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अनुशासन पर्व · अध्याय 143

अगस्त्य के कमल पर ऋषियों की शपथें

भीष्म तीर्थयात्रा का एक प्राचीन आख्यान सुनाते हैं। इन्द्र के साथ ऋषि और राजा तीर्थों में घूमते हुए ब्रह्मसर पहुँचते हैं, जहाँ अगस्त्य का कमल खो जाता है और वे उन्हीं पर सन्देह करते हैं। तब एक-एक करके सब कठोर शपथ लेते हैं और चोर को लगने वाले पापों की सूची गिनाते हैं। कमल लेने वाले इन्द्र शाप के स्थान पर आशीर्वाद देते हैं, धर्म सुनने के लिए कमल लेने की बात बताकर उसे लौटा देते हैं और अगस्त्य उन्हें क्षमा कर देते हैं। अन्त में भीष्म इस आख्यान के पाठ का फल बताते हैं।

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.143.1)

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यद्वृत्तं तीर्थयात्रायां शपथं प्रति तच्छृणु ॥

atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | yadvṛttaṃ tīrthayātrāyāṃ śapathaṃ prati tacchṛṇu

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं—तीर्थयात्रा के समय शपथ के सम्बन्ध में जो घटना घटी थी, उसे सुनो।

श्लोक 2 (13.143.2)

पुष्करार्थं कृतं स्तैन्यं पुरा भरतसत्तम । राजर्षिभिर्महाराज तथैव च द्विजर्षिभिः ॥

puṣkarārthaṃ kṛtaṃ stainyaṃ purā bharatasattama | rājarṣibhirmahārāja tathaiva ca dvijarṣibhiḥ

हे भरतश्रेष्ठ! हे महाराज! पूर्वकाल में राजर्षियों और ब्रह्मर्षियों के बीच एक कमल को लेकर चोरी का प्रसंग उठ खड़ा हुआ था।

श्लोक 3 (13.143.3)

पुरा प्रभासे ऋषयः समग्राः । समेता वै मन्त्रममन्त्रयन्त । चराम सर्वां पृथिवीं पुण्यतीर्थां । तन्नः कामं हन्त गच्छाम सर्वे ॥

purā prabhāse ṛṣayaḥ samagrāḥ | sametā vai mantramamantrayanta | carāma sarvāṃ pṛthivīṃ puṇyatīrthāṃ | tannaḥ kāmaṃ hanta gacchāma sarve

पूर्वकाल में प्रभास क्षेत्र में सब ऋषि एकत्र हुए और परस्पर परामर्श करने लगे—“हम पुण्यतीर्थों से भरी सारी पृथ्वी में विचरण करें; यही हमारी इच्छा है, तो आओ, हम सब चलें।”

श्लोक 4 (13.143.4)

शुक्रोऽङ्गिराश्चैव कविश्च विद्वां- । स्तथा ह्यगस्त्यो नारदपर्वतौ च । भृगुर्वसिष्ठः कश्यपो गौतमश्च । विश्वामित्रो जमदग्निश्च राजन् ॥

śukro'ṅgirāścaiva kaviśca vidvāṃ- | stathā hyagastyo nāradaparvatau ca | bhṛgurvasiṣṭhaḥ kaśyapo gautamaśca | viśvāmitro jamadagniśca rājan

शुक्र, अङ्गिरा, विद्वान् कवि, अगस्त्य, नारद और पर्वत, भृगु, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र और जमदग्नि—हे राजन्!

श्लोक 5 (13.143.5)

ऋषिस्तथा गालवोऽथाष्टकश्च । भरद्वाजोऽरुन्धती वालखिल्याः । शिबिर्दिलीपो नहुषोऽम्बरीषो । राजा ययातिर्धुन्धुमारोऽथ पूरुः ॥

ṛṣistathā gālavo'thāṣṭakaśca | bharadvājo'rundhatī vālakhilyāḥ | śibirdilīpo nahuṣo'mbarīṣo | rājā yayātirdhundhumāro'tha pūruḥ

ऋषि गालव, अष्टक, भरद्वाज, अरुन्धती, वालखिल्यगण, शिबि, दिलीप, नहुष, अम्बरीष, राजा ययाति, धुन्धुमार और पूरु—

