ | bhūyiṣṭhaṃ ca narendrāṇāṃ vidyate na śubhā gatiḥ

राज्य सदा दुःखरूप है, और आश्रमों के धर्म समझने में अत्यन्त कठिन हैं। सेवा-परिचर्या में भी दुःख है, जिसे अशिक्षित मन वाले सहन नहीं कर पाते। और राजाओं की प्रायः शुभ गति नहीं होती।

श्लोक 3 (13.130.3)

पूयन्ते तत्र नियतं प्रयच्छन्तो वसुन्धराम् । सर्वे च कथिता धर्मास्त्वया मे कुरुनन्दन ॥

pūyante tatra niyataṃ prayacchanto vasundharām | sarve ca kathitā dharmāstvayā me kurunandana

फिर भी पृथ्वी का दान करने वाले राजा उसी स्थिति में निश्चय ही शुद्ध हो जाते हैं। और हे कुरुनन्दन, आपने मुझे सभी धर्म बता दिए हैं।

श्लोक 4 (13.130.4)

एवमेव गवामुक्तं प्रदानं ते नृगेण ह । ऋषिणा नाचिकेतेन पूर्वमेव निदर्शितम् ॥

evameva gavāmuktaṃ pradānaṃ te nṛgeṇa ha | ṛṣiṇā nāciketena pūrvameva nidarśitam

इसी प्रकार नृग के उदाहरण के साथ गोदान का वर्णन किया गया है, और बहुत पहले ऋषि नाचिकेत ने भी इसे दिखाया था।

श्लोक 5 (13.130.5)

वेदोपनिषदे चैव सर्वकर्मसु दक्षिणाः । सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टा भूमिर्गावोऽथ काञ्चनम् ॥

vedopaniṣade caiva sarvakarmasu dakṣiṇāḥ | sarvakratuṣu coddiṣṭā bhūmirgāvo'tha kāñcanam

वेद और उपनिषदों में, सभी कर्मों और सभी यज्ञों में दक्षिणा के रूप में भूमि, गौएँ और सुवर्ण का विधान किया गया है।

श्लोक 6 (13.130.6)

तत्र श्रुतिस्तु परमा सुवर्णं दक्षिणेति वै । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पितामह यथातथम् ॥

tatra śrutistu paramā suvarṇaṃ dakṣiṇeti vai | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ pitāmaha yathātatham

इनमें श्रुति का सर्वोत्तम वचन यही है कि सुवर्ण ही दक्षिणा है। पितामह, मैं इसे आपसे यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 7 (13.130.7)

किं सुवर्णं कथं जातं कस्मिन्काले किमात्मकम् । किंदैव किंफलं चैव कस्माच्च परमुच्यते ॥

kiṃ suvarṇaṃ kathaṃ jātaṃ kasminkāle kimātmakam | kiṃdaiva kiṃphalaṃ caiva kasmācca paramucyate

सुवर्ण क्या है? वह कैसे और किस काल में उत्पन्न हुआ? उसका स्वरूप क्या है? उसका देवता कौन है और फल क्या है? और उसे सर्वोत्तम क्यों कहा जाता है?

श्लोक 8 (13.130.8)

कस्माद्दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिणः । कस्माच्च दक्षिणार्थं तद्यज्ञकर्मसु शस्यते ॥

kasmāddānaṃ suvarṇasya pūjayanti manīṣiṇaḥ | kasmācca dakṣiṇārthaṃ tadyajñakarmasu śasyate

बुद्धिमान लोग सुवर्ण-दान का आदर क्यों करते हैं? और यज्ञ-कर्मों में दक्षिणा के रूप में उसकी प्रशंसा क्यों की जाती है?

श्लोक 9 (13.130.9)

कस्माच्च पावनं श्रेष्ठं भूमेर्गोभ्यश्च काञ्चनम् । परमं दक्षिणार्थे च तद्ब्रवीहि पितामह ॥

kasmācca pāvanaṃ śreṣṭhaṃ bhūmergobhyaśca kāñcanam | paramaṃ dakṣiṇārthe ca tadbravīhi pitāmaha

सुवर्ण भूमि और गौओं से भी श्रेष्ठ पावन करने वाला और दक्षिणा के रूप में सर्वोत्तम क्यों है? पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (13.130.10)

शृणु राजन्नवहितो बहुकारणविस्तरम् । जातरूपसमुत्पत्तिमनुभूतं च यन्मया ॥

śṛṇu rājannavahito bahukāraṇavistaram | jātarūpasamutpattimanubhūtaṃ ca yanmayā

राजन्, ध्यान से सुनो। अनेक कारणों का विस्तृत वर्णन और सुवर्ण की उत्पत्ति की वह कथा, जिसका मैंने स्वयं अनुभव किया है।

श्लोक 11 (13.130.11)

पिता मम महातेजाः शन्तनुर्निधनं गतः । तस्य दित्सुरहं श्राद्धं गङ्गाद्वारमुपागमम् ॥

pitā mama mahātejāḥ śantanurnidhanaṃ gataḥ | tasya ditsurahaṃ śrāddhaṃ gaṅgādvāramupāgamam

मेरे महातेजस्वी पिता शन्तनु का देहान्त हो गया था। उनका श्राद्ध करने की इच्छा से मैं गङ्गाद्वार गया।

श्लोक 12 (13.130.12)

तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् । माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत्तदा ॥

tatrāgamya pituḥ putra śrāddhakarma samārabham | mātā me jāhnavī cātra sāhāyyamakarottadā

वहाँ पहुँचकर मैंने, उनके पुत्र ने, पिता का श्राद्धकर्म आरम्भ किया, और उस समय मेरी माता जाह्नवी ने मेरी सहायता की।

श्लोक 13 (13.130.13)

तत्रागतांस्तपस्सिद्धानुपवेश्य बहूनृषीन् । तोयप्रदानात्प्रभृति कार्याण्यहमथारभम् ॥

tatrāgatāṃstapassiddhānupaveśya bahūnṛṣīn | toyapradānātprabhṛti kāryāṇyahamathārabham

वहाँ आए हुए तप से सिद्ध अनेक ऋषियों को मैंने बिठाया और जलदान से आरम्भ करके कर्मों को शुरू किया।

श्लोक 14 (13.130.14)

तत्समाप्य यथोद्दिष्टं पूर्वकर्म समाहितः । दातुं निर्वपणं सम्यग्यथावदहमारभम् ॥

tatsamāpya yathoddiṣṭaṃ pūrvakarma samāhitaḥ | dātuṃ nirvapaṇaṃ samyagyathāvadahamārabham

निर्दिष्ट पूर्वकर्म को एकाग्र मन से पूरा करके मैंने विधि के अनुसार भली-भाँति पिण्डदान आरम्भ किया।

श्लोक 15 (13.130.15)

ततस्तं दर्भविन्यासं भित्त्वा सुरुचिराङ्गदः । प्रलम्बाभरणो बाहुरुदतिष्ठद्विशाम्पते ॥

tatastaṃ darbhavinyāsaṃ bhittvā surucirāṅgadaḥ | pralambābharaṇo bāhurudatiṣṭhadviśāmpate

तब हे प्रजापालक, दर्भ के बिछाव को भेदकर एक भुजा ऊपर उठी, जो सुन्दर बाजूबन्दों और लटकते आभूषणों से सजी थी।

श्लोक 16 (13.130.16)

मुहूर्तमपि तं दृष्ट्वा परं विस्मयमागमम् । प्रतिग्रहीता साक्षान्मे पितेति भरतर्षभ ॥

muhūrtamapi taṃ dṛṣṭvā paraṃ vismayamāgamam | pratigrahītā sākṣānme piteti bharatarṣabha

उसे देखकर मैं क्षण भर के लिए अत्यन्त विस्मित हो गया। हे भरतश्रेष्ठ, ग्रहण करने वाले साक्षात् मेरे पिता ही थे।

श्लोक 17 (13.130.17)

ततो मे पुनरेवासीत्संज्ञा सञ्चिन्त्य शास्त्रतः । नायं वेदेषु विहितो विधिर्हस्त इति प्रभो । पिण्डो देयो नरेणेह ततो मतिरभून्मम ॥

tato me punarevāsītsaṃjñā sañcintya śāstrataḥ | nāyaṃ vedeṣu vihito vidhirhasta iti prabho | piṇḍo deyo nareṇeha tato matirabhūnmama

तब मुझे फिर चेतना आई और मैंने शास्त्र का विचार किया। "हे प्रभो, वेदों में हाथ के लिए कोई विधान नहीं है; यहाँ मनुष्य को पिण्ड देना चाहिए।" ऐसा मेरे मन में निश्चय हुआ।

श्लोक 18 (13.130.18)

साक्षान्नेह मनुष्यस्य पिण्डं हि पितरः क्वचित् । गृह्णन्ति विहितं चेत्थं पिण्डो देयः कुशेष्विति ॥

sākṣānneha manuṣyasya piṇḍaṃ hi pitaraḥ kvacit | gṛhṇanti vihitaṃ cetthaṃ piṇḍo deyaḥ kuśeṣviti

"पितर कभी साक्षात् आकर मनुष्य का पिण्ड ग्रहण नहीं करते; विधान यही है कि पिण्ड कुशों पर रखा जाए।"

श्लोक 19 (13.130.19)

ततोऽहं तदनादृत्य पितुर्हस्तनिदर्शनम् । शास्त्रप्रामाण्यसूक्ष्मं तु विधिं पिण्डस्य संस्मरन् ॥

tato'haṃ tadanādṛtya piturhastanidarśanam | śāstraprāmāṇyasūkṣmaṃ tu vidhiṃ piṇḍasya saṃsmaran

इसलिए पिता के हाथ के उस दर्शन की उपेक्षा करके मैंने शास्त्र के प्रमाण पर आधारित पिण्ड-विधि के सूक्ष्म नियम को स्मरण किया।

श्लोक 20 (13.130.20)

ततो दर्भेषु तत्सर्वमददं भरतर्षभ । शास्त्रमार्गानुसारेण तद्विद्धि मनुजर्षभ ॥

tato darbheṣu tatsarvamadadaṃ bharatarṣabha | śāstramārgānusāreṇa tadviddhi manujarṣabha

तब हे भरतश्रेष्ठ, मैंने शास्त्र-मार्ग के अनुसार वह सब दर्भों पर रख दिया। हे नरश्रेष्ठ, इसे जान लो।

श्लोक 21 (13.130.21)

ततः सोऽन्तर्हितो बाहुः पितुर्मम जनाधिप । ततो मां दर्शयामासुः स्वप्नान्ते पितरस्तथा ॥

tataḥ so'ntarhito bāhuḥ piturmama janādhipa | tato māṃ darśayāmāsuḥ svapnānte pitarastathā

