Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 141

सप्तर्षियों द्वारा वृषादर्भि के दान का अस्वीकार

युधिष्ठिर पूछते हैं कि दान देने वाले और दान लेने वाले में क्या भेद है, और भीष्म उत्तर देते हैं कि योग्य दाता से लेने में दोष प्रायः नहीं होता, जबकि अयोग्य से लेने पर ग्रहीता डूब जाता है। वे सुनाते हैं कि अकाल में भूखे सप्तर्षियों, अरुन्धती, सेविका गण्डा और उसके पति पशुसख को राजा वृषादर्भि ने गौएँ, गाँव और धन देना चाहा। एक-एक करके हर ऋषि ने लोभ की निन्दा की और दान ठुकरा दिया, यहाँ तक कि सोने से भरे फल भी छोड़ दिए। क्रुद्ध राजा ने यातुधानी नाम की कृत्या को उत्पन्न कर उन्हें नष्ट करने भेजा।

अध्याय 140अध्याय-सूचीअध्याय 142

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.141.1)

ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति दानानि विविधानि च । दातृप्रतिग्रहीत्रोर्वै को विशेषः पितामह ॥

brāhmaṇebhyaḥ prayacchanti dānāni vividhāni ca | dātṛpratigrahītrorvai ko viśeṣaḥ pitāmaha

लोग ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान देते हैं। पितामह, दाता और दान लेने वाले में क्या अन्तर है?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.141.2)

साधोर्यः प्रतिगृह्णीयात्तथैवासाधुतो द्विजः । गुणवत्यल्पदोषः स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति ॥

sādhoryaḥ pratigṛhṇīyāttathaivāsādhuto dvijaḥ | guṇavatyalpadoṣaḥ syānnirguṇe tu nimajjati

ब्राह्मण सज्जन से भी दान ले सकता है और असज्जन से भी। यदि दाता गुणवान हो तो दोष थोड़ा होता है; यदि वह गुणहीन हो तो लेने वाला डूब जाता है।

श्लोक 3 (13.141.3)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । वृषादर्भेश्च संवादं सप्तर्षीणां च भारत ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | vṛṣādarbheśca saṃvādaṃ saptarṣīṇāṃ ca bhārata

भारत, इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, वृषादर्भि और सप्तर्षियों का संवाद।

श्लोक 4 (13.141.4)

कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः । विश्वामित्रो जमदग्निः साध्वी चैवाप्यरुन्धती ॥

kaśyapo'trirvasiṣṭhaśca bharadvājo'tha gautamaḥ | viśvāmitro jamadagniḥ sādhvī caivāpyarundhatī

वे थे कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र और जमदग्नि, तथा साध्वी अरुन्धती भी।

श्लोक 5 (13.141.5)

सर्वेषामथ तेषां तु गण्डाभूत्परिचारिका । शूद्रः पशुसखश्चैव भर्ता चास्या बभूव ह ॥

sarveṣāmatha teṣāṃ tu gaṇḍābhūtparicārikā | śūdraḥ paśusakhaścaiva bhartā cāsyā babhūva ha

उन सबकी सेविका गण्डा थी, और उसका पति पशुसख नाम का एक शूद्र था।

श्लोक 6 (13.141.6)

ते च सर्वे तपस्यन्तः पुरा चेरुर्महीमिमाम् । समाधिना प्रतीक्षन्तो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥

te ca sarve tapasyantaḥ purā cerurmahīmimām | samādhinā pratīkṣanto brahmalokaṃ sanātanam

वे सब पूर्वकाल में तपस्या करते हुए इस पृथ्वी पर विचरते थे और समाधि में स्थित होकर सनातन ब्रह्मलोक की प्रतीक्षा करते थे।

श्लोक 7 (13.141.7)

अथाभवदनावृष्टिर्महती कुरुनन्दन । कृच्छ्रप्राणोऽभवद्यत्र लोकोऽयं वै क्षुधान्वितः ॥

athābhavadanāvṛṣṭirmahatī kurunandana | kṛcchraprāṇo'bhavadyatra loko'yaṃ vai kṣudhānvitaḥ

