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अनुशासन पर्व · अध्याय 131

सुवर्ण की उत्पत्ति: अग्नि, गङ्गा और स्कन्द

वसिष्ठ परशुराम को सुवर्ण की उत्पत्ति सुनाते हैं। तारक असुर से पीड़ित देवता ब्रह्मा के पास जाते हैं, जो बताते हैं कि देवी के सन्तानहीनता वाले शाप के समय अनुपस्थित रहा अग्नि ही उस पुत्र को उत्पन्न करेगा जो तारक का वध करेगा। लोकों में लम्बी खोज के बाद, जिसमें मेंढक, हाथी और तोते शापित और फिर अनुगृहीत होते हैं, अग्नि मिल जाता है और वह अपना तेज गङ्गा में स्थापित करता है। गङ्गा उसे सह न सकी और उसे मेरु पर छोड़ दिया, जहाँ वह जिस-जिस वस्तु को छूता है वह सोना हो जाती है; उसी से स्कन्द का जन्म होता है और सुवर्ण को सब पवित्रों में पवित्र कहा गया है।

अध्याय 130अध्याय-सूचीअध्याय 132

देवा ऊचुः

श्लोक 1 (13.131.1)

असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवरः प्रभो । सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीयताम् ॥

asurastārako nāma tvayā dattavaraḥ prabho | surānṛṣīṃśca kliśnāti vadhastasya vidhīyatām

"प्रभो, तारक नाम का असुर, जिसे आपने वर दिया है, देवताओं और ऋषियों को सता रहा है। उसके वध का उपाय किया जाए।"

श्लोक 2 (13.131.2)

तस्माद्भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह । परित्रायस्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति नः ॥

tasmādbhayaṃ samutpannamasmākaṃ vai pitāmaha | paritrāyasva no deva na hyanyā gatirasti naḥ

"पितामह, उसी से हमें भय उत्पन्न हुआ है। हे देव, हमारी रक्षा कीजिए; हमारे लिए और कोई आश्रय नहीं है।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 3 (13.131.3)

समोऽहं सर्वभूतानामधर्मं नेह रोचये । हन्यतां तारकः क्षिप्र सुरर्षिगणबाधिता ॥

samo'haṃ sarvabhūtānāmadharmaṃ neha rocaye | hanyatāṃ tārakaḥ kṣipra surarṣigaṇabādhitā

"मैं सब प्राणियों के प्रति समान हूँ और यहाँ अधर्म को पसन्द नहीं करता। देवताओं और ऋषियों के समूहों को पीड़ा देने वाले तारक का शीघ्र वध किया जाए।"

श्लोक 4 (13.131.4)

वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयुः सुरसत्तमाः । विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वरः ॥

vedā dharmāśca nocchedaṃ gaccheyuḥ surasattamāḥ | vihitaṃ pūrvamevātra mayā vai vyetu vo jvaraḥ

"हे श्रेष्ठ देवताओ, वेद और धर्म नष्ट न हों। इसका उपाय मैंने पहले ही कर रखा है, इसलिए तुम्हारा सन्ताप दूर हो।"

देवा ऊचुः

श्लोक 5 (13.131.5)

वरदानाद्भगवतो दैतेयो बलगर्वितः । देवैर्न शक्यते हन्तु स कथं प्रशमं व्रजेत् ॥

varadānādbhagavato daiteyo balagarvitaḥ | devairna śakyate hantu sa kathaṃ praśamaṃ vrajet

"भगवान् के वरदान से बल के अभिमान में चूर वह दैत्य देवताओं से मारा नहीं जा सकता। फिर वह शान्त कैसे होगा?"

श्लोक 6 (13.131.6)

स हि नैव स्म देवानां नासुराणां न रक्षसाम् । वध्यः स्यामिति जग्राह वरं त्वत्तः पितामह ॥

sa hi naiva sma devānāṃ nāsurāṇāṃ na rakṣasām | vadhyaḥ syāmiti jagrāha varaṃ tvattaḥ pitāmaha

"हे पितामह, उसने आपसे यही वर लिया था कि वह न देवताओं के हाथों मरे, न असुरों के, न राक्षसों के।"

श्लोक 7 (13.131.7)

देवाश्च शप्ता रुद्राण्या प्रजोच्छेदे पुरा कृते । न भविष्यति वोऽपत्यमिति सर्वे जगत्पते ॥

devāśca śaptā rudrāṇyā prajocchede purā kṛte | na bhaviṣyati vo'patyamiti sarve jagatpate

"पहले जब सन्तान का उच्छेद किया गया था, तब रुद्र की पत्नी ने सब देवताओं को शाप दिया था कि 'तुम्हारे सन्तान नहीं होगी।' हे जगत्पति, ऐसी ही स्थिति है।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 8 (13.131.8)

हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमाः । स उत्पादयिताऽपत्यं वधाय त्रिदशद्विषाम् ॥

hutāśano na tatrāsīcchāpakāle surottamāḥ | sa utpādayitā'patyaṃ vadhāya tridaśadviṣām

"हे श्रेष्ठ देवताओ, शाप के समय अग्नि वहाँ नहीं था। वही देवताओं के शत्रुओं के विनाश के लिए सन्तान उत्पन्न करेगा।"

श्लोक 9 (13.131.9)

तद्वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान् । मानुषानथ गन्धर्वान्नागानथ च पक्षिणः ॥

tadvai sarvānatikramya devadānavarākṣasān | mānuṣānatha gandharvānnāgānatha ca pakṣiṇaḥ

"वह सन्तान सबको लाँघ जाएगी, चाहे देवता हों, दानव, राक्षस, मनुष्य, गन्धर्व, नाग या पक्षी;"

श्लोक 10 (13.131.10)

अस्त्रेणामोघपातेन शक्त्या तं घातयिष्यति । यतो वो भयमुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रवः ॥

astreṇāmoghapātena śaktyā taṃ ghātayiṣyati | yato vo bhayamutpannaṃ ye cānye suraśatravaḥ