श्लोक 6 (13.143.6)

जग्मुः पुरस्कृत्य महानुभावं । शतक्रतुं वृत्रहणं नरेन्द्राः । तीर्थानि सर्वाणि परिभ्रमन्तो । माघ्यां ययुः कौशिकीं पुण्यतीर्थाम् ॥

jagmuḥ puraskṛtya mahānubhāvaṃ | śatakratuṃ vṛtrahaṇaṃ narendrāḥ | tīrthāni sarvāṇi paribhramanto | māghyāṃ yayuḥ kauśikīṃ puṇyatīrthām

ये सब महाप्रभावशाली वृत्रहन्ता शतक्रतु (इन्द्र) को आगे करके चले। वे नरेश्वर सब तीर्थों में घूमते हुए माघ मास में पुण्यतीर्था कौशिकी पर पहुँचे।

श्लोक 7 (13.143.7)

सर्वेषु तीर्थेष्ववधूतपापा । जग्मुस्ततो ब्रह्मसरः सुपुण्यम् । देवस्य तीर्थे जलमग्निकल्पा । विगाह्य ते भुक्तबिसप्रसूनाः ॥

sarveṣu tīrtheṣvavadhūtapāpā | jagmustato brahmasaraḥ supuṇyam | devasya tīrthe jalamagnikalpā | vigāhya te bhuktabisaprasūnāḥ

सब तीर्थों में पापरहित होकर वे अत्यन्त पवित्र ब्रह्मसर पर गए। अग्नि के समान तेजस्वी उन ऋषियों ने देवता के तीर्थ के जल में स्नान किया और कमल की नाल तथा पुष्पों का भोजन किया।

श्लोक 8 (13.143.8)

केचिद्बिसान्यखनंस्तत्र राजन्न- । न्ये मृणालान्यखनंस्तत्र विप्राः । अथापश्यन्पुष्करं ते ह्रियन्तं । ह्रदादगस्त्येन समुद्धृतं तत् ॥

kecidbisānyakhanaṃstatra rājanna- | nye mṛṇālānyakhanaṃstatra viprāḥ | athāpaśyanpuṣkaraṃ te hriyantaṃ | hradādagastyena samuddhṛtaṃ tat

हे राजन्! वहाँ कुछ ने कमल की जड़ें खोदीं और दूसरे विप्रों ने मृणाल खोदे। तब उन्होंने देखा कि जिस कमल को अगस्त्य ने सरोवर से निकाला था, उसे कोई ले जा रहा है।

श्लोक 9 (13.143.9)

तानाह सर्वानृषिमुख्यानगस्त्यः । केनाहृतं पुष्करं मे सुजातम् । युष्माञ्शङ्के पुष्करं दीयतां मे । न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम् ॥

tānāha sarvānṛṣimukhyānagastyaḥ | kenāhṛtaṃ puṣkaraṃ me sujātam | yuṣmāñśaṅke puṣkaraṃ dīyatāṃ me | na vai bhavanto hartumarhanti padmam

अगस्त्य ने उन सब श्रेष्ठ ऋषियों से कहा—“मेरे सुन्दर उगे हुए कमल को किसने ले लिया? मुझे आप लोगों पर ही सन्देह है। मेरा कमल लौटा दीजिए; आप लोगों को कमल चुराना उचित नहीं है।”

अगस्त्य उवाच

श्लोक 10 (13.143.10)

शृणोमि कालो हिंसते धर्मवीर्यं । सेयं प्राप्ता वर्तते धर्मपीडा । पुराऽधर्मो वर्तते नेह याव- । त्तावद्गच्छामः सुरलोकं चिराय ॥

śṛṇomi kālo hiṃsate dharmavīryaṃ | seyaṃ prāptā vartate dharmapīḍā | purā'dharmo vartate neha yāva- | ttāvadgacchāmaḥ suralokaṃ cirāya

मैं सुनता हूँ कि काल धर्म के बल को नष्ट कर रहा है; धर्म की यह पीड़ा अब आ पहुँची है। जब तक यहाँ अधर्म का बोलबाला नहीं हुआ, तब तक हम चिरकाल के लिए देवलोक चले जाएँ।

