अनुशासन पर्व · अध्याय 132
ब्रह्मा के वीर्य से सोने की उत्पत्ति
भीष्म बताते हैं कि वसिष्ठ ने परशुराम को सोने की उत्पत्ति कैसे समझाई थी। वरुण का रूप धारण किए रुद्र के यज्ञ में ब्रह्मा का वीर्य गिरा और अग्नि में आहुत हुआ; उससे भृगु, अंगिरा और कवि तथा अन्य ऋषि उत्पन्न हुए, और वरुण, अग्नि तथा ब्रह्मा तीनों ने उन पर अपना अधिकार जताया, जब तक देवताओं ने उनकी वंश-परम्पराएँ निश्चित नहीं कर दीं। सोना अग्नि की सन्तान है; सूर्योदय, मध्याह्न या सन्ध्या में उसका दान पाप से मुक्ति और उत्तम लोक देता है। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर को ब्राह्मणों को सोना देने के लिए प्रेरित करते हैं।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 1 (13.132.1)
अपि चेदं पुरा राम श्रुतं मे ब्रह्मदर्शनम् । पितामहस्य यद्वृत्तं ब्रह्मणः परमात्मनः ॥
api cedaṃ purā rāma śrutaṃ me brahmadarśanam | pitāmahasya yadvṛttaṃ brahmaṇaḥ paramātmanaḥ
राम, मैंने बहुत पहले ब्रह्मा के दर्शन का यह वृत्तान्त भी सुना था, जो पितामह परमात्मा ब्रह्मा के साथ घटित हुआ था।
श्लोक 2 (13.132.2)
देवस्य महतस्तात वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् । ऐश्वर्ये वारुणेवाऽथ रुद्रस्येशस्य वै प्रभो ॥
devasya mahatastāta vāruṇīṃ bibhratastanum | aiśvarye vāruṇevā'tha rudrasyeśasya vai prabho
तात, जब महान् देव ईश्वर रुद्र ने वरुण का शरीर धारण किया था और वरुण के ऐश्वर्य में स्थित थे, हे प्रभो,
श्लोक 3 (13.132.3)
आजग्मुर्मुनयः सर्वे देवाश्चाग्निपुरोगमाः । यज्ञाङ्गानि च सर्वाणि वषट्कारश्च मूर्तिमान् ॥
ājagmurmunayaḥ sarve devāścāgnipurogamāḥ | yajñāṅgāni ca sarvāṇi vaṣaṭkāraśca mūrtimān
तब सब मुनि आए, अग्नि को आगे करके देवता आए, यज्ञ के सब अंग आए और वषट्कार भी मूर्तिमान होकर आया।
श्लोक 4 (13.132.4)
मूर्तिमन्ति च सामानि यजूंषि च सहस्रशः । ऋग्वेदश्चागमत्तत्र पदक्रमविभूषितः ॥
mūrtimanti ca sāmāni yajūṃṣi ca sahasraśaḥ | ṛgvedaścāgamattatra padakramavibhūṣitaḥ
साम मूर्तिमान होकर आए, हज़ारों यजुर्मन्त्र आए; पद और क्रम से विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ आया।
श्लोक 5 (13.132.5)
लक्षणानि स्वरास्तोभा निरुक्ताः स्वरभक्तयः । ओंकारश्छन्दसां नेत्रं निग्रहप्रग्रहौ तथा ॥
lakṣaṇāni svarāstobhā niruktāḥ svarabhaktayaḥ | oṃkāraśchandasāṃ netraṃ nigrahapragrahau tathā
लक्षण, स्वर, स्तोभ, निरुक्त और स्वरों के भेद आए; छन्दों के नेत्र ओंकार तथा निग्रह और प्रग्रह भी आए।
श्लोक 6 (13.132.6)
वेदाश्च सोपनिषदो विद्या सावित्र्यथापि च । भूतं भव्यं भविष्यच्च दधार भगवाञ्शिवः ॥
vedāśca sopaniṣado vidyā sāvitryathāpi ca | bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyacca dadhāra bhagavāñśivaḥ
उपनिषदों सहित वेद, विद्या और सावित्री भी आईं। भगवान् शिव ने भूत, वर्तमान और भविष्य को धारण किया।
श्लोक 7 (13.132.7)
संजुहावात्मनाऽऽत्मानं स्वयमेव तदा प्रभो । यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं पिनाकधृत् ॥
saṃjuhāvātmanā''tmānaṃ svayameva tadā prabho | yajñaṃ ca śobhayāmāsa bahurūpaṃ pinākadhṛt
हे प्रभो, तब उन्होंने स्वयं ही अपने द्वारा अपने को अपने में होम किया और पिनाकधारी ने अनेक रूपों वाले यज्ञ को सुशोभित किया।
श्लोक 8 (13.132.8)
द्यौर्नभः पृथिवी खं च तथा चैवैष भूपतिः । सर्वविद्येश्वरः श्रीमानेष चापि विभावसुः ॥
dyaurnabhaḥ pṛthivī khaṃ ca tathā caivaiṣa bhūpatiḥ | sarvavidyeśvaraḥ śrīmāneṣa cāpi vibhāvasuḥ
द्युलोक, आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष, यह भूपति, सब विद्याओं का श्रीमान् स्वामी और यह विभावसु अग्नि भी वही हैं;
श्लोक 9 (13.132.9)
एष ब्रह्मा शिवो रुद्रो वरुणोऽग्निः प्रजापतिः । कीर्त्यते भगवान्देवः सर्वभूतपतिः शिवः ॥
