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अनुशासन पर्व · अध्याय 133

स्कन्द का जन्म और तारक का वध

युधिष्ठिर के अनुरोध पर भीष्म बताते हैं कि तारक कैसे मारा गया। देवताओं और ऋषियों की प्रेरणा से छह कृत्तिकाओं ने अग्नि का गर्भ धारण किया और एक साथ उसे जन्म दिया; पृथ्वी ने उसे ग्रहण किया और वह सरकण्डों के वन में कुमार कार्तिकेय के रूप में बढ़ा, जिसे स्कन्द और गुह भी कहते हैं। देवता उसे देखने आए और उपहार तथा पशु-पक्षी दिए; तारक उसे नष्ट न कर सका, तब देवताओं ने उसे सेनापति बनाया और उसने अपनी अमोघ शक्ति से दानव को मार डाला। अन्त में भीष्म बताते हैं कि अग्नि का तेज सोना सर्वोत्तम रत्न है और राम सोना दान करके पाप से मुक्त हुए।

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.133.1)

उक्ताः पितामहेनेह सुवर्णस्य विधानतः । विस्तरेण प्रदानस्य ये गुणाः श्रुतिलक्षणाः ॥

uktāḥ pitāmaheneha suvarṇasya vidhānataḥ | vistareṇa pradānasya ye guṇāḥ śrutilakṣaṇāḥ

पितामह ने यहाँ विस्तार से सोने के विषय में बताया और श्रुतिसम्मत उसके दान के जो गुण हैं, वे भी कहे।

श्लोक 2 (13.133.2)

यत्तु कारणमुत्पत्तेः सुवर्णस्य प्रकीर्तितम् । स कथं तारकः प्राप्तो निधनं तद्ब्रवीहि मे ॥

yattu kāraṇamutpatteḥ suvarṇasya prakīrtitam | sa kathaṃ tārakaḥ prāpto nidhanaṃ tadbravīhi me

परन्तु सोने की उत्पत्ति का जो कारण आपने बताया, उसके सम्बन्ध में तारक की मृत्यु कैसे हुई? वह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (13.133.3)

उक्तः स दैवतानां हि अवध्य इति पार्थिव । कथं तस्याभवन्मृत्युर्विस्तरेण प्रकीर्तय ॥

uktaḥ sa daivatānāṃ hi avadhya iti pārthiva | kathaṃ tasyābhavanmṛtyurvistareṇa prakīrtaya

हे राजन्, कहा गया है कि वह देवताओं के लिए अवध्य था। फिर उसकी मृत्यु कैसे हुई? विस्तार से बताइए।

श्लोक 4 (13.133.4)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः कुरुकुलोद्वह । कार्त्स्न्येन तारकवधं परं कौतूहलं हि मे ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tvattaḥ kurukulodvaha | kārtsnyena tārakavadhaṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me

हे कुरुकुल के श्रेष्ठ, मैं यह आपसे सुनना चाहता हूँ। तारक के वध का पूरा वृत्तान्त जानने की मेरी बड़ी उत्सुकता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 5 (13.133.5)

विपन्नकृत्या राजेन्द्र देवता ऋषयस्तथा । कृत्तिकाश्चोदयामासुरपत्यभरणाय वै ॥

vipannakṛtyā rājendra devatā ṛṣayastathā | kṛttikāścodayāmāsurapatyabharaṇāya vai

हे राजेन्द्र, जिनका कार्य विफल हो गया था, उन देवताओं और ऋषियों ने कृत्तिकाओं को सन्तान का पालन करने के लिए प्रेरित किया।

श्लोक 6 (13.133.6)

न देवतानां काचिद्धि समर्था जातवेदसः । एता हि शक्तास्तं गर्भं सन्धारयितुमोजसा ॥

na devatānāṃ kāciddhi samarthā jātavedasaḥ | etā hi śaktāstaṃ garbhaṃ sandhārayitumojasā

देवताओं में कोई भी अग्नि के उस गर्भ को धारण करने में समर्थ नहीं थी; केवल ये कृत्तिकाएँ ही अपने ओज से उस गर्भ को धारण करने में समर्थ थीं।

