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अनुशासन पर्व · अध्याय 146

शूद्रों की सेवा और शौच-विधि

युधिष्ठिर पूछते हैं कि शूद्रों की सेवा कितने प्रकार की है और उससे उन्हें कौन-से लोक मिलते हैं। भीष्म वृद्ध पराशर का उपदेश सुनाते हैं: जो शूद्र वैदिक विधि से या कुमार्ग से तप करता है, वह क्लेश पाता है और म्लेच्छ जातियों में जन्म लेता है, जिनके नाम यहाँ गिनाए गए हैं। हर वर्ण की अपनी जीविका और अपना धर्म है, और उसे छोड़ने से नरक तथा पशु-योनि मिलती है। फिर पराशर उन शौच-नियमों को कहने लगते हैं जिनका पालन भिक्षुओं की सेवा करने वाले शूद्र को करना चाहिए: मल-मूत्र त्याग के बाद मिट्टी और जल का प्रयोग, हाथ-पैर और वस्त्र की शुद्धि, तथा आचमन और उससे प्रसन्न होने वाले देवता।

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.146.1)

शूद्राणामिह शुश्रूषा नित्यमेवानुवर्णिता । कैः कारणैः कतिविधा शुश्रूषा समुदाहृता ॥

śūdrāṇāmiha śuśrūṣā nityamevānuvarṇitā | kaiḥ kāraṇaiḥ katividhā śuśrūṣā samudāhṛtā

आपने कहा है कि यहाँ शूद्रों के लिए सदा सेवा का ही विधान है। वह सेवा किन कारणों से और कितने प्रकार की बताई गई है?

श्लोक 2 (13.146.2)

के च शुश्रूषया लोका विहिता भरतर्षभ । शूद्राणां भरतश्रेष्ठ ब्रूहि मे धर्मलक्षणम् ॥

ke ca śuśrūṣayā lokā vihitā bharatarṣabha | śūdrāṇāṃ bharataśreṣṭha brūhi me dharmalakṣaṇam

हे भरतश्रेष्ठ, सेवा से उन्हें कौन-से लोक मिलते हैं? शूद्रों के धर्म का स्वरूप मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.146.3)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शूद्राणामनुकम्पार्थं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | śūdrāṇāmanukampārthaṃ yaduktaṃ brahmavādinā

इस विषय में एक पुराना इतिहास भी कहा जाता है, जिसे ब्रह्मवादी ने शूद्रों पर दया करके कहा था।

श्लोक 4 (13.146.4)

वृद्धः पराशरः प्राह धर्मं शुभ्रमनामयम् । अनुग्रहार्थं वर्णानां शौचाचारसमन्वितम् ॥

vṛddhaḥ parāśaraḥ prāha dharmaṃ śubhramanāmayam | anugrahārthaṃ varṇānāṃ śaucācārasamanvitam

वृद्ध पराशर ने वर्णों के कल्याण के लिए पवित्रता और सदाचार से युक्त निर्मल और निर्दोष धर्म का उपदेश किया।

श्लोक 5 (13.146.5)

धर्मोपदेशमखिलं यथावदनुपूर्वशः । शिष्यानध्यापयामास शास्त्रमर्थवदर्थवित् ॥

dharmopadeśamakhilaṃ yathāvadanupūrvaśaḥ | śiṣyānadhyāpayāmāsa śāstramarthavadarthavit

अर्थ को जानने वाले उन्होंने अपने शिष्यों को धर्म का सम्पूर्ण उपदेश, अर्थपूर्ण शास्त्र के रूप में, ठीक-ठीक और क्रम से पढ़ाया।

श्लोक 6 (13.146.6)

क्षान्तेन्द्रियेण मानेन शुचिनाऽचापलेन वै । अदुर्बलेन धीरेण शान्तेनोत्तरवादिना ॥

kṣāntendriyeṇa mānena śucinā'cāpalena vai | adurbalena dhīreṇa śāntenottaravādinā

क्षमाशील और जितेन्द्रिय, मर्यादावान्, पवित्र, चंचलता से रहित, निर्बल न होने वाला, धीर, शान्त और केवल उत्तर में बोलने वाला,

श्लोक 7 (13.146.7)

अलुब्धेनानृशंसेन ऋजुना ब्रह्मवादिना । चारित्रतत्परेणैव सर्वभूतहितात्मना ॥

alubdhenānṛśaṃsena ṛjunā brahmavādinā | cāritratatpareṇaiva sarvabhūtahitātmanā

लोभ और क्रूरता से रहित, सरल, ब्रह्मवादी, सदाचार में तत्पर, सब प्राणियों के हित में मन लगाने वाला,

श्लोक 8 (13.146.8)