"और अचूक प्रहार वाले अस्त्र, शक्ति, से वह उस असुर को मरवाएगा जिससे तुम्हें भय उत्पन्न हुआ है, तथा देवताओं के अन्य शत्रुओं को भी।"

श्लोक 11 (13.131.11)

सनातनो हि सङ्कल्पः काम इत्यभिधीयते । रुद्रस्य तेजः प्रस्कन्नमग्नौ निपतितं च यत् ॥

sanātano hi saṅkalpaḥ kāma ityabhidhīyate | rudrasya tejaḥ praskannamagnau nipatitaṃ ca yat

"काम को सनातन सङ्कल्प कहा जाता है। रुद्र का जो तेज स्खलित होकर अग्नि में गिरा था,"

श्लोक 12 (13.131.12)

तत्तेजोऽग्निर्महद्भूतं द्वितीयमिव पावकम् । वधार्थं देवशत्रूणां गङ्गायां जनयिष्यति ॥

tattejo'gnirmahadbhūtaṃ dvitīyamiva pāvakam | vadhārthaṃ devaśatrūṇāṃ gaṅgāyāṃ janayiṣyati

"उस तेज को महान् भूत अग्नि, मानो दूसरा अग्नि, देवताओं के शत्रुओं के विनाश के लिए गङ्गा में उत्पन्न करेगा।"

श्लोक 13 (13.131.13)

स तु नावाप तं शापं नष्टः स हुतभुक्तदा । तस्माद्वो भयहृद्देवाः समुत्पत्स्यति पावकिः ॥

sa tu nāvāpa taṃ śāpaṃ naṣṭaḥ sa hutabhuktadā | tasmādvo bhayahṛddevāḥ samutpatsyati pāvakiḥ

"उस समय अग्नि अदृश्य हो गया था, इसलिए उस पर वह शाप नहीं पड़ा। अतः हे देवताओ, तुम्हारे भय को हरने वाला पावक का पुत्र उत्पन्न होगा।"

श्लोक 14 (13.131.14)

अन्विष्यतां वै ज्वलनस्तथा चाद्य नियुज्यताम् । तारकस्य वधोपायः कथितो वै मयाऽनघाः ॥

anviṣyatāṃ vai jvalanastathā cādya niyujyatām | tārakasya vadhopāyaḥ kathito vai mayā'naghāḥ

"अग्नि को खोजा जाए और आज ही उसे इस कार्य में लगाया जाए। हे निष्पाप देवताओ, तारक के वध का उपाय मैंने बता दिया है।"

श्लोक 15 (13.131.15)

न हि तेजस्विनां शापास्तेजःसु प्रभवन्ति वै । बलान्यतिबलं प्राप्य दुर्बलानि भवन्ति वै ॥

na hi tejasvināṃ śāpāstejaḥsu prabhavanti vai | balānyatibalaṃ prāpya durbalāni bhavanti vai

"तेजस्वियों पर, तेज में प्रतिष्ठित लोगों पर शाप असर नहीं करते; बलवान् भी अपने से अधिक बलवान् को पाकर दुर्बल हो जाते हैं।"

श्लोक 16 (13.131.16)

हन्यादवध्यान्वरदानपि चैव तपस्विनः । सङ्कल्पाभिरुचिः कामः सनातनतमोऽभवत् ॥

hanyādavadhyānvaradānapi caiva tapasvinaḥ | saṅkalpābhiruciḥ kāmaḥ sanātanatamo'bhavat

"सङ्कल्प में रुचि रखने वाला काम सबसे पुरातन है; वह अवध्यों को, वर देने वालों को और तपस्वियों को भी मार सकता है।"

श्लोक 17 (13.131.17)

जगत्पतिरनिर्देश्यः सर्वगः सर्वभावनः । हृच्छयः सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभुः ॥

jagatpatiranirdeśyaḥ sarvagaḥ sarvabhāvanaḥ | hṛcchayaḥ sarvabhūtānāṃ jyeṣṭho rudrādapi prabhuḥ

"वह जगत् का स्वामी है, अनिर्वचनीय है, सर्वव्यापी है, सब भूतों का उत्पादक है, सब प्राणियों के हृदय में रहने वाला है, ज्येष्ठ है और रुद्र से भी बढ़कर प्रभु है।"

श्लोक 18 (13.131.18)

अन्विष्यतां स तु क्षिप्रं तेजोराशिर्हुताशनः । स वो मनोगतं कामं देवः सम्पादयिष्यति ॥

anviṣyatāṃ sa tu kṣipraṃ tejorāśirhutāśanaḥ | sa vo manogataṃ kāmaṃ devaḥ sampādayiṣyati

"तेज की राशि उस अग्नि को शीघ्र खोजो। वह देव तुम्हारे मन की कामना पूरी करेगा।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 19 (13.131.19)

एतद्वाक्यमुपश्रुत्य ततो देवा महात्मनः । जग्मुः संसिद्धसङ्कल्पाः पर्येषन्तो विभावसुम् ॥

etadvākyamupaśrutya tato devā mahātmanaḥ | jagmuḥ saṃsiddhasaṅkalpāḥ paryeṣanto vibhāvasum

उन महात्मा की यह बात सुनकर देवता दृढ़ सङ्कल्प के साथ विभावसु अग्नि की खोज में चल पड़े।

श्लोक 20 (13.131.20)

ततस्त्रैलोक्यमृषयो व्यचिन्वन्त सुरैः सह । काङ्क्षन्तो दर्शनं वह्नेः सर्वे तद्गतमानसाः ॥

tatastrailokyamṛṣayo vyacinvanta suraiḥ saha | kāṅkṣanto darśanaṃ vahneḥ sarve tadgatamānasāḥ

तब ऋषियों ने देवताओं के साथ तीनों लोकों में खोज की; वे सब अग्नि के दर्शन की इच्छा से उसी में मन लगाए हुए थे।