हे नरेश्वर, तब मेरे पिता की वह भुजा अदृश्य हो गई, और उसके बाद स्वप्न के अन्त में पितर मुझे दिखाई दिए।

श्लोक 22 (13.130.22)

प्रीयमाणास्तु मामूचुः प्रीताः स्म भरतर्षभ । विज्ञानेन तवानेन यन्न मुह्यसि धर्मतः ॥

prīyamāṇāstu māmūcuḥ prītāḥ sma bharatarṣabha | vijñānena tavānena yanna muhyasi dharmataḥ

प्रसन्न होकर उन्होंने मुझसे कहा, "हे भरतश्रेष्ठ, हम तुमसे संतुष्ट हैं; तुम्हारे इस विवेक से कि तुम धर्म के विषय में मोहित नहीं होते।

पितर ऊचुः

श्लोक 23 (13.130.23)

त्वया हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव । आत्मा धर्मः श्रुतं वेदाः पितरश्चर्षिभिः सह ॥

tvayā hi kurvatā śāstraṃ pramāṇamiha pārthiva | ātmā dharmaḥ śrutaṃ vedāḥ pitaraścarṣibhiḥ saha

हे राजन्, शास्त्र का पालन करते हुए तुमने यहाँ आत्मा, धर्म, श्रुति, वेद, और ऋषियों सहित पितरों को अपना प्रमाण माना है।

श्लोक 24 (13.130.24)

साक्षात्पितामहो ब्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापतिः । प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्च न विचालिताः ॥

sākṣātpitāmaho brahmā guravo'tha prajāpatiḥ | pramāṇamupanītā vai sthitāśca na vicālitāḥ

स्वयं पितामह ब्रह्मा, गुरुजन और प्रजापति को प्रमाण के रूप में सामने रखा गया है, और वे अटल खड़े हैं।

श्लोक 25 (13.130.25)

तदिदं सम्यगारब्धं त्वयाऽद्य भरतर्षभ । किन्तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्णं दीयतामिति ॥

tadidaṃ samyagārabdhaṃ tvayā'dya bharatarṣabha | kintu bhūmergavāṃ cārthe suvarṇaṃ dīyatāmiti

हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार तुमने आज जो आरम्भ किया है, वह सर्वथा उचित है। किन्तु भूमि और गौओं के दान के साथ सुवर्ण भी दिया जाए।

श्लोक 26 (13.130.26)

एवं वयं च धर्मश्च सर्वे चास्मत्पितामहाः । पाविता वै भविष्यन्ति पावनं हि परं हि तत् ॥

evaṃ vayaṃ ca dharmaśca sarve cāsmatpitāmahāḥ | pāvitā vai bhaviṣyanti pāvanaṃ hi paraṃ hi tat

इस प्रकार हम, धर्म और हमारे सभी पूर्वज पवित्र हो जाएँगे, क्योंकि वह सबसे बड़ा पावन करने वाला है।

भीष्म उवाच

श्लोक 27 (13.130.27)

दश पूर्वान्दशैवान्यांस्तथा सन्तारयन्ति ते । सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति एवं मत्पितरोऽब्रुवन् ॥

daśa pūrvāndaśaivānyāṃstathā santārayanti te | suvarṇaṃ ye prayacchanti evaṃ matpitaro'bruvan

"जो लोग सुवर्ण का दान करते हैं, वे दस पूर्वजों को और दस अन्य को भी तार देते हैं।" इस प्रकार मेरे पितरों ने कहा।

श्लोक 28 (13.130.28)

ततोऽहं विस्मितो राजन्प्रतिबुद्धो विशाम्पते । सुवर्णदानेऽकरवं मतिं च भरतर्षभ ॥

tato'haṃ vismito rājanpratibuddho viśāmpate | suvarṇadāne'karavaṃ matiṃ ca bharatarṣabha

तब हे राजन्, हे प्रजापालक, मैं विस्मित होकर जाग उठा, और हे भरतश्रेष्ठ, मैंने सुवर्ण-दान में अपना मन लगाया।

श्लोक 29 (13.130.29)

इतिहासमिमं चापि शृणु राजन्पुरातनम् । जामदग्न्यं प्रति विभो धन्यमायुष्यमेव च ॥

itihāsamimaṃ cāpi śṛṇu rājanpurātanam | jāmadagnyaṃ prati vibho dhanyamāyuṣyameva ca

हे राजन्, जमदग्नि के पुत्र से सम्बन्धित यह प्राचीन इतिहास भी सुनो; हे विभो, यह पुण्यदायक और आयु बढ़ाने वाला है।

श्लोक 30 (13.130.30)

जामदग्न्येन रामेण तीव्ररोषान्वितेन वै । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा ॥

jāmadagnyena rāmeṇa tīvraroṣānvitena vai | triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivī kṛtā niḥkṣatriyā purā

पूर्वकाल में जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने तीव्र क्रोध से भरकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया था।

श्लोक 31 (13.130.31)

ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचनः । आजहार क्रतुं वीरो ब्रह्मक्षत्रेण पूजितम् ॥

tato jitvā mahīṃ kṛtsnāṃ rāmo rājīvalocanaḥ | ājahāra kratuṃ vīro brahmakṣatreṇa pūjitam