श्लोक 11 (13.143.11)

पुरा वेदान्ब्राह्मणा ग्राममध्ये । घुष्टस्वरा वृषलान्श्रावयन्ति । पुरा राजा व्यवहारानधर्मा- । न्पश्यत्यहं परलोकं व्रजामि ॥

purā vedānbrāhmaṇā grāmamadhye | ghuṣṭasvarā vṛṣalānśrāvayanti | purā rājā vyavahārānadharmā- | npaśyatyahaṃ paralokaṃ vrajāmi

इससे पहले कि ब्राह्मण गाँव के बीच ऊँचे स्वर से शूद्रों को वेद सुनाने लगें और राजा अधर्मयुक्त मुकदमों का निर्णय करने लगे, मैं परलोक को जाता हूँ।

श्लोक 12 (13.143.12)

पुरा राजा प्रत्यवरान्गरीयसो । मंस्यत्यथैनमनुयास्यन्ति सर्वे । धर्मोत्तरं यावदिदं न वर्तते । तावद्व्रजामि परलोकं चिराय ॥

purā rājā pratyavarāngarīyaso | maṃsyatyathainamanuyāsyanti sarve | dharmottaraṃ yāvadidaṃ na vartate | tāvadvrajāmi paralokaṃ cirāya

इससे पहले कि राजा निम्न जनों को श्रेष्ठ मानने लगे और सब लोग उसी का अनुसरण करने लगें, जब तक धर्म को सर्वोपरि रखने वाली यह व्यवस्था समाप्त नहीं हुई है, तब तक मैं चिरकाल के लिए परलोक को जाता हूँ।

श्लोक 13 (13.143.13)

पुरा प्रपश्यामि परेण मर्त्या- । न्बलीयसा दुर्बलान्भुज्यमानान् । तस्माद्यास्यामि परलोकं चिराय । न ह्युत्सहे द्रष्टुमीदृङ्नृलोके ॥

purā prapaśyāmi pareṇa martyā- | nbalīyasā durbalānbhujyamānān | tasmādyāsyāmi paralokaṃ cirāya | na hyutsahe draṣṭumīdṛṅnṛloke

इससे पहले कि मैं बलवानों के द्वारा दुर्बल मनुष्यों को सताया जाता देखूँ, मैं चिरकाल के लिए परलोक चला जाऊँगा; क्योंकि ऐसा दृश्य मनुष्यलोक में देखना मुझसे सहा नहीं जाता।

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (13.143.14)

तमाहुरार्ता ऋषयो महर्षिं । न ते वयं पुष्करं चोरयामः । मिथ्याभिशंसा भवता न कार्या । शपाम तीक्ष्णैः शपथैर्महर्षे ॥

tamāhurārtā ṛṣayo maharṣiṃ | na te vayaṃ puṣkaraṃ corayāmaḥ | mithyābhiśaṃsā bhavatā na kāryā | śapāma tīkṣṇaiḥ śapathairmaharṣe

तब दुःखी ऋषियों ने उन महर्षि से कहा—“हमने आपका कमल नहीं चुराया है। आपको हम पर झूठा आरोप नहीं लगाना चाहिए। हे महर्षे! हम कठोर शपथें लेंगे।”

श्लोक 15 (13.143.15)

ते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु । सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्राः । ततोऽशपन्त शपथान्पर्ययेण । सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रैः ॥

te niścitāstatra maharṣayastu | sampaśyanto dharmametaṃ narendrāḥ | tato'śapanta śapathānparyayeṇa | sahaiva te pārthiva putrapautraiḥ

हे नरेन्द्र! उन महर्षियों ने इसे ही धर्म मानकर निश्चय किया और अपने पुत्रों तथा पौत्रों सहित बारी-बारी से शपथें लेने लगे।

भृगुरुवाच

श्लोक 16 (13.143.16)

