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अनुशासन पर्व · अध्याय 145

सूर्य द्वारा छत्र और उपानह का प्रदान

युधिष्ठिर पूछते हैं कि सूर्य के प्रार्थना करने पर जमदग्नि ने क्या किया। ब्राह्मण का रूप धरे सूर्य हाथ जोड़कर कहते हैं कि चलते हुए लक्ष्य को बेधना कठिन है; जमदग्नि उत्तर देते हैं कि वे दोपहर में सूर्य के क्षण भर ठहरने पर प्रहार करेंगे। सूर्य शरण माँगते हैं, तब जमदग्नि हँसकर उन्हें अभय देते हैं और तेज धूप से बचाव का उपाय सोचने को कहते हैं। इस पर सूर्य उन्हें छत्र और उपानह देते हैं। भीष्म युधिष्ठिर से ब्राह्मणों को इनका दान करने को कहते हैं और इसके स्वर्गीय फल बताते हैं।

अध्याय 144अध्याय-सूचीअध्याय 146

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.145.1)

एवं प्रयाचति तदा भास्करे मुनिसत्तमः । जमदग्निर्महातेजाः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥

evaṃ prayācati tadā bhāskare munisattamaḥ | jamadagnirmahātejāḥ kiṃ kāryaṃ pratyapadyata

जब सूर्य ने इस प्रकार प्रार्थना की, तब मुनिश्रेष्ठ महातेजस्वी जमदग्नि ने क्या किया?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.145.2)

स तथा याचमानस्य मुनिरग्निसमप्रभः । जमदग्निः शमं नैव जगाम कुरुनन्दन ॥

sa tathā yācamānasya muniragnisamaprabhaḥ | jamadagniḥ śamaṃ naiva jagāma kurunandana

हे कुरुनन्दन! इस प्रकार सूर्य के याचना करने पर भी अग्नि के समान तेजस्वी मुनि जमदग्नि बिल्कुल शान्त नहीं हुए।

श्लोक 3 (13.145.3)

ततः सूर्यो मधुरया वाचा तमिदमब्रवीत् । कृताञ्जलिर्विप्ररूपी प्रणम्यैनं विशाम्पते ॥

tataḥ sūryo madhurayā vācā tamidamabravīt | kṛtāñjalirviprarūpī praṇamyainaṃ viśāmpate

तब ब्राह्मण का रूप धारण किए हुए सूर्य ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और मधुर वाणी में यह कहा, हे प्रजापालक!

सूर्य उवाच

श्लोक 4 (13.145.4)

चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः । कथं चलं भेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ॥

calaṃ nimittaṃ viprarṣe sadā sūryasya gacchataḥ | kathaṃ calaṃ bhetsyasi tvaṃ sadā yāntaṃ divākaram

हे विप्रर्षे! लक्ष्य सदा चलता रहता है, क्योंकि सूर्य सदा चलता ही रहता है। सदा चलते हुए सूर्य को आप कैसे बेधेंगे?

जमदग्निरुवाच

श्लोक 5 (13.145.5)

स्थिरं चापि चलं चापि जाने त्वां ज्ञानचक्षुषा । अवश्यं विनयाधानं कार्यमद्य मया तव ॥

sthiraṃ cāpi calaṃ cāpi jāne tvāṃ jñānacakṣuṣā | avaśyaṃ vinayādhānaṃ kāryamadya mayā tava

तुम स्थिर हो या चलते हो, मैं ज्ञान की दृष्टि से तुम्हें जानता हूँ। आज मुझे तुम्हें अवश्य अनुशासन सिखाना है।

श्लोक 6 (13.145.6)

मध्याह्ने वै निमेषार्धं तिष्ठसि त्वं दिवाकर । तत्र भेत्स्यामि सूर्य त्वां न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥

madhyāhne vai nimeṣārdhaṃ tiṣṭhasi tvaṃ divākara | tatra bhetsyāmi sūrya tvāṃ na me'trāsti vicāraṇā

हे दिवाकर! दोपहर में तुम आधे निमेष भर के लिए ठहरते हो। हे सूर्य! उसी समय मैं तुम्हें बेधूँगा; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है।

सूर्य उवाच

श्लोक 7 (13.145.7)