तब सारी पृथ्वी को जीतकर कमलनयन वीर परशुराम ने एक ऐसा यज्ञ किया, जिसका ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों आदर करते हैं।

श्लोक 32 (13.130.32)

वाजिमेधं महाराज सर्वकामसमन्वितम् । पावनं सर्वभूतानां तेजोद्युतिविवर्धनम् ॥

vājimedhaṃ mahārāja sarvakāmasamanvitam | pāvanaṃ sarvabhūtānāṃ tejodyutivivardhanam

हे महाराज, वह अश्वमेध यज्ञ था, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करता है, सब प्राणियों को पवित्र करता है और तेज तथा कान्ति को बढ़ाता है।

श्लोक 33 (13.130.33)

विपाप्मा च स तेजस्वी तेन क्रतुफलेन च । नैवात्मनोऽथ लघुतां जामदग्न्योऽध्यगच्छत ॥

vipāpmā ca sa tejasvī tena kratuphalena ca | naivātmano'tha laghutāṃ jāmadagnyo'dhyagacchata

उस यज्ञ के फल से वह तेजस्वी पाप से मुक्त हो गया था, फिर भी जमदग्नि-पुत्र ने अपने भीतर हल्कापन नहीं पाया।

श्लोक 34 (13.130.34)

स तु क्रतुवरेणेष्ट्वा महात्मा दक्षिणावता । पप्रच्छागमसम्पन्नानृषीन्देवांश्च भारत ॥

sa tu kratuvareṇeṣṭvā mahātmā dakṣiṇāvatā | papracchāgamasampannānṛṣīndevāṃśca bhārata

हे भारत, दक्षिणाओं से युक्त उस श्रेष्ठ यज्ञ को सम्पन्न करके उस महात्मा ने शास्त्र के ज्ञाता ऋषियों और देवताओं से पूछा।

श्लोक 35 (13.130.35)

पावनं यत्परं नॄणामुग्रे कर्मणि वर्तताम् । तदुच्यतां महाभागा इति जातघृणोऽब्रवीत् ॥

pāvanaṃ yatparaṃ nṝṇāmugre karmaṇi vartatām | taducyatāṃ mahābhāgā iti jātaghṛṇo'bravīt

"हे महाभाग, उग्र कर्म में लगे हुए मनुष्यों के लिए सबसे बड़ा पावन करने वाला साधन क्या है, यह बताइए।" ग्लानि से भरे हुए परशुराम ने ऐसा कहा।

श्लोक 36 (13.130.36)

इत्युक्ता वेदशास्त्रज्ञास्तमूचुस्ते महर्षयः । राम विप्राः सत्क्रियन्तां वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥

ityuktā vedaśāstrajñāstamūcuste maharṣayaḥ | rāma viprāḥ satkriyantāṃ vedaprāmāṇyadarśanāt

ऐसा कहे जाने पर वेद-शास्त्र के ज्ञाता उन महर्षियों ने उनसे कहा, "राम, ब्राह्मणों का सत्कार करो, क्योंकि वेद का प्रमाण स्पष्ट दिखाई देता है।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 37 (13.130.37)

भूयश्च विप्रर्षिगणाः प्रष्टव्याः पावनं प्रति । ते यद्ब्रूयुर्महाप्राज्ञास्तच्चैव समुदाचर ॥

bhūyaśca viprarṣigaṇāḥ praṣṭavyāḥ pāvanaṃ prati | te yadbrūyurmahāprājñāstaccaiva samudācara

और पावन करने वाले साधन के विषय में ब्राह्मण-ऋषियों के समुदायों से भी पूछना चाहिए। वे महाबुद्धिमान जो कहें, वही करो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 38 (13.130.38)

ततो वसिष्ठं देवर्षिमगस्त्यमथ काश्यपम् । तमेवार्तं महातेजाः पप्रच्छ भृगुनन्दनः ॥

tato vasiṣṭhaṃ devarṣimagastyamatha kāśyapam | tamevārtaṃ mahātejāḥ papraccha bhṛgunandanaḥ

तब महातेजस्वी भृगुवंशी ने उसी चिन्ता से व्याकुल होकर देवर्षि वसिष्ठ, अगस्त्य और कश्यप से पूछा।

राम उवाच

श्लोक 39 (13.130.39)

जाता मतिर्मे विप्रेन्द्राः कथं पूयेयमित्युत । केन वा कर्मयोगेन प्रदानेनेह केन वा ॥

jātā matirme viprendrāḥ kathaṃ pūyeyamityuta | kena vā karmayogena pradāneneha kena vā

"हे विप्रश्रेष्ठो, मेरे मन में यह विचार उठा है कि मैं कैसे पवित्र होऊँ? किस कर्म से अथवा किस दान से यह होगा?