eṣa brahmā śivo rudro varuṇo'gniḥ prajāpatiḥ | kīrtyate bhagavāndevaḥ sarvabhūtapatiḥ śivaḥ
यही ब्रह्मा, शिव, रुद्र, वरुण, अग्नि और प्रजापति है; सब प्राणियों के स्वामी भगवान् देव शिव की इन सब नामों से स्तुति की जाती है।
श्लोक 10 (13.132.10)
तस्य यज्ञः पशुपतेस्तपः क्रतव एव च । दीक्षा दीप्तव्रता देवी दिशश्च सदिगीश्वराः ॥
tasya yajñaḥ paśupatestapaḥ kratava eva ca | dīkṣā dīptavratā devī diśaśca sadigīśvarāḥ
उन पशुपति के ही वे यज्ञ, तप और क्रतु थे; दीक्षा, दीप्त व्रतों वाली देवी, तथा दिशाएँ अपने दिक्पालों सहित भी उन्हीं की थीं।
श्लोक 11 (13.132.11)
देवपत्न्यश्च कन्याश्च देवानां चैव मातरः । आजग्मुः सहितास्तत्र तदा भृगुकुलोद्वह । यज्ञं पशुपतेः प्रीता वरुणस्य महात्मनः ॥
devapatnyaśca kanyāśca devānāṃ caiva mātaraḥ | ājagmuḥ sahitāstatra tadā bhṛgukulodvaha | yajñaṃ paśupateḥ prītā varuṇasya mahātmanaḥ
हे भृगुकुल के वंशज, देवताओं की पत्नियाँ, कन्याएँ और देवताओं की माताएँ सब मिलकर प्रसन्नता से वहाँ महात्मा वरुण रूप पशुपति के यज्ञ में आईं।
श्लोक 12 (13.132.12)
स्वयंभुवस्तु ता दृष्ट्वा रेतः समपतद्भुवि ॥
svayaṃbhuvastu tā dṛṣṭvā retaḥ samapatadbhuvi
उन्हें देखकर स्वयंभू का वीर्य भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 13 (13.132.13)
तस्य शुक्रस्य निष्यन्दान्पांसून्सङ्गृह्य भूमितः । प्रास्यत्पूषा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने ॥
tasya śukrasya niṣyandānpāṃsūnsaṅgṛhya bhūmitaḥ | prāsyatpūṣā karābhyāṃ vai tasminneva hutāśane
पूषा ने उस वीर्य से भीगी हुई भूमि की धूल को दोनों हाथों से बटोरकर उसी अग्नि में डाल दिया।
श्लोक 14 (13.132.14)
ततस्तस्मिन्सम्प्रवृत्ते सत्रे ज्वलितपावके । ब्रह्मणो जुह्वतस्तत्र प्रादुर्भावो बभूवह ॥
tatastasminsampravṛtte satre jvalitapāvake | brahmaṇo juhvatastatra prādurbhāvo babhūvaha
तब जब यज्ञ चल रहा था और अग्नि प्रज्वलित थी, वहाँ आहुति देते हुए ब्रह्मा से एक प्राकट्य हुआ।
श्लोक 15 (13.132.15)
स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रं स्रुवेण परिगृह्य सः । आज्यवन्मन्त्रतश्चापि सोऽजुहोद्भृगुनन्दन ॥
skannamātraṃ ca tacchukraṃ sruveṇa parigṛhya saḥ | ājyavanmantrataścāpi so'juhodbhṛgunandana
हे भृगुनन्दन, गिरते ही उस वीर्य को स्रुवा में लेकर उसने घी की तरह मन्त्रों के साथ उसका होम कर दिया।
श्लोक 16 (13.132.16)
ततः स जनयामास भूतग्रामं च वीर्यवान् । तस्य तत्तेजसस्तस्माज्जज्ञे लोकेषु तैजसम् ॥
tataḥ sa janayāmāsa bhūtagrāmaṃ ca vīryavān | tasya tattejasastasmājjajñe lokeṣu taijasam
तब उस पराक्रमी ने प्राणियों के समूह को उत्पन्न किया और उस वीर्य के तेज से लोकों में तैजस तत्त्व उत्पन्न हुआ।
श्लोक 17 (13.132.17)
तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्वं तथोभयम् । स गुणस्तेजसो नित्यं तमस्याकाशमेव च । सर्वभूतेषु च तथा सत्वं तेजस्तथोत्तमम् ॥
tamasastāmasā bhāvā vyāpi satvaṃ tathobhayam | sa guṇastejaso nityaṃ tamasyākāśameva ca | sarvabhūteṣu ca tathā satvaṃ tejastathottamam
तमस् से तामस भाव उत्पन्न हुए; सत्त्व दोनों में व्याप्त है। वह गुण सदा तेज का है, तमस् में आकाश है, और सब प्राणियों में सत्त्व तथा उत्तम तेज स्थित हैं।
श्लोक 18 (13.132.18)
शुक्रे हुतेऽग्नौ तस्मिंस्तु प्रादुरासंस्त्रयः प्रभो । पुरुषा वपुषा युक्ताः स्वैः स्वैः प्रसवजैर्गुणैः ॥
śukre hute'gnau tasmiṃstu prādurāsaṃstrayaḥ prabho | puruṣā vapuṣā yuktāḥ svaiḥ svaiḥ prasavajairguṇaiḥ
हे प्रभो, उस अग्नि में वीर्य का होम होने पर तीन पुरुष प्रकट हुए, जो शरीर धारण किए हुए थे और अपने-अपने उद्भव से उत्पन्न गुणों से युक्त थे।
श्लोक 19 (13.132.19)
भर्जनाद्भृगुरित्येवमङ्गारेभ्योऽङ्गिराऽभवत् । अङ्गारसंश्रयाच्चैव कविरित्यपरोऽभवत् । सह ज्वालाभिरुत्पन्नो भृगुस्तस्माद्भृगुः स्मृतः ॥