प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडितः प्रतिताडयेत् । खादेच्च पृष्ठमांसानि यस्ते हरति पुष्करम् ॥

pratyākrośedihākruṣṭastāḍitaḥ pratitāḍayet | khādecca pṛṣṭhamāṃsāni yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह गाली खाकर बदले में गाली दे, मार खाकर बदले में मारे, और पीठ का मांस खाए (पीठ पीछे निन्दा करे)।

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 17 (13.143.17)

अस्वाध्यायपरो लोके श्वानं च परिकर्षतु । पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

asvādhyāyaparo loke śvānaṃ ca parikarṣatu | pure ca bhikṣurbhavatu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह वेदाध्ययन छोड़ दे, संसार में कुत्ते को खींचता फिरे और नगर में भिक्षुक बने।

कश्यप उवाच

श्लोक 18 (13.143.18)

सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासे लोभं करोतु च । कूटसाक्षित्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

sarvatra sarvaṃ paṇatu nyāse lobhaṃ karotu ca | kūṭasākṣitvamabhyetu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह सर्वत्र सब कुछ बेचता-खरीदता फिरे, धरोहर में लोभ करे और झूठा गवाह बने।

गौतम उवाच

श्लोक 19 (13.143.19)

जीवत्वहङ्कृतो बुद्ध्या विषमेणासमेन सः । कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

jīvatvahaṅkṛto buddhyā viṣameṇāsamena saḥ | karṣako matsarī cāstu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह अहंकार में फूला हुआ, टेढ़ी और ऊँची-नीची बुद्धि से जीने वाला, किसान और ईर्ष्यालु हो।

अङ्गिरा उवाच

श्लोक 20 (13.143.20)

अशुचिर्ब्रह्मकूटोस्तु श्वानं च परिकर्षतु । ब्रह्महाऽनिकृतिश्चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

aśucirbrahmakūṭostu śvānaṃ ca parikarṣatu | brahmahā'nikṛtiścāstu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह अपवित्र हो, वेद के विषय में झूठा बने, कुत्तों को खींचता फिरे और बिना प्रायश्चित्त किए ब्रह्महत्यारा हो।

धुन्धुमार उवाच

श्लोक 21 (13.143.21)

अकृतज्ञस्तु मित्राणां शूद्रायां च प्रजायतु । एकः सम्पन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

akṛtajñastu mitrāṇāṃ śūdrāyāṃ ca prajāyatu | ekaḥ sampannamaśnātu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह मित्रों का कृतघ्न हो, शूद्रा स्त्री से सन्तान उत्पन्न करे और अकेला ही सम्पन्न भोजन खाए।

पुरूरवा उवाच

श्लोक 22 (13.143.22)

चिकित्सायां प्रचरतु भार्यया चैव पुष्यतु । श्वशुरात्तस्य वृत्तिः स्याद्यस्ते हरति पुष्करम् ॥

cikitsāyāṃ pracaratu bhāryayā caiva puṣyatu | śvaśurāttasya vṛttiḥ syādyaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह चिकित्सा का धन्धा करे, पत्नी के सहारे पले और उसकी जीविका ससुर से चले।

दिलीप उवाच

श्लोक 23 (13.143.23)

उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः । तस्य लोकान्स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

udapānaplave grāme brāhmaṇo vṛṣalīpatiḥ | tasya lokānsa vrajatu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह उस ब्राह्मण के लोकों को जाए जो कुएँ पर स्नान करने वाले गाँव में शूद्रा का पति बना हुआ है।

शुक्र उवाच

श्लोक 24 (13.143.24)

वृथा मांसं समश्नातु दिवा गच्छतु मैथुनम् । प्रेष्यो भवतु राज्ञश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥

vṛthā māṃsaṃ samaśnātu divā gacchatu maithunam | preṣyo bhavatu rājñaśca yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह व्यर्थ ही (यज्ञ के बिना) मांस खाए, दिन में स्त्री-सहवास करे और राजा का सेवक बने।

जमदग्निरुवाच

श्लोक 25 (13.143.25)

