अनुशासन पर्व · अध्याय 142
कमलनाल की चोरी से इन्द्र द्वारा ऋषियों की परीक्षा
भीष्म बताते हैं कि अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और भरद्वाज, अरुन्धती, गण्डा और पशुसख के साथ भूखे वन में भटकते हुए एक मोटे परिव्राजक शुनःसख से मिलते हैं। एक राक्षसी से रक्षित कमलिनी-सरोवर पर हर ऋषि श्लेषमय नाम बताता है और लौटा दिया जाता है; शुनःसख अपने दण्ड से उसे मार डालता है। कमलनाल गायब होने पर हर कोई चोर के लिए शाप-रूपी शपथ लेता है। शुनःसख स्वयं को इन्द्र बताता है, जिसने उनकी परीक्षा के लिए कमलनाल छिपाए थे, और निर्लोभ रहने के कारण ऋषि स्वर्ग जाते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.142.1)
अथात्रिप्रमुखा राजन्वने तस्मिन्महर्षयः । व्यचरन्भक्षयन्तो वै मूलानि च फलानि च ॥
athātripramukhā rājanvane tasminmaharṣayaḥ | vyacaranbhakṣayanto vai mūlāni ca phalāni ca
हे राजन्, तब अत्रि आदि महर्षि उस वन में कन्द-मूल और फल खाते हुए विचरण कर रहे थे।
श्लोक 2 (13.142.2)
अथापश्यन्सुपीनांसपाणिपादमुखोदरम् । परिव्रजन्तं स्थूलाङ्गं परिव्राजं शुनस्सखम् ॥
athāpaśyansupīnāṃsapāṇipādamukhodaram | parivrajantaṃ sthūlāṅgaṃ parivrājaṃ śunassakham
वहाँ उन्होंने शुनःसख नामक एक परिव्राजक को घूमते देखा; उसके कन्धे, हाथ, पैर, मुख और पेट खूब मोटे थे और सारा शरीर स्थूल था।
श्लोक 3 (13.142.3)
अरुन्धती तु तं दृष्ट्वा सर्वाङ्गोपचितं शुभम् । भवितारो भवन्तो वै नैवमित्यब्रवीदृषीन् ॥
arundhatī tu taṃ dṛṣṭvā sarvāṅgopacitaṃ śubham | bhavitāro bhavanto vai naivamityabravīdṛṣīn
परन्तु अरुन्धती ने उसे सब अंगों से पुष्ट और सुन्दर देखकर ऋषियों से कहा, "आप लोग ऐसे नहीं हैं।"
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 4 (13.142.4)
नैतस्येह यथाऽस्माकमग्निहोत्रमनिर्हुतम् । सायं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्शुनस्सखः ॥
naitasyeha yathā'smākamagnihotramanirhutam | sāyaṃ prātaśca hotavyaṃ tena pīvāñśunassakhaḥ
"हमारी तरह इसके पास सायं और प्रातः करने को अग्निहोत्र का अनुष्ठान शेष नहीं रहता; इसी कारण शुनःसख मोटा है।"
अत्रिरुवाच
श्लोक 5 (13.142.5)
नैतस्येह यथाऽस्माकं क्षुधया वीर्यमाहतम् । कृच्छ्राधीतं प्रनष्टं च तेन पीवाञ्छुनस्सखः ॥
naitasyeha yathā'smākaṃ kṣudhayā vīryamāhatam | kṛcchrādhītaṃ pranaṣṭaṃ ca tena pīvāñchunassakhaḥ
"हमारी तरह भूख ने इसका बल नहीं घटाया है, और कठिनाई से पढ़ा हुआ इसका विद्याधन नष्ट नहीं हुआ है; इसी कारण शुनःसख मोटा है।"
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 6 (13.142.6)
नैतस्येह यथाऽस्माकं शश्वच्छास्त्रकृतो ज्वरः । अलसः क्षुत्परो मूर्खस्तेन पीवाञ्शुनस्सखः ॥
naitasyeha yathā'smākaṃ śaśvacchāstrakṛto jvaraḥ | alasaḥ kṣutparo mūrkhastena pīvāñśunassakhaḥ
"हमारी तरह इसे शास्त्र-चिन्तन का निरन्तर ज्वर नहीं लगता; यह आलसी है, भोजन में ही लगा रहता है और मूर्ख है; इसी कारण शुनःसख मोटा है।"
जमदग्निरुवाच
श्लोक 7 (13.142.7)
नैतस्येह यथाऽस्माकं भक्तमिन्धनमेव च । सञ्चित्यं वार्षिकं चित्ते तेन पीवाञ्शुनस्सखः ॥
naitasyeha yathā'smākaṃ bhaktamindhanameva ca | sañcityaṃ vārṣikaṃ citte tena pīvāñśunassakhaḥ
"हमारी तरह इसे भोजन और ईंधन की चिन्ता नहीं है, और न मन में वर्षभर के संचय की फ़िक्र है; इसी कारण शुनःसख मोटा है।"
कश्यप उवाच
श्लोक 8 (13.142.8)
नैतस्येह यथाऽस्माकं चत्वारश्च सहोदराः । देहिदेहीति भिक्षन्ति तेन पीवाञ्शुनस्सखः ॥
naitasyeha yathā'smākaṃ catvāraśca sahodarāḥ | dehidehīti bhikṣanti tena pīvāñśunassakhaḥ
"हमारी तरह इसके चार सगे भाई 'दो, दो' कहकर भीख नहीं माँगते; इसी कारण शुनःसख मोटा है।"
भरद्वाज उवाच
श्लोक 9 (13.142.9)
नैतस्येह यथाऽस्माकं ब्रह्मबन्धोरचेतसः । शोको भार्यापवादेन तेन पीवाञ्शुनस्सखः ॥
naitasyeha yathā'smākaṃ brahmabandhoracetasaḥ | śoko bhāryāpavādena tena pīvāñśunassakhaḥ
"हमारी तरह इसे वह शोक नहीं होता जो नाम-मात्र के ब्राह्मण, अविवेकी पुरुष को पत्नी के ताने सुनकर होता है; इसी कारण शुनःसख मोटा है।"
गौतम उवाच
श्लोक 10 (13.142.10)
नैतस्येह यथाऽस्माकं त्रिकौशेयं च राङ्कवम् । एकैकं वै त्रिवर्षीयं तेन पीवाञ्शुनस्सखः ॥
naitasyeha yathā'smākaṃ trikauśeyaṃ ca rāṅkavam | ekaikaṃ vai trivarṣīyaṃ tena pīvāñśunassakhaḥ
"हमारी तरह इसके पास तीन रेशमी वस्त्र और ऊनी कम्बल नहीं हैं, जिनमें से एक-एक को तीन-तीन वर्ष चलाना पड़े; इसी कारण शुनःसख मोटा है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 11 (13.142.11)
अथ दृष्ट्वा परिव्राट् स तान्महर्षीञ्शुनस्सखः । अभिवाद्य यथान्यायं पाणिस्पर्शमथाचरत् ॥
atha dṛṣṭvā parivrāṭ sa tānmaharṣīñśunassakhaḥ | abhivādya yathānyāyaṃ pāṇisparśamathācarat