श्लोक 21 (13.131.21)

परेण तपसा युक्ताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः । लोकानन्वचरन्सिद्धाः सर्व एव भृगूत्तम । नष्टमात्मनि संलीनं नाभिजग्मुर्हुताशनम् ॥

pareṇa tapasā yuktāḥ śrīmanto lokaviśrutāḥ | lokānanvacaransiddhāḥ sarva eva bhṛgūttama | naṣṭamātmani saṃlīnaṃ nābhijagmurhutāśanam

हे भृगुश्रेष्ठ, महान् तप से युक्त, तेजस्वी और लोकों में विख्यात वे सब सिद्ध सब लोकों में विचरते रहे; फिर भी अदृश्य होकर अपने भीतर छिपे हुए अग्नि को वे नहीं पा सके।

श्लोक 22 (13.131.22)

ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान् । जलेचरः क्लान्तमनास्तेजसाऽग्नेः प्रदीपितः । उवाच देवान्मण्डूको रसातलतलोत्थितः ॥

tataḥ saṃjātasaṃtrāsānagnidarśanalālasān | jalecaraḥ klāntamanāstejasā'gneḥ pradīpitaḥ | uvāca devānmaṇḍūko rasātalatalotthitaḥ

तब देवता भय से घिर गए थे और अग्नि को देखने के लिए आतुर थे। उसी समय रसातल की गहराई से निकला एक जलचर मेंढक, जो अग्नि के तेज से तपकर थका हुआ था, देवताओं से बोला।

मण्डूक उवाच

श्लोक 23 (13.131.23)

रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो । सन्तापादिह सम्प्राप्तः पावकप्रभवादहम् ॥

rasātalatale devā vasatyagniriti prabho | santāpādiha samprāptaḥ pāvakaprabhavādaham

"हे देवताओ, हे प्रभो, अग्नि रसातल के तल में रहता है। पावक से उठने वाले ताप से पीड़ित होकर मैं यहाँ आया हूँ।"

श्लोक 24 (13.131.24)

स संसुप्तो जले देवा भगवान्हव्यवाहनः । अपः संसृज्य तेजोभिस्तेन सन्तापिता वयम् ॥

sa saṃsupto jale devā bhagavānhavyavāhanaḥ | apaḥ saṃsṛjya tejobhistena santāpitā vayam

"हे देवताओ, भगवान् हव्यवाहन जल में सोया हुआ है; उसने अपने तेज से जल को भर दिया है, और उसी से हम सन्तप्त हैं।"

श्लोक 25 (13.131.25)

तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसोः । तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्यं वो यदि वह्निना ॥

tasya darśanamiṣṭaṃ vo yadi devā vibhāvasoḥ | tatraivamadhigacchadhvaṃ kāryaṃ vo yadi vahninā

"हे देवताओ, यदि तुम विभावसु के दर्शन चाहते हो, यदि अग्नि से तुम्हारा कोई काम है, तो वहीं जाकर उससे मिलो।"

श्लोक 26 (13.131.26)

गम्यतां साधयिष्यामो वयं ह्यग्निभयात्सुराः । एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत् ॥

gamyatāṃ sādhayiṣyāmo vayaṃ hyagnibhayātsurāḥ | etāvaduktvā maṇḍūkastvarito jalamāviśat

"जाओ; हम अपना निर्वाह कर लेंगे, क्योंकि हे देवताओ, हमें अग्नि से भय है।" इतना कहकर मेंढक तुरन्त जल में घुस गया।

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 27 (13.131.27)

हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम् । शशाप स तमासाद्य न रसान्वेत्स्यसीति वै ॥

hutāśanastu bubudhe maṇḍūkasya ca paiśunam | śaśāpa sa tamāsādya na rasānvetsyasīti vai

हुताशन को मेंढक की चुगली का पता चल गया। उसके पास जाकर उसने शाप दिया, "तुम रसों को नहीं जान सकोगे।"

श्लोक 28 (13.131.28)

तं वै संयुज्य शापेन मण्डूकं त्वरितो ययौ । अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत् ॥

taṃ vai saṃyujya śāpena maṇḍūkaṃ tvarito yayau | anyatra vāsāya vibhurna cātmānamadarśayat

उस मेंढक को शाप से बाँधकर वह प्रभु शीघ्र ही कहीं और रहने चला गया और अपने को प्रकट नहीं किया।

श्लोक 29 (13.131.29)

देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्डूकानां भृगूत्तम । यत्तच्छृणु महाबाहो गदतो मम सर्वशः ॥

devāstvanugrahaṃ cakrurmaṇḍūkānāṃ bhṛgūttama | yattacchṛṇu mahābāho gadato mama sarvaśaḥ

पर हे भृगुश्रेष्ठ, देवताओं ने मेंढकों पर अनुग्रह किया। हे महाबाहो, वह सब मैं बताता हूँ, सुनो।

देवा ऊचुः

श्लोक 30 (13.131.30)

अग्निशापादजिह्वाऽपि रसज्ञानबहिष्कृताः । सरस्वतीं बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ ॥

agniśāpādajihvā'pi rasajñānabahiṣkṛtāḥ | sarasvatīṃ bahuvidhāṃ yūyamuccārayiṣyatha

"अग्नि के शाप से तुम जीभ से रहित और रसों के ज्ञान से वञ्चित हो गए हो, फिर भी तुम अनेक प्रकार की वाणी बोलोगे।"

श्लोक 31 (13.131.31)

बिलवासं गतांश्चैव निराहारानचेतसः । गतासूनपि वः शुष्कान्भूमिः सन्धारयिष्यति ॥

bilavāsaṃ gatāṃścaiva nirāhārānacetasaḥ | gatāsūnapi vaḥ śuṣkānbhūmiḥ sandhārayiṣyati