अरयः षड्विजेतव्या नित्यं स्वं देहमाश्रिताः । कामक्रोधौ च लोभश्च मानमोहौ मदस्तथा ॥

arayaḥ ṣaḍvijetavyā nityaṃ svaṃ dehamāśritāḥ | kāmakrodhau ca lobhaśca mānamohau madastathā

अपने ही शरीर में रहने वाले छह शत्रुओं को उसे सदा जीतना चाहिए: काम, क्रोध, लोभ, मान, मोह और छठा मद।

श्लोक 9 (13.146.9)

विधिना धृतिमास्थाय शुश्रूषुरनहंकृतः । वर्णत्रयस्यानुमतो यथाशक्ति यथाबलम् ॥

vidhinā dhṛtimāsthāya śuśrūṣuranahaṃkṛtaḥ | varṇatrayasyānumato yathāśakti yathābalam

विधि के अनुसार धैर्य रखकर, सेवा की इच्छा वाला, अहंकार से रहित, तीनों वर्णों की अनुमति पाकर, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार,

श्लोक 10 (13.146.10)

कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा च चतुर्विधम् । आस्थाय नियमं धीमाञ्शान्तो दान्तो जितेन्द्रियः ॥

karmaṇā manasā vācā cakṣuṣā ca caturvidham | āsthāya niyamaṃ dhīmāñśānto dānto jitendriyaḥ

कर्म, मन, वाणी और दृष्टि के चार प्रकार के नियम को अपनाकर, बुद्धिमान्, शान्त, संयमी और जितेन्द्रिय होकर,

श्लोक 11 (13.146.11)

रक्षोयक्षजनद्वेषी शेषान्नकृतभोजनः । वर्णत्रयान्मधु यथा भ्रमरो धर्ममाचरेत् ॥

rakṣoyakṣajanadveṣī śeṣānnakṛtabhojanaḥ | varṇatrayānmadhu yathā bhramaro dharmamācaret

राक्षसों, यक्षों और वैसे लोगों से द्वेष रखने वाला, बचा हुआ अन्न खाने वाला शूद्र, भौंरा जैसे फूलों से मधु लेता है वैसे ही तीनों वर्णों से धर्म ग्रहण करके उसका आचरण करे।

श्लोक 12 (13.146.12)

यदि शूद्रस्तपः कुर्याद्वेददृष्टेन कर्मणा । इह चास्य परिक्लेशः प्रेत्य चास्याशुभागतिः ॥

yadi śūdrastapaḥ kuryādvedadṛṣṭena karmaṇā | iha cāsya parikleśaḥ pretya cāsyāśubhāgatiḥ

यदि शूद्र वेद में बताई विधि से तप करे, तो इस लोक में उसे क्लेश होता है और मरने के बाद उसकी गति अशुभ होती है।

श्लोक 13 (13.146.13)

अधर्म्यमयशस्यं च तपः शूद्रे प्रतिष्ठितम् । अमार्गेण तपस्तप्त्वा म्लेच्छेषु फलमश्नुते ॥

adharmyamayaśasyaṃ ca tapaḥ śūdre pratiṣṭhitam | amārgeṇa tapastaptvā mleccheṣu phalamaśnute

शूद्र में प्रतिष्ठित तप धर्म के विरुद्ध है और यश नहीं देता। कुमार्ग से तप करके वह उसका फल म्लेच्छों में पाता है।

श्लोक 14 (13.146.14)

अन्यथा वर्तमानो हि न शूद्रो धर्ममर्हति । अमार्गेण प्रयातानां प्रत्यक्षादुपलभ्यते । चातुर्वर्ण्यव्यपेतानां जातिमूर्तिपरिग्रहः ॥

anyathā vartamāno hi na śūdro dharmamarhati | amārgeṇa prayātānāṃ pratyakṣādupalabhyate | cāturvarṇyavyapetānāṃ jātimūrtiparigrahaḥ

जो शूद्र इसके विपरीत चलता है, वह धर्म के योग्य नहीं रहता। कुमार्ग पर चलने वालों में यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि चारों वर्णों से भटके हुए लोग दूसरी जाति का शरीर धारण कर लेते हैं।

श्लोक 15 (13.146.15)

तथा ते हि शकाश्चीनाः काम्भोजाः पारदास्तथा । शबराः पप्लवाश्चैव तुषारयवनास्तथा ॥

tathā te hi śakāścīnāḥ kāmbhojāḥ pāradāstathā | śabarāḥ paplavāścaiva tuṣārayavanāstathā

इसी प्रकार ये हैं: शक, चीन, काम्बोज और पारद, शबर, पप्लव, तुषार और यवन,

श्लोक 16 (13.146.16)

दार्वाश्च दरदाश्चैव उज्जिहानास्तथेतराः । वेणाश्च कङ्कणाश्चैव सिम्हला मद्रकास्तथा ॥

dārvāśca daradāścaiva ujjihānāstathetarāḥ | veṇāśca kaṅkaṇāścaiva simhalā madrakāstathā