श्लोक 40 (13.130.40)

यदि वोऽनुग्रहकृता बुद्धिर्मां प्रति सत्तमाः । प्रब्रूत पावनं किं मे भवेदिति तपोधनाः ॥

yadi vo'nugrahakṛtā buddhirmāṃ prati sattamāḥ | prabrūta pāvanaṃ kiṃ me bhavediti tapodhanāḥ

हे श्रेष्ठजनो, यदि आपकी बुद्धि मुझ पर कृपा करने वाली है, तो हे तपोधनो, बताइए कि मेरे लिए पावन करने वाला साधन क्या होगा।"

ऋषय ऊचुः

श्लोक 41 (13.130.41)

गाश्च भूमिं च वित्तं च दत्त्वेह भृगुनन्दन । पापकृत्पूयते मर्त्य इति भार्गव शुश्रुम ॥

gāśca bhūmiṃ ca vittaṃ ca dattveha bhṛgunandana | pāpakṛtpūyate martya iti bhārgava śuśruma

"हे भृगुनन्दन, गौएँ, भूमि और धन का दान करके पापी मनुष्य भी शुद्ध हो जाता है। हे भार्गव, हमने ऐसा सुना है।

श्लोक 42 (13.130.42)

अन्यद्दानं तु विप्रर्षे श्रूयतां पावनं महत् । दिव्यमत्यद्भुताकारमपत्यं जातवेदसः ॥

anyaddānaṃ tu viprarṣe śrūyatāṃ pāvanaṃ mahat | divyamatyadbhutākāramapatyaṃ jātavedasaḥ

हे विप्रर्षि, एक और दान के विषय में सुनिए, जो महान् पावन करने वाला है: अग्नि की वह दिव्य और अत्यन्त अद्भुत सन्तान।

श्लोक 43 (13.130.43)

दग्ध्वा लोकान्पुरा वीर्यात्सम्भूतमिह शुश्रुम । सुवर्णमिति विख्यातं तद्ददत्सिद्धिमेष्यसि ॥

dagdhvā lokānpurā vīryātsambhūtamiha śuśruma | suvarṇamiti vikhyātaṃ taddadatsiddhimeṣyasi

हमने सुना है कि पूर्वकाल में अग्नि ने अपने बल से लोकों को जलाकर उसे उत्पन्न किया। वह सुवर्ण के नाम से प्रसिद्ध है। उसका दान करके तुम सिद्धि पाओगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 44 (13.130.44)

ततोऽब्रवीद्वसिष्ठस्तं भगवान्संशितव्रतः । शृणु राम यथोत्पन्नं सुवर्णमनलप्रभम् ॥

tato'bravīdvasiṣṭhastaṃ bhagavānsaṃśitavrataḥ | śṛṇu rāma yathotpannaṃ suvarṇamanalaprabham

तब दृढ़ व्रत वाले भगवान् वसिष्ठ ने उनसे कहा, "राम, सुनो कि अग्नि के समान प्रभा वाला सुवर्ण कैसे उत्पन्न हुआ।

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 45 (13.130.45)

फलं दास्यति ते यत्तु दाने परमिहोच्यते । सुवर्णं यच्च यस्माच्च यथा च गुणवत्तमम् ॥

phalaṃ dāsyati te yattu dāne paramihocyate | suvarṇaṃ yacca yasmācca yathā ca guṇavattamam

दान में सुवर्ण तुम्हें जो परम फल देगा, सुवर्ण क्या है, किससे उत्पन्न हुआ है और किस प्रकार सबसे अधिक गुणवान है,

श्लोक 46 (13.130.46)

तन्निबोध महाबाहो सर्वं निगदतो मम । अग्निषोमात्मकमिदं सुवर्णं विद्धि निश्चये ॥

tannibodha mahābāho sarvaṃ nigadato mama | agniṣomātmakamidaṃ suvarṇaṃ viddhi niścaye

यह सब मेरे कहने पर सुनो, हे महाबाहो। निश्चय जानो कि यह सुवर्ण अग्नि और सोम से बना है।

श्लोक 47 (13.130.47)

अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्व इति दर्शनम् । कुञ्जराश्च मृगा नागा महिषाश्चासुरा इति ॥

ajo'gnirvaruṇo meṣaḥ sūryo'śva iti darśanam | kuñjarāśca mṛgā nāgā mahiṣāścāsurā iti

बकरा अग्नि है, मेढ़ा वरुण है, घोड़ा सूर्य है, ऐसा दर्शन है। हाथी, मृग, सर्प और भैंसे असुर हैं,

श्लोक 48 (13.130.48)

कुक्कुटाश्च वराहाश्च राक्षसा भृगुनन्दन । इडा गावः पयः सोमो भूमिरित्येव च स्मृतिः ॥

kukkuṭāśca varāhāśca rākṣasā bhṛgunandana | iḍā gāvaḥ payaḥ somo bhūmirityeva ca smṛtiḥ

और हे भृगुनन्दन, मुर्गे और सूअर राक्षस हैं। इडा, गौएँ, दूध, सोम और भूमि: ऐसी स्मृति है।

श्लोक 49 (13.130.49)

जगत्सर्वं च निर्मथ्य तेजोराशिः समुत्थितः । सुवर्णमेभ्यो विप्रर्षे रत्नं परममुत्तमम् ॥

jagatsarvaṃ ca nirmathya tejorāśiḥ samutthitaḥ | suvarṇamebhyo viprarṣe ratnaṃ paramamuttamam

सारे जगत् का मन्थन करने पर तेज की एक राशि उठी। हे विप्रर्षि, इन्हीं से सुवर्ण उत्पन्न हुआ, जो सबसे उत्तम और श्रेष्ठ रत्न है।

श्लोक 50 (13.130.50)

एतस्मात्कारणाद्देवा गन्धर्वोरगराक्षसाः । मनुष्याश्च पिशाचाश्च प्रयता धारयन्ति तत् ॥

etasmātkāraṇāddevā gandharvoragarākṣasāḥ | manuṣyāśca piśācāśca prayatā dhārayanti tat

