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अनुशासन पर्व · अध्याय 144

जमदग्नि का सूर्य पर प्रहार का संकल्प

युधिष्ठिर पूछते हैं कि श्राद्ध तथा अन्य पुण्य कार्यों में छत्र और उपानह देने की प्रथा किसने चलाई। भीष्म इसके उत्तर में जमदग्नि और सूर्य का आख्यान सुनाते हैं। मुनि खेल में बाण चलाते हैं और उनकी पत्नी रेणुका दोपहर की धूप में तपे हुए सिर और पैरों के साथ बाण लौटा लाती है, पर देर से पहुँचती है। क्रुद्ध जमदग्नि सूर्य को ही बाणों से गिराने का संकल्प करते हैं। तब ब्राह्मण का रूप धरकर सूर्य उन्हें समझाते हैं कि वे जल खींचकर वर्षा करते हैं, जिससे अन्न और सब यज्ञादि कर्म चलते हैं, और उनसे शान्त होने की प्रार्थना करते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.144.1)

यदिदं श्राद्धकृत्येषु दीयते भरतर्षभ । छत्रं चोपानहौ चैव केनैतत्सम्प्रवर्तितम् ॥

yadidaṃ śrāddhakṛtyeṣu dīyate bharatarṣabha | chatraṃ copānahau caiva kenaitatsampravartitam

हे भरतश्रेष्ठ! श्राद्ध-कर्मों में छत्र और जूते (उपानह) दिए जाते हैं। इसे किसने आरम्भ किया?

श्लोक 2 (13.144.2)

कथं चैतत्समुत्पन्नं किमर्थं चैव दीयते । न केवलं श्राद्धकृत्ये पुण्यकेष्वपि दीयते ॥

kathaṃ caitatsamutpannaṃ kimarthaṃ caiva dīyate | na kevalaṃ śrāddhakṛtye puṇyakeṣvapi dīyate

यह कैसे उत्पन्न हुआ और किसलिए दिया जाता है? यह केवल श्राद्ध में ही नहीं, पुण्य कर्मों में भी दिया जाता है।

श्लोक 3 (13.144.3)

बहुष्वपि निमित्तेषु पुण्यमाश्रित्य दीयते । एतद्विस्तरतो ब्रह्मञ्श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥

bahuṣvapi nimitteṣu puṇyamāśritya dīyate | etadvistarato brahmañśrotumicchāmi tattvataḥ

अनेक अवसरों पर यह पुण्य को आधार मानकर दिया जाता है। मैं इसे विस्तार से और यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (13.144.4)

शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम् । यथैतत्प्रथितं लोके यथा चैतत्प्रवर्तितम् ॥

śṛṇu rājannavahitaśchatropānahavistaram | yathaitatprathitaṃ loke yathā caitatpravartitam

हे राजन्! छत्र और उपानह का पूरा वृत्तान्त ध्यान से सुनो—यह संसार में कैसे प्रसिद्ध हुआ और कैसे आरम्भ हुआ,

श्लोक 5 (13.144.5)

यथा चाक्षय्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथागतम् । सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥

yathā cākṣayyatāṃ prāptaṃ puṇyatāṃ ca yathāgatam | sarvametadaśeṣeṇa pravakṣyāmi narādhipa

यह कैसे अक्षय हुआ और कैसे पुण्यदायी बना—यह सब मैं तुम्हें पूरी तरह बताऊँगा, हे नराधिप!

श्लोक 6 (13.144.6)

इतिहासं पुरावृत्तमिदं शृणु नराधिप । जमदग्नेश्च संवादं सूर्यस्य च महात्मनः ॥

itihāsaṃ purāvṛttamidaṃ śṛṇu narādhipa | jamadagneśca saṃvādaṃ sūryasya ca mahātmanaḥ

हे नराधिप! यह प्राचीन इतिहास सुनो—जमदग्नि और महात्मा सूर्य का संवाद।

श्लोक 7 (13.144.7)

पुरा स भगवान्साक्षाद्धनुषा क्रीडति प्रभो । सन्धायसन्धाय शरांश्चिक्षेप किल भार्गवः ॥

purā sa bhagavānsākṣāddhanuṣā krīḍati prabho | sandhāyasandhāya śarāṃścikṣepa kila bhārgavaḥ