तब उस परिव्राजक शुनःसख ने उन महर्षियों को देखकर यथोचित रीति से प्रणाम किया और उनके हाथों का स्पर्श किया।
श्लोक 12 (13.142.12)
परिचर्यां वने तां तु क्षुत्प्रतीकारकाङ्क्षिणः । अन्योन्येन निवेद्याथ प्रातिष्ठन्त सहैव ते ॥
paricaryāṃ vane tāṃ tu kṣutpratīkārakāṅkṣiṇaḥ | anyonyena nivedyātha prātiṣṭhanta sahaiva te
भूख का उपाय चाहते हुए उन्होंने वन में परस्पर उस सेवा का प्रस्ताव किया और फिर सब साथ ही चल पड़े।
श्लोक 13 (13.142.13)
एकनिश्चयकार्याश्च व्यचरन्त वनानि ते । आददानाः समुद्धृत्य मूलानि च फलानि च ॥
ekaniścayakāryāśca vyacaranta vanāni te | ādadānāḥ samuddhṛtya mūlāni ca phalāni ca
एक ही निश्चय से वे वनों में घूमते रहे और कन्द उखाड़कर तथा फल तोड़कर इकट्ठा करते रहे।
श्लोक 14 (13.142.14)
कदाचिद्विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैर्वृताम् । शुचिपूर्णप्रसन्नोदां ददृशुः पद्मिनीं शुभाम् ॥
kadācidvicarantaste vṛkṣairaviralairvṛtām | śucipūrṇaprasannodāṃ dadṛśuḥ padminīṃ śubhām
एक बार घूमते हुए उन्होंने एक सुन्दर कमलिनी-सरोवर देखा, जो घने वृक्षों से घिरा था और जिसका जल निर्मल, भरा हुआ और स्वच्छ था।
श्लोक 15 (13.142.15)
बालादित्यवपुःप्रख्यैः पुष्करैरुपशोभिताम् । वैडूर्यवर्णसदृशैः पद्मपत्रैरथावृताम् ॥
bālādityavapuḥprakhyaiḥ puṣkarairupaśobhitām | vaiḍūryavarṇasadṛśaiḥ padmapatrairathāvṛtām
वह प्रातःकालीन सूर्य के समान आभा वाले कमलों से सुशोभित था और वैदूर्य-मणि जैसे रंग वाले कमल-पत्रों से ढका हुआ था।
श्लोक 16 (13.142.16)
नानाविधैश्च विहगैर्जलप्रवरसेविभिः । एकद्वारामनादेयां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥
nānāvidhaiśca vihagairjalapravarasevibhiḥ | ekadvārāmanādeyāṃ sūpatīrthāmakardamām
जल में रहने वाले अनेक प्रकार के पक्षी वहाँ आया करते थे; उसका एक ही द्वार था, उसे कोई लूट नहीं सकता था, उसके घाट सुन्दर थे और उसमें कीचड़ नहीं था।
श्लोक 17 (13.142.17)
वृषादर्भिप्रयुक्ता तु कृत्या विकृतदर्शना । यातुधानीति विख्याता पद्मिनीं तामरक्षत ॥
vṛṣādarbhiprayuktā tu kṛtyā vikṛtadarśanā | yātudhānīti vikhyātā padminīṃ tāmarakṣata
किन्तु वृषादर्भि की भेजी हुई, भयंकर रूप वाली, यातुधानी नाम से प्रसिद्ध एक कृत्या उस कमलिनी की रखवाली करती थी।
श्लोक 18 (13.142.18)
शुनस्सखसहायास्तु बिसार्थं ते महर्षयः । पद्मिनीमभिजग्मुस्ते सर्वे कृत्याभिरक्षिताम् ॥
śunassakhasahāyāstu bisārthaṃ te maharṣayaḥ | padminīmabhijagmuste sarve kṛtyābhirakṣitām
शुनःसख को साथ लेकर वे सब महर्षि कमलनाल के लिए उस सरोवर के पास गए, जिसकी रक्षा वह कृत्या कर रही थी।
श्लोक 19 (13.142.19)
ततस्ते यातुधानीं तां दृष्ट्वा विकृतदर्शनाम् । स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षयः ॥
tataste yātudhānīṃ tāṃ dṛṣṭvā vikṛtadarśanām | sthitāṃ kamalinītīre kṛtyāmūcurmaharṣayaḥ
तब कमलिनी के तट पर खड़ी उस विकराल यातुधानी को देखकर महर्षियों ने उस कृत्या से कहा:
श्लोक 20 (13.142.20)
एका तिष्ठसि का च त्वं कस्यार्थे किं प्रयोजनम् । पद्मिनीतीरमाश्रित्य ब्रूहि त्वं किं चिकीर्षसि ॥
ekā tiṣṭhasi kā ca tvaṃ kasyārthe kiṃ prayojanam | padminītīramāśritya brūhi tvaṃ kiṃ cikīrṣasi
"तुम यहाँ अकेली खड़ी हो। तुम कौन हो, किसके लिए यहाँ हो और तुम्हारा प्रयोजन क्या है? इस सरोवर के तट पर रहकर तुम क्या करना चाहती हो, बताओ।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 21 (13.142.21)
याऽस्मि काऽस्म्यनुयोगो मे न कर्तव्यः कथञ्चन । आरक्षिणीं मा पद्मिन्या वित्त सर्वे तपोधनाः ॥
yā'smi kā'smyanuyogo me na kartavyaḥ kathañcana | ārakṣiṇīṃ mā padminyā vitta sarve tapodhanāḥ
"मैं जो भी हूँ, हूँ; मुझसे किसी भी प्रकार पूछताछ न करना। हे तपस्या के धनी लोगो, तुम सब मुझे इस कमलिनी की रक्षिका ही जानो।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 22 (13.142.22)
सर्व एव क्षुधार्ताः स्म न चान्यत्किंचिदस्ति नः । भवत्याः सम्मते सर्वे गृह्णीयाम बिसान्युत ॥
sarva eva kṣudhārtāḥ sma na cānyatkiṃcidasti naḥ | bhavatyāḥ sammate sarve gṛhṇīyāma bisānyuta
"हम सब भूख से पीड़ित हैं और हमारे पास और कुछ भी नहीं है। तुम्हारी अनुमति से हम कमलनाल ले लें।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 23 (13.142.23)
समयेन बिसानीतो गृह्णीध्वं कामकारतः । एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम् ॥
samayena bisānīto gṛhṇīdhvaṃ kāmakārataḥ | ekaiko nāma me proktvā tato gṛhṇīta māciram
"एक शर्त पर तुम यहाँ से अपनी इच्छा के अनुसार कमलनाल ले सकते हो: तुममें से प्रत्येक पहले मुझे अपना नाम बताए, फिर देर किए बिना ले ले।"
भीष्म उवाच
श्लोक 24 (13.142.24)
विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यमृषिवधैषिणीम् । अत्रिः क्षुधा परीतात्मा ततो वचनमब्रवीत् ॥
vijñāya yātudhānīṃ tāṃ kṛtyamṛṣivadhaiṣiṇīm | atriḥ kṣudhā parītātmā tato vacanamabravīt
उसे यातुधानी, ऋषियों के वध की इच्छा रखने वाली कृत्या जानकर, भूख से व्याकुल अत्रि ने तब यह कहा।
अत्रिरुवाच
श्लोक 25 (13.142.25)
अरात्त्रिरत्त्रिः सा रात्रिर्यां नाधीते त्रिरद्य वै । अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने ॥
arāttrirattriḥ sā rātriryāṃ nādhīte triradya vai | arātriratrirityeva nāma me viddhi śobhane
"जिस रात में आज तीन बार अध्ययन न किया जाए, वह अत्रि के लिए रात नहीं है। हे शोभने, मेरा नाम अरात्रि-अत्रि है, यह जान लो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 26 (13.142.26)
यथोदाहृतमेतत्ते त्वया नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
yathodāhṛtametatte tvayā nāma mahādyute | durdhāryametanmanasā gacchā'vatara padminīm
"हे महातेजस्वी, तुमने जो नाम बताया, उसे मन में धारण करना कठिन है। जाओ, सरोवर में उतरो।"
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 27 (13.142.27)
वसिष्ठोऽस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासगृहेष्वपि । वरिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धि माम् ॥
vasiṣṭho'smi variṣṭho'smi vase vāsagṛheṣvapi | variṣṭhatvācca vāsācca vasiṣṭha iti viddhi mām
"मैं वसिष्ठ हूँ; मैं वरिष्ठ (श्रेष्ठ) हूँ; मैं गृहस्थों के घरों में भी वास करता हूँ। श्रेष्ठ होने से और वास करने से मुझे वसिष्ठ जानो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 28 (13.142.28)
नाम नैरुक्तमेतत्ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
nāma nairuktametatte duḥkhavyābhāṣitākṣaram | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchā'vatara padminīm
"तुम्हारा यह नाम व्युत्पत्ति-प्रधान है और इसके अक्षर कठिनाई से बोले जाते हैं; इसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
कश्यप उवाच
श्लोक 29 (13.142.29)
कुलंकुलं च कुवमः कुवमः कश्यपो द्विजः । काश्यः काशनिकाशत्वादेतन्मे नाम धारय ॥
kulaṃkulaṃ ca kuvamaḥ kuvamaḥ kaśyapo dvijaḥ | kāśyaḥ kāśanikāśatvādetanme nāma dhāraya
"कुलं-कुलं, कुवम, कुवम, द्विज कश्यप; और काश (घास) के समान होने से मैं काश्य हूँ। यही मेरा नाम धारण करो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 30 (13.142.30)
यथोदाहृतमेतत्ते मयि नाम महाद्युते । दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
yathodāhṛtametatte mayi nāma mahādyute | durdhāryametanmanasā gacchā'vatara padminīm
"हे महातेजस्वी, तुमने मुझे जो यह नाम बताया, उसे मन में धारण करना कठिन है। जाओ, सरोवर में उतरो।"
भरद्वाज उवाच
श्लोक 31 (13.142.31)
भरे सुतान्भरे पोष्यान्भरे देवान्भरे द्विजान् । भरे भार्यामहं व्याजाद्भरद्वाजोऽस्मि शोभने ॥
bhare sutānbhare poṣyānbhare devānbhare dvijān | bhare bhāryāmahaṃ vyājādbharadvājo'smi śobhane
"मैं पुत्रों का भरण करता हूँ, पोषणीय जनों का भरण करता हूँ, देवताओं का भरण करता हूँ, ब्राह्मणों का भरण करता हूँ, और किसी बहाने से पत्नी का भी भरण करता हूँ; इसलिए हे शोभने, मैं भरद्वाज हूँ।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 32 (13.142.32)
नाम नैरुक्तमेतत्ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
nāma nairuktametatte duḥkhavyābhāṣitākṣaram | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchā'vatara padminīm
"तुम्हारा यह नाम व्युत्पत्ति-प्रधान है और इसके अक्षर कठिनाई से बोले जाते हैं; इसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
गौतम उवाच
श्लोक 33 (13.142.33)
गोदमो दमतोऽधूमोऽदमस्ते समदर्शनात् । विद्धि मां गोतमं कृत्ये यातुधानि निबोध मां ॥
godamo damato'dhūmo'damaste samadarśanāt | viddhi māṃ gotamaṃ kṛtye yātudhāni nibodha māṃ
"मैं गोदम, दमत, अधूम और अदम हूँ, क्योंकि मैं सबको समान दृष्टि से देखता हूँ। हे कृत्ये, मुझे गोतम जानो; हे यातुधानि, मुझे समझ लो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 34 (13.142.34)
यथोदाहृतमेतत्ते मयि नाम महामुने । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
yathodāhṛtametatte mayi nāma mahāmune | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchā'vatara padminīm
"हे महामुने, तुमने मुझे जो यह नाम बताया, उसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 35 (13.142.35)
विश्वेदेवाश्च मे मित्रं मित्रमस्मि गवां तथा । विश्वामित्र इति ख्यातं यातुधानि निबोध मां ॥
viśvedevāśca me mitraṃ mitramasmi gavāṃ tathā | viśvāmitra iti khyātaṃ yātudhāni nibodha māṃ