कुरुनन्दन, तब बड़ा भारी अकाल पड़ा, जिसमें भूख से पीड़ित यह संसार बड़ी कठिनाई से प्राण धारण कर रहा था।

श्लोक 8 (13.141.8)

कस्मिंश्चिच्च पुरा यज्ञे याज्येन शिबिसूनुना । दक्षिणार्थेऽथ ऋत्विग्भ्यो दत्तः पुत्रोऽनिलः किल ॥

kasmiṃścicca purā yajñe yājyena śibisūnunā | dakṣiṇārthe'tha ṛtvigbhyo dattaḥ putro'nilaḥ kila

कहते हैं कि पूर्वकाल में किसी यज्ञ में यजमान शिबिपुत्र ने दक्षिणा के रूप में अपना पुत्र अनिल ऋत्विजों को दे दिया था।

श्लोक 9 (13.141.9)

अस्मिन्कालेऽथ सोऽल्पायुर्दिष्टान्तमगमत्प्रभुः । ते तं क्षुधाभिसन्तप्ताः परिवार्योपतस्थिरे ॥

asminkāle'tha so'lpāyurdiṣṭāntamagamatprabhuḥ | te taṃ kṣudhābhisantaptāḥ parivāryopatasthire

उसी समय वह अल्पायु बालक मृत्यु को प्राप्त हो गया। भूख से तड़पते हुए वे ऋषि उसे घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 10 (13.141.10)

याज्यात्मजमथो दृष्ट्वा गतासुमृषिसत्तमाः । अपचन्त तदा स्थाल्यां क्षुधार्ताः किल भारत ॥

yājyātmajamatho dṛṣṭvā gatāsumṛṣisattamāḥ | apacanta tadā sthālyāṃ kṣudhārtāḥ kila bhārata

भारत, यजमान के पुत्र को प्राणहीन देखकर भूख से पीड़ित उन श्रेष्ठ ऋषियों ने उसे हाँड़ी में पकाना आरम्भ किया।

श्लोक 11 (13.141.11)

नाजीव्ये मर्त्यलोकेऽस्मिन्नात्मानं ते परीप्सवः । कृच्छ्रामापेदिरे वृत्तिमन्नहेतोस्तपस्विनः ॥

nājīvye martyaloke'sminnātmānaṃ te parīpsavaḥ | kṛcchrāmāpedire vṛttimannahetostapasvinaḥ

जीविका से रहित इस मर्त्यलोक में अपने प्राण बचाने की इच्छा से उन तपस्वियों ने अन्न के लिए यह कष्टदायक आचरण अपनाया।

श्लोक 12 (13.141.12)

अटमानोऽथ तान्मार्गे पचमानान्महीपतिः । राजा शैब्यो वृषादर्भिः क्लिश्यमानान्ददर्श ह ॥

aṭamāno'tha tānmārge pacamānānmahīpatiḥ | rājā śaibyo vṛṣādarbhiḥ kliśyamānāndadarśa ha

घूमते हुए शिबिपुत्र राजा वृषादर्भि ने मार्ग में उन्हें भोजन पकाते और कष्ट पाते देखा।

वृषादर्भिरुवाच

श्लोक 13 (13.141.13)

प्रतिग्रहस्तारयति पुष्टिर्वै प्रतिगृह्णताम् । मयि यद्विद्यते वित्तं तद्वृणुध्वं तपोधनाः ॥

pratigrahastārayati puṣṭirvai pratigṛhṇatām | mayi yadvidyate vittaṃ tadvṛṇudhvaṃ tapodhanāḥ

दान स्वीकार करना पार लगाता है, दान लेने वालों के लिए वह पोषण है। तपस्या ही जिनका धन है, ऐसे ऋषियो, मेरे पास जो धन है, उसे चुन लीजिए।

श्लोक 14 (13.141.14)

प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां सृष्टा वृत्तिरनिन्दिता । तस्माद्ददामि वो वित्तं तद्वृणुध्वं तपोधनाः ॥

pratigraho brāhmaṇānāṃ sṛṣṭā vṛttiraninditā | tasmāddadāmi vo vittaṃ tadvṛṇudhvaṃ tapodhanāḥ