हे प्रभो! पूर्वकाल में भृगुवंशी पूज्य जमदग्नि स्वयं धनुष से खेल रहे थे; वे बार-बार बाण चढ़ाकर उन्हें छोड़ते थे।

श्लोक 8 (13.144.8)

तान्क्षिप्तान्रेणुका सर्वांस्तस्येषून्दीप्ततेजसः । आनीय सा तदा तस्मै प्रादादसकृदच्युत ॥

tānkṣiptānreṇukā sarvāṃstasyeṣūndīptatejasaḥ | ānīya sā tadā tasmai prādādasakṛdacyuta

रेणुका उनके छोड़े हुए उन सब चमकते बाणों को उठा लाती और हे अच्युत! बार-बार उन्हें लाकर उन्हें सौंप देती थी।

श्लोक 9 (13.144.9)

अथ तेन स शब्देन ज्यायाश्चैव शरस्य च । प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान् ॥

atha tena sa śabdena jyāyāścaiva śarasya ca | prahṛṣṭaḥ sampracikṣepa sā ca pratyājahāra tān

तब प्रत्यंचा और बाण की ध्वनि से प्रसन्न होकर वे फिर बाण छोड़ते और वह फिर उन्हें उठा लाती।

श्लोक 10 (13.144.10)

ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे । स सायकान्द्विजो मुक्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत् ॥

tato madhyāhnamārūḍhe jyeṣṭhāmūle divākare | sa sāyakāndvijo muktvā reṇukāmidamabravīt

तब जब सूर्य ज्येष्ठामूल में दोपहर पर चढ़ आया, उन ब्राह्मण ने बाण छोड़कर रेणुका से यह कहा—

जमदग्निरुवाच

श्लोक 11 (13.144.11)

गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान्धनुश्च्युतान् । यावदेतान्पुनः सुभ्रु क्षिपामीति जनाधिप ॥

gacchānaya viśālākṣi śarānetāndhanuścyutān | yāvadetānpunaḥ subhru kṣipāmīti janādhipa

हे विशाल नेत्रों वाली! जाओ और धनुष से छूटे हुए इन बाणों को ले आओ, ताकि हे सुन्दर भौंहों वाली! मैं इन्हें फिर चला सकूँ—ऐसा उन्होंने कहा, हे जनाधिप!

भीष्म उवाच

श्लोक 12 (13.144.12)

सा गच्छन्त्यन्तरा छायां वृक्षमाश्रित्य भामिनी । तस्थौ तस्या हि सन्तप्तं शिरः पादौ तथैव च ॥

sā gacchantyantarā chāyāṃ vṛkṣamāśritya bhāminī | tasthau tasyā hi santaptaṃ śiraḥ pādau tathaiva ca

वह सुन्दरी जाते हुए बीच में वृक्ष की छाया का आश्रय लेकर ठहर गई, क्योंकि उसका सिर और पैर तप गए थे।

श्लोक 13 (13.144.13)

स्थिता सा तु मुहूर्तं वै भर्तुः शापभयाच्छुभा । ययावानयितुं भूयः सायकानसितेक्षणा । प्रत्याजगाम च शरांस्तानादाय यशस्विनी ॥

sthitā sā tu muhūrtaṃ vai bhartuḥ śāpabhayācchubhā | yayāvānayituṃ bhūyaḥ sāyakānasitekṣaṇā | pratyājagāma ca śarāṃstānādāya yaśasvinī

पति के शाप के भय से वह शुभ स्त्री क्षण भर ठहरी रही, फिर वह काली आँखों वाली यशस्विनी बाणों को लाने फिर गई और उन्हें उठाकर लौट आई।

श्लोक 14 (13.144.14)

सा वै प्रस्विन्नसर्वाङ्गी पद्भ्यां दुःखं नियच्छती । उपाजगाम भर्तारं भयाद्भर्तुः प्रवेपती ॥

sā vai prasvinnasarvāṅgī padbhyāṃ duḥkhaṃ niyacchatī | upājagāma bhartāraṃ bhayādbhartuḥ pravepatī