इसी कारण देवता, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, मनुष्य और पिशाच श्रद्धापूर्वक उसे धारण करते हैं।

श्लोक 51 (13.130.51)

मुकुटैरङ्गदयुतैरलङ्कारैः पृथग्विधैः । सुवर्णविकृतैस्तत्र विराजन्ते भृगूत्तम ॥

mukuṭairaṅgadayutairalaṅkāraiḥ pṛthagvidhaiḥ | suvarṇavikṛtaistatra virājante bhṛgūttama

हे भृगुश्रेष्ठ, वे मुकुटों, बाजूबन्दों और सोने से बने नाना प्रकार के आभूषणों से वहाँ शोभित होते हैं।

श्लोक 52 (13.130.52)

तस्मात्सर्वपवित्रेभ्यः पवित्रं परमं स्मृतम् । भूमेर्गोभ्योऽथ रत्नेभ्यस्तद्विद्धि मनुजर्षभ ॥

tasmātsarvapavitrebhyaḥ pavitraṃ paramaṃ smṛtam | bhūmergobhyo'tha ratnebhyastadviddhi manujarṣabha

इसलिए सब पवित्र करने वालों में उसे सर्वोत्तम पावन माना गया है, भूमि, गौओं और रत्नों से भी बढ़कर। हे नरश्रेष्ठ, इसे जानो।

श्लोक 53 (13.130.53)

पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किञ्चन । विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं विभो ॥

pṛthivīṃ gāśca dattveha yaccānyadapi kiñcana | viśiṣyate suvarṇasya dānaṃ paramakaṃ vibho

हे विभो, पृथ्वी, गौएँ और अन्य कुछ भी देने के बाद भी सुवर्ण का दान सबसे विशिष्ट और श्रेष्ठ है।

श्लोक 54 (13.130.54)

अक्षयं पावनं चैव सुवर्णममरद्युते । प्रयच्छ द्विजमुख्येभ्यः पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥

akṣayaṃ pāvanaṃ caiva suvarṇamamaradyute | prayaccha dvijamukhyebhyaḥ pāvanaṃ hyetaduttamam

हे देवों के समान कान्ति वाले, सुवर्ण अक्षय और पावन करने वाला है। इसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दो, क्योंकि यही सबसे उत्तम पावन करने वाला है।

श्लोक 55 (13.130.55)

सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते । सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत ॥

suvarṇameva sarvāsu dakṣiṇāsu vidhīyate | suvarṇaṃ ye prayacchanti sarvadāste bhavantyuta

सभी दक्षिणाओं में सुवर्ण का ही विधान किया गया है। जो सुवर्ण देते हैं, वे सब कुछ देने वाले हो जाते हैं।

श्लोक 56 (13.130.56)

देवतास्ते प्रयच्छन्ति ये सुवर्णं ददत्यथ । अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम् ॥

devatāste prayacchanti ye suvarṇaṃ dadatyatha | agnirhi devatāḥ sarvāḥ suvarṇaṃ ca tadātmakam

जो सुवर्ण का दान करते हैं, वे देवताओं का ही दान करते हैं, क्योंकि अग्नि ही सब देवता हैं और सुवर्ण उन्हीं के स्वरूप का है।

श्लोक 57 (13.130.57)

तस्मात्सुवर्णं ददता दत्ताः सर्वाः स्म देवताः । भवन्ति पुरुषव्याघ्र न ह्यतः परमं विदुः ॥

tasmātsuvarṇaṃ dadatā dattāḥ sarvāḥ sma devatāḥ | bhavanti puruṣavyāghra na hyataḥ paramaṃ viduḥ

इसलिए, हे पुरुषव्याघ्र, सुवर्ण देने वाले ने सभी देवताओं को दे दिया। इससे बढ़कर कुछ नहीं जाना जाता।

श्लोक 58 (13.130.58)

भूय एव च महात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे । गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतांवर ॥

bhūya eva ca mahātmyaṃ suvarṇasya nibodha me | gadato mama viprarṣe sarvaśastrabhṛtāṃvara

हे विप्रर्षि, हे सभी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, मैं सुवर्ण की महिमा और भी कहता हूँ; उसे मुझसे सुनो।

श्लोक 59 (13.130.59)

मया श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन । प्रजापतेः कथयतो मनोः स्वायंभुवस्य वै ॥

mayā śrutamidaṃ pūrvaṃ purāṇe bhṛgunandana | prajāpateḥ kathayato manoḥ svāyaṃbhuvasya vai

हे भृगुनन्दन, मैंने इसे बहुत पहले पुराण में सुना था, जब प्रजापति स्वायम्भुव मनु इसे सुना रहे थे।

श्लोक 60 (13.130.60)

शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मनः । गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भृगुकुलोद्वह ॥

śūlapāṇerbhagavato rudrasya ca mahātmanaḥ | girau himavati śreṣṭhe tadā bhṛgukulodvaha

हे भृगुकुल के वंशज, वह त्रिशूलधारी महात्मा भगवान् रुद्र के विषय में था, जब वे पर्वतश्रेष्ठ हिमालय पर थे।

श्लोक 61 (13.130.61)

देव्या विवाहे निर्वृत्ते रुद्राण्या भृगुनन्दन । समागमे भगवतो देव्या सह महात्मनः ॥

devyā vivāhe nirvṛtte rudrāṇyā bhṛgunandana | samāgame bhagavato devyā saha mahātmanaḥ