"विश्वेदेव मेरे मित्र हैं और मैं गौओं का भी मित्र हूँ; इसीलिए मैं विश्वामित्र नाम से प्रसिद्ध हूँ। हे यातुधानि, मुझे समझ लो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 36 (13.142.36)
नाम नैरुक्तमेतत्ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
nāma nairuktametatte duḥkhavyābhāṣitākṣaram | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchā'vatara padminīm
"तुम्हारा यह नाम व्युत्पत्ति-प्रधान है और इसके अक्षर कठिनाई से बोले जाते हैं; इसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
जमदग्निरुवाच
श्लोक 37 (13.142.37)
जाजमद्यजजानेऽहं जिजाहीह जिजायिषि । जमदग्निरिति ख्यातं ततो मां विद्धि शोभने ॥
jājamadyajajāne'haṃ jijāhīha jijāyiṣi | jamadagniriti khyātaṃ tato māṃ viddhi śobhane
"जाजमद्-यजजाने, मैं, जिजाहि, यहाँ जिजायिषि: मैं जमदग्नि नाम से प्रसिद्ध हूँ; हे शोभने, इसी प्रकार मुझे जानो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 38 (13.142.38)
यथोदाहृतमेतत्ते मयि नाम महामुने । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
yathodāhṛtametatte mayi nāma mahāmune | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchā'vatara padminīm
"हे महामुने, तुमने मुझे जो यह नाम बताया, उसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
अरुन्धत्युवाच
श्लोक 39 (13.142.39)
धरान्धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम् । मनोऽनुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्ध्यरुन्धतीम् ॥
dharāndharitrīṃ vasudhāṃ bhartustiṣṭhāmyanantaram | mano'nurundhatī bharturiti māṃ viddhyarundhatīm
"मैं पर्वतों, पृथ्वी और वसुधा को धारण करती हूँ और सदा अपने पति के समीप रहती हूँ; मैं पति के मन का अनुसरण करती हूँ। इसलिए मुझे अरुन्धती जानो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 40 (13.142.40)
नामनैरुक्तमेतत्ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
nāmanairuktametatte duḥkhavyābhāṣitākṣaram | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchā'vatara padminīm
"तुम्हारा यह नाम व्युत्पत्ति-प्रधान है और इसके अक्षर कठिनाई से बोले जाते हैं; इसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
गण्डोवाच
श्लोक 41 (13.142.41)
वक्त्रैकदेशे गण्डेति धातुमेतं प्रचक्षते । तेनोन्नतेन गण्डेति विद्धि माऽनलसम्भवे ॥
vaktraikadeśe gaṇḍeti dhātumetaṃ pracakṣate | tenonnatena gaṇḍeti viddhi mā'nalasambhave
"मुख के एक भाग को 'गण्ड' कहते हैं, जो उभरा हुआ होता है; उसी उभार से हे अग्निसम्भवे, मुझे गण्डा जानो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 42 (13.142.42)
नामनैरुक्तमेतत्ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥
nāmanairuktametatte duḥkhavyābhāṣitākṣaram | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchāvatara padminīm
"तुम्हारा यह नाम व्युत्पत्ति-प्रधान है और इसके अक्षर कठिनाई से बोले जाते हैं; इसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
पशुसख उवाच
श्लोक 43 (13.142.43)
पशून्रञ्जामि दृष्ट्वाऽहं पशूनां च सदा सखा । गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे ॥
paśūnrañjāmi dṛṣṭvā'haṃ paśūnāṃ ca sadā sakhā | gauṇaṃ paśusakhetyevaṃ viddhi māmagnisambhave
"मैं पशुओं को देखकर उन्हें प्रसन्न करता हूँ और सदा पशुओं का सखा हूँ; इसलिए हे अग्निसम्भवे, गुणवाचक नाम से मुझे पशुसख जानो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 44 (13.142.44)
नामनैरुक्तमेतत्ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् । नैतद्धारयितुं शक्यं गच्छाऽवतर पद्मिनीम् ॥
nāmanairuktametatte duḥkhavyābhāṣitākṣaram | naitaddhārayituṃ śakyaṃ gacchā'vatara padminīm
"तुम्हारा यह नाम व्युत्पत्ति-प्रधान है और इसके अक्षर कठिनाई से बोले जाते हैं; इसे मन में धारण नहीं किया जा सकता। जाओ, सरोवर में उतरो।"
शुनःसख उवाच
श्लोक 45 (13.142.45)
एभिरुक्तं यथा नाम नाहं वक्तुमिहोत्सहे । शुनःसखसखायं मां यातुधान्युपधारय ॥
ebhiruktaṃ yathā nāma nāhaṃ vaktumihotsahe | śunaḥsakhasakhāyaṃ māṃ yātudhānyupadhāraya
"जैसे इन सबने अपने नाम बताए, वैसे मैं नहीं बता सकता। हे यातुधानि, मुझे शुनःसख-सख, अर्थात् शुनःसखों का मित्र समझो।"
यातुधान्युवाच
श्लोक 46 (13.142.46)
नाम न व्यक्तमुक्तं वै वाक्यं संदिग्धया गिरा । तस्मात्सकृदिदानीं त्वं ब्रूहि यन्नाम ते द्विज ॥
nāma na vyaktamuktaṃ vai vākyaṃ saṃdigdhayā girā | tasmātsakṛdidānīṃ tvaṃ brūhi yannāma te dvija
"तुमने अपना नाम स्पष्ट नहीं बताया, तुम्हारी वाणी सन्देह भरी थी। इसलिए अब एक बार फिर बोलो: हे द्विज, तुम्हारा नाम क्या है?"