दान लेना ब्राह्मणों के लिए बनाई गई निर्दोष जीविका है। इसलिए मैं आपको धन देता हूँ; तपोधन ऋषियो, उसे चुन लीजिए।

श्लोक 15 (13.141.15)

प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानो । दद्यामहं वोऽश्वतरीसहस्रम् । धेनूनां दद्यामयुतं समग्रम् । एकैकशः सवृषाः सम्प्रसूताः ॥

priyo hi me brāhmaṇo yācamāno | dadyāmahaṃ vo'śvatarīsahasram | dhenūnāṃ dadyāmayutaṃ samagram | ekaikaśaḥ savṛṣāḥ samprasūtāḥ

याचना करने वाला ब्राह्मण मुझे प्रिय है। मैं आपको एक हज़ार खच्चरियाँ दूँगा। मैं पूरे दस हज़ार गौएँ दूँगा, एक-एक के साथ उसका साँड़, और सब बछड़ा जनी हुई।

श्लोक 16 (13.141.16)

कुलम्भरानडुहः शतंशतान् । धुर्याञ्छुभान्सर्वशोऽहं ददानि । पृथ्वीवाहान्पीवरांश्चैव तावद् । अग्र्या गृष्टीर्धेनवः सुव्रताश्च ॥

kulambharānaḍuhaḥ śataṃśatān | dhuryāñchubhānsarvaśo'haṃ dadāni | pṛthvīvāhānpīvarāṃścaiva tāvad | agryā gṛṣṭīrdhenavaḥ suvratāśca

मैं आपको कुल का भार उठाने वाले बैल सैकड़ों-सैकड़ों की संख्या में दूँगा, सब प्रकार के उत्तम भार ढोने वाले पशु दूँगा; भूमि पर बोझ ढोने वाले उतने ही हृष्ट-पुष्ट पशु, और एक बार ब्याई हुई उत्तम, शान्त स्वभाव की दुधारू गौएँ भी दूँगा।

श्लोक 17 (13.141.17)

वरान्ग्रामान्व्रीहिरसं यवांश्च । रत्नं चान्यद्दुर्लभं किं ददानि । नास्मिन्नभक्ष्ये भावमेवं कुरुध्वं । पुष्ट्यर्थं वः किं प्रयच्छाम्यहं वै ॥

varāngrāmānvrīhirasaṃ yavāṃśca | ratnaṃ cānyaddurlabhaṃ kiṃ dadāni | nāsminnabhakṣye bhāvamevaṃ kurudhvaṃ | puṣṭyarthaṃ vaḥ kiṃ prayacchāmyahaṃ vai

उत्तम गाँव, चावल, उनका रस और जौ, तथा और भी जो दुर्लभ रत्न हों, बताइए मैं क्या दूँ? इस अभक्ष्य को खाने का ऐसा विचार मत कीजिए। आपके पोषण के लिए मैं आपको क्या दूँ?

ऋषय ऊचुः

श्लोक 18 (13.141.18)

राजन्प्रतिग्रहो राज्ञो मध्वास्वादो विषोपमः । तज्जानमानः कस्मात्त्वं कुरुषे नः प्रलोभनम् ॥

rājanpratigraho rājño madhvāsvādo viṣopamaḥ | tajjānamānaḥ kasmāttvaṃ kuruṣe naḥ pralobhanam

राजन्, राजा का दान मधु-सा स्वादिष्ट होता है, पर विष के समान है। यह जानते हुए आप हमें क्यों लुभा रहे हैं?