हे भृगुनन्दन, जब देवी रुद्राणी के साथ विवाह सम्पन्न हो गया और महात्मा भगवान् देवी के साथ मिलन में थे,

श्लोक 62 (13.130.62)

ततः सर्वे समुद्विग्ना देवा रुद्रमुपागमन् । ते महादेवमासीनं देवीं च वरदामुमाम् ॥

tataḥ sarve samudvignā devā rudramupāgaman | te mahādevamāsīnaṃ devīṃ ca varadāmumām

तब सभी देवता अत्यन्त घबराकर रुद्र के पास आए, जहाँ महादेव और वर देने वाली देवी उमा बैठे थे।

श्लोक 63 (13.130.63)

प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भृगूद्वह । अयं समागमो देव देव्या सह तवानघ ॥

prasādya śirasā sarve rudramūcurbhṛgūdvaha | ayaṃ samāgamo deva devyā saha tavānagha

हे भृगुवंशी, सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके सबने रुद्र से कहा, "हे निष्पाप देव, देवी के साथ आपका यह मिलन,

देवा ऊचुः

श्लोक 64 (13.130.64)

तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्याऽतितेजसः । अमोघतेजास्त्वं देव देवी चेयमुमा तथा ॥

tapasvinastapasvinyā tejasvinyā'titejasaḥ | amoghatejāstvaṃ deva devī ceyamumā tathā

एक तपस्वी का तपस्विनी के साथ, अत्यन्त तेजस्वी का तेजस्विनी के साथ। हे देव, आपका तेज अमोघ है, और इसी प्रकार इन देवी उमा का भी।

श्लोक 65 (13.130.65)

अपत्यं युवयोर्देव बलवद्भविता विभो । तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषयिष्यति ॥

apatyaṃ yuvayordeva balavadbhavitā vibho | tannūnaṃ triṣu lokeṣu na kiñciccheṣayiṣyati

हे प्रभो, आप दोनों की सन्तान अत्यन्त बलवान होगी, और निश्चय ही वह तीनों लोकों में कुछ भी शेष नहीं छोड़ेगी।

श्लोक 66 (13.130.66)

तदेभ्यः प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्यः पृथुलोचन । वरं प्रयच्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया ॥

tadebhyaḥ praṇatebhyastvaṃ devebhyaḥ pṛthulocana | varaṃ prayaccha lokeśa trailokyahitakāmyayā

इसलिए हे विशाल नेत्रों वाले लोकेश, आपके सामने झुके हुए इन देवताओं को तीनों लोकों के कल्याण की इच्छा से वर दीजिए।

श्लोक 67 (13.130.67)

अपत्यार्थं निगृह्णीष्व तेजः परमकं विभो । त्रैलोक्यसारौ हि युवां लोकं सन्तापयिष्यथ ॥

apatyārthaṃ nigṛhṇīṣva tejaḥ paramakaṃ vibho | trailokyasārau hi yuvāṃ lokaṃ santāpayiṣyatha

हे विभो, सन्तान के विषय में अपने परम तेज को रोक लीजिए। आप दोनों तीनों लोकों के सार हैं और संसार को सन्तप्त कर देंगे।

श्लोक 68 (13.130.68)

तदपत्यं हि युवयोर्देवानभिभवेद्ध्रुवम् । न हि ते पृथिवी देवी न च द्यौर्न दिवं विभो ॥

tadapatyaṃ hi yuvayordevānabhibhaveddhruvam | na hi te pṛthivī devī na ca dyaurna divaṃ vibho

आप दोनों की सन्तान निश्चय ही देवताओं को परास्त कर देगी। हे प्रभो, न देवी पृथ्वी, न आकाश, न स्वर्ग ही,

श्लोक 69 (13.130.69)

नेदं धारयितुं शक्ताः समस्ता इति मे मतिः । तेजःप्रभावनिर्दग्धं तस्मात्सर्वमिदं जगत् ॥

nedaṃ dhārayituṃ śaktāḥ samastā iti me matiḥ | tejaḥprabhāvanirdagdhaṃ tasmātsarvamidaṃ jagat

सब मिलकर भी इसे सहन करने में समर्थ नहीं हैं, ऐसा हमारा मत है। उस तेज के प्रभाव से यह सारा जगत् जल जाएगा।

श्लोक 70 (13.130.70)

तस्मात्प्रसादं भगवन्कर्तुमर्हसि नः प्रभो । न देव्यां सम्भवेत्पुत्रो भवतः सुरसत्तम । धैर्यादेव निगृह्णीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम् ॥

tasmātprasādaṃ bhagavankartumarhasi naḥ prabho | na devyāṃ sambhavetputro bhavataḥ surasattama | dhairyādeva nigṛhṇīṣva tejo jvalitamuttamam

इसलिए हे भगवन्, आप हम पर कृपा करें। हे सुरश्रेष्ठ, देवी से आपका पुत्र उत्पन्न न हो। अपने धैर्य से ही उस प्रज्वलित परम तेज को रोक लीजिए।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 71 (13.130.71)

इति तेषां कथयतां भगवान्वृषभध्वजः । एवमस्त्विति देवांस्तान्विप्रर्षे प्रत्यभाषत ॥

iti teṣāṃ kathayatāṃ bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ | evamastviti devāṃstānviprarṣe pratyabhāṣata