असंशयं मां विप्रर्षे भेत्स्यसे धन्विनांवर । अपकारिणं मां विद्धि भगवञ्शरणागतम् ॥

asaṃśayaṃ māṃ viprarṣe bhetsyase dhanvināṃvara | apakāriṇaṃ māṃ viddhi bhagavañśaraṇāgatam

हे विप्रर्षे! हे धनुर्धरों में श्रेष्ठ! निःसन्देह आप मुझे बेधेंगे; किन्तु हे भगवन्! मुझे अपराधी जानिए, जो अब आपकी शरण में आया है।

भीष्म उवाच

श्लोक 8 (13.145.8)

ततः प्रहस्य भगवाञ्जमदग्निरुवाच तम् । न भीः सूर्य त्वया कार्या प्रणिपातगतो ह्यसि ॥

tataḥ prahasya bhagavāñjamadagniruvāca tam | na bhīḥ sūrya tvayā kāryā praṇipātagato hyasi

तब पूज्य जमदग्नि ने हँसकर उनसे कहा—“हे सूर्य! तुम्हें डरना नहीं चाहिए, क्योंकि तुम प्रणाम करके मेरी शरण में आए हो।”

जमदग्निरुवाच

श्लोक 9 (13.145.9)

ब्राह्मणेष्वार्जवं यच्च स्थैर्यं च धरणीतले । सौम्यतां चैव सोमस्य गाम्भीर्यं वरुणस्य च ॥

brāhmaṇeṣvārjavaṃ yacca sthairyaṃ ca dharaṇītale | saumyatāṃ caiva somasya gāmbhīryaṃ varuṇasya ca

ब्राह्मणों में सरलता, पृथ्वी पर स्थिरता, चन्द्रमा की सौम्यता और वरुण की गम्भीरता,

श्लोक 10 (13.145.10)

दीप्तिमग्नेः प्रभां मेरोः प्रतापं धनदस्य च । एतान्यतिक्रमेद्यो वै स हन्याच्छरणागतम् ॥

dīptimagneḥ prabhāṃ meroḥ pratāpaṃ dhanadasya ca | etānyatikramedyo vai sa hanyāccharaṇāgatam

अग्नि की दीप्ति, मेरु की प्रभा और कुबेर का प्रताप—जो इन सबका उल्लंघन करता है, वही शरण में आए हुए का वध कर सकता है।

श्लोक 11 (13.145.11)

भवेत्स गुरुतल्पी च ब्रह्महा च स वै भवेत् । सुरापानं स कुर्याच्च यो हन्याच्छरणागतम् ॥

bhavetsa gurutalpī ca brahmahā ca sa vai bhavet | surāpānaṃ sa kuryācca yo hanyāccharaṇāgatam

जो शरण में आए हुए का वध करे, वह गुरुपत्नीगामी, ब्रह्महत्यारा और सुरापान करने वाला हो जाता है।

श्लोक 12 (13.145.12)

एतस्य त्वपनीतस्य समाधिं तात चिन्तय । यथा सुखगमः पन्था भवेत्त्वद्रश्मितापितः ॥

etasya tvapanītasya samādhiṃ tāta cintaya | yathā sukhagamaḥ panthā bhavettvadraśmitāpitaḥ

हे तात! इस कष्ट का कोई उपाय सोचो, जिससे तुम्हारी किरणों से तपा हुआ मार्ग सुगमता से चलने योग्य हो जाए।

भीष्म उवाच

श्लोक 13 (13.145.13)

एतावदुक्त्वा स तदा तूष्णीमासीद्भृगूत्तमः । अथ सूर्योऽददत्तस्मै छत्रोपानहमाशु वै ॥

etāvaduktvā sa tadā tūṣṇīmāsīdbhṛgūttamaḥ | atha sūryo'dadattasmai chatropānahamāśu vai

इतना कहकर भृगुश्रेष्ठ चुप हो गए। तब सूर्य ने शीघ्र ही उन्हें छत्र और उपानह दिए।

सूर्य उवाच

श्लोक 14 (13.145.14)

महर्षे शिरसस्त्राणं छत्रं मद्रश्मिवारणम् । प्रतिगृह्णीष्व पद्भ्यां च त्राणार्थं चर्मपादुके ॥

maharṣe śirasastrāṇaṃ chatraṃ madraśmivāraṇam | pratigṛhṇīṣva padbhyāṃ ca trāṇārthaṃ carmapāduke