श्लोक 7 (13.133.7)

षण्णां तासां ततः प्रीतः पावको गर्भधारणात् । स्वेन तेजोविसर्गेण वीर्येण परमेण च ॥

ṣaṇṇāṃ tāsāṃ tataḥ prītaḥ pāvako garbhadhāraṇāt | svena tejovisargeṇa vīryeṇa parameṇa ca

उन छहों के गर्भ धारण करने से अग्नि प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने तेज और परम वीर्य का सेचन किया।

श्लोक 8 (13.133.8)

तास्तु षट् कृत्तिका गर्भं पुपुषुर्जातवेदसः । षट्सु वर्त्मसु तेजोऽग्नेः सकलं निहितं प्रभो ॥

tāstu ṣaṭ kṛttikā garbhaṃ pupuṣurjātavedasaḥ | ṣaṭsu vartmasu tejo'gneḥ sakalaṃ nihitaṃ prabho

उन छह कृत्तिकाओं ने अग्नि के उस गर्भ का पोषण किया; हे प्रभो, छहों मार्गों में अग्नि का सारा तेज स्थापित हुआ।

श्लोक 9 (13.133.9)

ततस्ता वर्धमानस्य कुमारस्य महात्मनः । तेजसाऽभिपरीताङ्ग्यो न क्वचिच्छर्म लेभिरे ॥

tatastā vardhamānasya kumārasya mahātmanaḥ | tejasā'bhiparītāṅgyo na kvaciccharma lebhire

उस महात्मा कुमार के बढ़ने पर उसके तेज से व्याप्त होकर वे कहीं भी सुख नहीं पाती थीं।

श्लोक 10 (13.133.10)

ततस्तेजःपरीताङ्ग्यः सर्वाः काल उपस्थिते । समं गर्भं सुषुविरे कृत्तिकास्ता नरर्षभ ॥

tatastejaḥparītāṅgyaḥ sarvāḥ kāla upasthite | samaṃ garbhaṃ suṣuvire kṛttikāstā nararṣabha

तब तेज से व्याकुल हुई सब कृत्तिकाओं ने, समय आने पर, हे नरश्रेष्ठ, एक साथ गर्भ को जन्म दिया।

श्लोक 11 (13.133.11)

ततस्तं षडधिष्ठानं गर्भमेकत्वमागतम् । पृथिवी प्रतिजग्राह कृत्तिकानां समीपतः ॥

tatastaṃ ṣaḍadhiṣṭhānaṃ garbhamekatvamāgatam | pṛthivī pratijagrāha kṛttikānāṃ samīpataḥ

तब छह आधारों वाले और एक हो गए उस गर्भ को पृथ्वी ने कृत्तिकाओं के समीप से ग्रहण किया।

श्लोक 12 (13.133.12)

स गर्भो दिव्यसंस्थानो दीप्तिमान्पावकप्रभः । दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधे प्रियदर्शनः ॥

sa garbho divyasaṃsthāno dīptimānpāvakaprabhaḥ | divyaṃ śaravaṇaṃ prāpya vavṛdhe priyadarśanaḥ

दिव्य रूप वाला, दीप्तिमान् और अग्नि के समान प्रभा वाला वह गर्भ दिव्य सरकण्डों के वन में पहुँचकर प्रिय दर्शन वाले बालक के रूप में बढ़ा।

श्लोक 13 (13.133.13)

ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालमर्कसमद्युतिम् । जातस्नेहाश्च सौहार्दात्पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ॥

dadṛśuḥ kṛttikāstaṃ tu bālamarkasamadyutim | jātasnehāśca sauhārdātpupuṣuḥ stanyavisravaiḥ

कृत्तिकाओं ने सूर्य के समान तेजस्वी उस बालक को देखा और सौहार्द से उत्पन्न स्नेह के कारण अपने स्तनों की दूध की धाराओं से उसे पाला।

श्लोक 14 (13.133.14)

