अनुशासन पर्व · अध्याय 147
भिक्षुओं की सेवा के विषय में पराशर का उपदेश
पराशर प्रत्येक वर्ण का यज्ञ और जीविका बताते हैं; शूद्र के लिए वह सेवा है। वे कहते हैं कि शूद्र को तीनों वर्णों की, और विशेषकर संन्यास आश्रम में रहने वालों की, बिना द्वेष के यह सोचकर सेवा करनी चाहिए कि यही उसका परम धर्म है और यही संसार-सागर से पार उतरने का उपाय है। फिर वे विस्तार से बताते हैं कि सेवक भिक्षुओं के साथ कैसा व्यवहार करे: उनके साथ चलना, प्रणाम करना, चरण दबाना, उनके निवास में झाड़ू-लेपन करना, फूल चढ़ाना, और उनके स्वाध्याय में कभी विघ्न न डालना।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (13.147.1)
क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु वीर्ययज्ञा विशः स्मृताः । शूद्राः परिचरायज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणाः ॥
kṣatrā ārambhayajñāstu vīryayajñā viśaḥ smṛtāḥ | śūdrāḥ paricarāyajñā japayajñāstu brāhmaṇāḥ
क्षत्रियों के यज्ञ आरम्भ-यज्ञ हैं, और वैश्यों के यज्ञ पराक्रम-यज्ञ माने गए हैं; शूद्रों के यज्ञ सेवा-यज्ञ हैं और ब्राह्मणों के यज्ञ जप-यज्ञ।
श्लोक 2 (13.147.2)
शुश्रूषाजीविनः शूद्रा वैश्या विपणिजीविनः । अनिष्टनिग्रहाः क्षत्रा विप्राः स्वाध्यायजीविनः ॥
śuśrūṣājīvinaḥ śūdrā vaiśyā vipaṇijīvinaḥ | aniṣṭanigrahāḥ kṣatrā viprāḥ svādhyāyajīvinaḥ
शूद्र सेवा से जीविका चलाते हैं और वैश्य व्यापार से; क्षत्रिय अनिष्ट का निग्रह करके और ब्राह्मण वेदाध्ययन से जीते हैं।
श्लोक 3 (13.147.3)
तपसा शोभते विप्रो राजन्यः पालनादिभिः । आतिथ्येन तथा वैश्यः शूद्रो दास्येन शोभते ॥
tapasā śobhate vipro rājanyaḥ pālanādibhiḥ | ātithyena tathā vaiśyaḥ śūdro dāsyena śobhate
ब्राह्मण तप से शोभा पाता है, क्षत्रिय रक्षा आदि से, वैश्य आतिथ्य से और शूद्र दास्य से।
श्लोक 4 (13.147.4)
यतात्मना तु शूद्रेण शुश्रूषा नित्यमेव च । कर्तव्या त्रिषु वर्णेषु प्रायेणाश्रमवासिषु ॥
yatātmanā tu śūdreṇa śuśrūṣā nityameva ca | kartavyā triṣu varṇeṣu prāyeṇāśramavāsiṣu
संयमी शूद्र को तीनों वर्णों की सेवा सदा करनी चाहिए, विशेषकर आश्रमों में रहने वालों की।
श्लोक 5 (13.147.5)
अशक्तेन त्रिवर्गस्य सेव्या ह्याश्रमवासिनः । यथाशक्यं यथाप्रज्ञं यथाधर्मं यथाश्रुतम् ॥
aśaktena trivargasya sevyā hyāśramavāsinaḥ | yathāśakyaṃ yathāprajñaṃ yathādharmaṃ yathāśrutam
जो तीनों वर्णों की सेवा न कर सके, वह आश्रमों में रहने वालों की सेवा करे, अपनी शक्ति, समझ, धर्म और सुने हुए उपदेश के अनुसार।
श्लोक 6 (13.147.6)
विशेषेणैव कर्तव्या शुश्रूषा भिक्षुकाश्रमे ॥
viśeṣeṇaiva kartavyā śuśrūṣā bhikṣukāśrame
सेवा विशेष रूप से भिक्षुओं के आश्रम में करनी चाहिए।
श्लोक 7 (13.147.7)
आश्रमाणां तु सर्वेषां चतुर्णां भिक्षुकाश्रमम् । प्रधानमिति वर्ण्यन्ते शिष्टाः शास्त्रविनिश्चये ॥
āśramāṇāṃ tu sarveṣāṃ caturṇāṃ bhikṣukāśramam | pradhānamiti varṇyante śiṣṭāḥ śāstraviniścaye