शुनःसख उवाच
श्लोक 47 (13.142.47)
सकृदुक्तं मया नाम न गृहीतं त्वया यदि । तस्मात्त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति माचिरम् ॥
sakṛduktaṃ mayā nāma na gṛhītaṃ tvayā yadi | tasmāttridaṇḍābhihatā gaccha bhasmeti māciram
"मैंने अपना नाम एक बार कह दिया; यदि तुमने उसे ग्रहण नहीं किया, तो इस त्रिदण्ड की चोट खाकर तुरन्त भस्म हो जाओ!"
भीष्म उवाच
श्लोक 48 (13.142.48)
सा ब्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्ध्नि हता तदा । कृत्या पपात मेदिन्यां भस्म सा च जगाम ह ॥
sā brahmadaṇḍakalpena tena mūrdhni hatā tadā | kṛtyā papāta medinyāṃ bhasma sā ca jagāma ha
ब्रह्मदण्ड के समान उस दण्ड से सिर पर चोट खाकर वह कृत्या उसी समय पृथ्वी पर गिर पड़ी और भस्म हो गई।
श्लोक 49 (13.142.49)
शुनःसखश्च हत्वा तां यातुधानीं महाबलाम् । भुवि त्रिदण्डं विष्टभ्य शाद्वले समुपाविशत् ॥
śunaḥsakhaśca hatvā tāṃ yātudhānīṃ mahābalām | bhuvi tridaṇḍaṃ viṣṭabhya śādvale samupāviśat
उस महाबली यातुधानी को मारकर शुनःसख ने अपना त्रिदण्ड भूमि में गाड़ा और हरी घास पर बैठ गया।
श्लोक 50 (13.142.50)
ततस्ते मुनयः सर्वे पुष्कराणि बिसानि च । यथाकाममुपादाय समुत्तस्थुर्मुदाऽन्विताः ॥
tataste munayaḥ sarve puṣkarāṇi bisāni ca | yathākāmamupādāya samuttasthurmudā'nvitāḥ
तब वे सब मुनि इच्छानुसार कमल और कमलनाल लेकर प्रसन्न होकर उठ खड़े हुए।
श्लोक 51 (13.142.51)
श्रमेण महता युक्तास्ते बिसानि कलापशः । तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा ॥
śrameṇa mahatā yuktāste bisāni kalāpaśaḥ | tīre nikṣipya padminyāstarpaṇaṃ cakrurambhasā
बहुत परिश्रम से थके हुए उन्होंने कमलनालों को गट्ठर बाँधकर सरोवर के तट पर रखा और उसी के जल से तर्पण किया।
श्लोक 52 (13.142.52)
अथोत्थाय जलात्तस्मात्सर्वे ते समुपागमन् । नापश्यंश्चापि ते तानि बिसानि पुरुषर्षभाः ॥
athotthāya jalāttasmātsarve te samupāgaman | nāpaśyaṃścāpi te tāni bisāni puruṣarṣabhāḥ
फिर वे सब जल से निकलकर लौटे, परन्तु उन पुरुषश्रेष्ठों को वे कमलनाल दिखाई नहीं दिए।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 53 (13.142.53)
केन क्षुधाभिभूतानामस्माकं पापकर्मणाम् । नृशंसेनापनीतानि बिसान्याहारकाङ्क्षिणाम् ॥
kena kṣudhābhibhūtānāmasmākaṃ pāpakarmaṇām | nṛśaṃsenāpanītāni bisānyāhārakāṅkṣiṇām
"किस निर्दयी ने भूख से पीड़ित, अभागे और भोजन की इच्छा रखने वाले हम लोगों के ये कमलनाल चुरा लिए?"