दार्व और दरद, उज्जिहान तथा अन्य, वेण, कंकण, सिंहल और मद्रक,

श्लोक 17 (13.146.17)

किष्किन्धकाः पुलिन्दाश्च कह्वाश्चान्ध्राः सनीरगाः । गन्धिका द्रमिडाश्चैव बर्बराश्चूचुकास्तथा ॥

kiṣkindhakāḥ pulindāśca kahvāścāndhrāḥ sanīragāḥ | gandhikā dramiḍāścaiva barbarāścūcukāstathā

किष्किन्धक, पुलिन्द, कह्व, आन्ध्र और सनीरग, गन्धिक, द्रमिड, बर्बर और चूचुक,

श्लोक 18 (13.146.18)

किराताः पार्वतेयाश्च कोलाश्चोलाः सकाषकाः । आरूकाश्चैव दोहाश्च याश्चान्याम्लेच्छजातयः ॥

kirātāḥ pārvateyāśca kolāścolāḥ sakāṣakāḥ | ārūkāścaiva dohāśca yāścānyāmlecchajātayaḥ

किरात, पार्वतेय, कोल, चोल और सकाषक, आरूक और दोह, तथा जो अन्य म्लेच्छ जातियाँ हैं।

श्लोक 19 (13.146.19)

विकृता विकृताचारा दृश्यन्ते क्रूरबुद्धयः । अमार्गेणाश्रिता धर्मं ततो जात्यन्तरं गताः ॥

vikṛtā vikṛtācārā dṛśyante krūrabuddhayaḥ | amārgeṇāśritā dharmaṃ tato jātyantaraṃ gatāḥ

वे विकृत रूप वाले, विकृत आचरण वाले और क्रूर बुद्धि वाले दिखाई देते हैं। कुमार्ग से धर्म का आश्रय लेने के कारण वे उससे दूसरी जाति में चले गए।

श्लोक 20 (13.146.20)

अमार्गोपार्जितस्यैतत्तपसो विदितं फलम् । न नश्यति कृतं कर्म शुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥

amārgopārjitasyaitattapaso viditaṃ phalam | na naśyati kṛtaṃ karma śubhaṃ vā yadi vā'śubham

कुमार्ग से कमाए तप का यही फल जाना गया है। किया हुआ कर्म, चाहे शुभ हो या अशुभ, नष्ट नहीं होता।

श्लोक 21 (13.146.21)

अत्राप्येते वसु प्राप्य विकर्म तपसार्जितम् । पाषण्डानर्चयिष्यन्ति धर्मकामा वृथा श्रमाः ॥

atrāpyete vasu prāpya vikarma tapasārjitam | pāṣaṇḍānarcayiṣyanti dharmakāmā vṛthā śramāḥ

यहाँ भी ये लोग विपरीत कर्म और तप से कमाया धन पाकर, धर्म की इच्छा रखते हुए भी व्यर्थ श्रम करते हुए पाखण्डियों की पूजा करेंगे।

श्लोक 22 (13.146.22)

एवं चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां च पार्थिव । विपरीतं वर्तमाना म्लेच्छा जायन्त्यबुद्धयः ॥

evaṃ caturṇāṃ varṇānāmāśramāṇāṃ ca pārthiva | viparītaṃ vartamānā mlecchā jāyantyabuddhayaḥ

हे राजन्, इस प्रकार चारों वर्णों और आश्रमों के विपरीत चलने वाले बुद्धिहीन लोग म्लेच्छ होकर जन्म लेते हैं।

श्लोक 23 (13.146.23)

अध्यायधनिनो विप्राः क्षत्रियाणां बलं धनम् । वणिक्कृषिश्च वैश्यानां शूद्राणां परिचारिका ॥

adhyāyadhanino viprāḥ kṣatriyāṇāṃ balaṃ dhanam | vaṇikkṛṣiśca vaiśyānāṃ śūdrāṇāṃ paricārikā

ब्राह्मणों का धन अध्ययन है, क्षत्रियों का धन बल है, वैश्यों का धन व्यापार और खेती है, और शूद्रों का धन सेवा है।

श्लोक 24 (13.146.24)

व्युच्छेदात्तस्य धर्मस्य निरयायोपपद्यते । ततो म्लेच्छा भवन्त्येते निर्घृणा धर्मवर्जिताः । पुनश्च निरयं तेषां तिर्यग्योनिश्च शाश्वती ॥

vyucchedāttasya dharmasya nirayāyopapadyate | tato mlecchā bhavantyete nirghṛṇā dharmavarjitāḥ | punaśca nirayaṃ teṣāṃ tiryagyoniśca śāśvatī