श्लोक 19 (13.141.19)

दशसूनासमश्चक्री दशचक्रिसमो ध्वजी । दशध्वजिसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः ॥

daśasūnāsamaścakrī daśacakrisamo dhvajī | daśadhvajisamā veśyā daśaveśyāsamo nṛpaḥ

तेल का कोल्हू चलाने वाला दस कसाईखानों के समान है; मदिरा की दुकान (ध्वजा) रखने वाला दस कोल्हू चलाने वालों के समान है; वेश्या दस मदिरा-विक्रेताओं के समान है; और राजा दस वेश्याओं के समान है।

श्लोक 20 (13.141.20)

दशसूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः । तेन तुल्यो भवेद्राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥

daśasūnāsahasrāṇi yo vāhayati saunikaḥ | tena tulyo bhavedrājā ghorastasya pratigrahaḥ

जो कसाई दस हज़ार वधशालाएँ चलाता है, राजा उसके तुल्य होता है; उसका दान भयंकर है।

श्लोक 21 (13.141.21)

क्षत्रं हि दैवतमिव ब्राह्मणान्समुपाश्रितम् । अमलो ह्येष तपसा प्रीतः प्रीणाति देवताः ॥

kṣatraṃ hi daivatamiva brāhmaṇānsamupāśritam | amalo hyeṣa tapasā prītaḥ prīṇāti devatāḥ

क्षत्रिय वर्ग, मानो देवता हो, ब्राह्मणों के आश्रय में रहता है। निर्मल और तप से सन्तुष्ट ब्राह्मण देवताओं को तृप्त करता है।

श्लोक 22 (13.141.22)

अह्नायेह तपो जातु ब्राह्मणस्योपजायते । तद्दाव इव निर्दह्यात्प्राप्तो राजप्रतिग्रहः ॥

ahnāyeha tapo jātu brāhmaṇasyopajāyate | taddāva iva nirdahyātprāpto rājapratigrahaḥ

ब्राह्मण का तप कभी एक दिन में नहीं उत्पन्न होता, पर राजा का दान लेते ही वह दावानल की तरह उसे जला डालता है।

श्लोक 23 (13.141.23)

कुशलं सह दानेन राजन्नस्तु सदा तव । अर्थिभ्यो दीयतां सर्वमित्युक्त्वा तेऽन्यतो ययुः ॥

kuśalaṃ saha dānena rājannastu sadā tava | arthibhyo dīyatāṃ sarvamityuktvā te'nyato yayuḥ

"राजन्, आपका सदा कल्याण हो, आपके दान के साथ ही। जो माँगने वाले हैं, उन्हें यह सब दे दीजिए।" यह कहकर वे दूसरी ओर चले गए।

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (13.141.24)

अपक्वमेव तन्मांसमभूत्तेषां महात्मनाम् । अथ हित्वा ययुः सर्वे वनमाहारकाङ्क्षिणः ॥

apakvameva tanmāṃsamabhūtteṣāṃ mahātmanām | atha hitvā yayuḥ sarve vanamāhārakāṅkṣiṇaḥ

उन महात्माओं का वह मांस पका ही नहीं। तब उसे छोड़कर वे सब भोजन की खोज में वन की ओर चले गए।

श्लोक 25 (13.141.25)

ततः प्रचोदिता राज्ञा वनं गत्वाऽस्य मन्त्रिणः । प्रचीयोदुम्बराणि स्म दातुं तेषां प्रचक्रिरे ॥

tataḥ pracoditā rājñā vanaṃ gatvā'sya mantriṇaḥ | pracīyodumbarāṇi sma dātuṃ teṣāṃ pracakrire

तब राजा की प्रेरणा से उसके मन्त्री वन में गए, वहाँ से गूलर के फल चुनकर लाए और उन ऋषियों को देने लगे।

श्लोक 26 (13.141.26)

दृष्ट्वा फलानि मुनयस्ते ग्रहीतुमुपाद्रवन् ॥

dṛṣṭvā phalāni munayaste grahītumupādravan

उन फलों को देखकर ऋषि उन्हें लेने के लिए दौड़े।

श्लोक 27 (13.141.27)

उदुम्बराण्यथान्यानि हेमगर्भाण्युपाहरन् । भृत्यास्तेषां ततस्तानि प्रग्राहितुमुपाद्रवन् ॥

udumbarāṇyathānyāni hemagarbhāṇyupāharan | bhṛtyāsteṣāṃ tatastāni pragrāhitumupādravan