हे महर्षे! यह छत्र लीजिए, जो आपके सिर की रक्षा करेगा और मेरी किरणों को रोकेगा; और पैरों की रक्षा के लिए ये चमड़े की पादुकाएँ भी स्वीकार कीजिए।

श्लोक 15 (13.145.15)

अद्यप्रभृति चैवेह लोके सम्प्रचरिष्यति । पुण्यकेषु च सर्वेषु परमक्षय्यमेव च ॥

adyaprabhṛti caiveha loke sampracariṣyati | puṇyakeṣu ca sarveṣu paramakṣayyameva ca

आज से यह संसार में प्रचलित होगा, और सब पुण्य कर्मों में इसका फल परम तथा अक्षय होगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 16 (13.145.16)

उपानहौ च च्छत्रं च सूर्येणैतत्प्रवर्तितम् । पुण्यमेतदभिख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत ॥

upānahau ca cchatraṃ ca sūryeṇaitatpravartitam | puṇyametadabhikhyātaṃ triṣu lokeṣu bhārata

इस प्रकार सूर्य ने उपानह और छत्र का प्रचलन कराया। हे भारत! यह पुण्य तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।

श्लोक 17 (13.145.17)

तस्मात्प्रयच्छ विप्रेषु छत्रोपानहमुत्तमम् । धर्मस्ते सुमहान्भावी न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥

tasmātprayaccha vipreṣu chatropānahamuttamam | dharmaste sumahānbhāvī na me'trāsti vicāraṇā

इसलिए ब्राह्मणों को उत्तम छत्र और उपानह दान करो। तुम्हें महान् धर्म प्राप्त होगा; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है।

श्लोक 18 (13.145.18)

छत्रं हि भरतश्रेष्ठ यः प्रदद्याद्द्विजातये । शुभ्रं शतशलाकं वै स प्रेत्य सुखमेधते ॥

chatraṃ hi bharataśreṣṭha yaḥ pradadyāddvijātaye | śubhraṃ śataśalākaṃ vai sa pretya sukhamedhate

हे भरतश्रेष्ठ! जो द्विज को सौ तीलियों वाला श्वेत छत्र दान करता है, वह मरकर सुख पाता है।

श्लोक 19 (13.145.19)

स शक्रलोके वसति पूज्यमानो द्विजातिभिः । अप्सरोभिश्च सततं देवैश्च भरतर्षभ ॥

sa śakraloke vasati pūjyamāno dvijātibhiḥ | apsarobhiśca satataṃ devaiśca bharatarṣabha

वह इन्द्रलोक में निवास करता है, जहाँ द्विज, अप्सराएँ और देवता सदा उसका सम्मान करते हैं, हे भरतश्रेष्ठ!

श्लोक 20 (13.145.20)

उपानहौ च यो दद्याच्छ्लक्ष्णौ स्नेहसमन्वितौ । स्नातकाय महाबाहो संशिताय द्विजातये ॥

upānahau ca yo dadyācchlakṣṇau snehasamanvitau | snātakāya mahābāho saṃśitāya dvijātaye

और हे महाबाहो! जो स्नेहपूर्वक कोमल जूते किसी स्नातक, कठोर व्रतों वाले ब्राह्मण को देता है,

श्लोक 21 (13.145.21)

सोपि लोकानवाप्नोति देवतैरभिपूजितान् । गोलोके स मुदा युक्तो वसति प्रेत्य भारत ॥

sopi lokānavāpnoti devatairabhipūjitān | goloke sa mudā yukto vasati pretya bhārata

वह भी देवताओं से सम्मानित लोकों को प्राप्त करता है; मरने के बाद वह प्रसन्न होकर गोलोक में निवास करता है, हे भारत!

श्लोक 22 (13.145.22)

एतत्ते भरतश्रेष्ठ मया कार्त्स्न्येन कीर्तितम् । छत्रोपानहदानस्य फलं भरतसत्तम ॥

etatte bharataśreṣṭha mayā kārtsnyena kīrtitam | chatropānahadānasya phalaṃ bharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ! छत्र और उपानह के दान का यह फल मैंने तुम्हें पूरा-पूरा बता दिया, हे भरतसत्तम!

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