अभवत्कार्तिकेयः स त्रैलोक्ये सचराचरे । स्कन्नत्वात्स्कन्दतां प्राप्तो गुहावासाद्गुहोऽभवत् ॥

abhavatkārtikeyaḥ sa trailokye sacarācare | skannatvātskandatāṃ prāpto guhāvāsādguho'bhavat

वह चर-अचर सहित तीनों लोकों में कार्तिकेय हुआ; स्कन्न (गिरा हुआ) होने से वह स्कन्द कहलाया और गुहा में रहने से गुह हुआ।

श्लोक 15 (13.133.15)

ततो देवास्त्रयस्त्रिंशद्दिशश्च सदिगीश्वराः । रुद्रो धाता च विष्णुश्च यमः पूषाऽर्यमा भगः ॥

tato devāstrayastriṃśaddiśaśca sadigīśvarāḥ | rudro dhātā ca viṣṇuśca yamaḥ pūṣā'ryamā bhagaḥ

तब तैंतीस देवता, दिशाएँ अपने दिक्पालों सहित, रुद्र, धाता, विष्णु, यम, पूषा, अर्यमा, भग,

श्लोक 16 (13.133.16)

अंशो मित्रश्च साध्याश्च वासवो वसवोऽश्विनौ । आपो वायुर्नभश्चन्द्रो नक्षत्राणि ग्रहा रविः ॥

aṃśo mitraśca sādhyāśca vāsavo vasavo'śvinau | āpo vāyurnabhaścandro nakṣatrāṇi grahā raviḥ

अंश, मित्र, साध्य, वासव, वसु, दोनों अश्विनीकुमार, जल, वायु, आकाश, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह और सूर्य,

श्लोक 17 (13.133.17)

पृथग्भूतानि चान्यानि यानि देवगणानि वै । आजग्मुस्तेऽद्भुतं द्रष्टुं कुमारं ज्वलनात्मजम् ॥

pṛthagbhūtāni cānyāni yāni devagaṇāni vai | ājagmuste'dbhutaṃ draṣṭuṃ kumāraṃ jvalanātmajam

और जो अन्य देवगण अलग-अलग हैं, वे सब उस अद्भुत अग्निपुत्र कुमार को देखने आए।

श्लोक 18 (13.133.18)

ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव गन्धर्वाश्च जगुस्तथा । षडाननं कुमारं तु द्विषडक्षं द्विजप्रियम् ॥

ṛṣayastuṣṭuvuścaiva gandharvāśca jagustathā | ṣaḍānanaṃ kumāraṃ tu dviṣaḍakṣaṃ dvijapriyam

ऋषियों ने उसकी स्तुति की और गन्धर्वों ने गान किया; उन्होंने उस छह मुख वाले, बारह नेत्रों वाले, ब्राह्मणों के प्रिय कुमार को देखा,

श्लोक 19 (13.133.19)

पीनांसं द्वादशभुजं पावकादित्यवर्चसम् । शयानं शरगुल्मस्थं दृष्ट्वा देवाः सहर्षिभिः । लेभिरे परमं हर्षं मेनिरे चासुरं हतम् ॥

pīnāṃsaṃ dvādaśabhujaṃ pāvakādityavarcasam | śayānaṃ śaragulmasthaṃ dṛṣṭvā devāḥ saharṣibhiḥ | lebhire paramaṃ harṣaṃ menire cāsuraṃ hatam

जो चौड़े कन्धों वाला, बारह भुजाओं वाला और अग्नि तथा सूर्य के समान तेजस्वी था और सरकण्डों के झुरमुट में लेटा था। उसे देखकर ऋषियों सहित देवताओं ने परम हर्ष पाया और असुर को मरा हुआ मान लिया।

श्लोक 20 (13.133.20)

ततो देवाः प्रियाण्यस्य सर्व एव समाहरन् । क्रीडतः क्रीडनीयानि ददुः पक्षिगणांश्च ह ॥

tato devāḥ priyāṇyasya sarva eva samāharan | krīḍataḥ krīḍanīyāni daduḥ pakṣigaṇāṃśca ha

तब सब देवताओं ने उसके प्रिय उपहार लाए, खेलते हुए उसे खिलौने दिए और पक्षियों के झुंड भी दिए।