अनध्यायेष्वधीयीत मित्रं श्राद्धे च भोजयेत् । श्राद्धे शूद्रस्य चाश्नीयाद्यस्ते हरति पुष्करम् ॥

anadhyāyeṣvadhīyīta mitraṃ śrāddhe ca bhojayet | śrāddhe śūdrasya cāśnīyādyaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह अनध्याय के दिनों में पढ़े, श्राद्ध में मित्र को भोजन कराए और शूद्र के श्राद्ध में भोजन करे।

शिबिरुवाच

श्लोक 26 (13.143.26)

अनाहिताग्निर्मियतां यज्ञे विघ्नं करोतु च । तपस्विभिर्विरुध्येच्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥

anāhitāgnirmiyatāṃ yajñe vighnaṃ karotu ca | tapasvibhirvirudhyecca yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह अग्नि की स्थापना किए बिना ही मर जाए, यज्ञ में विघ्न डाले और तपस्वियों से विरोध करे।

ययातिरुवाच

श्लोक 27 (13.143.27)

अनृतौ व्रतनियतायां भार्यायां स प्रजायतु । निराकरोतु वेदांश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥

anṛtau vrataniyatāyāṃ bhāryāyāṃ sa prajāyatu | nirākarotu vedāṃśca yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह ऋतुकाल के बिना, व्रत-नियम में लगी हुई पत्नी से सन्तान उत्पन्न करे और वेदों का तिरस्कार करे।

नहुष उवाच

श्लोक 28 (13.143.28)

अतिथिर्गृहसंस्थोऽस्तु कामवृत्तस्तु दीक्षितः । विद्यां प्रयच्छतु भृतो यस्ते हरति पुष्करम् ॥

atithirgṛhasaṃstho'stu kāmavṛttastu dīkṣitaḥ | vidyāṃ prayacchatu bhṛto yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह घर में रहने वाला यति हो, दीक्षित होकर भी मनमाना आचरण करे और वेतन लेकर विद्या दे।

अम्बरीष उवाच

श्लोक 29 (13.143.29)

नृशंसस्त्यक्तधर्मोऽस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च । निहन्तु ब्राह्मणं चापि यस्ते हरति पुष्करम् ॥

nṛśaṃsastyaktadharmo'stu strīṣu jñātiṣu goṣu ca | nihantu brāhmaṇaṃ cāpi yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह स्त्रियों, जातिजनों और गौओं के प्रति क्रूर और धर्म त्यागने वाला हो, और ब्राह्मण का वध भी करे।

नारद उवाच

श्लोक 30 (13.143.30)

गृहज्ञानी बहिःशास्त्रं पठतां विस्वरं पदम् । गरीयसोऽवजानातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

gṛhajñānī bahiḥśāstraṃ paṭhatāṃ visvaraṃ padam | garīyaso'vajānātu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह घर में ही ज्ञानी बना रहे, वेद से बाहर के शास्त्र पढ़े, पढ़ने वालों के बीच बेसुरे स्वर में पद का पाठ करे और अपने से बड़ों का अपमान करे।

नाभाग उवाच

श्लोक 31 (13.143.31)

अनृतं भाषतु सदा सद्भिश्चैव विरुध्यतु । शुल्केन ददतु कन्यां यस्ते हरति पुष्करम् ॥

anṛtaṃ bhāṣatu sadā sadbhiścaiva virudhyatu | śulkena dadatu kanyāṃ yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह सदा झूठ बोले, सज्जनों से विरोध करे और मूल्य लेकर कन्या दे।

कविरुवाच

श्लोक 32 (13.143.32)

पदा च गां संस्पृशतु सूर्यं च प्रति मेहतु । शरणागतं संत्यजतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

padā ca gāṃ saṃspṛśatu sūryaṃ ca prati mehatu | śaraṇāgataṃ saṃtyajatu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह पैर से गौ को छुए, सूर्य की ओर मुँह करके मूत्र त्यागे और शरण में आए हुए को छोड़ दे।

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 33 (13.143.33)

करोतु भृतकोऽवर्षां राज्ञश्चास्तु पुरोहितः । ऋत्विगस्तु ह्ययाज्यस्य यस्ते हरति पुष्करम् ॥

karotu bhṛtako'varṣāṃ rājñaścāstu purohitaḥ | ṛtvigastu hyayājyasya yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह वेतनभोगी सेवक होकर अनावृष्टि कराए, राजा का पुरोहित बने और जिसका यज्ञ कराना निषिद्ध है, उसका ऋत्विक् हो।