bharjanādbhṛgurityevamaṅgārebhyo'ṅgirā'bhavat | aṅgārasaṃśrayāccaiva kavirityaparo'bhavat | saha jvālābhirutpanno bhṛgustasmādbhṛguḥ smṛtaḥ
भूने जाने से वह भृगु हुआ; अंगारों से अंगिरा हुआ; अंगारों के आश्रय से एक और कवि हुआ। ज्वालाओं के साथ उत्पन्न होने के कारण भृगु 'भृगु' कहलाया।
श्लोक 20 (13.132.20)
मरीचिभ्यो मरीचिस्तु मारीचः कश्यपो ह्यभूत् । अङ्गारेभ्योऽङ्गिरास्तात वालखिल्याः कुशोच्चयात् ॥
marīcibhyo marīcistu mārīcaḥ kaśyapo hyabhūt | aṅgārebhyo'ṅgirāstāta vālakhilyāḥ kuśoccayāt
किरणों से मरीचि हुआ और मरीचि का पुत्र कश्यप हुआ। हे तात, अंगारों से अंगिरा हुआ और कुशों के ढेर से वालखिल्य उत्पन्न हुए।
श्लोक 21 (13.132.21)
अत्रैवात्रेति च विभो जातमत्रिं वदन्त्यपि ॥
atraivātreti ca vibho jātamatriṃ vadantyapi
हे विभो, वे कहते हैं कि अत्रि भी यहीं उत्पन्न हुआ, इसीलिए 'अत्रैव' के आधार पर उसका नाम अत्रि है।
श्लोक 22 (13.132.22)
तथा भस्मव्यपोहेभ्यो ब्रह्मर्षिगणसम्मताः । वैखानसाः समुत्पन्नास्तपः श्रुतगुणेप्सवः ॥
tathā bhasmavyapohebhyo brahmarṣigaṇasammatāḥ | vaikhānasāḥ samutpannāstapaḥ śrutaguṇepsavaḥ
इसी प्रकार भस्म के ढेरों से वैखानस उत्पन्न हुए, जो ब्रह्मर्षियों के समूह द्वारा सम्मानित थे और तप, शास्त्रज्ञान तथा सद्गुणों के अभिलाषी थे।
श्लोक 23 (13.132.23)
अश्रुतोऽस्य समुत्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ । शेषाः प्रजानां पतयः स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे । ऋषयो रोमकूपेभ्यः स्वेदाच्छन्दो बलान्मनः ॥
aśruto'sya samutpannāvaśvinau rūpasammatau | śeṣāḥ prajānāṃ patayaḥ srotobhyastasya jajñire | ṛṣayo romakūpebhyaḥ svedācchando balānmanaḥ
उसके अश्रुओं से रूपवान् दोनों अश्विनीकुमार उत्पन्न हुए; उसके स्रोतों से शेष प्रजापति उत्पन्न हुए; रोमकूपों से ऋषि, स्वेद से छन्द और बल से मन उत्पन्न हुआ।
श्लोक 24 (13.132.24)
एतस्मात्कारणादाहुरग्निः सर्वास्तु देवताः । ऋषयः श्रुतसम्पन्ना वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥
etasmātkāraṇādāhuragniḥ sarvāstu devatāḥ | ṛṣayaḥ śrutasampannā vedaprāmāṇyadarśanāt
इसी कारण वे कहते हैं कि अग्नि ही सब देवता हैं; शास्त्रज्ञ ऋषि वेद के प्रमाण को देखकर ऐसा कहते हैं।
श्लोक 25 (13.132.25)
यानि दारूणि निर्यासास्ते मासाः पक्षसंज्ञिताः । अहोरात्रा मुहूर्ताश्च वीतज्योतिश्च वारुणम् ॥
yāni dārūṇi niryāsāste māsāḥ pakṣasaṃjñitāḥ | ahorātrā muhūrtāśca vītajyotiśca vāruṇam
जो काष्ठ और रस हैं, वे पक्षों के नाम वाले मास हैं; वे अहोरात्र और मुहूर्त हैं, और बुझी हुई ज्योति वरुण की है।
श्लोक 26 (13.132.26)
रौद्रं लोहितमित्याहुर्लोहितात्कनकं स्मृतम् । तन्मैत्रमिति विज्ञेयं धूमाच्च वसवः स्मृताः ॥
raudraṃ lohitamityāhurlohitātkanakaṃ smṛtam | tanmaitramiti vijñeyaṃ dhūmācca vasavaḥ smṛtāḥ
लाल लौ को वे रुद्र की कहते हैं; लाल से सोना हुआ, ऐसा कहा गया है; उसे मित्र का जानना चाहिए; और धुएँ से वसु हुए, ऐसा स्मरण किया जाता है।
श्लोक 27 (13.132.27)
अर्चिषो याश्च ते रुद्रास्तथाऽऽदित्या महाप्रभाः । उद्दीप्तास्ते तथाऽङ्गारा ये धिष्ण्येषु दिवि स्थिताः ॥
arciṣo yāśca te rudrāstathā''dityā mahāprabhāḥ | uddīptāste tathā'ṅgārā ye dhiṣṇyeṣu divi sthitāḥ
लपटें वे रुद्र हैं और महाप्रभावान् आदित्य हैं; और जलते हुए अंगारे वे हैं जो आकाश में अपने स्थानों पर स्थित हैं।
श्लोक 28 (13.132.28)
अग्निर्नाथश्च लोकस्य तत्परं ब्रह्म तद्भुवम् । सर्वकामदमित्याहुस्तत्र हव्यमुपावहन् ॥
agnirnāthaśca lokasya tatparaṃ brahma tadbhuvam | sarvakāmadamityāhustatra havyamupāvahan
अग्नि लोक के रक्षक हैं; वही वह परम ब्रह्म और वही ध्रुव आधार हैं। उन्हें सब कामनाओं का देने वाला कहते हैं, जो वहाँ हव्य पहुँचाते हैं।