भीष्म उवाच
श्लोक 54 (13.142.54)
ते शङ्कमानास्त्वन्योन्यं पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः । त ऊचुः शपथं सर्वे कुर्म इत्यरिकर्शन ॥
te śaṅkamānāstvanyonyaṃ papracchurdvijasattamāḥ | ta ūcuḥ śapathaṃ sarve kurma ityarikarśana
हे शत्रुओं को सताने वाले, एक-दूसरे पर शंका करते हुए उन श्रेष्ठ द्विजों ने आपस में पूछा; और सबने कहा, "हम शपथ लेंगे।"
श्लोक 55 (13.142.55)
त उक्त्वा बाढमित्येव सर्व एव तदा समम् । क्षुधार्ताः सुपरिश्रान्ताः शपथायोपचक्रमुः ॥
ta uktvā bāḍhamityeva sarva eva tadā samam | kṣudhārtāḥ supariśrāntāḥ śapathāyopacakramuḥ
सबने एक साथ "ठीक है" कहकर, भूख से पीड़ित और बहुत थके हुए, शपथ लेना आरम्भ किया।
अत्रिरुवाच
श्लोक 56 (13.142.56)
स गां स्पृशतु पादेन सूर्यं च प्रतिमेहतु । अनध्यायेष्वधीयीत बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
sa gāṃ spṛśatu pādena sūryaṃ ca pratimehatu | anadhyāyeṣvadhīyīta bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह गौ को पैर से छुए, सूर्य की ओर मूत्र करे और अनध्याय के दिनों में पढ़े।"
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 57 (13.142.57)
अनध्याये पठेल्लोके शुनः स परिकर्षतु । परिव्राट् कामवृत्तिस्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
anadhyāye paṭhelloke śunaḥ sa parikarṣatu | parivrāṭ kāmavṛttistu bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह लोक में अनध्याय के दिन पाठ करे, कुत्तों को घसीटता फिरे और मनमाने आचरण वाला परिव्राजक बने।"
श्लोक 58 (13.142.58)
शरणागतं हन्तु मित्रं स्वसुतां चोपजीवतु । अर्थान्काङ्क्षतु कीनाशाद्बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
śaraṇāgataṃ hantu mitraṃ svasutāṃ copajīvatu | arthānkāṅkṣatu kīnāśādbisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह शरण में आए हुए को मारे, मित्र और अपनी पुत्री की कमाई पर जीवन बिताए और किसान से धन की कामना करे।"
कश्यप उवाच
श्लोक 59 (13.142.59)
विष्णुं ब्रह्मण्यदेवेशं देवदेवं जगद्गुरुम् । आधातारं विधातारं सन्धातारं जगद्गुरुम् । विहाय स भजत्वन्यं बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
viṣṇuṃ brahmaṇyadeveśaṃ devadevaṃ jagadgurum | ādhātāraṃ vidhātāraṃ sandhātāraṃ jagadgurum | vihāya sa bhajatvanyaṃ bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह ब्राह्मणों के हितकारी, देवताओं के स्वामी, देवाधिदेव, जगद्गुरु, आधाता, विधाता और सन्धाता, जगत् के गुरु विष्णु को छोड़कर किसी और की उपासना करे।"
श्लोक 60 (13.142.60)
सर्वत्र सर्वं लपतु न्यासलोपं करोतु च । कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
sarvatra sarvaṃ lapatu nyāsalopaṃ karotu ca | kūṭasākṣitvamabhyetu bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह सर्वत्र सब कुछ बकता फिरे, धरोहर को हड़प ले और झूठी गवाही दे।"
श्लोक 61 (13.142.61)
वृथा मांसाशनश्चास्तु वृथा दानं करोतु च । यातु स्त्रियं दिवा चैव बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
vṛthā māṃsāśanaścāstu vṛthā dānaṃ karotu ca | yātu striyaṃ divā caiva bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह व्यर्थ मांस खाए, व्यर्थ दान करे और दिन में स्त्री-गमन करे।"
भरद्वाज उवाच
श्लोक 62 (13.142.62)
नृशंसस्त्यक्तधर्माऽस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च । ब्राह्मणं चापि जयतां बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
nṛśaṃsastyaktadharmā'stu strīṣu jñātiṣu goṣu ca | brāhmaṇaṃ cāpi jayatāṃ bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह क्रूर हो और स्त्रियों, जातिजनों तथा गौओं के प्रति धर्म छोड़ दे, और ब्राह्मण तक को हराने का यत्न करे।"
श्लोक 63 (13.142.63)
उपाध्यायमधः कृत्वा ऋचोऽध्येतु यजूंषि च । जुहोतु च स कक्षाग्नौ बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
upādhyāyamadhaḥ kṛtvā ṛco'dhyetu yajūṃṣi ca | juhotu ca sa kakṣāgnau bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह अपने उपाध्याय को नीचे बैठाकर ऋचाएँ और यजुर्मन्त्र पढ़े और सूखी घास की अग्नि में आहुति दे।"
जमदग्निरुवाच
श्लोक 64 (13.142.64)
पुरीषमुत्सृजत्वप्सु हन्तु गां चैव द्रुह्यत् । अनृतौ मैथुनं यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
purīṣamutsṛjatvapsu hantu gāṃ caiva druhyat | anṛtau maithunaṃ yātu bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह जल में मल त्यागे, गौ को कष्ट देकर मार डाले और ऋतुकाल के बिना स्त्री-गमन करे।"
श्लोक 65 (13.142.65)
द्वेष्यो भार्योपजीवी स्याद्दुरबन्धुश्च वैरवान् । अन्योन्यस्यातिथिश्चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