पर्वत उवाच

श्लोक 34 (13.143.34)

ग्रामे चाधिकृतः सोऽस्तु खरयानेन गच्छतु । शुनः कर्षतु वृत्त्यर्थे यस्ते हरति पुष्करम् ॥

grāme cādhikṛtaḥ so'stu kharayānena gacchatu | śunaḥ karṣatu vṛttyarthe yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह गाँव का अधिकारी बने, गधे की सवारी से चले और जीविका के लिए कुत्तों को खींचता फिरे।

भरद्वाज उवाच

श्लोक 35 (13.143.35)

सर्वपापसमादानं नृशंसे चानृते च यत् । तत्तस्यास्तु सदा पापं यस्ते हरति पुष्करम् ॥

sarvapāpasamādānaṃ nṛśaṃse cānṛte ca yat | tattasyāstu sadā pāpaṃ yaste harati puṣkaram

क्रूर कर्म और झूठ से जो सब पापों का संचय होता है, वह सारा पाप सदा उसी को लगे जो तुम्हारा कमल चुराए।

अष्टक उवाच

श्लोक 36 (13.143.36)

स राजास्त्वकृतप्रज्ञः कामवृत्तश्च पापकृत् । अधर्मेणाभिशास्तूर्वीं यस्ते हरति पुष्करम् ॥

sa rājāstvakṛtaprajñaḥ kāmavṛttaśca pāpakṛt | adharmeṇābhiśāstūrvīṃ yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह राजा बुद्धिहीन, स्वेच्छाचारी और पापी हो और अधर्म से पृथ्वी पर शासन करे।

गालव उवाच

श्लोक 37 (13.143.37)

पापिष्ठेभ्यो ह्यनर्घार्हः स नरोऽस्तु स्वपापकृत् । दत्त्वा दानं कीर्तयतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

pāpiṣṭhebhyo hyanarghārhaḥ sa naro'stu svapāpakṛt | dattvā dānaṃ kīrtayatu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह मनुष्य निकृष्टतम पापियों से भी अधिक अनादर के योग्य हो, अपने ही जनों के प्रति पाप करने वाला हो, और दान देकर उसका बखान करे।

अरुन्धत्युवाच

श्लोक 38 (13.143.38)

श्वश्र्वाऽपवादं वदतु भर्तुर्भवतु दुर्मनाः । एका स्वादु समश्नातु या ते हरति पुष्करम् ॥

śvaśrvā'pavādaṃ vadatu bharturbhavatu durmanāḥ | ekā svādu samaśnātu yā te harati puṣkaram

जो स्त्री तुम्हारा कमल चुराए, वह सास की निन्दा करे, पति के प्रति दुर्भाव रखे और अकेली ही स्वादिष्ट भोजन खाए।

वालखिल्या ऊचुः

श्लोक 39 (13.143.39)

एकपादेन वृत्त्यर्थं ग्रामद्वारे स तिष्ठतु । धर्मज्ञस्त्यक्तधर्मास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

ekapādena vṛttyarthaṃ grāmadvāre sa tiṣṭhatu | dharmajñastyaktadharmāstu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह जीविका के लिए गाँव के द्वार पर एक पैर से खड़ा रहे और धर्म को जानते हुए भी धर्म त्याग दे।

पशुसख उवाच

श्लोक 40 (13.143.40)

अग्निहोत्रमनादृत्य स सुखं स्वपतु द्विजः । परिव्राट् कामवृत्तोस्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

agnihotramanādṛtya sa sukhaṃ svapatu dvijaḥ | parivrāṭ kāmavṛttostu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल चुराए, वह द्विज अग्निहोत्र की उपेक्षा करके सुख से सोए और स्वेच्छाचारी परिव्राजक बन जाए।

सुरभ्युवाच

श्लोक 41 (13.143.41)