"बिलों में चले जाने पर, बिना आहार और बिना चेतना के रहने पर, यहाँ तक कि प्राणरहित और सूख जाने पर भी पृथ्वी तुम्हें धारण करेगी।"

श्लोक 32 (13.131.32)

तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ । इत्युक्त्वा तांस्ततो देवाः पुनरेव महीमिमाम् ॥

tamoghanāyāmapi vai niśāyāṃ vicariṣyatha | ityuktvā tāṃstato devāḥ punareva mahīmimām

"और घने अन्धकार वाली रात में भी तुम विचरोगे।" उनसे ऐसा कहकर देवता फिर इस पृथ्वी पर घूमने लगे,

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 33 (13.131.33)

परीयुर्ज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन्हुताशनम् । अथ तान्द्विरदः कश्चित्सुरेन्द्रद्विरदोपमः ॥

parīyurjvalanasyārthe na cāvindanhutāśanam | atha tāndviradaḥ kaścitsurendradviradopamaḥ

अग्नि की खोज में; पर हुताशन उन्हें नहीं मिला। तब इन्द्र के हाथी जैसे एक हाथी ने

श्लोक 34 (13.131.34)

अश्वत्थस्थोऽग्निरित्येवमाह देवान्भृगूद्वह । शशाप ज्वलनः सर्वान्द्विरदान्क्रोधमूर्च्छितः ॥

aśvatthastho'gnirityevamāha devānbhṛgūdvaha | śaśāpa jvalanaḥ sarvāndviradānkrodhamūrcchitaḥ

देवताओं से कहा, हे भृगुश्रेष्ठ, कि "अग्नि पीपल के वृक्ष में है।" तब क्रोध से मूर्छित हुए अग्नि ने सब हाथियों को शाप दिया:

श्लोक 35 (13.131.35)

प्रतीपा भवतां जिह्वा भवित्रीति भृगूद्वह । इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः । प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्निः सुषुप्सया ॥

pratīpā bhavatāṃ jihvā bhavitrīti bhṛgūdvaha | ityuktvā niḥsṛto'śvatthādagnirvāraṇasūcitaḥ | praviveśa śamīgarbhamatha vahniḥ suṣupsayā

"तुम्हारी जीभ उलटी हो जाएगी," हे भृगुश्रेष्ठ। ऐसा कहकर हाथी द्वारा बताया गया अग्नि पीपल से निकला और सोने की इच्छा से शमी वृक्ष के भीतर घुस गया।

श्लोक 36 (13.131.36)

अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो । देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमाः ॥

anugrahaṃ tu nāgānāṃ yaṃ cakruḥ śṛṇu taṃ prabho | devā bhṛgukulaśreṣṭha prītyā satyaparākramāḥ

हे प्रभो, अब सुनो कि हे भृगुकुलश्रेष्ठ, सत्यपराक्रमी देवताओं ने प्रसन्न होकर हाथियों पर कौन-सा अनुग्रह किया।

देवा ऊचुः

श्लोक 37 (13.131.37)

प्रतीपया जिह्वयाऽपि सर्वाहारान्हरिष्यथ । वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यञ्जिताक्षराम् । इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकसः ॥

pratīpayā jihvayā'pi sarvāhārānhariṣyatha | vācaṃ coccārayiṣyadhvamuccairavyañjitākṣarām | ityuktvā punarevāgnimanusasrurdivaukasaḥ

"उलटी जीभ से भी तुम सब प्रकार का आहार ग्रहण करोगे, और ऊँचे स्वर में अस्पष्ट अक्षरों वाली वाणी बोलोगे।" यह कहकर स्वर्गवासी देवता फिर अग्नि के पीछे चल पड़े।

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 38 (13.131.38)

अश्वत्थान्निःसृतश्चाग्निः शमीगर्भमुपाविशत् । शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवाः समुपाद्रवन् ॥

aśvatthānniḥsṛtaścāgniḥ śamīgarbhamupāviśat | śukena khyāpito vipra taṃ devāḥ samupādravan

अग्नि पीपल से निकलकर शमी के भीतर घुस गया। हे विप्र, तोते ने उसका पता बता दिया, और देवता उसकी ओर दौड़े।

श्लोक 39 (13.131.39)

शशाप शुकमग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि । जिह्वामावर्तयामास तस्यापि हुतभुक्तदा ॥

śaśāpa śukamagnistu vāgvihīno bhaviṣyasi | jihvāmāvartayāmāsa tasyāpi hutabhuktadā

अग्नि ने तोते को शाप दिया, "तुम वाणी से रहित हो जाओगे," और उस समय उसकी जीभ भी उलट दी।

श्लोक 40 (13.131.40)

दृष्ट्वा तु ज्वलनं देवाः शुकमूचुर्दयान्विताः । भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति ॥

dṛṣṭvā tu jvalanaṃ devāḥ śukamūcurdayānvitāḥ | bhavitā na tvamatyantaṃ śukatve naṣṭavāgiti

अग्नि को देखकर दया से भरे देवताओं ने तोते से कहा, "तोते के रूप में तुम सर्वथा वाणीहीन नहीं रहोगे।"

देवा ऊचुः

श्लोक 41 (13.131.41)

आवृत्तजिह्वस्य सतो वाक्यं कान्तं भविष्यति । बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम् ॥

āvṛttajihvasya sato vākyaṃ kāntaṃ bhaviṣyati | bālasyeva pravṛddhasya kalamavyaktamadbhutam

"जीभ के उलट जाने पर भी तुम्हारी वाणी मनोहर होगी, बड़े हो जाने पर भी बालक की-सी, मधुर, अस्पष्ट और अद्भुत।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 42 (13.131.42)

इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्निमालक्ष्य देवताः । तदेवायतनं चक्रुः पुण्यं सर्वक्रियास्वपि ॥

ityuktvā taṃ śamīgarbhe vahnimālakṣya devatāḥ | tadevāyatanaṃ cakruḥ puṇyaṃ sarvakriyāsvapi

