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अनुशासन पर्व · अध्याय 134

तिथियों के अनुसार श्राद्ध के फल

युधिष्ठिर श्राद्ध की पूरी विधि पूछते हैं, और भीष्म आरम्भ में कहते हैं कि सब प्राणियों को पितरों की पूजा देवताओं से पहले करनी चाहिए। वे प्रत्येक मास किए जाने वाले अन्वाहार्य श्राद्ध का वर्णन करते हैं और फिर प्रतिपदा से अमावस्या तक प्रत्येक तिथि पर श्राद्ध करने के फल गिनाते हैं: पत्नियाँ, कन्याएँ, घोड़े, पशु, पुत्र, खेती, व्यापार, सोना-चाँदी, जातिजनों में श्रेष्ठता और युद्ध। अन्त में वे कृष्ण पक्ष की दशमी से चतुर्दशी को छोड़कर शेष तिथियों को श्रेष्ठ और पूर्वाह्न से अपराह्न को उत्तम बताते हैं।

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.134.1)

चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन्धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया । तथैव मे श्राद्धविधिं कृत्स्नं प्रब्रूहि पार्थिव ॥

cāturvarṇyasya dharmātmandharmāḥ proktā yathā tvayā | tathaiva me śrāddhavidhiṃ kṛtsnaṃ prabrūhi pārthiva

हे धर्मात्मन्, आपने चारों वर्णों के धर्म जैसे बताए, वैसे ही हे राजन्, मुझे श्राद्ध की पूरी विधि भी बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (13.134.2)

युधिष्ठिरेणैवमुक्तो भीष्मः शान्तनवस्तदा । इमं श्राद्धविधिं कृत्स्नं वक्तुं समुपचक्रमे ॥

yudhiṣṭhireṇaivamukto bhīṣmaḥ śāntanavastadā | imaṃ śrāddhavidhiṃ kṛtsnaṃ vaktuṃ samupacakrame

युधिष्ठिर के इस प्रकार कहने पर शान्तनु के पुत्र भीष्म ने तब श्राद्ध की यह सारी विधि कहना आरम्भ किया।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.134.3)

शृणुष्वावहितो राजञ्श्राद्धकर्मविधिं शुभम् । धन्यं यशस्यं पुत्रीयं पितृयज्ञं परन्तप ॥

śṛṇuṣvāvahito rājañśrāddhakarmavidhiṃ śubham | dhanyaṃ yaśasyaṃ putrīyaṃ pitṛyajñaṃ parantapa

हे राजन्, ध्यान से सुनो: श्राद्ध-कर्म की यह शुभ विधि धन्य, यशदायक और पुत्रों के लिए हितकर पितृयज्ञ है, हे परन्तप।

श्लोक 4 (13.134.4)

देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । पिशाचकिन्नराणां च पूज्या वै पितरः सदा ॥

devāsuramanuṣyāṇāṃ gandharvoragarakṣasām | piśācakinnarāṇāṃ ca pūjyā vai pitaraḥ sadā

देवता, असुर और मनुष्य, गन्धर्व, सर्प और राक्षस, पिशाच और किन्नर, सभी के लिए पितर सदा पूजनीय हैं।

श्लोक 5 (13.134.5)

पितॄन्पूज्यादितः पश्चाद्देवतास्तर्पयन्ति वै । तस्मात्तान्सर्वयत्नेन पुरुषः पूजयेत्सदा ॥

pitṝnpūjyāditaḥ paścāddevatāstarpayanti vai | tasmāttānsarvayatnena puruṣaḥ pūjayetsadā

वे पहले पितरों की पूजा करके बाद में देवताओं को तृप्त करते हैं; इसलिए मनुष्य को सब प्रकार के प्रयत्न से सदा उनकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 6 (13.134.6)

अन्वाहार्यं महाराज पितॄणां श्राद्धमुच्यते । तस्माद्विशेषविधिना विधिः प्रथमकल्पितः ॥

anvāhāryaṃ mahārāja pitṝṇāṃ śrāddhamucyate | tasmādviśeṣavidhinā vidhiḥ prathamakalpitaḥ

हे महाराज, पितरों के श्राद्ध को अन्वाहार्य कहते हैं। इसीलिए सबसे पहले जो विधि निर्धारित हुई है, वह विशेष विधि है।