श्लोक 29 (13.132.29)
ततोऽब्रवीन्महादेवो वरुणः पवनात्मकः । मम सत्रमिदं दिव्यमहं गृहपतिस्त्विह ॥
tato'bravīnmahādevo varuṇaḥ pavanātmakaḥ | mama satramidaṃ divyamahaṃ gṛhapatistviha
तब वायुस्वरूप महादेव वरुण ने कहा: 'यह दिव्य सत्र मेरा है और यहाँ मैं गृहपति हूँ।
वरुण उवाच
श्लोक 30 (13.132.30)
त्रीणि पूर्वाण्यपत्यानि मम तानि न संशयः । इति जानीत खगमा मम यज्ञफलं हि तत् ॥
trīṇi pūrvāṇyapatyāni mama tāni na saṃśayaḥ | iti jānīta khagamā mama yajñaphalaṃ hi tat
ये पहले तीन सन्तानें निस्संदेह मेरी हैं। हे आकाशचारियो, यह जान लो कि वह मेरे यज्ञ का फल है।'
अग्निरुवाच
श्लोक 31 (13.132.31)
मदङ्गेभ्यः प्रसूतानि मदाश्रयकृतानि च । ममैव तान्यपत्यानि वरुणो ह्यवशात्मकः ॥
madaṅgebhyaḥ prasūtāni madāśrayakṛtāni ca | mamaiva tānyapatyāni varuṇo hyavaśātmakaḥ
'मेरे अंगों से उत्पन्न और मेरे आश्रित बनी हुई वे सन्तानें मेरी ही हैं, क्योंकि इसमें वरुण का अपने ऊपर अधिकार नहीं है।'
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 32 (13.132.32)
अथाब्रवील्लोकगुरुर्ब्रह्मा लोकपितामहः । ममैव तान्यपत्यानि मम शुक्लं हुतं हि तत् ॥
athābravīllokagururbrahmā lokapitāmahaḥ | mamaiva tānyapatyāni mama śuklaṃ hutaṃ hi tat
तब लोकगुरु लोकपितामह ब्रह्मा ने कहा: 'वे सन्तानें मेरी ही हैं; जो वीर्य आहुत हुआ, वह मेरा था।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 33 (13.132.33)
अहं वक्ता च मन्त्रस्य होता शुक्रस्य चैव ह । यस्य बीजं फलं तस्य शुक्रं चेत्कारणं मतम् ॥
ahaṃ vaktā ca mantrasya hotā śukrasya caiva ha | yasya bījaṃ phalaṃ tasya śukraṃ cetkāraṇaṃ matam
मैं मन्त्र का वक्ता और वीर्य का होता हूँ। जिसका बीज है, उसी का फल है, यदि बीज को ही कारण माना जाए।'
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 34 (13.132.34)
ततोऽब्रुवन्देवगणाः पितामहमुपेत्य वै । कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिरभिवन्द्य च ॥
tato'bruvandevagaṇāḥ pitāmahamupetya vai | kṛtāñjalipuṭāḥ sarve śirobhirabhivandya ca
तब देवताओं के समूहों ने पितामह के पास जाकर, हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर वन्दना करके कहा:
देवा ऊचुः
श्लोक 35 (13.132.35)
वयं च भगवन्सर्वे जगच्च सचराचरम् । तवैव प्रसवाः सर्वे तस्मादग्निर्विभावसुः । वरुणश्चेश्वरो देवो लभतां काममीप्सितम् ॥
vayaṃ ca bhagavansarve jagacca sacarācaram | tavaiva prasavāḥ sarve tasmādagnirvibhāvasuḥ | varuṇaśceśvaro devo labhatāṃ kāmamīpsitam
'भगवन्, हम सब और चर-अचर सहित यह सारा जगत् आपकी ही सन्तान है। इसलिए अग्नि विभावसु और ईश्वर देव वरुण अपनी इच्छित कामना को प्राप्त करें।'
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 36 (13.132.36)
निसर्गाद्ब्रह्मणश्चापि वरुणो यादसाम्पतिः । जग्राह वै भृगुं पूर्वमपत्यं सूर्यवर्चसम् ॥
nisargādbrahmaṇaścāpi varuṇo yādasāmpatiḥ | jagrāha vai bhṛguṃ pūrvamapatyaṃ sūryavarcasam
ब्रह्मा की व्यवस्था से जलचरों के स्वामी वरुण ने पहले सूर्य के समान तेजस्वी भृगु को अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण किया।
श्लोक 37 (13.132.37)
ईश्वरोऽङ्गिरसं चाग्नेरपत्यार्थमकल्पयत् । पितामहस्त्वपत्यं वै कविं जग्राह तत्त्ववित् ॥
īśvaro'ṅgirasaṃ cāgnerapatyārthamakalpayat | pitāmahastvapatyaṃ vai kaviṃ jagrāha tattvavit
ईश्वर ने अंगिरा को अग्नि की सन्तान होने के लिए नियत किया, और तत्त्व को जानने वाले पितामह ने कवि को अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण किया।
श्लोक 38 (13.132.38)
तदा स वारुणिः ख्यातो भृगुः प्रसवकर्मकृत् । आग्नेयस्त्वङ्गिराः श्रीमान्कविर्ब्राह्मो महायशाः । भार्गवाङ्गिरसौ लोके लोकसन्तानलक्षणौ ॥