सारे अंगों में पसीने से भीगी हुई, पैरों की पीड़ा को सहती और पति के भय से काँपती हुई वह उनके पास आई।

श्लोक 15 (13.144.15)

स तामृषिस्तदा क्रुद्धो वाक्यमाह शुभाननाम् । रेणुके किं चिरेण त्वमागतेति पुनःपुनः ॥

sa tāmṛṣistadā kruddho vākyamāha śubhānanām | reṇuke kiṃ cireṇa tvamāgateti punaḥpunaḥ

तब क्रोधित ऋषि ने उस सुन्दर मुख वाली से बार-बार कहा—“रेणुके! तुम इतनी देर से क्यों आई हो?”

रेणुकोवाच

श्लोक 16 (13.144.16)

शिरस्तप्तं प्रदीप्तौ मे पादौ चैव तपोधन । सूर्यतेजोनिरुद्धाऽहं वृक्षच्छायां समाश्रिता ॥

śirastaptaṃ pradīptau me pādau caiva tapodhana | sūryatejoniruddhā'haṃ vṛkṣacchāyāṃ samāśritā

हे तपोधन! मेरा सिर तप गया था और मेरे पैर जल रहे थे। सूर्य की तपन से रुककर मैंने वृक्ष की छाया का आश्रय लिया।

श्लोक 17 (13.144.17)

एतस्मात्कारणाद्ब्रह्मंश्चिरायैतत्कृतं मया । एतच्छ्रुत्वा मम विभो मा क्रुधस्त्वं तपोधन ॥

etasmātkāraṇādbrahmaṃścirāyaitatkṛtaṃ mayā | etacchrutvā mama vibho mā krudhastvaṃ tapodhana

हे ब्रह्मन्! इसी कारण मुझे देर हुई। हे विभो! यह सुनकर आप क्रोध न कीजिए, हे तपोधन!

जमदग्निरुवाच

श्लोक 18 (13.144.18)

अद्यैनं दीप्तकिरणं रेणुके तव दुःखदम् । शरैर्निपातयिष्यामि सूर्यमस्त्राग्नितेजसा ॥

adyainaṃ dīptakiraṇaṃ reṇuke tava duḥkhadam | śarairnipātayiṣyāmi sūryamastrāgnitejasā

रेणुके! आज मैं तुम्हें कष्ट देने वाले इस प्रचण्ड किरणों वाले सूर्य को अपने अस्त्रों की अग्नि के तेज से बाणों द्वारा गिरा दूँगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (13.144.19)

स विष्फार्य धनुर्दिव्यं गृहीत्वा च शरान्बहून् । अतिष्ठत्सूर्यमभितो यतो याति ततोमुखः ॥

sa viṣphārya dhanurdivyaṃ gṛhītvā ca śarānbahūn | atiṣṭhatsūryamabhito yato yāti tatomukhaḥ

उन्होंने अपना दिव्य धनुष तानकर बहुत-से बाण हाथ में लिए और सूर्य की ओर मुख करके, वह जिधर जाता था उसी ओर घूमते हुए खड़े हो गए।

श्लोक 20 (13.144.20)

अथ तं प्रेक्ष्य सन्नद्धं सूर्योऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् । द्विजरूपेण कौन्तेय किं ते सूर्योऽपराध्यति ॥

atha taṃ prekṣya sannaddhaṃ sūryo'bhyetya vaco'bravīt | dvijarūpeṇa kaunteya kiṃ te sūryo'parādhyati

उन्हें सन्नद्ध देखकर सूर्य ब्राह्मण का रूप धरकर उनके पास आए, हे कुन्तीपुत्र! और बोले—“सूर्य ने आपका क्या अपराध किया है?”