यह कहकर शमी के भीतर अग्नि को पहचानकर देवताओं ने उसी वृक्ष को उसका निवास बना दिया, जो सब कर्मों में पवित्र है।

श्लोक 43 (13.131.43)

तदाप्रभृति चाप्यग्निः शमीगर्भेषु दृश्यते । उत्पादने तथोपायमभिजग्मुश्च मानवाः ॥

tadāprabhṛti cāpyagniḥ śamīgarbheṣu dṛśyate | utpādane tathopāyamabhijagmuśca mānavāḥ

तभी से अग्नि शमी के भीतर दिखाई देता है, और मनुष्यों ने अग्नि उत्पन्न करने के लिए इसी उपाय को अपनाया।

श्लोक 44 (13.131.44)

आपो रसातले यास्तु संस्पृष्टाश्चित्रभानुना । ताः पर्वतप्रस्रवणैरूष्मां मुञ्चन्ति भार्गव । पावकेनाधिशयता सन्तप्तास्तस्य तेजसा ॥

āpo rasātale yāstu saṃspṛṣṭāścitrabhānunā | tāḥ parvataprasravaṇairūṣmāṃ muñcanti bhārgava | pāvakenādhiśayatā santaptāstasya tejasā

हे भार्गव, रसातल में जो जल चित्रभानु अग्नि के स्पर्श में आए, वे पर्वतीय झरनों से गर्मी छोड़ते हैं, क्योंकि उनमें सोए हुए अग्नि के तेज से वे तप गए थे।

श्लोक 45 (13.131.45)

अथाग्निर्देवता दृष्ट्वा बभूव व्यथितस्तदा । किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावकः ॥

athāgnirdevatā dṛṣṭvā babhūva vyathitastadā | kimāgamanamityevaṃ tānapṛcchata pāvakaḥ

तब देवताओं को देखकर अग्नि व्याकुल हो गया, और पावक ने उनसे पूछा, "आप किसलिए आए हैं?"

श्लोक 46 (13.131.46)

तमूचुर्विबुधाः सर्वे ते चैव परमर्षयः । त्वां नियोक्ष्यामहे कार्ये तद्भवान्कर्तुमर्हति । कृते च तस्मिन्भविता तवापि सुमहान्गुणः ॥

tamūcurvibudhāḥ sarve te caiva paramarṣayaḥ | tvāṃ niyokṣyāmahe kārye tadbhavānkartumarhati | kṛte ca tasminbhavitā tavāpi sumahānguṇaḥ

सब देवताओं और परम ऋषियों ने उससे कहा, "हम तुम्हें एक कार्य में लगाएँगे; तुम्हें उसे करना चाहिए। उसके पूरा होने पर तुम्हें भी बहुत बड़ा लाभ होगा।"

अग्निरुवाच

श्लोक 47 (13.131.47)

ब्रूत यद्भवतां कार्यं कर्तास्मि तदहं सुराः । भवतां तु नियोज्योऽस्मि मा वोऽत्रास्तु विचारणा ॥

brūta yadbhavatāṃ kāryaṃ kartāsmi tadahaṃ surāḥ | bhavatāṃ tu niyojyo'smi mā vo'trāstu vicāraṇā

"हे देवताओ, बताइए आपका क्या कार्य है; मैं उसे करूँगा। मैं आपकी आज्ञा में हूँ; इसमें कोई सोच-विचार न हो।"

देवा ऊचुः

श्लोक 48 (13.131.48)

असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः । अस्मान्प्रबाधते वीर्याद्वधस्तस्य विधीयताम् ॥

asurastārako nāma brahmaṇo varadarpitaḥ | asmānprabādhate vīryādvadhastasya vidhīyatām

"तारक नाम का असुर ब्रह्मा के वर से गर्वित होकर अपने बल से हमें सता रहा है। उसके वध का उपाय किया जाए।"

श्लोक 49 (13.131.49)

इमान्देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा । ऋषींश्चापि महाभाग परित्रायस्व पावक ॥

imāndevagaṇāṃstāta prajāpatigaṇāṃstathā | ṛṣīṃścāpi mahābhāga paritrāyasva pāvaka

"हे तात, हे महाभाग पावक, इन देवगणों, प्रजापतियों के गणों और ऋषियों की भी रक्षा कीजिए।"

श्लोक 50 (13.131.50)

अपत्यं तेजसा युक्तं प्रवीरं जनय प्रभो । यद्भयं नोऽसुरात्तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन ॥

apatyaṃ tejasā yuktaṃ pravīraṃ janaya prabho | yadbhayaṃ no'surāttasmānnāśayeddhavyavāhana

"हे प्रभो, हे हव्यवाहन, तेज से युक्त एक महावीर सन्तान उत्पन्न कीजिए, जो उस असुर से हमारे भय का नाश करे।"

श्लोक 51 (13.131.51)

शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति परायणम् । अन्यत्र भवतो वीर तस्मात्त्रायस्व नः प्रभो ॥

śaptānāṃ no mahādevyā nānyadasti parāyaṇam | anyatra bhavato vīra tasmāttrāyasva naḥ prabho

"महादेवी से शापित हम लोगों के लिए आपके सिवा और कोई आश्रय नहीं है, हे वीर; इसलिए हे प्रभो, हमें बचाइए।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 52 (13.131.52)

इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा भगवान्हव्यवाहनः । जगामाथ दुराधर्षो गङ्गां भागीरथीं प्रति ॥

ityuktaḥ sa tathetyuktvā bhagavānhavyavāhanaḥ | jagāmātha durādharṣo gaṅgāṃ bhāgīrathīṃ prati

ऐसा कहे जाने पर भगवान् हव्यवाहन ने "ऐसा ही हो" कहा और वह दुर्धर्ष अग्नि भागीरथी गङ्गा के पास गया।

श्लोक 53 (13.131.53)

तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भं चास्यां दधे तदा । ववृधे स तदा गर्भः कक्षे कृष्णगतिर्यथा ॥

tayā cāpyabhavanmiśro garbhaṃ cāsyāṃ dadhe tadā | vavṛdhe sa tadā garbhaḥ kakṣe kṛṣṇagatiryathā

वह उससे मिला, और तब उसने उसका गर्भ धारण किया। वह गर्भ उस समय सूखी घास में लगी आग की तरह बढ़ने लगा।

श्लोक 54 (13.131.54)

तेजसा तस्य देवस्य गङ्गा विह्वलचेतना । सन्तापमगमत्तीव्रं वोढुं सा न शशाक ह ॥

tejasā tasya devasya gaṅgā vihvalacetanā | santāpamagamattīvraṃ voḍhuṃ sā na śaśāka ha

उस देव के तेज से गङ्गा विह्वल हो गई; उसे तीव्र सन्ताप हुआ और वह उसे सह न सकी।

श्लोक 55 (13.131.55)

आहिते ज्वलनेनाथ गर्भे तेजःसमन्विते । गङ्गायामसुरः कश्चिद्भैरवं नादमानदत् ॥

āhite jvalanenātha garbhe tejaḥsamanvite | gaṅgāyāmasuraḥ kaścidbhairavaṃ nādamānadat

जब अग्नि ने गङ्गा में तेज से भरा गर्भ स्थापित कर दिया, तब किसी असुर ने वहाँ भयानक गर्जना की।

श्लोक 56 (13.131.56)

अबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा । वित्रस्तोद्धान्तनयना गङ्गा विप्लुतलोचना ॥

abuddhipatitenātha nādena vipulena sā | vitrastoddhāntanayanā gaṅgā viplutalocanā

अचानक आ पड़ी उस भारी गर्जना से भयभीत होकर गङ्गा की आँखें घबराहट से घूमने लगीं और उसकी दृष्टि डगमगा गई।

श्लोक 57 (13.131.57)

विसंज्ञा नाशकद्गर्भं वोढुमात्मानमेव च । सा तु तेजःपरीताङ्गी कम्पमाना च जाह्नवी ॥

visaṃjñā nāśakadgarbhaṃ voḍhumātmānameva ca | sā tu tejaḥparītāṅgī kampamānā ca jāhnavī

वह अचेत हो गई और न गर्भ को, न स्वयं को सँभाल सकी। तेज से व्याप्त अङ्गों वाली, काँपती हुई जाह्नवी

श्लोक 58 (13.131.58)

उवाच ज्वलनं विप्र तदा गर्भबलोद्धुता । न ते शक्ताऽस्मि भगवंस्तेजसोऽस्य विधारणे ॥

uvāca jvalanaṃ vipra tadā garbhabaloddhutā | na te śaktā'smi bhagavaṃstejaso'sya vidhāraṇe

गर्भ के बल से अभिभूत होकर, हे विप्र, अग्नि से बोली, "भगवन्, मैं इस तेज को धारण करने में समर्थ नहीं हूँ।"

गङ्गोवाच

श्लोक 59 (13.131.59)

विमूढाऽस्मि कृताऽनेन न मे स्वास्थ्यं यथा पुरा । विह्वला चास्मि भगवंश्चेतो नष्टं च मेऽनघ ॥

vimūḍhā'smi kṛtā'nena na me svāsthyaṃ yathā purā | vihvalā cāsmi bhagavaṃśceto naṣṭaṃ ca me'nagha

"इसने मुझे विमूढ़ कर दिया है, मुझे पहले जैसा स्वास्थ्य नहीं रहा। हे भगवन्, मैं विह्वल हूँ और हे निष्पाप, मेरा चित्त खो गया है।"

श्लोक 60 (13.131.60)

धारणे नास्य शक्ताऽहं गर्भस्य तपतांवर । उत्स्रक्ष्येऽहमिमं दुःखान्न तु कामात्कथञ्चन ॥

dhāraṇe nāsya śaktā'haṃ garbhasya tapatāṃvara | utsrakṣye'hamimaṃ duḥkhānna tu kāmātkathañcana

"हे तपने वालों में श्रेष्ठ, मैं इस गर्भ को धारण नहीं कर सकती; मैं दुःख के कारण इसे छोड़ दूँगी, अपनी इच्छा से कदापि नहीं।"

श्लोक 61 (13.131.61)

न तेजसाऽस्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो । आपदर्थे हि सम्बन्धः सुसूक्ष्मोऽपि महाद्युते ॥

na tejasā'sti saṃsparśo mama deva vibhāvaso | āpadarthe hi sambandhaḥ susūkṣmo'pi mahādyute

"हे देव विभावसु, मेरा ऐसे तेज से कोई सम्पर्क नहीं है; हे महातेजस्वी, इसके साथ अत्यन्त सूक्ष्म सम्बन्ध भी आपत्ति के लिए ही होता है।"

श्लोक 62 (13.131.62)

यदत्र गुणसम्पन्नमितरद्वा हुताशन । त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मौ च केवलौ ॥

yadatra guṇasampannamitaradvā hutāśana | tvayyeva tadahaṃ manye dharmādharmau ca kevalau

"हे हुताशन, इस विषय में जो कुछ गुणयुक्त है या इसके विपरीत है, उसे मैं आप पर ही आश्रित मानती हूँ; धर्म और अधर्म दोनों केवल आपके ही हैं।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 63 (13.131.63)

तामुवाच ततो वह्निर्धार्यतां धार्यतामिति । गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदयः ॥

tāmuvāca tato vahnirdhāryatāṃ dhāryatāmiti | garbho mattejasā yukto mahāguṇaphalodayaḥ

तब अग्नि ने उससे कहा, "इसे धारण करो, धारण करो! मेरे तेज से युक्त यह गर्भ महान् गुणों के फल को उत्पन्न करेगा।"

अग्निरुवाच

श्लोक 64 (13.131.64)