चारों आश्रमों में शास्त्र के निर्णय में शिष्ट जन भिक्षु-आश्रम को ही प्रधान बताते हैं।
श्लोक 8 (13.147.8)
यच्चोपदिश्यते शिष्टैः श्रुतिस्मृतिविधानतः । तथाऽऽस्थेयमशक्तेन स धर्म इति निश्चितः ॥
yaccopadiśyate śiṣṭaiḥ śrutismṛtividhānataḥ | tathā''stheyamaśaktena sa dharma iti niścitaḥ
श्रुति और स्मृति के विधान के अनुसार शिष्ट जन जो उपदेश देते हैं, उसे असमर्थ व्यक्ति भी जैसे बन सके वैसे अपनाए; वही धर्म निश्चित है।
श्लोक 9 (13.147.9)
अतोऽन्यथा तु कुर्वाणः श्रेयो नाप्नोति मानवः । तस्माद्भिक्षुषु शूद्रेण कार्यमात्महितं सदा ॥
ato'nyathā tu kurvāṇaḥ śreyo nāpnoti mānavaḥ | tasmādbhikṣuṣu śūdreṇa kāryamātmahitaṃ sadā
इससे भिन्न आचरण करने वाला मनुष्य कल्याण नहीं पाता। इसलिए शूद्र को भिक्षुओं के बीच सदा वही करना चाहिए जिसमें उसका अपना हित हो।
श्लोक 10 (13.147.10)
इह यत्कुरुते श्रेयस्तत्प्रेत्य समुपाश्नुते । तच्चानसूयता कार्यं कर्तव्यं यद्धि मन्यते ॥
iha yatkurute śreyastatpretya samupāśnute | taccānasūyatā kāryaṃ kartavyaṃ yaddhi manyate
मनुष्य यहाँ जो कल्याणकारी कर्म करता है, उसे मरने के बाद भोगता है; और जो उचित लगे उसे बिना द्वेष के करना चाहिए।
श्लोक 11 (13.147.11)
असूयता तु तस्येह फलं दुःखादवाप्यते । प्रियवादी जितक्रोधो वीततन्द्रीरमत्सरः ॥
asūyatā tu tasyeha phalaṃ duḥkhādavāpyate | priyavādī jitakrodho vītatandrīramatsaraḥ
जो द्वेष से करता है, उसे यहाँ फल दुःख के बाद ही मिलता है। प्रिय बोलने वाला, क्रोध जीता हुआ, आलस्य और डाह से रहित,
श्लोक 12 (13.147.12)
क्षमावाञ्शीलसम्पन्नः सत्यधर्मपरायणः । आपद्भावेन कुर्याद्धि शुश्रूषां भिक्षुकाश्रमे ॥
kṣamāvāñśīlasampannaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ | āpadbhāvena kuryāddhi śuśrūṣāṃ bhikṣukāśrame
क्षमाशील, शीलवान् और सत्य तथा धर्म में लगा हुआ व्यक्ति संकट के समय की भाँति भिक्षुओं के आश्रम में सेवा करे।
श्लोक 13 (13.147.13)
अयं मे परमो धर्मस्त्वनेनेदं सुदुष्करम् । संसारसागरं घोरं तरिष्यामि न संशयः ॥
ayaṃ me paramo dharmastvanenedaṃ suduṣkaram | saṃsārasāgaraṃ ghoraṃ tariṣyāmi na saṃśayaḥ
'यह मेरा परम धर्म है; इसी से मैं इस भयंकर और अत्यन्त दुस्तर संसार-सागर को निःसन्देह पार करूँगा।
श्लोक 14 (13.147.14)
विभयो देहमुत्सृज्य यास्यामि परमां गतिम् । नातः परं ममाप्यन्य एष धर्मः सनातनः ॥
vibhayo dehamutsṛjya yāsyāmi paramāṃ gatim | nātaḥ paraṃ mamāpyanya eṣa dharmaḥ sanātanaḥ
निर्भय होकर देह छोड़कर मैं परम गति को जाऊँगा। मेरे लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं; यही सनातन धर्म है।'
श्लोक 15 (13.147.15)
एवं सञ्चिन्त्य मनसा शूद्रो बुद्धिसमाधिना । कुर्यादविमना नित्यं शुश्रूषाधर्ममुत्तमम् ॥
evaṃ sañcintya manasā śūdro buddhisamādhinā | kuryādavimanā nityaṃ śuśrūṣādharmamuttamam
ऐसा मन में विचारकर, बुद्धि को स्थिर करके, शूद्र प्रसन्न मन से सदा सेवा के उत्तम धर्म का पालन करे।