सेवक भीतर सोना भरे हुए दूसरे गूलर के फल ले आए और उन्हें ऋषियों को देने के लिए दौड़ पड़े।

श्लोक 28 (13.141.28)

गुरूणीति विदित्वाऽथ न ग्राह्याण्यत्रिरब्रवीत् । नास्मेह मन्दविज्ञाना नास्म मानुषबुद्धयः ॥

gurūṇīti viditvā'tha na grāhyāṇyatrirabravīt | nāsmeha mandavijñānā nāsma mānuṣabuddhayaḥ

उन्हें भारी जानकर अत्रि ने कहा कि इन्हें नहीं लेना चाहिए: "हम मन्दबुद्धि नहीं हैं, और न हम साधारण मनुष्यों की-सी बुद्धि वाले हैं।"

अत्रिरुवाच

श्लोक 29 (13.141.29)

हैमानीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्म जागृम । इह ह्येतदुपावृत्तं प्रेत्य स्यात्कटुकोदयम् । अप्रतिग्राह्यमेवैतत्प्रेत्येह च सुखेप्सुना ॥

haimānīmāni jānīmaḥ pratibuddhāḥ sma jāgṛma | iha hyetadupāvṛttaṃ pretya syātkaṭukodayam | apratigrāhyamevaitatpretyeha ca sukhepsunā

हम जानते हैं कि ये फल सोने के हैं; हम सचेत हैं और जाग रहे हैं। यहाँ जो यह हमारे पास आया है, उसका परिणाम मरने के बाद कड़वा होगा। जो परलोक और इस लोक, दोनों में सुख चाहता है, उसे यह नहीं लेना चाहिए।

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 30 (13.141.30)

शतेन निष्कगुणितं सहस्रेण च सम्मितम् । तथा बहु प्रतीच्छन्वै पापिष्ठां लभते गतिम् ॥

śatena niṣkaguṇitaṃ sahasreṇa ca sammitam | tathā bahu pratīcchanvai pāpiṣṭhāṃ labhate gatim

सैकड़ों निष्कों में गिना हुआ और हज़ारों में नापा हुआ इतना बहुत-सा दान लेने वाला सबसे बुरी गति को पाता है।

कश्यप उवाच

श्लोक 31 (13.141.31)

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । सर्वं तन्नालमेकस्य तस्माद्विद्वाञ्शमं व्रजेत् ॥

yatpṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ | sarvaṃ tannālamekasya tasmādvidvāñśamaṃ vrajet

पृथ्वी पर जितने चावल, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्य के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं; इसलिए विद्वान् को शान्ति का मार्ग अपनाना चाहिए।

भरद्वाज उवाच

श्लोक 32 (13.141.32)

उत्पन्नस्य रुरोः शृङ्गं वर्धमानस्य वर्धते । प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते ॥

utpannasya ruroḥ śṛṅgaṃ vardhamānasya vardhate | prārthanā puruṣasyeva tasya mātrā na vidyate

रुरु मृग का सींग जन्म लेने के बाद उसके बढ़ने के साथ बढ़ता है; पुरुष की कामना भी वैसी ही है, उसकी कोई सीमा नहीं।

गौतम उवाच

श्लोक 33 (13.141.33)

न तल्लोके द्रव्यमस्ति यल्लोभं प्रतिपूरयेत् । समुद्रकल्पः पुरुषो न कदाचन पूर्यते ॥

na talloke dravyamasti yallobhaṃ pratipūrayet | samudrakalpaḥ puruṣo na kadācana pūryate

संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो लोभ को भर सके; मनुष्य समुद्र के समान है, वह कभी नहीं भरता।

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 34 (13.141.34)

कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते । अथैनमपरः काम इष्टो विध्यति बाणवत् ॥

kāmaṃ kāmayamānasya yadā kāmaḥ samṛdhyate | athainamaparaḥ kāma iṣṭo vidhyati bāṇavat

एक कामना की इच्छा करने वाले की जब वह कामना पूरी हो जाती है, तब दूसरी इच्छित कामना उसे बाण की तरह बेध देती है।