dveṣyo bhāryopajīvī syāddurabandhuśca vairavān | anyonyasyātithiścāstu bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह सबका द्वेषपात्र हो, पत्नी की कमाई पर जिए, बुरे बन्धुओं वाला और वैर से भरा हो, और बारी-बारी से एक-दूसरे के घर अतिथि बनता फिरे।"
गौतम उवाच
श्लोक 66 (13.142.66)
अधीत्य वेदांस्त्यजतु त्रीनग्नीनपविध्यतु । विक्रीणातु तथा सोमं बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
adhītya vedāṃstyajatu trīnagnīnapavidhyatu | vikrīṇātu tathā somaṃ bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह वेद पढ़कर उन्हें छोड़ दे, तीनों अग्नियों को त्याग दे और सोम बेचे।"
श्लोक 67 (13.142.67)
उदपानोदके ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः । तस्य सालोक्यतां यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
udapānodake grāme brāhmaṇo vṛṣalīpatiḥ | tasya sālokyatāṃ yātu bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह उस ब्राह्मण के लोक को जाए जो कुएँ के जल वाले गाँव में रहता है और शूद्रा स्त्री का पति है।"
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 68 (13.142.68)
जीवतो वै गुरून्भृत्यान्भरन्त्वस्य परे जनाः । दरिद्रो बहुपुत्रः स्याद्बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
jīvato vai gurūnbhṛtyānbharantvasya pare janāḥ | daridro bahuputraḥ syādbisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह दरिद्र हो और बहुत पुत्रों वाला हो, और उसके जीते-जी उसके गुरुजनों तथा आश्रितों का भरण दूसरे लोग करें।"
श्लोक 69 (13.142.69)
अशुचिर्ब्रह्मकूटोऽस्तु मिथ्या चैवाप्यहङ्कृतः । कर्षको मत्सरी चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
aśucirbrahmakūṭo'stu mithyā caivāpyahaṅkṛtaḥ | karṣako matsarī cāstu bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह अपवित्र हो, कपटी ब्राह्मण हो, झूठे अहंकार से भरा हो, किसान हो और ईर्ष्यालु हो।"
श्लोक 70 (13.142.70)
हर्षं करोतु भृतको राज्ञश्चास्तु पुरोहितः । अयाज्यस्य भवेदृत्विक् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
harṣaṃ karotu bhṛtako rājñaścāstu purohitaḥ | ayājyasya bhavedṛtvik bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह वेतन पर सेवा करने में ही हर्ष माने, राजा का पुरोहित बने और जो यज्ञ का अधिकारी नहीं है उसका ऋत्विक् बने।"
अरुन्धत्युवाच
श्लोक 71 (13.142.71)
नित्यं परिभवेच्छ्वश्रूं भर्तुर्भवतु दुर्मनाः । एका स्वादु समश्नातु बिसस्तैन्यं करोति या ॥
nityaṃ paribhavecchvaśrūṃ bharturbhavatu durmanāḥ | ekā svādu samaśnātu bisastainyaṃ karoti yā
"जो स्त्री कमलनाल की चोरी करे, वह सदा सास का अनादर करे, पति के प्रति दुर्भावना रखे और अकेली स्वादिष्ट भोजन खाए।"
श्लोक 72 (13.142.72)
ज्ञातीनां गृहमध्यस्था सक्तूनत्तु दिनक्षये । अभोग्याऽवीरसूरस्तु बिसस्तैन्यं करोति या ॥
jñātīnāṃ gṛhamadhyasthā saktūnattu dinakṣaye | abhogyā'vīrasūrastu bisastainyaṃ karoti yā
"जो स्त्री कमलनाल की चोरी करे, वह जातिजनों के घर के बीच बैठी हुई दिन ढलने पर केवल सत्तू खाए; वह अभोग्या हो और वीर सन्तान को जन्म न दे।"
गण्डोवाच
श्लोक 73 (13.142.73)
अनृतं भाषतु सदा बन्धुभिश्च विरुध्यतु । ददातु कन्यां शुल्केन बिसस्तैन्यं करोति या ॥
anṛtaṃ bhāṣatu sadā bandhubhiśca virudhyatu | dadātu kanyāṃ śulkena bisastainyaṃ karoti yā
"जो स्त्री कमलनाल की चोरी करे, वह सदा झूठ बोले, बन्धुओं से झगड़ती रहे और शुल्क लेकर कन्या का दान करे।"
श्लोक 74 (13.142.74)
साधयित्वा स्वयं प्राशेद्दास्ये जीर्यतु चैव ह । विकर्मणा प्रमीयेत बिसस्तैन्यं करोति या ॥
sādhayitvā svayaṃ prāśeddāsye jīryatu caiva ha | vikarmaṇā pramīyeta bisastainyaṃ karoti yā
"जो स्त्री कमलनाल की चोरी करे, वह स्वयं पकाकर अकेली खाए, दासता में ही जीर्ण हो जाए और किसी निषिद्ध कर्म से मरे।"
पशुसख उवाच
श्लोक 75 (13.142.75)
दास एव प्रजायेतामप्रसूतिरकिञ्चन । दैवतेष्वनमस्कारो बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
dāsa eva prajāyetāmaprasūtirakiñcana | daivateṣvanamaskāro bisastainyaṃ karoti yaḥ
"जो कमलनाल की चोरी करे, वह दास के रूप में ही जन्म ले, सन्तानहीन और निर्धन हो, और देवताओं को प्रणाम न करे।"
शुनःसख उवाच
श्लोक 76 (13.142.76)
अध्वर्यवे दुहितरं वा ददातु । च्छन्दोगे वाऽऽचरितब्रह्मचर्ये । आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः । स्नायीत वा यो हरते बिसानि ॥
adhvaryave duhitaraṃ vā dadātu | cchandoge vā''caritabrahmacarye | ātharvaṇaṃ vedamadhītya vipraḥ | snāyīta vā yo harate bisāni