श्लोक 16 (13.147.16)
शुश्रूषानियमेनेह भाव्यं शिष्टाशिना सदा । शमान्वितेन दान्तेन कार्याकार्यविदा सदा ॥
śuśrūṣāniyameneha bhāvyaṃ śiṣṭāśinā sadā | śamānvitena dāntena kāryākāryavidā sadā
सेवा के नियम में वह सदा सज्जनों का बचा हुआ खाने वाला, शान्त, संयमी तथा करणीय और अकरणीय को जानने वाला हो।
श्लोक 17 (13.147.17)
सर्वकार्येषु कृत्यानि कृतान्येव तु दर्शयेत् । यथा प्रियो भवेद्भिक्षुस्तथा कार्यं प्रसाधयेत् ॥
sarvakāryeṣu kṛtyāni kṛtānyeva tu darśayet | yathā priyo bhavedbhikṣustathā kāryaṃ prasādhayet
हर काम में वह सब कार्य पहले से पूरे हुए दिखाए; और जिस प्रकार भिक्षु प्रसन्न हो, उसी प्रकार काम पूरा करे।
श्लोक 18 (13.147.18)
यदकल्प्यं भवेद्भिक्षोर्न तत्कार्यं समाचरेत् । यथाऽऽश्रमस्याविरुद्धं धर्ममात्राभिसंहितम् ॥
yadakalpyaṃ bhavedbhikṣorna tatkāryaṃ samācaret | yathā''śramasyāviruddhaṃ dharmamātrābhisaṃhitam
जो भिक्षु के लिए अनुचित हो, वह न करे। जो उसके आश्रम के विरुद्ध नहीं है और केवल धर्म से बँधा है,
श्लोक 19 (13.147.19)
तत्कार्यमविचारेण नित्यमेव शुभार्थिना । मनसा कर्मणा वाचा नित्यमेव प्रसादयेत् ॥
tatkāryamavicāreṇa nityameva śubhārthinā | manasā karmaṇā vācā nityameva prasādayet
वह अपना कल्याण चाहने वाला बिना विचार किए सदा करे। मन, कर्म और वाणी से सदा उन्हें प्रसन्न रखे।
श्लोक 20 (13.147.20)
स्थातव्यं तिष्ठमानेषु गच्छमानाननुव्रजेत् । आसीनेष्वासितव्यं च नित्यमेवानुवर्तता ॥
sthātavyaṃ tiṣṭhamāneṣu gacchamānānanuvrajet | āsīneṣvāsitavyaṃ ca nityamevānuvartatā
वे खड़े हों तो वह खड़ा रहे, चलें तो उनके पीछे चले, और बैठे हों तो बैठे; वह सदा उनका अनुसरण करे।
श्लोक 21 (13.147.21)
धर्मलब्धेन स्नेहेन पादौ सम्पीडयेत्सदा । उद्वर्तनादींश्च तथा कुर्यादप्रतिचोदितः ॥
dharmalabdhena snehena pādau sampīḍayetsadā | udvartanādīṃśca tathā kuryādapraticoditaḥ
धर्म से उत्पन्न स्नेह के साथ वह सदा उनके चरण दबाए, और बिना कहे उबटन आदि भी करे।
श्लोक 22 (13.147.22)
नैजकार्याणि कृत्वा तु नित्यं चैवानुचोदितः । यथाविधिरुपस्पृश्य संन्यस्य जलभाजनम् ॥
naijakāryāṇi kṛtvā tu nityaṃ caivānucoditaḥ | yathāvidhirupaspṛśya saṃnyasya jalabhājanam
अपने कार्य पूरे करके, और सदा उनके कहने पर, विधि से आचमन करके और जल का पात्र रखकर,
श्लोक 23 (13.147.23)
भिक्षूणां निलयं गत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् । ब्रह्मपूर्वान्गुरूंस्तत्र प्रणम्य नियतेन्द्रियः ॥
bhikṣūṇāṃ nilayaṃ gatvā praṇamya vidhipūrvakam | brahmapūrvāngurūṃstatra praṇamya niyatendriyaḥ
वह भिक्षुओं के निवास पर जाए, विधिपूर्वक प्रणाम करे, और संयतेन्द्रिय होकर वहाँ ब्रह्मज्ञान में अग्रगण्य गुरुओं को प्रणाम करे।
श्लोक 24 (13.147.24)
तथाऽऽचार्यपुरोगाणामनुकुर्यान्नमस्क्रियाम् । स्वधर्मचारिणां चापि सुखं पृष्ट्वाऽभिवाद्य च ॥
tathā''cāryapurogāṇāmanukuryānnamaskriyām | svadharmacāriṇāṃ cāpi sukhaṃ pṛṣṭvā'bhivādya ca