सूर्य उवाच

श्लोक 21 (13.144.21)

आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो दिवि तिष्ठंस्ततस्ततः । रसं हृतं वै वर्षासु प्रवर्षति दिवाकरः ॥

ādatte raśmibhiḥ sūryo divi tiṣṭhaṃstatastataḥ | rasaṃ hṛtaṃ vai varṣāsu pravarṣati divākaraḥ

आकाश में स्थित सूर्य अपनी किरणों से यहाँ-वहाँ से रस खींच लेता है और फिर वर्षा ऋतु में सूर्य उसी खींचे हुए रस को बरसा देता है।

श्लोक 22 (13.144.22)

ततोऽन्नं जायते विप्र मनुष्याणां सुखावहम् । अन्नं प्राणा इति यथा वेदेषु परिपठ्यते ॥

tato'nnaṃ jāyate vipra manuṣyāṇāṃ sukhāvaham | annaṃ prāṇā iti yathā vedeṣu paripaṭhyate

हे विप्र! उसी से मनुष्यों को सुख देने वाला अन्न उत्पन्न होता है; क्योंकि वेदों में कहा गया है कि अन्न ही प्राण है।

श्लोक 23 (13.144.23)

अथाऽभ्रेषु निगूढश्च रश्मिभिः परिवारितः । सप्तद्वीपानिमान्ब्रह्मन्वर्षेणाभिप्रवर्षति ॥

athā'bhreṣu nigūḍhaśca raśmibhiḥ parivāritaḥ | saptadvīpānimānbrahmanvarṣeṇābhipravarṣati

फिर बादलों में छिपकर और अपनी किरणों से घिरा हुआ वह इन सातों द्वीपों पर वर्षा बरसाता है, हे ब्रह्मन्!

श्लोक 24 (13.144.24)

ततस्तदौषधीनां च वीरुधां पुष्पपत्रजम् । सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति प्रभो ॥

tatastadauṣadhīnāṃ ca vīrudhāṃ puṣpapatrajam | sarvaṃ varṣābhinirvṛttamannaṃ sambhavati prabho

तब ओषधियों और लताओं के फूल-पत्ते आदि सब कुछ वर्षा से उत्पन्न होता है और अन्न तैयार होता है, हे प्रभो!

श्लोक 25 (13.144.25)

जातकर्माणि सर्वाणि व्रतोपनयनानि च । गोदानानि विवाहाश्च तथा यज्ञसमृद्धयः ॥

jātakarmāṇi sarvāṇi vratopanayanāni ca | godānāni vivāhāśca tathā yajñasamṛddhayaḥ

सब जातकर्म, व्रत और उपनयन, गोदान और विवाह तथा यज्ञों की समृद्धि—

श्लोक 26 (13.144.26)

सत्राणि दानानि तथा संयोगा वित्तसञ्चयाः । अन्नतः सम्प्रवर्तन्ते यथा त्वं वेत्थ भार्गव ॥

satrāṇi dānāni tathā saṃyogā vittasañcayāḥ | annataḥ sampravartante yathā tvaṃ vettha bhārgava

सत्र और दान, सम्बन्ध और धन का संचय—ये सब अन्न से ही चलते हैं, जैसा आप स्वयं जानते हैं, हे भार्गव!

श्लोक 27 (13.144.27)

रमणीयानि यावन्ति यावदारम्भिकाणि च । सर्वमन्नात्प्रभवति विदितं कीर्तयामि ते ॥

ramaṇīyāni yāvanti yāvadārambhikāṇi ca | sarvamannātprabhavati viditaṃ kīrtayāmi te

जितनी भी रमणीय वस्तुएँ हैं और जितने भी आरम्भ किए जाने वाले कार्य हैं, वह सब अन्न से ही उत्पन्न होता है। मैं तुमसे वही कहता हूँ जो सबको विदित है।

श्लोक 28 (13.144.28)

सर्वं हि वेत्थ विप्र त्वं यदेतत्कीर्तितं मया । प्रसादये त्वां विप्रर्षे किं ते सूर्यो निपात्यते ॥

sarvaṃ hi vettha vipra tvaṃ yadetatkīrtitaṃ mayā | prasādaye tvāṃ viprarṣe kiṃ te sūryo nipātyate

हे विप्र! मैंने जो कहा है, उस सबको आप जानते हैं। हे विप्रर्षे! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ; सूर्य को क्यों गिराया जा रहा है?

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