"जो कमलनाल हर ले, वह अपनी कन्या अध्वर्यु को दे, अथवा ब्रह्मचर्य का पालन कर चुके छन्दोग (सामवेदी) को दे; और वह ब्राह्मण अथर्ववेद पढ़कर समावर्तन-स्नान करे।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 77 (13.142.77)
इष्टमेतद्द्विजातीनां योऽयं ते शपथः कृतः । त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनःसख ॥
iṣṭametaddvijātīnāṃ yo'yaṃ te śapathaḥ kṛtaḥ | tvayā kṛtaṃ bisastainyaṃ sarveṣāṃ naḥ śunaḥsakha
"तुमने जो यह शपथ ली है, वह द्विजातियों को इष्ट ही है। हे शुनःसख, हम सबके कमलनाल की चोरी तुमने ही की है।"
शुनःसख उवाच
श्लोक 78 (13.142.78)
न्यस्तमद्यं न पश्यद्भिर्यदुक्तं कृतकर्मभिः । सत्यमेतन्न मिथ्यैतद्बिसस्तैन्यं कृतं मया ॥
nyastamadyaṃ na paśyadbhiryaduktaṃ kṛtakarmabhiḥ | satyametanna mithyaitadbisastainyaṃ kṛtaṃ mayā
"कर्म पूरा कर चुके तुम लोगों ने रखे हुए भोजन को न देखकर जो कहा है, वह सत्य है, मिथ्या नहीं; कमलनाल की चोरी मैंने ही की है।"
श्लोक 79 (13.142.79)
मया ह्यन्तर्हितानीह बिसानीमानि पश्यत । परीक्षार्थं भगवतां कृतमेवं मयाऽनघाः ॥
mayā hyantarhitānīha bisānīmāni paśyata | parīkṣārthaṃ bhagavatāṃ kṛtamevaṃ mayā'naghāḥ
"देखो, इन्हीं कमलनालों को मैंने यहाँ छिपा दिया था। हे निष्पाप पूज्यजनो, मैंने यह आप लोगों की परीक्षा के लिए किया।"
श्लोक 80 (13.142.80)
रक्षणार्थं च सर्वेषां भवतामहमागतः । यातुधानी ह्यतिक्रूरा कृत्यैषा वो वधैषिणी ॥
rakṣaṇārthaṃ ca sarveṣāṃ bhavatāmahamāgataḥ | yātudhānī hyatikrūrā kṛtyaiṣā vo vadhaiṣiṇī
"और मैं आप सबकी रक्षा के लिए आया था। यह यातुधानी अत्यन्त क्रूर कृत्या थी और आपका वध चाहती थी।"
श्लोक 81 (13.142.81)
वृषादर्भिप्रयुक्तैषा निहता मे तपोधनाः । दुष्टा हिंस्यादियं पापा युष्मान्प्रत्यग्निसम्भवा ॥
vṛṣādarbhiprayuktaiṣā nihatā me tapodhanāḥ | duṣṭā hiṃsyādiyaṃ pāpā yuṣmānpratyagnisambhavā
"हे तपोधनो, वह वृषादर्भि की भेजी हुई थी और मैंने उसे मार डाला है। वह दुष्ट, पापिनी, अग्नि से उत्पन्न कृत्या आपको हानि पहुँचाती।"
श्लोक 82 (13.142.82)
तस्मादस्म्यागतो विप्रा वासवं मां निबोधत । अलोभादक्षया लोकाः प्राप्ता वः सार्वकामिकाः । उत्तिष्ठध्वमितः क्षिप्रं तानवाप्नुत वै द्विजाः ॥
tasmādasmyāgato viprā vāsavaṃ māṃ nibodhata | alobhādakṣayā lokāḥ prāptā vaḥ sārvakāmikāḥ | uttiṣṭhadhvamitaḥ kṣipraṃ tānavāpnuta vai dvijāḥ
"इसीलिए मैं आया हूँ; हे ब्राह्मणो, मुझे वासव (इन्द्र) जानो। निर्लोभ रहने से आपने सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले अक्षय लोक प्राप्त कर लिए हैं। हे द्विजो, यहाँ से शीघ्र उठिए और उन्हें प्राप्त कीजिए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 83 (13.142.83)
ततो महर्षयः प्रीतास्तथेत्युक्त्वा पुरन्दरम् । सहैव त्रिदशेन्द्रेण सर्वे जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥
tato maharṣayaḥ prītāstathetyuktvā purandaram | sahaiva tridaśendreṇa sarve jagmustriviṣṭapam
तब प्रसन्न महर्षियों ने पुरन्दर से "ऐसा ही हो" कहा और सब देवराज के साथ ही स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 84 (13.142.84)
एवमेते महात्मानो योगैर्बहुविधैरपि । क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः । नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ॥
evamete mahātmāno yogairbahuvidhairapi | kṣudhā paramayā yuktāśchandyamānā mahātmabhiḥ | naiva lobhaṃ tadā cakrustataḥ svargamavāpnuvan
इस प्रकार इन महात्माओं को अत्यन्त भूख ने घेर रखा था और महान् जनों ने अनेक उपायों से उन्हें लुभाया, फिर भी उन्होंने लोभ नहीं किया और इसी से उन्हें स्वर्ग प्राप्त हुआ।
श्लोक 85 (13.142.85)
तस्मात्सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् । एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥
tasmātsarvāsvavasthāsu naro lobhaṃ vivarjayet | eṣa dharmaḥ paro rājaṃstasmāllobhaṃ vivarjayet
इसलिए मनुष्य को सभी अवस्थाओं में लोभ त्याग देना चाहिए। हे राजन्, यह परम धर्म है; इसलिए लोभ त्याग देना चाहिए।
श्लोक 86 (13.142.86)
इदं नरः सुचरितं समवायेषु कीर्तयन् । अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते ॥
idaṃ naraḥ sucaritaṃ samavāyeṣu kīrtayan | arthabhāgī ca bhavati na ca durgāṇyavāpnute
जो मनुष्य सभाओं में इस सुचरित का कीर्तन करता है, वह धन का भागी होता है और संकटों में नहीं पड़ता।
श्लोक 87 (13.142.87)
प्रीयन्ते पितरश्चास्य ऋषयो देवतास्तथा । यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानवः ॥
prīyante pitaraścāsya ṛṣayo devatāstathā | yaśodharmārthabhāgī ca bhavati pretya mānavaḥ
उसके पितर, ऋषि और देवता प्रसन्न होते हैं, और वह मनुष्य मरने के बाद यश, धर्म और अर्थ का भागी होता है।