इसी प्रकार आचार्य आदि प्रमुख जनों को नमस्कार करे, और अपने-अपने धर्म का पालन करने वालों की कुशल पूछकर उनका अभिवादन करे।
श्लोक 25 (13.147.25)
यो भवेत्पूर्वसंसिद्धस्तुल्यकर्मा भवेत्सदा । तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतरेषु कदाचन ॥
yo bhavetpūrvasaṃsiddhastulyakarmā bhavetsadā | tasmai praṇāmaḥ kartavyo netareṣu kadācana
जो पहले से सिद्ध हो और समान कर्म वाला हो, उसी को प्रणाम करना चाहिए; दूसरों को कभी नहीं।
श्लोक 26 (13.147.26)
अनुक्त्वा तेषु चोत्थाय नित्यमेव यतव्रतः । सम्मार्जनमथो गत्वा कृत्वा चाप्युपलेपनम् ॥
anuktvā teṣu cotthāya nityameva yatavrataḥ | sammārjanamatho gatvā kṛtvā cāpyupalepanam
उनसे कुछ कहे बिना उठकर, सदा व्रत में दृढ़ रहने वाला वह जाकर झाड़ू लगाए और लेपन भी करे।
श्लोक 27 (13.147.27)
ततः पुष्पबलिं दद्यात्पुष्पाण्यादाय धर्मतः । निष्क्रम्यावसथात्तूर्णमन्यत्कर्म समाचरेत् ॥
tataḥ puṣpabaliṃ dadyātpuṣpāṇyādāya dharmataḥ | niṣkramyāvasathāttūrṇamanyatkarma samācaret
फिर धर्म के अनुसार फूल लेकर पुष्प-बलि चढ़ाए; और निवास से शीघ्र निकलकर दूसरा काम करे।
श्लोक 28 (13.147.28)
यथोपघातो न भवेत्स्वाध्यायेऽऽश्रमिणां तथा । उपघातं तु कुर्वाण एनसा सम्प्रयुज्यते । तथाऽऽत्मा प्रणिधातव्यो यथा ते प्रीतिमाप्नुयुः ॥
yathopaghāto na bhavetsvādhyāye''śramiṇāṃ tathā | upaghātaṃ tu kurvāṇa enasā samprayujyate | tathā''tmā praṇidhātavyo yathā te prītimāpnuyuḥ
वह ऐसा व्यवहार करे कि आश्रमवासियों के स्वाध्याय में विघ्न न पड़े; जो विघ्न डालता है, वह पाप से लिप्त होता है। अपने को वह इस प्रकार रखे कि वे प्रसन्न हों।
श्लोक 29 (13.147.29)
परिचारकोऽहं वर्णानां त्रयाणां धर्मतः स्मृतः । किमुताश्रमवृद्धानां यथालब्धोपजीविनाम् ॥
paricārako'haṃ varṇānāṃ trayāṇāṃ dharmataḥ smṛtaḥ | kimutāśramavṛddhānāṃ yathālabdhopajīvinām
'मैं धर्म से तीनों वर्णों का सेवक कहा गया हूँ; तब जो आश्रम में वृद्ध हैं और जो मिल जाए उसी पर जीते हैं, उनकी तो बात ही क्या,
श्लोक 30 (13.147.30)
भिक्षूणां गतरागाणां केवलं ज्ञानदर्शिनाम् । विशेषेण मया कार्या शुश्रूषा नियतात्मना ॥
bhikṣūṇāṃ gatarāgāṇāṃ kevalaṃ jñānadarśinām | viśeṣeṇa mayā kāryā śuśrūṣā niyatātmanā
उन वीतराग भिक्षुओं की, जो केवल ज्ञान को ही देखते हैं! मुझ संयमी को उनकी विशेष रूप से सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 31 (13.147.31)
तेषां प्रसादात्तपसा प्राप्स्यामीष्टां शुभां गतिम् । एवमेतद्विनिश्चित्य यदि सेवेत भिक्षुकान् । विधिना स्वोपदिष्टेन प्राप्नोति परमां गतिम् ॥
teṣāṃ prasādāttapasā prāpsyāmīṣṭāṃ śubhāṃ gatim | evametadviniścitya yadi seveta bhikṣukān | vidhinā svopadiṣṭena prāpnoti paramāṃ gatim
उनकी कृपा और तप से मैं इष्ट और शुभ गति को पाऊँगा।' ऐसा निश्चय करके जो अपने लिए बताई विधि से भिक्षुओं की सेवा करता है, वह परम गति को पाता है।