उस धर्म के टूटने से मनुष्य नरक को जाता है। उसी से ये दयाहीन और धर्महीन म्लेच्छ बनते हैं। फिर उनके लिए नरक है और पशु-योनि भी चिरकाल तक बनी रहती है।

श्लोक 25 (13.146.25)

ये तु सत्पथमास्थाय वर्णाश्रमकृतं पुरा । सर्वान्विमार्गानुत्सृज्य स्वधर्मविधिमाश्रिताः ॥

ye tu satpathamāsthāya varṇāśramakṛtaṃ purā | sarvānvimārgānutsṛjya svadharmavidhimāśritāḥ

परन्तु जो लोग वर्णों और आश्रमों के लिए पूर्वकाल में बनाए सन्मार्ग का आश्रय लेकर सब कुमार्गों को छोड़ देते हैं और अपने धर्म की विधि पर टिके रहते हैं,

श्लोक 26 (13.146.26)

सर्वभूतदयावन्तो दैवतद्विजपूजकाः । शास्त्रदृष्टेन विधिना श्रद्धया जितमन्यवः ॥

sarvabhūtadayāvanto daivatadvijapūjakāḥ | śāstradṛṣṭena vidhinā śraddhayā jitamanyavaḥ

जो सब प्राणियों पर दया करते हैं, देवताओं और द्विजों की पूजा करते हैं, और शास्त्र में बताई विधि से श्रद्धापूर्वक क्रोध को जीत चुके हैं,

श्लोक 27 (13.146.27)

तेषां विधिं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः । उपादानविधिं कृत्स्नं शुश्रूषाधिगमं तथा ॥

teṣāṃ vidhiṃ pravakṣyāmi yathāvadanupūrvaśaḥ | upādānavidhiṃ kṛtsnaṃ śuśrūṣādhigamaṃ tathā

उनके लिए मैं विधि क्रम से बताऊँगा: आरम्भ करने की पूरी प्रक्रिया और सेवा की प्राप्ति।

श्लोक 28 (13.146.28)

शिष्टोपनयनं चैव मन्त्राणि विविधानि च । तथा शिष्यपरीक्षां च शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात् ॥

śiṣṭopanayanaṃ caiva mantrāṇi vividhāni ca | tathā śiṣyaparīkṣāṃ ca śāstraprāmāṇyadarśanāt

साथ ही शास्त्र की प्रामाणिकता को देखते हुए शिष्ट पुरुषों का उपनयन, अनेक मन्त्र और शिष्य की परीक्षा भी बताऊँगा।

श्लोक 29 (13.146.29)

प्रवक्ष्यामि यथातत्वं यथावदनुपूर्वशः । शौचकृत्यस्य शौचार्थान्सर्वानेव विशेषतः ॥

pravakṣyāmi yathātatvaṃ yathāvadanupūrvaśaḥ | śaucakṛtyasya śaucārthānsarvāneva viśeṣataḥ

शौच के आचरण के सभी प्रयोजन भी मैं विशेष रूप से यथार्थ, उचित और क्रमपूर्वक बताऊँगा।

श्लोक 30 (13.146.30)

महाशौचप्रभृतयो दृष्टास्तत्वार्थदर्शिभिः । तत्रापि शूद्रो भिक्षूणामिदं शेषं च कल्पयेत् ॥

mahāśaucaprabhṛtayo dṛṣṭāstatvārthadarśibhiḥ | tatrāpi śūdro bhikṣūṇāmidaṃ śeṣaṃ ca kalpayet

महाशौच आदि को तत्त्व को देखने वालों ने देखा है। उसमें भी शूद्र को चाहिए कि यह और शेष सब भिक्षुओं के लिए प्रस्तुत करे।

श्लोक 31 (13.146.31)

भिक्षुभिः सुकृतप्रज्ञैः केवलं धर्ममाश्रितैः । सम्यग्दर्शनसम्पन्नैर्गताध्वनि हितार्थिभिः । अवकाशमिमं मेध्यं निर्मितं कामवीरुधम् ॥

bhikṣubhiḥ sukṛtaprajñaiḥ kevalaṃ dharmamāśritaiḥ | samyagdarśanasampannairgatādhvani hitārthibhiḥ | avakāśamimaṃ medhyaṃ nirmitaṃ kāmavīrudham

सुविचारित बुद्धि वाले, केवल धर्म का आश्रय लेने वाले, सम्यक् दृष्टि से युक्त, मार्ग पर चल चुके और हित चाहने वाले भिक्षुओं के लिए यह पवित्र स्थान बनाया गया है, जो इच्छानुसार लताओं से ढका है।

श्लोक 32 (13.146.32)