शक्ता ह्यसि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा । न हि ते किञ्चिदप्राप्यमन्यतो धारणादृते ॥

śaktā hyasi mahīṃ kṛtsnāṃ voḍhuṃ dhārayituṃ tathā | na hi te kiñcidaprāpyamanyato dhāraṇādṛte

"तुम सारी पृथ्वी को वहन करने और धारण करने में समर्थ हो; किसी अन्य से मिले हुए को धारण करने के सिवा तुम्हारे लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 65 (13.131.65)

एवमुक्ता तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम् । जगामेष्टं तदा देशं ततो भार्गवनन्दन ॥

evamuktā tu sā devī tatraivāntaradhīyata | pāvakaścāpi tejasvī kṛtvā kāryaṃ divaukasām | jagāmeṣṭaṃ tadā deśaṃ tato bhārgavanandana

ऐसा कहे जाने पर वह देवी वहीं अन्तर्धान हो गई; और तेजस्वी पावक भी स्वर्गवासियों का कार्य करके, हे भार्गवनन्दन, अपने इष्ट स्थान को चला गया।

श्लोक 66 (13.131.66)

सा वह्निना वार्यमाणा देवैरपि सरिद्वरा । समुत्ससर्ज तं गर्भं मेरौ गिरिवरे तदा ॥

sā vahninā vāryamāṇā devairapi saridvarā | samutsasarja taṃ garbhaṃ merau girivare tadā

अग्नि और देवताओं के रोकने पर भी उस श्रेष्ठ नदी ने तब उस गर्भ को पर्वतश्रेष्ठ मेरु पर डाल दिया।

श्लोक 67 (13.131.67)

समर्था धारणे चापि रुद्रतेजःप्रधर्षिता । नाशकत्सा तदा गर्भं सन्धारयितुमोजसा । समुत्ससर्ज तं दुःखाद्दीप्तवैश्वानरप्रभम् ॥

samarthā dhāraṇe cāpi rudratejaḥpradharṣitā | nāśakatsā tadā garbhaṃ sandhārayitumojasā | samutsasarja taṃ duḥkhāddīptavaiśvānaraprabham

वह धारण करने में समर्थ थी, फिर भी रुद्र के तेज से अभिभूत होकर अपने बल से उस गर्भ को और न सँभाल सकी। दुःख से उसने उसे छोड़ दिया; वह प्रज्वलित वैश्वानर की-सी आभा वाला था।

श्लोक 68 (13.131.68)

दर्शयामास चाग्निस्तां तदा गङ्गां भृगूद्वह । पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद्गर्भः सुखोदयः ॥

darśayāmāsa cāgnistāṃ tadā gaṅgāṃ bhṛgūdvaha | papraccha saritāṃ śreṣṭhāṃ kaccidgarbhaḥ sukhodayaḥ

हे भृगुश्रेष्ठ, तब अग्नि ने उस गङ्गा को अपना दर्शन दिया और उस श्रेष्ठ नदी से पूछा, "क्या गर्भ सुखपूर्वक बढ़ रहा है?"

अग्निरुवाच

श्लोक 69 (13.131.69)

कीदृग्गुणोऽपि वा देवि कीदृग्रूपश्च दृश्यते । तेजसा केन वा युक्तः सर्वमेतद्ब्रवीहि मे ॥

kīdṛgguṇo'pi vā devi kīdṛgrūpaśca dṛśyate | tejasā kena vā yuktaḥ sarvametadbravīhi me

"हे देवि, उसके गुण कैसे हैं, उसका रूप कैसा दिखाई देता है, और वह किस तेज से युक्त है? यह सब मुझे बताओ।"

गङ्गोवाच

श्लोक 70 (13.131.70)

जातरूपः स गर्भो वै तेजसा त्वमिवानघ । सुवर्णो विमलो दीप्तः पर्वतं चावभासयन् ॥

jātarūpaḥ sa garbho vai tejasā tvamivānagha | suvarṇo vimalo dīptaḥ parvataṃ cāvabhāsayan

"वह गर्भ जातरूप, अर्थात् सोने के रङ्ग का है, हे निष्पाप, तुम्हारे ही समान तेजस्वी, स्वर्ण-वर्ण, निर्मल और दीप्त है, और पर्वत को प्रकाशित कर रहा है।"

श्लोक 71 (13.131.71)

पद्मोत्पलविमिश्राणां ह्रदानामिव शीतलः । गन्धोऽस्य स कदम्बानां तुल्यो वै तपतांवर ॥

padmotpalavimiśrāṇāṃ hradānāmiva śītalaḥ | gandho'sya sa kadambānāṃ tulyo vai tapatāṃvara

"वह कमलों और उत्पलों से मिले सरोवरों के समान शीतल है, और हे तपने वालों में श्रेष्ठ, उसकी गन्ध कदम्ब के फूलों के समान है।"

श्लोक 72 (13.131.72)

तेजसा तस्य गर्भस्य भास्करस्येव रश्मिभिः । यद्द्रव्यं परिसंसृष्टं पृथिव्यां पर्वतेषु च । तत्सर्वं काञ्चनीभूतं समन्तात्प्रत्यदृश्यत ॥

tejasā tasya garbhasya bhāskarasyeva raśmibhiḥ | yaddravyaṃ parisaṃsṛṣṭaṃ pṛthivyāṃ parvateṣu ca | tatsarvaṃ kāñcanībhūtaṃ samantātpratyadṛśyata

"उस गर्भ के तेज से, सूर्य की किरणों के समान, पृथ्वी और पर्वतों पर जो भी वस्तु उसके सम्पर्क में आई, वह सब ओर सोने की बनी दिखाई दी।"

श्लोक 73 (13.131.73)

पर्यधावत शैलांश्च नदीः प्रस्रवणानि च । व्यादीपयत्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥

paryadhāvata śailāṃśca nadīḥ prasravaṇāni ca | vyādīpayattejasā ca trailokyaṃ sacarācaram