वालजेन निदानेन कांस्यं भवतु दोहनम् । दुह्येत परवत्सेन या ते हरति पुष्करम् ॥

vālajena nidānena kāṃsyaṃ bhavatu dohanam | duhyeta paravatsena yā te harati puṣkaram

जो गौ तुम्हारा कमल चुराए, उसे बालों की रस्सी से बाँधकर काँसे के पात्र में दुहा जाए और दूसरे के बछड़े से दुहाया जाए।

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (13.143.42)

ततस्तु तैः शपथैः शप्यमानै- । र्नानाविधैर्बहुभिः कौरवेन्द्र । सहस्राक्षो देवराट् सम्प्रहृष्टः । समीक्ष्य तं कोपनं विप्रमुख्यम् ॥

tatastu taiḥ śapathaiḥ śapyamānai- | rnānāvidhairbahubhiḥ kauravendra | sahasrākṣo devarāṭ samprahṛṣṭaḥ | samīkṣya taṃ kopanaṃ vipramukhyam

हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार उन ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार की बहुत-सी शपथें लिए जाने पर सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उस क्रोधी श्रेष्ठ ब्राह्मण की ओर देखा,

श्लोक 43 (13.143.43)

यथाब्रवीन्मघवा प्रत्ययं स्वं । स्वयं समागत्य तमृषिं जातरोषम् । ब्रह्मर्षिदेवर्षिनृपर्षिमध्ये । यं तं निबोधेह ममाद्य राजन् ॥

yathābravīnmaghavā pratyayaṃ svaṃ | svayaṃ samāgatya tamṛṣiṃ jātaroṣam | brahmarṣidevarṣinṛparṣimadhye | yaṃ taṃ nibodheha mamādya rājan

और ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा राजर्षियों के बीच स्वयं उस कुपित ऋषि के पास आकर मघवा ने अपना अभिप्राय कहा। हे राजन्! वह आज मुझसे सुनो।

शक्र उवाच

श्लोक 44 (13.143.44)

अध्वर्यवे दुहितरं ददातु । छन्दोगे वाऽऽचरितब्रह्मचर्ये । अथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः । स्नायीत यः पुष्करमाददाति ॥

adhvaryave duhitaraṃ dadātu | chandoge vā''caritabrahmacarye | atharvaṇaṃ vedamadhītya vipraḥ | snāyīta yaḥ puṣkaramādadāti

जो ब्राह्मण यह कमल ले ले, वह अपनी कन्या किसी अध्वर्यु को दे, या ब्रह्मचर्य का पालन कर चुके किसी छन्दोग (सामवेदी) को दे; और अथर्ववेद का अध्ययन करके स्नातक-स्नान करे।

श्लोक 45 (13.143.45)

सर्वान्वेदानधीयीत पुण्यशीलोऽस्तु धार्मिकः । ब्रह्मणः सदनं यातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥

sarvānvedānadhīyīta puṇyaśīlo'stu dhārmikaḥ | brahmaṇaḥ sadanaṃ yātu yaste harati puṣkaram

जो तुम्हारा कमल ले, वह सब वेदों का अध्ययन करे, पुण्यशील और धर्मात्मा हो, और ब्रह्मलोक को जाए।

अगस्त्य उवाच

श्लोक 46 (13.143.46)

आशीर्वादस्त्वया प्रोक्तः शपथो बलसूदन । दीयतां पुष्करं मह्यमेष धर्मः सनातनः ॥

āśīrvādastvayā proktaḥ śapatho balasūdana | dīyatāṃ puṣkaraṃ mahyameṣa dharmaḥ sanātanaḥ

हे बलसूदन! आपने जो कहा है, वह आशीर्वाद है, शपथ नहीं। मेरा कमल मुझे लौटा दीजिए; यही सनातन धर्म है।

इन्द्र उवाच

श्लोक 47 (13.143.47)

न मया भगवँल्लोभाद्धृतं पुष्करमद्य वै । धर्मांस्तु श्रोतुकामेन हृतं न क्रोद्धुमर्हसि ॥

na mayā bhagavam̐llobhāddhṛtaṃ puṣkaramadya vai | dharmāṃstu śrotukāmena hṛtaṃ na kroddhumarhasi