निर्जनं संवृतं बुद्ध्वा नियतात्मा जितेन्द्रियः । सजलं भाजनं स्थाप्य मृत्तिकां च परीक्षिताम् ॥

nirjanaṃ saṃvṛtaṃ buddhvā niyatātmā jitendriyaḥ | sajalaṃ bhājanaṃ sthāpya mṛttikāṃ ca parīkṣitām

उस स्थान को निर्जन और ओट वाला जानकर, संयत और जितेन्द्रिय होकर, वह जल से भरा पात्र और परखी हुई मिट्टी रख दे।

श्लोक 33 (13.146.33)

परीक्ष्य भूमिं मूत्रार्थी तत आसीत वाग्यतः । उदङ्मुखो दिवा कुर्याद्रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः ॥

parīkṣya bhūmiṃ mūtrārthī tata āsīta vāgyataḥ | udaṅmukho divā kuryādrātrau ceddakṣiṇāmukhaḥ

भूमि को परखकर, मूत्र-त्याग की इच्छा वाला वह फिर मौन होकर बैठे। दिन में उत्तर की ओर मुख करे और रात में दक्षिण की ओर।

श्लोक 34 (13.146.34)

अन्तर्हितायां भूमौ तु अन्तर्हितशिरास्तथा । असमाप्ते तथा शौचे न वाचं किञ्चिदीरयेत् ॥

antarhitāyāṃ bhūmau tu antarhitaśirāstathā | asamāpte tathā śauce na vācaṃ kiñcidīrayet

ढकी हुई भूमि पर और सिर को भी ढककर बैठे। जब तक शौच पूरा न हो, वह कोई भी शब्द न बोले।

श्लोक 35 (13.146.35)

कृतकृत्यस्तथाऽऽचम्य गच्छन्नोदीरयेद्वचः । शौचार्थमुपविष्टस्तु मृद्भाजनपुरस्कृतः ॥

kṛtakṛtyastathā''camya gacchannodīrayedvacaḥ | śaucārthamupaviṣṭastu mṛdbhājanapuraskṛtaḥ

काम पूरा होने पर आचमन करके चलते समय वह कुछ न बोले। शौच के लिए बैठा हुआ, मिट्टी का पात्र सामने रखकर,

श्लोक 36 (13.146.36)

स्थाप्यं कमण्डलुं गृह्य पार्श्वोरुभ्यामथान्तरे । शौचं कुर्याच्छनैर्वीरो बुद्धिपूर्वमसङ्करम् ॥

sthāpyaṃ kamaṇḍaluṃ gṛhya pārśvorubhyāmathāntare | śaucaṃ kuryācchanairvīro buddhipūrvamasaṅkaram

कमण्डलु उठाकर उसे अपनी बगल और जाँघ के बीच रखे, और धीर पुरुष ध्यानपूर्वक, बिना गड़बड़ी के, धीरे-धीरे शौच करे।

श्लोक 37 (13.146.37)

पाणिना शुद्धमुदकं सङ्गृह्य विधिपूर्वकम् । विप्रुषश्च यथा न स्युर्यथा चोरू न संस्पृशेत् ॥

pāṇinā śuddhamudakaṃ saṅgṛhya vidhipūrvakam | vipruṣaśca yathā na syuryathā corū na saṃspṛśet

विधि के अनुसार हाथ में शुद्ध जल लेकर वह ध्यान रखे कि बूँदें न गिरें और जल जाँघों को न छुए।

श्लोक 38 (13.146.38)

अपाने मृत्तिकास्तिस्रः प्रदेयास्त्वनुपूर्वशः । हस्ताभ्यां च तथा विप्रो हस्तं हस्तेन संस्पृशेत् ॥

apāne mṛttikāstisraḥ pradeyāstvanupūrvaśaḥ | hastābhyāṃ ca tathā vipro hastaṃ hastena saṃspṛśet

गुदा पर क्रम से तीन मिट्टी के ढेले लगाने चाहिए, और दोनों हाथों से विप्र एक हाथ को दूसरे हाथ से रगड़े।

श्लोक 39 (13.146.39)

अपाने नव देयाः स्युरिति वृद्धानुशासनम् । मृत्तिका दीयमाना हि शोधयेद्देशमञ्जसा ॥

apāne nava deyāḥ syuriti vṛddhānuśāsanam | mṛttikā dīyamānā hi śodhayeddeśamañjasā

'गुदा पर नौ लगाने चाहिए' ऐसा वृद्धों का उपदेश है, क्योंकि लगाई गई मिट्टी उस स्थान को भली-भाँति शुद्ध करती है।

श्लोक 40 (13.146.40)

तस्मात्पाणितले देया मृत्तिकास्तु पुनः पुनः । बुद्धिपूर्वं प्रयत्नेन यथा नैव स्पृशेत्स्फिजौ ॥

tasmātpāṇitale deyā mṛttikāstu punaḥ punaḥ | buddhipūrvaṃ prayatnena yathā naiva spṛśetsphijau