"वह पर्वतों, नदियों और झरनों पर दौड़ता रहा, और अपने तेज से चर-अचर सहित तीनों लोकों को प्रकाशित कर दिया।"

श्लोक 74 (13.131.74)

एवंरूपः स भगवान्पुत्रस्ते हव्यवाहन । सूर्यवैश्वानरसमः कान्त्या सोम इवापरः ॥

evaṃrūpaḥ sa bhagavānputraste havyavāhana | sūryavaiśvānarasamaḥ kāntyā soma ivāparaḥ

"हे हव्यवाहन, ऐसा ही रूप उन भगवान् का है, जो आपके पुत्र हैं; वे तेज में सूर्य और वैश्वानर के समान और कान्ति में दूसरे चन्द्रमा के समान हैं।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 75 (13.131.75)

एवमुक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम् । जगामेष्टं ततो देशं तदा भार्गवनन्दन ॥

evamuktvā tu sā devī tatraivāntaradhīyata | pāvakaścāpi tejasvī kṛtvā kāryaṃ divaukasām | jagāmeṣṭaṃ tato deśaṃ tadā bhārgavanandana

ऐसा कहकर वह देवी वहीं अन्तर्धान हो गई; और तेजस्वी पावक भी स्वर्गवासियों का कार्य करके, हे भार्गवनन्दन, वहाँ से अपने इष्ट स्थान को चला गया।

श्लोक 76 (13.131.76)

एतैः कर्मगुणैर्लोके नामाग्नेः परिगीयते । हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा । पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै ॥

etaiḥ karmaguṇairloke nāmāgneḥ parigīyate | hiraṇyaretā iti vai ṛṣibhirvibudhaistathā | pṛthivī ca tadā devī khyātā vasumatīti vai

इन कर्मों और गुणों के कारण लोक में ऋषियों और देवताओं द्वारा अग्नि का नाम "हिरण्यरेता" गाया जाता है; और तभी देवी पृथ्वी भी "वसुमती" नाम से प्रसिद्ध हुई।

श्लोक 77 (13.131.77)

स तु गर्भो महातेजा गाङ्गेयः पावकोद्भवः । दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधेऽद्भुतदर्शनः ॥

sa tu garbho mahātejā gāṅgeyaḥ pāvakodbhavaḥ | divyaṃ śaravaṇaṃ prāpya vavṛdhe'dbhutadarśanaḥ

वह महातेजस्वी गर्भ, गङ्गा का पुत्र जो पावक से उत्पन्न था, दिव्य शरवण में पहुँचकर बढ़ने लगा; उसका रूप अद्भुत दिखता था।

श्लोक 78 (13.131.78)

ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालार्कसदृशद्युतिम् । जातस्नेहास्तु तं बालं पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ॥

dadṛśuḥ kṛttikāstaṃ tu bālārkasadṛśadyutim | jātasnehāstu taṃ bālaṃ pupuṣuḥ stanyavisravaiḥ

कृत्तिकाओं ने उसे देखा, जिसकी कान्ति बाल सूर्य के समान थी; उनके मन में स्नेह जाग उठा और उन्होंने अपने दूध की धाराओं से उस बालक का पोषण किया।

श्लोक 79 (13.131.79)

ततः स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युतिः । स्कन्नत्वात्स्कन्दतां चापि गुहावासाद्गुहोऽभवत् ॥

tataḥ sa kārtikeyatvamavāpa paramadyutiḥ | skannatvātskandatāṃ cāpi guhāvāsādguho'bhavat

इस प्रकार वह परम तेजस्वी कार्तिकेय कहलाया; स्खलित (स्कन्न) होने के कारण वह स्कन्द भी कहलाया, और गुहा में वास करने के कारण वह गुह हुआ।

श्लोक 80 (13.131.80)

एवं सुवर्णमुत्पन्नमपत्यं जातवेदसः । तत्र जाम्बूनदं श्रेष्ठं देवानामपि भूषणम् ॥

evaṃ suvarṇamutpannamapatyaṃ jātavedasaḥ | tatra jāmbūnadaṃ śreṣṭhaṃ devānāmapi bhūṣaṇam

इस प्रकार जातवेदा अग्नि की सन्तान के रूप में सोना उत्पन्न हुआ। उसमें जाम्बूनद सोना सर्वश्रेष्ठ है, जो देवताओं का भी आभूषण है।

श्लोक 81 (13.131.81)

ततःप्रभृति चाप्येतञ्जातरूपमुदाहृतम् । रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च ॥

tataḥprabhṛti cāpyetañjātarūpamudāhṛtam | ratnānāmuttamaṃ ratnaṃ bhūṣaṇānāṃ tathaiva ca

तभी से इसे "जातरूप" कहा गया; यह रत्नों में उत्तम रत्न और आभूषणों में भी उत्तम है,

श्लोक 82 (13.131.82)

पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् । यत्सुवर्णं स भगवानग्निरीशः प्रजापतिः ॥

pavitraṃ ca pavitrāṇāṃ maṅgalānāṃ ca maṅgalam | yatsuvarṇaṃ sa bhagavānagnirīśaḥ prajāpatiḥ

पवित्रों को भी पवित्र करने वाला और मङ्गलों में भी मङ्गल है। जो सोना है, वही भगवान् अग्नि, ईश्वर और प्रजापति है।

श्लोक 83 (13.131.83)

पवित्राणां पवित्रं हि कनकं द्विजसत्तमाः । अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाहृतम् ॥

pavitrāṇāṃ pavitraṃ hi kanakaṃ dvijasattamāḥ | agnīṣomātmakaṃ caiva jātarūpamudāhṛtam

हे श्रेष्ठ द्विजो, सोना पवित्रों में भी पवित्र है; उसे अग्नि और सोम के स्वरूप वाला कहा गया है, और वही "जातरूप" कहलाता है।

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