हे विप्रर्षि, जब वे यह कह ही रहे थे, तब वृषभ-ध्वज भगवान् ने उन देवताओं से कहा, "ऐसा ही हो।"

श्लोक 72 (13.130.72)

इत्युक्त्वा चोर्ध्वमनयद्रेतो वृषभवाहनः । ऊर्ध्वरेषः समभवत्ततः प्रभृति चापि सः ॥

ityuktvā cordhvamanayadreto vṛṣabhavāhanaḥ | ūrdhvareṣaḥ samabhavattataḥ prabhṛti cāpi saḥ

यह कहकर वृषभवाहन ने अपने तेज को ऊपर की ओर लौटा दिया, और तभी से वे ऊर्ध्वरेता हो गए।

श्लोक 73 (13.130.73)

रुद्राणीति ततः क्रुद्धा प्रजोच्छेदे तदा कृते । देवानथाब्रवीत्तत्र स्त्रीभावात्परुषं वचः ॥

rudrāṇīti tataḥ kruddhā prajocchede tadā kṛte | devānathābravīttatra strībhāvātparuṣaṃ vacaḥ

तब सन्तान के उच्छेद से क्रुद्ध रुद्राणी ने स्त्री-स्वभाव के कारण देवताओं से कठोर वचन कहे।

उमोवाच

श्लोक 74 (13.130.74)

यस्मादपत्यकामो वै भर्ता मे विनिवर्तितः । तस्मात्सर्वे सुरा यूयमनपत्या भविष्यथ ॥

yasmādapatyakāmo vai bhartā me vinivartitaḥ | tasmātsarve surā yūyamanapatyā bhaviṣyatha

"चूँकि सन्तान की इच्छा रखने वाले मेरे पति को तुमने रोक दिया, इसलिए तुम सब देवता सन्तानहीन हो जाओगे।

श्लोक 75 (13.130.75)

प्रजोच्छेदो मम कृतो यस्माद्युष्माभिरद्य वै । तस्मात्प्रजा वः खगमाः सर्वेषां न भविष्यति ॥

prajocchedo mama kṛto yasmādyuṣmābhiradya vai | tasmātprajā vaḥ khagamāḥ sarveṣāṃ na bhaviṣyati

चूँकि आज तुमने मेरी सन्तान का उच्छेद कराया है, इसलिए हे आकाशचारियो, तुम सबकी सन्तान नहीं होगी।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 76 (13.130.76)

पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्वह । देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्ततोऽभवन् ॥

pāvakastu na tatrāsīcchāpakāle bhṛgūdvaha | devā devyāstathā śāpādanapatyāstato'bhavan

हे भृगुनन्दन, शाप के समय अग्नि वहाँ नहीं थे। इस प्रकार देवी के शाप से देवता सन्तानहीन हो गए।

श्लोक 77 (13.130.77)

रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा । प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात्किंचित्तत्रापतद्भुवि ॥

rudrastu tejo'pratimaṃ dhārayāmāsa vai tadā | praskannaṃ tu tatastasmātkiṃcittatrāpatadbhuvi

रुद्र ने उस समय अपने अनुपम तेज को धारण किए रखा, फिर भी उससे कुछ अंश छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 78 (13.130.78)

उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम् । तेजस्तेजसि संयुक्तमेकयोनित्वमागतम् ॥

utpapāta tadā vahnau vavṛdhe cādbhutopamam | tejastejasi saṃyuktamekayonitvamāgatam

वह उस समय उछलकर अग्नि में जा पड़ा और अद्भुत रूप से बढ़ने लगा। तेज तेज से मिलकर एक ही उत्पत्ति वाला हो गया।

श्लोक 79 (13.130.79)

एतस्मिन्नेव काले तु देवाः शक्रपुरोगमाः । असुरस्तारको नाम तेन सन्तापिता भृशम् ॥

etasminneva kāle tu devāḥ śakrapurogamāḥ | asurastārako nāma tena santāpitā bhṛśam

उसी समय इन्द्र आदि देवता तारक नामक असुर से अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे।

श्लोक 80 (13.130.80)

आदित्या वसवो रुद्रा मरुतोऽथाश्विनावपि । साध्याश्च सर्वे संत्रस्ता दैतेयस्य पराक्रमात् ॥

ādityā vasavo rudrā maruto'thāśvināvapi | sādhyāśca sarve saṃtrastā daiteyasya parākramāt

आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार और साध्य, सभी उस दैत्य के पराक्रम से भयभीत हो गए।

श्लोक 81 (13.130.81)

स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च । ऋषीणां चाश्रमाश्चैव बभूवुरसुरैर्हृताः ॥

sthānāni devatānāṃ hi vimānāni purāṇi ca | ṛṣīṇāṃ cāśramāścaiva babhūvurasurairhṛtāḥ

देवताओं के स्थान, विमान और नगर, तथा ऋषियों के आश्रम, सब असुरों ने छीन लिए थे।

श्लोक 82 (13.130.82)

ते दीनमनसः सर्वे देवता ऋषयश्च ये । प्रजग्मुः शरणं देवं ब्रह्माणमजरं विभुम् ॥

te dīnamanasaḥ sarve devatā ṛṣayaśca ye | prajagmuḥ śaraṇaṃ devaṃ brahmāṇamajaraṃ vibhum

दीन मन वाले वे सभी देवता और ऋषि अजर और सर्वव्यापी देव ब्रह्मा की शरण में गए।

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