अत्रिरुवाच

श्लोक 35 (13.141.35)

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate

भोगों के उपभोग से कामना कभी शान्त नहीं होती; घी से अग्नि की तरह वह और अधिक बढ़ती ही है।

जमदग्निरुवाच

श्लोक 36 (13.141.36)

प्रतिग्रहे संयमो वै तपो धारयते ध्रुवम् । तद्धनं ब्राह्मणस्येह लुभ्यमानस्य विस्रवेत् ॥

pratigrahe saṃyamo vai tapo dhārayate dhruvam | taddhanaṃ brāhmaṇasyeha lubhyamānasya visravet

दान लेने में संयम निश्चय ही तप को धारण करता है; जो ब्राह्मण लोभ करता है, उसका वह तपोधन बह जाता है।

अरुन्धत्युवाच

श्लोक 37 (13.141.37)

धर्मार्थं सञ्चयो यो वा द्रव्याणां पक्षसम्मतः । तपःसञ्चय एवेह विशिष्टो द्रव्यसञ्चयात् ॥

dharmārthaṃ sañcayo yo vā dravyāṇāṃ pakṣasammataḥ | tapaḥsañcaya eveha viśiṣṭo dravyasañcayāt

धर्म के लिए द्रव्यों का जो संचय कुछ लोगों को मान्य है, उससे भी इस लोक में तप का संचय द्रव्य के संचय से श्रेष्ठ है।

गण्डोवाच

श्लोक 38 (13.141.38)

उग्रादितो भयाद्यस्माद्बिभ्यतीमे ममेश्वराः । बलीयसो दुर्बलवद्बिभेम्यहमतः परम् ॥

ugrādito bhayādyasmādbibhyatīme mameśvarāḥ | balīyaso durbalavadbibhemyahamataḥ param

मेरे ये स्वामी इस उग्र पुरुष और उससे होने वाले भय से डरते हैं, इसलिए मैं तो दुर्बल की तरह और भी अधिक डरती हूँ।

पशुसख उवाच

श्लोक 39 (13.141.39)

यद्वै धर्मात्परं नास्ति तादृशं ब्राह्मणा विदुः । विनयात्साधु विद्वांसमुपासेयं यथातथम् ॥

yadvai dharmātparaṃ nāsti tādṛśaṃ brāhmaṇā viduḥ | vinayātsādhu vidvāṃsamupāseyaṃ yathātatham

ब्राह्मण जानते हैं कि धर्म से बढ़कर कुछ नहीं है, और वही ऐसी वस्तु है। विनय से, जैसा उचित हो, किसी सज्जन विद्वान् की सेवा करनी चाहिए।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 40 (13.141.40)

कुशलं सह दानेन तस्मै यस्य प्रजा इमाः । फलान्युपधियुक्तानि य एवं नः प्रयच्छति ॥

kuśalaṃ saha dānena tasmai yasya prajā imāḥ | phalānyupadhiyuktāni ya evaṃ naḥ prayacchati

जिसकी ये प्रजाएँ हैं, उसका दान के साथ कल्याण हो, जो इस प्रकार हमें छल से भरे फल दे रहा है।

भीष्म उवाच

श्लोक 41 (13.141.41)

इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि ते । ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव दृढव्रताः ॥

ityuktvā hemagarbhāṇi hitvā tāni phalāni te | ṛṣayo jagmuranyatra sarva eva dṛḍhavratāḥ

यह कहकर वे दृढ़ व्रत वाले सब ऋषि सोने से भरे उन फलों को छोड़कर दूसरी ओर चले गए।

श्लोक 42 (13.141.42)

अथ ते मन्त्रिणः सर्वे राजानमिदमब्रुवन् । उपधिं शङ्कमानास्ते हित्वा तानि फलानि वै । ततोऽन्यत्रैव गच्छन्ति विदितं तेऽस्तु पार्थिव ॥

atha te mantriṇaḥ sarve rājānamidamabruvan | upadhiṃ śaṅkamānāste hitvā tāni phalāni vai | tato'nyatraiva gacchanti viditaṃ te'stu pārthiva