tadā sa vāruṇiḥ khyāto bhṛguḥ prasavakarmakṛt | āgneyastvaṅgirāḥ śrīmānkavirbrāhmo mahāyaśāḥ | bhārgavāṅgirasau loke lokasantānalakṣaṇau
तब सन्तान उत्पन्न करने का कार्य करने वाला भृगु वरुण का पुत्र कहलाया, श्रीमान् अंगिरा अग्नि का और महायशस्वी कवि ब्रह्मा का। भार्गव और आंगिरस लोक में जगत् की वंश-परम्परा के चिह्न हैं।
श्लोक 39 (13.132.39)
एते विप्रवराः सर्वे प्रजानां पतयस्त्रयः । सर्वं सन्तानमेतेषामिदमित्युपधारय ॥
ete vipravarāḥ sarve prajānāṃ patayastrayaḥ | sarvaṃ santānameteṣāmidamityupadhāraya
ये तीनों श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रजापति हैं; समझ लो कि सारी वंश-परम्परा इन्हीं की है।
श्लोक 40 (13.132.40)
भृगोस्तु पुत्राः सप्तासन्सर्वे तुल्या भृगोर्गुणैः । च्यवनो वज्रशीर्षश्च शुचिरौर्वस्तथैव च ॥
bhṛgostu putrāḥ saptāsansarve tulyā bhṛgorguṇaiḥ | cyavano vajraśīrṣaśca śuciraurvastathaiva ca
भृगु के सात पुत्र थे, सब भृगु के गुणों के समान: च्यवन, वज्रशीर्ष, शुचि, और्व,
श्लोक 41 (13.132.41)
शुक्रो वरेण्यश्च विभुः सवनश्चेति सप्त ते । भार्गवा वारुणाः सर्वे येषां वंशे भवानपि ॥
śukro vareṇyaśca vibhuḥ savanaśceti sapta te | bhārgavā vāruṇāḥ sarve yeṣāṃ vaṃśe bhavānapi
शुक्र, वरेण्य, विभु और सवन। ये सातों भार्गव सब वरुण के हैं, और आप भी उन्हीं के वंश में हैं।
श्लोक 42 (13.132.42)
अष्टौ चाङ्गिरसः पुत्रा वारुणास्तेऽप्यवारुणाः । बृहस्पतिरुचथ्यश्च वयस्यः शान्तिरेव च ॥
aṣṭau cāṅgirasaḥ putrā vāruṇāste'pyavāruṇāḥ | bṛhaspatirucathyaśca vayasyaḥ śāntireva ca
अंगिरा के आठ पुत्र थे, जो वरुण के भी थे और वरुण के नहीं भी: बृहस्पति, उचथ्य, वयस्य, शान्ति,
श्लोक 43 (13.132.43)
घोरो विरूपः संवर्तः सुधन्वा चाष्टमः स्मृतः । एतेऽष्टौ वह्निजाः सर्वे ज्ञाननिष्ठा निरामयाः ॥
ghoro virūpaḥ saṃvartaḥ sudhanvā cāṣṭamaḥ smṛtaḥ | ete'ṣṭau vahnijāḥ sarve jñānaniṣṭhā nirāmayāḥ
घोर, विरूप, संवर्त और आठवाँ सुधन्वा कहा गया है। ये आठों अग्नि से उत्पन्न, सब ज्ञान में निष्ठावान् और निर्दोष थे।
श्लोक 44 (13.132.44)
ब्राह्मणाश्च कवेः पुत्रा वारुणास्तेऽप्युदाहृताः । अष्टौ प्रसवजैर्युक्ता गुणैर्ब्रह्मविदः शुभाः ॥
brāhmaṇāśca kaveḥ putrā vāruṇāste'pyudāhṛtāḥ | aṣṭau prasavajairyuktā guṇairbrahmavidaḥ śubhāḥ
कवि के पुत्र ब्राह्मण थे, और वे भी वरुण के कहे गए हैं: आठ, अपने उद्भव के गुणों से युक्त, शुभ और ब्रह्मवेत्ता।
श्लोक 45 (13.132.45)
कविः काव्यश्च विष्णुश्च बुद्धिमानुशना तथा । भृगुश्च वरुणश्चैव काश्यपोऽग्निश्च धर्मवित् ॥
kaviḥ kāvyaśca viṣṇuśca buddhimānuśanā tathā | bhṛguśca varuṇaścaiva kāśyapo'gniśca dharmavit
कवि, काव्य, विष्णु, बुद्धिमान् उशना, भृगु, वरुण, काश्यप और धर्म को जानने वाले अग्नि।
श्लोक 46 (13.132.46)
अष्टौ कविसुता ह्येते सर्वमेभिर्जगत्ततम् । प्रजापतय एते हि प्रजानां यैरिमाः प्रजाः ॥
aṣṭau kavisutā hyete sarvamebhirjagattatam | prajāpataya ete hi prajānāṃ yairimāḥ prajāḥ
ये कवि के आठ पुत्र हैं, इनसे जगत् व्याप्त है। ये प्रजापति हैं, जिनसे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं।
श्लोक 47 (13.132.47)
एवमङ्गिरसश्चैव कवेश्च प्रसवान्वयैः । भृगोश्च भृगुशार्दूल वंशजैः सततं जगत् ॥
evamaṅgirasaścaiva kaveśca prasavānvayaiḥ | bhṛgośca bhṛguśārdūla vaṃśajaiḥ satataṃ jagat
इस प्रकार हे भृगुश्रेष्ठ, अंगिरा और कवि की सन्तानों से तथा भृगु के वंशजों से जगत् निरन्तर चलता है।
श्लोक 48 (13.132.48)
वरुणश्चादितो विप्र जग्राह प्रभुरीश्वरः । कविं तात भृगुं चापि तस्मात्तौ वारुणौ स्मृतौ ॥
varuṇaścādito vipra jagrāha prabhurīśvaraḥ | kaviṃ tāta bhṛguṃ cāpi tasmāttau vāruṇau smṛtau
हे विप्र, समर्थ ईश्वर वरुण ने पहले कवि और भृगु को भी ग्रहण किया, इसलिए वे दोनों वरुण के कहे गए हैं।