इसलिए मिट्टी बार-बार हथेली पर लगानी चाहिए, सावधानी और प्रयत्न से, ताकि नितम्बों को न छुए।

श्लोक 41 (13.146.41)

यथा घातो हि न भवेत्क्लेदजः परिधानके । तथा गुदं प्रमार्जेत शौचार्थं तु पुनःपुनः ॥

yathā ghāto hi na bhavetkledajaḥ paridhānake | tathā gudaṃ pramārjeta śaucārthaṃ tu punaḥpunaḥ

वह शौच के लिए गुदा को बार-बार पोंछे, जिससे नीचे के वस्त्र में नमी से घाव न हो।

श्लोक 42 (13.146.42)

प्रतिपादं ततस्त्यक्त्वा शौचमुत्थाय कारयेत् । सव्ये द्वादश देयाः स्युस्तिस्रस्तिस्रः पुनः पुनः । देयाः कूर्परके हस्ते पृष्ठे बन्धे पुनः पुनः ॥

pratipādaṃ tatastyaktvā śaucamutthāya kārayet | savye dvādaśa deyāḥ syustisrastisraḥ punaḥ punaḥ | deyāḥ kūrparake haste pṛṣṭhe bandhe punaḥ punaḥ

फिर एक-एक पैर को छोड़कर वह उठे और शौच कराए। बाएँ हाथ पर बारह लगाए जाएँ, तीन-तीन बार-बार। कोहनी, हाथ और पीठ के जोड़ पर भी बार-बार लगाई जाएँ।

श्लोक 43 (13.146.43)

तथैवादर्शके दद्याच्चतस्रस्तूभयोरपि । उभयोर्हस्तयोरेवं सप्तसप्त प्रदापयेत् ॥

tathaivādarśake dadyāccatasrastūbhayorapi | ubhayorhastayorevaṃ saptasapta pradāpayet

इसी प्रकार दोनों के 'दर्पण' भाग पर चार-चार दी जाएँ; इस तरह दोनों हाथों पर सात-सात मिट्टी लगाई जाएँ।

श्लोक 44 (13.146.44)

ततोऽन्यां मृत्तिकां गृह्य कार्यं शौचं पुनस्तयोः । हस्तयोरेवमेतद्धि महाशौचं विधीयते । ततोऽन्यथा न कुर्वीत विधिरेष सनातनः ॥

tato'nyāṃ mṛttikāṃ gṛhya kāryaṃ śaucaṃ punastayoḥ | hastayorevametaddhi mahāśaucaṃ vidhīyate | tato'nyathā na kurvīta vidhireṣa sanātanaḥ

फिर दूसरी मिट्टी लेकर उन दोनों हाथों का शौच फिर करना चाहिए। यही महाशौच कहलाता है। इससे भिन्न न करे; यह विधि सनातन है।

श्लोक 45 (13.146.45)

उपस्थे मूत्रशौचं स्यादत ऊर्ध्वं विधीयते । अतोऽन्यथा तु यः कुर्यात्प्रायश्चित्तीयते तु सः ॥

upasthe mūtraśaucaṃ syādata ūrdhvaṃ vidhīyate | ato'nyathā tu yaḥ kuryātprāyaścittīyate tu saḥ

इसके बाद उपस्थ में मूत्र-शौच का विधान है। जो इससे भिन्न करता है, वह प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है।

श्लोक 46 (13.146.46)

मलोपहतचेलस्य द्विगुणं तु विधीयते । सहपादमथोरुभ्यां हस्तशौचमसंशयम् ॥

malopahatacelasya dviguṇaṃ tu vidhīyate | sahapādamathorubhyāṃ hastaśaucamasaṃśayam

मल से सने वस्त्र के लिए दुगुना विधान है, और पैरों तथा जाँघों के साथ हाथों का शौच निःसन्देह करना चाहिए।

श्लोक 47 (13.146.47)

अवधीरयमाणस्य सन्देह उपजायते । यथायथा विशुद्ध्येत तत्तथा तदुपक्रमे ॥

avadhīrayamāṇasya sandeha upajāyate | yathāyathā viśuddhyeta tattathā tadupakrame

जो इसकी उपेक्षा करता है, उसके मन में सन्देह उठता है। जिस-जिस प्रकार वह शुद्ध हो, उस कार्य में वह उसी प्रकार करे।

श्लोक 48 (13.146.48)

सकर्दमं तु वर्षासु गृहमाविश्य सङ्कटम् । हस्तयोर्मृत्तिकास्तिस्रः पादयोः षट् प्रदापयेत् ॥

sakardamaṃ tu varṣāsu gṛhamāviśya saṅkaṭam | hastayormṛttikāstisraḥ pādayoḥ ṣaṭ pradāpayet