तब उसके सब मन्त्रियों ने राजा से यह कहा: "छल की आशंका करके वे उन फलों को छोड़कर दूसरी ओर जा रहे हैं। राजन्, यह आपको मालूम हो जाए।"

श्लोक 43 (13.141.43)

इत्युक्तः स तु भृत्यैस्तैर्वृषादर्भिश्चुकोप ह । तेषां वै प्रतिकर्तुं च सर्वेषामगमद्गृहम् ॥

ityuktaḥ sa tu bhṛtyaistairvṛṣādarbhiścukopa ha | teṣāṃ vai pratikartuṃ ca sarveṣāmagamadgṛham

सेवकों के यह कहने पर वृषादर्भि क्रोध से भर उठा और उन सबसे बदला लेने के लिए घर गया।

श्लोक 44 (13.141.44)

स गत्वाऽऽहवनीयेऽग्नौ तीव्रं नियममास्थितः । जुहाव संस्कृतैर्मन्त्रैरेकैकामाहुतिं नृपः ॥

sa gatvā''havanīye'gnau tīvraṃ niyamamāsthitaḥ | juhāva saṃskṛtairmantrairekaikāmāhutiṃ nṛpaḥ

वह आहवनीय अग्नि के पास गया, कठोर नियम का आश्रय लेकर संस्कारित मन्त्रों से राजा ने उसमें एक-एक करके आहुतियाँ दीं।

श्लोक 45 (13.141.45)

तस्मादग्नेः समुत्तस्थौ कृत्या लोकभयंकरी । तस्या नाम वृषादर्भिर्यातुधानीत्यथाकरोत् ॥

tasmādagneḥ samuttasthau kṛtyā lokabhayaṃkarī | tasyā nāma vṛṣādarbhiryātudhānītyathākarot

उस अग्नि से लोक को भयभीत करने वाली एक कृत्या प्रकट हुई; वृषादर्भि ने उसका नाम यातुधानी रखा।

श्लोक 46 (13.141.46)

सा कृत्या कालरात्रीव कृताञ्जलिरुपस्थिता । वृषादर्भि नरपतिं किं करोमीति चाब्रवीत् ॥

sā kṛtyā kālarātrīva kṛtāñjalirupasthitā | vṛṣādarbhi narapatiṃ kiṃ karomīti cābravīt

कालरात्रि के समान वह कृत्या हाथ जोड़कर राजा वृषादर्भि के सामने खड़ी हुई और बोली, "मैं क्या करूँ?"

वृषादर्भिरुवाच

श्लोक 47 (13.141.47)

ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च । दासीभर्तुश्च दास्याश्च मनसा नाम धारय ॥

ṛṣīṇāṃ gaccha saptānāmarundhatyāstathaiva ca | dāsībhartuśca dāsyāśca manasā nāma dhāraya

तू सात ऋषियों के पास, अरुन्धती के पास तथा दासी और उसके पति के पास जा, और उनके नाम मन में धारण कर।

श्लोक 48 (13.141.48)

ज्ञात्वा नामानि चैवैषां सर्वानेतान्विनाशय । विनष्टेषु तथा स्वैरं गच्छ यत्रेप्सितं तव ॥

jñātvā nāmāni caivaiṣāṃ sarvānetānvināśaya | vinaṣṭeṣu tathā svairaṃ gaccha yatrepsitaṃ tava

इनके नाम जानकर इन सबका नाश कर दे; इनके नष्ट हो जाने पर जहाँ चाहे वहाँ स्वतन्त्र होकर चली जा।

भीष्म उवाच

श्लोक 49 (13.141.49)

सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी । जगाम तद्वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षयः ॥

sā tatheti pratiśrutya yātudhānī svarūpiṇī | jagāma tadvanaṃ yatra viceruste maharṣayaḥ

"ऐसा ही हो" कहकर वह यातुधानी अपने रूप में उस वन में गई जहाँ वे महर्षि विचर रहे थे।

अध्याय 140अध्याय-सूचीअध्याय 142