श्लोक 21 (13.133.21)

सुपर्णोऽस्य ददौ पुत्रं मयूरं चित्रबर्हिणम् । राक्षसाश्च ददुस्तस्मै वराहमहिषावुभौ ॥

suparṇo'sya dadau putraṃ mayūraṃ citrabarhiṇam | rākṣasāśca dadustasmai varāhamahiṣāvubhau

सुपर्ण ने उसे अपना पुत्र, चित्र-विचित्र पंखों वाला मयूर, दिया; राक्षसों ने उसे वराह और महिष दोनों दिए।

श्लोक 22 (13.133.22)

कुक्कुटं चाग्निसङ्काशं प्रददावरुणः स्वयम् । चन्द्रमाः प्रददौ मेषमादित्यो रुचिरां प्रभाम् ॥

kukkuṭaṃ cāgnisaṅkāśaṃ pradadāvaruṇaḥ svayam | candramāḥ pradadau meṣamādityo rucirāṃ prabhām

अरुण ने स्वयं अग्नि के समान तेजस्वी कुक्कुट दिया; चन्द्रमा ने मेढ़ा दिया और सूर्य ने सुन्दर प्रभा दी।

श्लोक 23 (13.133.23)

गवां माता च गा देवी ददौ शतसहस्रशः । छागमग्निर्गुणोपेतमिला पुष्पफलं बहु ॥

gavāṃ mātā ca gā devī dadau śatasahasraśaḥ | chāgamagnirguṇopetamilā puṣpaphalaṃ bahu

गौओं की माता गोदेवी ने सैकड़ों-हज़ारों गौएँ दीं; अग्नि ने उत्तम गुणों वाला बकरा दिया और इला ने बहुत-से फूल और फल दिए।

श्लोक 24 (13.133.24)

सुधन्वा शकटं चैव रथं चाञ्चितकूबरम् । वरुणो वारुणान्दिव्यान्सगजान्प्रददौ शुभान् ॥

sudhanvā śakaṭaṃ caiva rathaṃ cāñcitakūbaram | varuṇo vāruṇāndivyānsagajānpradadau śubhān

सुधन्वा ने गाड़ी और झुके हुए जुए वाला रथ दिया; वरुण ने जल के सुन्दर दिव्य प्राणी हाथियों सहित दिए।

श्लोक 25 (13.133.25)

सिंहान्सुरेन्द्रो व्याघ्रांश्च द्विपानन्यांश्च दंष्ट्रिणः । श्वापदांश्च बहून्घोराञ्शस्त्राणि विविधानि च ॥

siṃhānsurendro vyāghrāṃśca dvipānanyāṃśca daṃṣṭriṇaḥ | śvāpadāṃśca bahūnghorāñśastrāṇi vividhāni ca

देवेन्द्र ने सिंह, बाघ, हाथी और अन्य दाँतों वाले पशु, बहुत-से भयंकर हिंस्र जीव और अनेक प्रकार के शस्त्र दिए।

श्लोक 26 (13.133.26)

राक्षसासुरसङ्घाश्च अनुजग्मुस्तमीश्वरम् ॥

rākṣasāsurasaṅghāśca anujagmustamīśvaram

और राक्षसों तथा असुरों के समूह उस ईश्वर के पीछे चले।

श्लोक 27 (13.133.27)

वर्धमानवधोपायं प्रार्थयामास तारकः । उपायैर्बहुभिर्हन्तुं नाशकच्चापि तं विभुम् ॥

vardhamānavadhopāyaṃ prārthayāmāsa tārakaḥ | upāyairbahubhirhantuṃ nāśakaccāpi taṃ vibhum

तारक ने बढ़ते हुए उसके वध का उपाय खोजा, पर अनेक उपायों से भी वह उस समर्थ को मार न सका।

श्लोक 28 (13.133.28)

सैनापत्येन तं देवाः पूजयित्वा गुहालयम् । शशंसुर्विप्रकारं तं तस्मै तारककारितम् ॥

saināpatyena taṃ devāḥ pūjayitvā guhālayam | śaśaṃsurviprakāraṃ taṃ tasmai tārakakāritam