वर्षा में कीचड़ वाले और तंग घर में प्रवेश करके वह हाथों पर तीन और पैरों पर छह मिट्टी के ढेले लगाए।

श्लोक 49 (13.146.49)

कामं दत्त्वा गुदे दद्यात्तिस्रः पद्भ्यां तथैव च । हस्तशौचं प्रकर्तव्यं मूत्रशौचविधेस्तथा ॥

kāmaṃ dattvā gude dadyāttisraḥ padbhyāṃ tathaiva ca | hastaśaucaṃ prakartavyaṃ mūtraśaucavidhestathā

गुदा पर इच्छा के अनुसार लगाकर वह पैरों पर भी तीन लगाए। हाथों का शौच करना चाहिए, और मूत्र-शौच की विधि भी।

श्लोक 50 (13.146.50)

मूत्रशौचे तथा हस्तौ पादाभ्यां चानुपूर्वशः । नैष्ठिके स्थानशौचे तु महाशौचं विधीयते ॥

mūtraśauce tathā hastau pādābhyāṃ cānupūrvaśaḥ | naiṣṭhike sthānaśauce tu mahāśaucaṃ vidhīyate

मूत्र-शौच में पहले हाथ और फिर क्रम से पैर शुद्ध करे। स्थान की स्थायी शुद्धि में महाशौच का विधान है।

श्लोक 51 (13.146.51)

क्षारौषराभ्यां वस्त्रस्य कुर्याच्छौचं मृदा सह । लेपगन्धापनयनममेध्यस्य विधीयते ॥

kṣārauṣarābhyāṃ vastrasya kuryācchaucaṃ mṛdā saha | lepagandhāpanayanamamedhyasya vidhīyate

वस्त्र का शौच क्षार और खारी मिट्टी के साथ मिट्टी से करे। अशुद्ध वस्तु के लिए लेप और गन्ध का दूर करना विधान है।

श्लोक 52 (13.146.52)

स्नानशाट्यां मृदस्तिस्रो हस्ताभ्यां चानुपूर्वशः । शौचं प्रयत्नतः कृत्वा कम्पमानः समुद्धरेत् ॥

snānaśāṭyāṃ mṛdastisro hastābhyāṃ cānupūrvaśaḥ | śaucaṃ prayatnataḥ kṛtvā kampamānaḥ samuddharet

स्नान के वस्त्र पर दोनों हाथों से क्रम से तीन ढेले मिट्टी लगाए। प्रयत्न से शौच करके उसे झटककर उठाए।

श्लोक 53 (13.146.53)

देयाश्चतस्रस्तिस्रो वा द्वे वाऽप्येकां तथाऽऽपदि । कालमासाद्य देशं च शौचस्य गुरुलाघवम् ॥

deyāścatasrastisro vā dve vā'pyekāṃ tathā''padi | kālamāsādya deśaṃ ca śaucasya gurulāghavam

चार, तीन, दो या संकट में एक भी लगाई जा सकती है। शौच का भारी या हल्का होना समय और स्थान पर निर्भर है।

श्लोक 54 (13.146.54)

विधिनाऽनेन शौचं तु नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । अविप्रेक्षन्नसम्भ्रान्तः पादौ प्रक्षाल्य तत्परः ॥

vidhinā'nena śaucaṃ tu nityaṃ kuryādatandritaḥ | aviprekṣannasambhrāntaḥ pādau prakṣālya tatparaḥ

इसी विधि से वह सदा आलस्य छोड़कर, इधर-उधर न देखते हुए, घबराए बिना, तत्पर होकर और पैर धोकर शौच करे।

श्लोक 55 (13.146.55)

अप्रक्षालितपादस्तु पाणिमामणिबन्धनात् । अधस्तादुपरिष्टाच्च ततः पाणिमुपस्पृशेत् ॥

aprakṣālitapādastu pāṇimāmaṇibandhanāt | adhastādupariṣṭācca tataḥ pāṇimupaspṛśet

यदि पैर धोए न हों, तो पहले हाथ को कलाई तक नीचे और ऊपर से धोए, फिर हाथ से जल का स्पर्श करे।

श्लोक 56 (13.146.56)

मनोगतास्तु निश्शब्दा निश्शब्दं त्रिरपः पिबेत् । द्विर्मुखं परिमृज्याच्च खानि चोपस्पृशेद्बुधः ॥

manogatāstu niśśabdā niśśabdaṃ trirapaḥ pibet | dvirmukhaṃ parimṛjyācca khāni copaspṛśedbudhaḥ

मन को भीतर रखकर वह बिना आवाज़ किए तीन बार जल पिए। मुख को दो बार पोंछे, और बुद्धिमान् पुरुष शरीर के छिद्रों का स्पर्श करे।