श्लोक 49 (13.132.49)
जग्राहाङ्गिरसं देवः शिखी तस्माद्धुताशनः । तस्मादाङ्गिरसा ज्ञेयाः सर्व एव तदन्वयाः ॥
jagrāhāṅgirasaṃ devaḥ śikhī tasmāddhutāśanaḥ | tasmādāṅgirasā jñeyāḥ sarva eva tadanvayāḥ
शिखाधारी देव ने अंगिरा को ग्रहण किया, इसी से वे हुताशन हैं; इसलिए उनके सारे वंशजों को आंगिरस जानना चाहिए।
श्लोक 50 (13.132.50)
ब्रह्मा पितामहः पूर्वं देवताभिः प्रसादितः । इमे नः सन्तरिष्यन्ति प्रजाभिर्जगदीश्वराः ॥
brahmā pitāmahaḥ pūrvaṃ devatābhiḥ prasāditaḥ | ime naḥ santariṣyanti prajābhirjagadīśvarāḥ
पूर्वकाल में देवताओं ने पितामह ब्रह्मा को प्रसन्न किया: 'ये जगत् के स्वामी अपनी सन्तानों द्वारा हमारा उद्धार करेंगे।
देवा ऊचुः
श्लोक 51 (13.132.51)
सर्वे प्रजानां पतयः सर्वे चातितपस्विनः । त्वत्प्रसादादिमं लोकं धारयिष्यन्ति शाश्वतं ॥
sarve prajānāṃ patayaḥ sarve cātitapasvinaḥ | tvatprasādādimaṃ lokaṃ dhārayiṣyanti śāśvataṃ
ये सब प्रजापति हैं और सब महान् तपस्वी हैं; आपकी कृपा से ये इस लोक को सदा धारण करेंगे।
श्लोक 52 (13.132.52)
तथैव वंशकर्तारस्तव तेजोविवर्धनाः । भवेयुर्वेदविदुषः सर्वे च कृतिनस्तथा ॥
tathaiva vaṃśakartārastava tejovivardhanāḥ | bhaveyurvedaviduṣaḥ sarve ca kṛtinastathā
इसी प्रकार आपके तेज को बढ़ाने वाले वंशकर्ता सब वेदों के ज्ञाता और कृतार्थ होंगे।
श्लोक 53 (13.132.53)
देवपक्षचराः सौम्याः प्राजापत्या महर्षयः । अनन्तं ब्रह्म सत्यं च तपश्च परमं भुवि ॥
devapakṣacarāḥ saumyāḥ prājāpatyā maharṣayaḥ | anantaṃ brahma satyaṃ ca tapaśca paramaṃ bhuvi
वे देवताओं के पक्ष में विचरने वाले, सौम्य और प्रजापति की परम्परा के महर्षि होंगे; वे पृथ्वी पर अनन्त ब्रह्म, सत्य और परम तप होंगे।
श्लोक 54 (13.132.54)
सर्वे हि वयमेते च तवैव प्रसवाः प्रभो । देवानां ब्राह्मणानां च त्वं हि कर्ता पितामह ॥
sarve hi vayamete ca tavaiva prasavāḥ prabho | devānāṃ brāhmaṇānāṃ ca tvaṃ hi kartā pitāmaha
हे प्रभो, हम सब और ये भी आपकी ही सन्तान हैं; हे पितामह, आप ही देवताओं और ब्राह्मणों के रचयिता हैं।
श्लोक 55 (13.132.55)
मारीचमादितः कृत्वा सर्वे चैवाथ भार्गवाः । अपत्यानीति सम्प्रेक्ष्य क्षमयाम पितामह ॥
mārīcamāditaḥ kṛtvā sarve caivātha bhārgavāḥ | apatyānīti samprekṣya kṣamayāma pitāmaha
मरीचि की परम्परा को पहले रखकर और फिर सब भार्गवों को, उन्हें सन्तान मानकर, हे पितामह, हम आपसे क्षमा माँगते हैं।
श्लोक 56 (13.132.56)
अथ स्वेनैव रूपेण प्रजनिष्यन्ति वै प्रजाः । स्थापयिष्यन्ति चात्मानं युगादिनिधने तथा ॥
atha svenaiva rūpeṇa prajaniṣyanti vai prajāḥ | sthāpayiṣyanti cātmānaṃ yugādinidhane tathā
तब वे अपने-अपने रूप में प्रजाओं को उत्पन्न करेंगे और युग के आदि से अन्त तक अपने को स्थापित रखेंगे।'
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 57 (13.132.57)
इत्युक्तः स तदा तैस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः । तथेत्येवाब्रवीत्प्रीतस्तेऽपि जग्मुर्यथागतम् ॥
ityuktaḥ sa tadā taistu brahmā lokapitāmahaḥ | tathetyevābravītprītaste'pi jagmuryathāgatam
उनके ऐसा कहने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर 'ऐसा ही हो' कहा, और वे भी जैसे आए थे वैसे चले गए।
श्लोक 58 (13.132.58)
एवमेतत्पुरावृत्तं तस्य यज्ञे महात्मनः । देवश्रेष्ठस्य लोकादौ वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् ॥
evametatpurāvṛttaṃ tasya yajñe mahātmanaḥ | devaśreṣṭhasya lokādau vāruṇīṃ bibhratastanum
इस प्रकार वरुण का रूप धारण किए हुए उन महात्मा देवश्रेष्ठ के यज्ञ में लोकों के आदि में यह घटना हुई थी।
श्लोक 59 (13.132.59)
अग्निर्ब्रह्म पशुपतिः शर्वो रुद्रः प्रजापतिः । अग्नेरपत्यमेतद्वै सुवर्णमिति धारणाः ॥
agnirbrahma paśupatiḥ śarvo rudraḥ prajāpatiḥ | agnerapatyametadvai suvarṇamiti dhāraṇāḥ