हे भगवन्! मैंने लोभ से आपका कमल नहीं लिया है। मैंने धर्मों को सुनने की इच्छा से इसे लिया था; इसलिए आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 48 (13.143.48)

धर्मश्रुतिसमुत्कर्षो धर्मसेतुरनामयः । आर्षो वै शाश्वतो नित्यमव्ययोऽयं मया श्रुतः ॥

dharmaśrutisamutkarṣo dharmaseturanāmayaḥ | ārṣo vai śāśvato nityamavyayo'yaṃ mayā śrutaḥ

मैंने सुना है कि यह धर्म के उपदेश का परम उत्कर्ष है, धर्म का निर्दोष सेतु है, ऋषियों से प्राप्त, शाश्वत, नित्य और अविनाशी है।

श्लोक 49 (13.143.49)

तदिदं गृह्यतां विद्वन्पुष्करं द्विजसत्तम । अतिक्रमं मे भगवन्क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित ॥

tadidaṃ gṛhyatāṃ vidvanpuṣkaraṃ dvijasattama | atikramaṃ me bhagavankṣantumarhasyanindita

हे विद्वन्! हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप यह कमल ग्रहण कीजिए। हे निर्दोष भगवन्! मेरे अपराध को क्षमा कीजिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 50 (13.143.50)

इत्युक्तः स महेन्द्रेण तपस्वी कोपनो भृशम् । जग्राह पुष्करं धीमान्प्रसन्नश्चाभवन्मुनिः ॥

ityuktaḥ sa mahendreṇa tapasvī kopano bhṛśam | jagrāha puṣkaraṃ dhīmānprasannaścābhavanmuniḥ

महेन्द्र के ऐसा कहने पर अत्यन्त क्रोधी वे तपस्वी बुद्धिमान् मुनि प्रसन्न हो गए और उन्होंने कमल ले लिया।

श्लोक 51 (13.143.51)

प्रययुस्ते ततो भूयस्तीर्थानि वनगोचराः । पुण्येषु तीर्थेषु तथा गात्राण्याप्लावयन्त ते ॥

prayayuste tato bhūyastīrthāni vanagocarāḥ | puṇyeṣu tīrtheṣu tathā gātrāṇyāplāvayanta te

तब वे वनचारी ऋषि पुनः तीर्थों की ओर चल पड़े और पुण्यतीर्थों में अपने अंगों को स्नान से पवित्र करने लगे।

श्लोक 52 (13.143.52)

आख्यानं य इदं युक्तः पठेत्पर्वणिपर्वणि । न मूर्खं जनयेत्पुत्रं न भवेच्च निराकृतिः ॥

ākhyānaṃ ya idaṃ yuktaḥ paṭhetparvaṇiparvaṇi | na mūrkhaṃ janayetputraṃ na bhavecca nirākṛtiḥ

जो मनुष्य सावधान होकर प्रत्येक पर्व पर इस आख्यान का पाठ करता है, उसके मूर्ख पुत्र नहीं होता और वह तिरस्कृत नहीं होता।

श्लोक 53 (13.143.53)

न तमापत्स्पृशेत्काचिद्विज्वरो न जरावहः । विरजाः श्रेयसा युक्तः प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयात् ॥

na tamāpatspṛśetkācidvijvaro na jarāvahaḥ | virajāḥ śreyasā yuktaḥ pretya svargamavāpnuyāt

उसे कोई विपत्ति नहीं छूती; वह ज्वररहित रहता है और जरा उसे नहीं सताती। वह निर्मल तथा कल्याण से युक्त होकर मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करता है।

श्लोक 54 (13.143.54)

यश्च शास्त्रमधीयीत ऋषिभिः परिपालितम् । स गच्छेद्ब्रह्मणो लोकमव्ययं च नरोत्तम ॥

yaśca śāstramadhīyīta ṛṣibhiḥ paripālitam | sa gacchedbrahmaṇo lokamavyayaṃ ca narottama

और जो ऋषियों द्वारा सुरक्षित शास्त्र का अध्ययन करता है, हे नरश्रेष्ठ! वह ब्रह्मा के अविनाशी लोक को जाता है।

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