श्लोक 7 (13.134.7)

सर्वेष्वहःसु प्रीयन्ते कृते श्राद्धे पितामहाः । पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम् । पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चन्द्रक्षयेऽग्निमान् ॥

sarveṣvahaḥsu prīyante kṛte śrāddhe pitāmahāḥ | piṇḍānvāhāryakaṃ śrāddhaṃ kuryānmāsānumāsikam | pitṛyajñaṃ tu nirvartya vipraścandrakṣaye'gnimān

श्राद्ध करने पर पितामह सभी दिनों में प्रसन्न होते हैं। अग्निहोत्री ब्राह्मण को चन्द्रक्षय के समय पितृयज्ञ पूरा करके प्रत्येक मास पिण्ड सहित अन्वाहार्य श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 8 (13.134.8)

पिण्डानां मासिकश्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधाः । तदामिषेण कुर्वीत प्रयतः प्राञ्जलिः शुचिः ॥

piṇḍānāṃ māsikaśrāddhamanvāhāryaṃ vidurbudhāḥ | tadāmiṣeṇa kurvīta prayataḥ prāñjaliḥ śuciḥ

पिण्डों के मासिक श्राद्ध को ज्ञानी लोग अन्वाहार्य कहते हैं; तब संयत, हाथ जोड़े और पवित्र होकर उसे मांस के साथ करना चाहिए।

श्लोक 9 (13.134.9)

प्रवक्ष्यामि तु ते सर्वांस्तिथ्यांतिथ्यां दिने गुणान् । येष्वहःसु कृतैः श्राद्धैर्यत्फलं प्राप्यतेऽनघ । तत्सर्वं कीर्तयिष्यामि यथावत्तन्निबोध मे ॥

pravakṣyāmi tu te sarvāṃstithyāṃtithyāṃ dine guṇān | yeṣvahaḥsu kṛtaiḥ śrāddhairyatphalaṃ prāpyate'nagha | tatsarvaṃ kīrtayiṣyāmi yathāvattannibodha me

हे निष्पाप, मैं तुम्हें प्रत्येक तिथि के गुण बताऊँगा और उन दिनों में किए गए श्राद्धों से जो फल मिलता है, वह सब ठीक-ठीक कहूँगा; मुझसे सुनो।

श्लोक 10 (13.134.10)

पितॄनर्च्य प्रतिपदि प्राप्नुयात्स्वगृहे स्त्रियः । अभिरूपप्रजायिन्यो दर्शनीया बहुप्रजाः ॥

pitṝnarcya pratipadi prāpnuyātsvagṛhe striyaḥ | abhirūpaprajāyinyo darśanīyā bahuprajāḥ

प्रतिपदा को पितरों की पूजा करके मनुष्य अपने घर में सुन्दर रूप वाली, सन्तान को जन्म देने वाली, दर्शनीय और बहुत सन्तानों वाली स्त्रियाँ पाता है।

श्लोक 11 (13.134.11)

स्त्रियो द्वितीयां जायन्ते तृतीयायां तु वाजिनः । चतुर्थ्यां क्षुद्रपशवो भवन्ति बहवो गृहे ॥

striyo dvitīyāṃ jāyante tṛtīyāyāṃ tu vājinaḥ | caturthyāṃ kṣudrapaśavo bhavanti bahavo gṛhe

द्वितीया को कन्याएँ उत्पन्न होती हैं, तृतीया को घोड़े, और चतुर्थी को घर में बहुत-से छोटे पशु हो जाते हैं।

श्लोक 12 (13.134.12)

पञ्चम्यां बहवः पुत्रा जायन्ते कुर्वतां नृप । कुर्वाणास्तु नराः षष्ठ्यां भवन्ति द्युतिभागिनः ॥

pañcamyāṃ bahavaḥ putrā jāyante kurvatāṃ nṛpa | kurvāṇāstu narāḥ ṣaṣṭhyāṃ bhavanti dyutibhāginaḥ

हे राजन्, पंचमी को करने वालों के बहुत पुत्र होते हैं; और षष्ठी को करने वाले मनुष्य तेजस्वी होते हैं।

श्लोक 13 (13.134.13)