अग्नि ही ब्रह्मा, पशुपति, शर्व, रुद्र और प्रजापति हैं। यह सोना अग्नि की सन्तान है, यही निश्चय है।
श्लोक 60 (13.132.60)
अग्न्यभावे च कुरुते वह्निस्थानेषु काञ्चनम् । जामदग्न्यप्रमाणज्ञो वेदश्रुतिनिदर्शनात् ॥
agnyabhāve ca kurute vahnisthāneṣu kāñcanam | jāmadagnyapramāṇajño vedaśrutinidarśanāt
अग्नि के अभाव में अग्नि के स्थानों में सोना रखा जाता है। हे जामदग्न्य, आप प्रमाणों को जानते हैं; यह वेद और श्रुति के साक्ष्य से सिद्ध है।
श्लोक 61 (13.132.61)
कुशस्तम्बे जुहोत्यग्निं सुवर्णे तत्र च स्थिते । वल्मीकस्य वपायां च कर्णे वाजस्य दक्षिणे ॥
kuśastambe juhotyagniṃ suvarṇe tatra ca sthite | valmīkasya vapāyāṃ ca karṇe vājasya dakṣiṇe
जहाँ सोना रखा हो ऐसे कुश के गुच्छे में, दीमक की बाँबी के छिद्र में और घोड़े के दाहिने कान में अग्नि के लिए होम किया जाता है;
श्लोक 62 (13.132.62)
शकटोर्व्यां परस्याप्सु ब्राह्मणस्य करे तथा । हुते प्रीतिकरीमृद्धिं भगवांस्तत्र मन्यते ॥
śakaṭorvyāṃ parasyāpsu brāhmaṇasya kare tathā | hute prītikarīmṛddhiṃ bhagavāṃstatra manyate
गाड़ी के मार्ग में, दूसरे के जल में और ब्राह्मण के हाथ में भी; वहाँ होम करने पर भगवान् अग्नि उसे प्रीतिकर समृद्धि मानते हैं।
श्लोक 63 (13.132.63)
तस्मादग्निपराः सर्वे देवता इति शुश्रुम । ब्रह्मणो हि प्रभूतोऽग्निरग्नेरपि च काञ्चनम् ॥
tasmādagniparāḥ sarve devatā iti śuśruma | brahmaṇo hi prabhūto'gniragnerapi ca kāñcanam
इसलिए हमने सुना है कि सब देवता अग्नि को ही परम मानते हैं; अग्नि ब्रह्मा से उत्पन्न हुए और सोना अग्नि से।
श्लोक 64 (13.132.64)
तस्माद्ये वै प्रयच्छन्ति सुवर्णं धर्मदर्शिनः । देवतास्ते प्रयच्छन्ति समस्ता इति नः श्रुतम् ॥
tasmādye vai prayacchanti suvarṇaṃ dharmadarśinaḥ | devatāste prayacchanti samastā iti naḥ śrutam
इसलिए जो धर्म को देखने वाले लोग सोना देते हैं, वे हमने सुना है, सभी देवताओं को ही देते हैं।
श्लोक 65 (13.132.65)
तस्य वा तपसो लोकान्गच्छतः परमां गतिम् । स्वर्लोके राजराज्येन सोभिषिच्येत भार्गव ॥
tasya vā tapaso lokāngacchataḥ paramāṃ gatim | svarloke rājarājyena sobhiṣicyeta bhārgava
हे भार्गव, तप के प्रभाव से लोकों में परम गति को जाता हुआ वह स्वर्गलोक में राजराज के राज्य पर अभिषिक्त होता है।
श्लोक 66 (13.132.66)
आदित्योदयने प्राप्ते विधिमन्त्रपुरस्कृतम् । ददाति काञ्चनं यो वै दुःस्वप्नं प्रतिहन्ति सः ॥
ādityodayane prāpte vidhimantrapuraskṛtam | dadāti kāñcanaṃ yo vai duḥsvapnaṃ pratihanti saḥ
जो सूर्योदय के समय विधि और मन्त्रों के साथ सोना देता है, वह दुःस्वप्न का नाश करता है।
श्लोक 67 (13.132.67)
ददात्युदितमात्रे यस्तस्य पाप्मा विधूयते । मध्याह्ने ददतो रुक्मं हन्ति पापमनागतम् ॥
dadātyuditamātre yastasya pāpmā vidhūyate | madhyāhne dadato rukmaṃ hanti pāpamanāgatam
जो सूर्य के उदित होते ही देता है, उसका पाप झड़ जाता है; जो मध्याह्न में सोना देता है, वह आने वाले पाप को नष्ट कर देता है।
श्लोक 68 (13.132.68)
ददाति पश्चिमां सन्ध्यां यः सुवर्णं यतव्रतः । ब्रह्मवाय्वग्निसोमानां सालोक्यमुपयाति सः ॥
dadāti paścimāṃ sandhyāṃ yaḥ suvarṇaṃ yatavrataḥ | brahmavāyvagnisomānāṃ sālokyamupayāti saḥ
जो व्रत का पालन करने वाला पश्चिम सन्ध्या में सोना देता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और सोम के लोक में स्थान पाता है।
श्लोक 69 (13.132.69)
सेन्द्रेषु चैव लोकेषु प्रतिष्ठा विन्दते शुभाम् । इह लोके यशः प्राप्य शान्तपाप्मा च मोदते ॥
sendreṣu caiva lokeṣu pratiṣṭhā vindate śubhām | iha loke yaśaḥ prāpya śāntapāpmā ca modate
वह इन्द्र के लोकों में भी शुभ प्रतिष्ठा पाता है; इस लोक में यश पाकर पापरहित होकर आनन्द करता है।
श्लोक 70 (13.132.70)