श्लोक 57 (13.146.57)

ऋग्वेदं तेन प्रीणाति प्रथमं यः पिबेदपः । द्वितीयं तु यजुर्वेदं तृतीयं साम एव च ॥

ṛgvedaṃ tena prīṇāti prathamaṃ yaḥ pibedapaḥ | dvitīyaṃ tu yajurvedaṃ tṛtīyaṃ sāma eva ca

जो पहली बार जल पीता है, उससे वह ऋग्वेद को प्रसन्न करता है; दूसरी बार से यजुर्वेद को और तीसरी बार से सामवेद को।

श्लोक 58 (13.146.58)

मृज्यते प्रथमं तेन अथर्वा प्रीतिमाप्नुयात् । द्वितीयेनेतिहासं च पुराणस्मृतिदेवताः ॥

mṛjyate prathamaṃ tena atharvā prītimāpnuyāt | dvitīyenetihāsaṃ ca purāṇasmṛtidevatāḥ

पहली बार पोंछने से अथर्ववेद प्रसन्न होता है; दूसरी बार से इतिहास, पुराण, स्मृतियाँ और देवता।

श्लोक 59 (13.146.59)

यच्चक्षुषि समाधत्ते तेनादित्यं तु प्रीणयेत् । प्रीणाति वायुं घ्राणं च दिशश्चाप्यथ श्रोत्रयोः ॥

yaccakṣuṣi samādhatte tenādityaṃ tu prīṇayet | prīṇāti vāyuṃ ghrāṇaṃ ca diśaścāpyatha śrotrayoḥ

जो जल वह नेत्र पर रखता है, उससे सूर्य प्रसन्न होता है; नाक में वायु को और दोनों कानों में दिशाओं को प्रसन्न करता है।

श्लोक 60 (13.146.60)

ब्रह्माणं तेन प्रीणाति यन्मूर्धनि समापयेत् । समुत्क्षिपति चापोर्ध्वमाकाशं तेन प्रीणयेत् ॥

brahmāṇaṃ tena prīṇāti yanmūrdhani samāpayet | samutkṣipati cāpordhvamākāśaṃ tena prīṇayet

जिस जल को वह सिर पर पूरा करता है, उससे ब्रह्मा प्रसन्न होते हैं; और जो जल वह ऊपर उछालता है, उससे आकाश प्रसन्न होता है।

श्लोक 61 (13.146.61)

प्रीणाति विष्णुं पद्भ्यां तु सलिलं वै समादधत् । प्राङ्मुखोदङ्मुखो वाऽपि अन्तर्जानुरुपस्पृशेत् ॥

prīṇāti viṣṇuṃ padbhyāṃ tu salilaṃ vai samādadhat | prāṅmukhodaṅmukho vā'pi antarjānurupaspṛśet

पैरों पर जल डालने से वह विष्णु को प्रसन्न करता है। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके, घुटनों के भीतर हाथ रखकर वह आचमन करे।

श्लोक 62 (13.146.62)

सर्वत्र विधिरित्येष भोजनादिषु नित्यशः । अन्नेषु दन्तलग्नेषु उच्छिष्टः पुनराचमेत् ॥

sarvatra vidhirityeṣa bhojanādiṣu nityaśaḥ | anneṣu dantalagneṣu ucchiṣṭaḥ punarācamet

भोजन आदि सभी अवसरों पर सदा यही विधि है। जब अन्न दाँतों में लगा रह जाए, तो उच्छिष्ट हुआ व्यक्ति फिर आचमन करे।

श्लोक 63 (13.146.63)

विधिरेष समुद्दिष्टः शौचे चाभ्युक्षणं स्मृतम् । शूद्रस्यैव विधिर्दृष्टो गृहान्निष्क्रमतस्ततः ॥

vidhireṣa samuddiṣṭaḥ śauce cābhyukṣaṇaṃ smṛtam | śūdrasyaiva vidhirdṛṣṭo gṛhānniṣkramatastataḥ

यह विधि बताई गई, और शौच में जल छिड़कना भी स्मृति में कहा गया है। घर से बाहर निकलते समय शूद्र के लिए भी यही विधि देखी गई है।

श्लोक 64 (13.146.64)

नित्यं त्वलुप्तशौचेन वर्तितव्यं कृतात्मना । यशस्कामेन भिक्षुभ्यः शूद्रेणात्महितार्थिना ॥

nityaṃ tvaluptaśaucena vartitavyaṃ kṛtātmanā | yaśaskāmena bhikṣubhyaḥ śūdreṇātmahitārthinā

संस्कारित मन वाला शूद्र, जो यश चाहता है और अपना हित चाहता है, भिक्षुओं के प्रति सदा अखण्ड शौच के साथ व्यवहार करे।

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