कृषिभागी भवेच्छ्राद्धं कुर्वाणः सप्तमीं नृप । अष्टम्यां तु प्रकुर्वाणो वाणिज्ये लाभमाप्नुयात् ॥

kṛṣibhāgī bhavecchrāddhaṃ kurvāṇaḥ saptamīṃ nṛpa | aṣṭamyāṃ tu prakurvāṇo vāṇijye lābhamāpnuyāt

हे राजन्, सप्तमी को श्राद्ध करने वाला खेती से भाग पाता है; अष्टमी को करने वाला व्यापार में लाभ पाता है।

श्लोक 14 (13.134.14)

नवम्यां कुर्वतः श्राद्धं भवत्येकशफं बहु । विवर्धन्ते तु दशमीं गावः श्राद्धानि कुर्वतः ॥

navamyāṃ kurvataḥ śrāddhaṃ bhavatyekaśaphaṃ bahu | vivardhante tu daśamīṃ gāvaḥ śrāddhāni kurvataḥ

नवमी को श्राद्ध करने वाले के बहुत-से एक खुर वाले पशु होते हैं; और दशमी को श्राद्ध करने वालों की गौएँ बढ़ती हैं।

श्लोक 15 (13.134.15)

कुप्यभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन्नेकादशीं नृप । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते तस्य वेश्मनि ॥

kupyabhāgī bhavenmartyaḥ kurvannekādaśīṃ nṛpa | brahmavarcasvinaḥ putrā jāyante tasya veśmani

हे राजन्, एकादशी को करने वाला मनुष्य वस्त्र-पात्र आदि का भागी होता है, और उसके घर में ब्रह्मतेज वाले पुत्र उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 16 (13.134.16)

द्वादश्यामीहमानस्य नित्यमेव प्रदृश्यते । रजतं बहुवित्तं च सुवर्णं च मनोरमम् ॥

dvādaśyāmīhamānasya nityameva pradṛśyate | rajataṃ bahuvittaṃ ca suvarṇaṃ ca manoramam

द्वादशी को प्रयत्न करने वाले के पास चाँदी, बहुत धन और मनोहर सोना सदा दिखाई देता है।

श्लोक 17 (13.134.17)

ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठः कुर्वञ्श्राद्धं त्रयोदशीम् ॥

jñātīnāṃ tu bhavecchreṣṭhaḥ kurvañśrāddhaṃ trayodaśīm

त्रयोदशी को श्राद्ध करने वाला अपने जातिजनों में श्रेष्ठ होता है।

श्लोक 18 (13.134.18)

अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे । युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वञ्श्राद्धं चतुर्दशीम् ॥

avaśyaṃ tu yuvāno'sya pramīyante narā gṛhe | yuddhabhāgī bhavenmartyaḥ kurvañśrāddhaṃ caturdaśīm

परन्तु उसके घर में युवा पुरुष अवश्य मर जाते हैं; और चतुर्दशी को श्राद्ध करने वाला मनुष्य युद्ध का भागी होता है।

श्लोक 19 (13.134.19)

अमावास्यां तु निवपन्सर्वकामानवाप्नुयात् ॥

amāvāsyāṃ tu nivapansarvakāmānavāpnuyāt

और जो अमावस्या को पिण्ड-दान करता है, वह सब कामनाएँ प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (13.134.20)

कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । श्राद्धकर्मणि तिथ्यस्तु प्रशस्ता न तथेतराः ॥

kṛṣṇapakṣe daśamyādau varjayitvā caturdaśīm | śrāddhakarmaṇi tithyastu praśastā na tathetarāḥ

कृष्ण पक्ष में दशमी से आरम्भ करके चतुर्दशी को छोड़कर श्राद्ध-कर्म के लिए ये तिथियाँ प्रशस्त हैं; दूसरी तिथियाँ वैसी नहीं।

श्लोक 21 (13.134.21)

यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते । तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्णादपराह्णो विशिष्यते ॥

yathā caivāparaḥ pakṣaḥ pūrvapakṣādviśiṣyate | tathā śrāddhasya pūrvāhṇādaparāhṇo viśiṣyate

जैसे कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्ष से श्रेष्ठ है, वैसे ही श्राद्ध के लिए अपराह्न पूर्वाह्न से श्रेष्ठ है।

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