ततः सम्पद्यतेऽन्येषु लोकेष्वप्रतिमः सदा । अनावृतगतिश्चैव कामचारो भवत्युत ॥
tataḥ sampadyate'nyeṣu lokeṣvapratimaḥ sadā | anāvṛtagatiścaiva kāmacāro bhavatyuta
फिर अन्य लोकों में वह सदा अप्रतिम होता है, उसकी गति अबाध होती है और वह इच्छानुसार विचरता है।
श्लोक 71 (13.132.71)
न च क्षरति तेभ्यश्च यशश्चैवाप्नुते महत् । सुवर्णमक्षयं दत्त्वा लोकांश्चाप्नोति पुष्कलान् ॥
na ca kṣarati tebhyaśca yaśaścaivāpnute mahat | suvarṇamakṣayaṃ dattvā lokāṃścāpnoti puṣkalān
वह उन लोकों से च्युत नहीं होता और महान् यश पाता है; अक्षय सोना देकर वह प्रचुर लोक प्राप्त करता है।
श्लोक 72 (13.132.72)
यस्तु सञ्जनयित्वाऽग्निमादित्योदयनं प्रति । दद्याद्वै व्रतमुद्दिश्य सर्वकामान्समश्नुते ॥
yastu sañjanayitvā'gnimādityodayanaṃ prati | dadyādvai vratamuddiśya sarvakāmānsamaśnute
और जो अग्नि को प्रज्वलित करके सूर्योदय के समय किसी व्रत का उद्देश्य करके दान देता है, वह सब कामनाएँ पा लेता है।
श्लोक 73 (13.132.73)
अग्निरित्येव तत्प्राहुः प्रदानं च सुखावहम् । यथेष्टगुणसंवृत्तं प्रवर्तकमिति स्मृतम् ॥
agnirityeva tatprāhuḥ pradānaṃ ca sukhāvaham | yatheṣṭaguṇasaṃvṛttaṃ pravartakamiti smṛtam
उसे वे अग्नि ही कहते हैं; यह दान सुख देने वाला, इच्छित गुणों से युक्त और सब कुछ को प्रवृत्त करने वाला माना गया है।
श्लोक 74 (13.132.74)
एषा सुवर्णस्योत्पत्तिः कथिता ते मयाऽनघ । कार्तिकेयस्य च विभो तद्विद्धि भृगुनन्दन ॥
eṣā suvarṇasyotpattiḥ kathitā te mayā'nagha | kārtikeyasya ca vibho tadviddhi bhṛgunandana
हे निष्पाप, मैंने तुम्हें यह सोने की उत्पत्ति बताई, और हे विभो, कार्तिकेय की भी; हे भृगुनन्दन, इसे जान लो।
श्लोक 75 (13.132.75)
कार्तिकेयस्तु संवृद्धः कालेन महता तदा । देवैः सेनापतित्वेन वृतः सेन्द्रैर्भृगूद्वह ॥
kārtikeyastu saṃvṛddhaḥ kālena mahatā tadā | devaiḥ senāpatitvena vṛtaḥ sendrairbhṛgūdvaha
हे भृगुवंशी, बहुत समय बाद बड़े हो जाने पर कार्तिकेय को इन्द्र सहित देवताओं ने सेनापति चुना।
श्लोक 76 (13.132.76)
जघान तारकं चापि दैत्यमन्यांस्तथाऽसुरान् । त्रिदशेन्द्राज्ञया ब्रह्मँल्लोकानां हितकाम्यया ॥
jaghāna tārakaṃ cāpi daityamanyāṃstathā'surān | tridaśendrājñayā brahmam̐llokānāṃ hitakāmyayā
हे ब्रह्मन्, देवेन्द्र की आज्ञा से और लोकों के हित की कामना से उसने दैत्य तारक को और अन्य असुरों को भी मार डाला।
श्लोक 77 (13.132.77)
सुवर्णदाने च मया कथितास्ते गुणा विभो । तस्मात्सुवर्णं विप्रेभ्यः प्रयच्छ ददतां वर ॥
suvarṇadāne ca mayā kathitāste guṇā vibho | tasmātsuvarṇaṃ viprebhyaḥ prayaccha dadatāṃ vara
हे विभो, मैंने तुम्हें सोने के दान के ये गुण बता दिए; इसलिए हे दाताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मणों को सोना दो।
भीष्म उवाच
श्लोक 78 (13.132.78)
इत्युक्तः स वसिष्ठेन जामदग्न्यः प्रतापवान् । ददौ सुवर्णं विप्रेभ्यो व्यमुच्यत च किल्बिषात् ॥
ityuktaḥ sa vasiṣṭhena jāmadagnyaḥ pratāpavān | dadau suvarṇaṃ viprebhyo vyamucyata ca kilbiṣāt
वसिष्ठ के ऐसा कहने पर प्रतापी जामदग्न्य ने ब्राह्मणों को सोना दिया और पाप से मुक्त हो गए।
श्लोक 79 (13.132.79)
एतत्ते सर्वमाख्यातं सुवर्णस्य महीपते । प्रदानस्य फलं चैव जन्म चास्य युधिष्ठिर ॥
etatte sarvamākhyātaṃ suvarṇasya mahīpate | pradānasya phalaṃ caiva janma cāsya yudhiṣṭhira
हे महीपते युधिष्ठिर, मैंने सोने के विषय में यह सब कह दिया: उसके दान का फल और उसका जन्म।
श्लोक 80 (13.132.80)
तस्मात्त्वमपि विप्रेभ्यः प्रयच्छ कनकं बहु । ददत्सुवर्णं नृपते किल्बिषाद्विप्रमोक्ष्यसि ॥
tasmāttvamapi viprebhyaḥ prayaccha kanakaṃ bahu | dadatsuvarṇaṃ nṛpate kilbiṣādvipramokṣyasi
इसलिए तुम भी ब्राह्मणों को बहुत-सा सोना दो। हे राजन्, सोना देकर तुम पाप से मुक्त हो जाओगे।