देवताओं ने गुहा में रहने वाले का सेनापति के पद से सम्मान किया और तारक द्वारा किया गया अपना अपकार उसे बताया।

श्लोक 29 (13.133.29)

स विवृद्धो महावीर्यो देवसेनापतिः प्रभुः । जघानामोघया शक्त्या दानवं तारकं गुहः ॥

sa vivṛddho mahāvīryo devasenāpatiḥ prabhuḥ | jaghānāmoghayā śaktyā dānavaṃ tārakaṃ guhaḥ

बड़े होकर महापराक्रमी प्रभु गुह ने, देवसेना के सेनापति के रूप में, अपनी अमोघ शक्ति से दानव तारक को मार डाला।

श्लोक 30 (13.133.30)

तेन तस्मिन्कुमारेण क्रीडता निहतेऽसुरे । सुरेन्द्रः स्थापितो राज्ये देवानां पुनरीश्वरः ॥

tena tasminkumāreṇa krīḍatā nihate'sure | surendraḥ sthāpito rājye devānāṃ punarīśvaraḥ

खेलते हुए उस कुमार के द्वारा असुर के मारे जाने पर इन्द्र फिर से राज्य पर स्थापित होकर देवताओं के स्वामी हुए।

श्लोक 31 (13.133.31)

स सेनापतिरेवाथ बभौ स्कन्दः प्रतापवान् । ईशो गोप्ता च देवानां प्रियकृच्छङ्करस्य च ॥

sa senāpatirevātha babhau skandaḥ pratāpavān | īśo goptā ca devānāṃ priyakṛcchaṅkarasya ca

प्रतापी स्कन्द सेनापति के रूप में शोभित हुए, जो देवताओं के स्वामी और रक्षक थे और शंकर का प्रिय करने वाले थे।

श्लोक 32 (13.133.32)

हिरण्यमूर्तिर्भगवानेष एव च पावकिः । सदा कुमारो देवानां सैनापत्यमवाप्तवान् ॥

hiraṇyamūrtirbhagavāneṣa eva ca pāvakiḥ | sadā kumāro devānāṃ saināpatyamavāptavān

सुनहरे रूप वाले, भगवान्, अग्नि के पुत्र, सदा कुमार रहने वाले उन्होंने देवताओं का सेनापतित्व प्राप्त किया।

श्लोक 33 (13.133.33)

तस्मात्सुवर्णं मङ्गल्यं रत्नमक्षय्यमुत्तमम् । सहजं कार्तिकेयस्य वह्नेस्तेजः परं मतम् ॥

tasmātsuvarṇaṃ maṅgalyaṃ ratnamakṣayyamuttamam | sahajaṃ kārtikeyasya vahnestejaḥ paraṃ matam

इसलिए सोना मंगलकारी, उत्तम और अक्षय रत्न है, जो कार्तिकेय के साथ उत्पन्न हुआ और अग्नि का परम तेज माना गया है।

श्लोक 34 (13.133.34)

एवं रामाय कौरव्य वसिष्ठोऽकथयत्पुरा । तस्मात्सुवर्णदानाय प्रयतस्व नराधिप ॥

evaṃ rāmāya kauravya vasiṣṭho'kathayatpurā | tasmātsuvarṇadānāya prayatasva narādhipa

हे कौरव्य, वसिष्ठ ने राम को पहले यही बताया था; इसलिए हे राजन्, सोने का दान करने का प्रयत्न करो।

श्लोक 35 (13.133.35)

रामः सुवर्णं दत्त्वा हि विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः । त्रिविष्टपे महत्स्थानमवापासुलभं नरैः ॥

rāmaḥ suvarṇaṃ dattvā hi vimuktaḥ sarvakilbiṣaiḥ | triviṣṭape mahatsthānamavāpāsulabhaṃ naraiḥ

राम सोना देकर सब पापों से मुक्त हो गए और स्वर्ग में वह महान् स्थान पाया जो मनुष्यों के लिए दुर्लभ है।

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