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अनुशासन पर्व · अध्याय 148

रोगी भिक्षुओं की सेवा

पराशर बताते हैं कि कोई दान या उपवास वैसा इष्ट फल नहीं देता जैसा सेवा देती है, और मनुष्य जिसकी सेवा करता है उसी जैसा हो जाता है, जैसे धोई हुई वस्तु जल के गुण को ले लेती है। शूद्र को मार्ग से थके और रोगी भिक्षुओं की सेवा करनी चाहिए: उनके कुश, मृगचर्म और भिक्षा-पात्र की देखभाल, वस्त्र धोना, दवा लाना और तैयार करना, और केवल श्रद्धा से दी हुई वस्तु ही लेना। अध्याय इस उपदेश पर समाप्त होता है कि द्वन्द्व स्वभाव से आते-जाते हैं, और यह जानने वाला पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता जल से।

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पराशर उवाच

श्लोक 1 (13.148.1)

न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा । इष्टां गतिमवाप्नोति यथा शुश्रूषकर्मणा ॥

na tathā sampradānena nopavāsādibhistathā | iṣṭāṃ gatimavāpnoti yathā śuśrūṣakarmaṇā

दान से या उपवास आदि से मनुष्य उतनी इष्ट गति नहीं पाता, जितनी सेवा-कर्म से पाता है।

श्लोक 2 (13.148.2)

यादृशेन तु तोयेन शुद्धिं प्रकुरुते नरः । तादृग्भवति तद्धौतमुदकस्य प्रभावतः ॥

yādṛśena tu toyena śuddhiṃ prakurute naraḥ | tādṛgbhavati taddhautamudakasya prabhāvataḥ

मनुष्य जैसे जल से शुद्धि करता है, जल के प्रभाव से धोई हुई वस्तु वैसी ही हो जाती है।

श्लोक 3 (13.148.3)

शूद्रोप्येतेन मार्गेण यादृशं सेवते जनम् । तादृग्भवति संसर्गादचिरेण न संशयः ॥

śūdropyetena mārgeṇa yādṛśaṃ sevate janam | tādṛgbhavati saṃsargādacireṇa na saṃśayaḥ

इसी प्रकार शूद्र भी जैसे मनुष्य की सेवा करता है, संगति से थोड़े ही समय में वैसा ही हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 4 (13.148.4)

तस्मात्प्रयत्नतः सेव्या भिक्षवो नियतात्मना । उदकग्राहणाद्येन स्नपनोद्वर्तनैस्तथा ॥

tasmātprayatnataḥ sevyā bhikṣavo niyatātmanā | udakagrāhaṇādyena snapanodvartanaistathā

इसलिए संयमी पुरुष को प्रयत्नपूर्वक भिक्षुओं की सेवा करनी चाहिए: जल लाने आदि से, स्नान कराने और उबटन लगाने से।

श्लोक 5 (13.148.5)

अध्वना कर्शितानां च व्याधितानां तथैव च । शुश्रूषां नियतं कुर्यात्तेषामापदि यत्नतः ॥

adhvanā karśitānāṃ ca vyādhitānāṃ tathaiva ca | śuśrūṣāṃ niyataṃ kuryātteṣāmāpadi yatnataḥ

जो मार्ग से थक गए हों और जो रोगी हों, उनकी संकट में वह प्रयत्न से और निरन्तर सेवा करे।

श्लोक 6 (13.148.6)

दर्भाजिनान्यवेक्षेत भैक्षभाजनमेव च । यथाकामं च कार्याणि सर्वाण्येवोपसाधयेत् । प्रायश्चित्तं यथा न स्यात्तथा सर्वं समाचरेत् ॥

darbhājinānyavekṣeta bhaikṣabhājanameva ca | yathākāmaṃ ca kāryāṇi sarvāṇyevopasādhayet | prāyaścittaṃ yathā na syāttathā sarvaṃ samācaret

वह उनके कुश, मृगचर्म और भिक्षा-पात्र की देखभाल करे। उनकी इच्छा के अनुसार सब काम पूरे करे, और हर तरह से ऐसा आचरण करे कि प्रायश्चित्त की आवश्यकता न पड़े।

श्लोक 7 (13.148.7)

व्याधितानां तु भिक्षूणां चेलप्रक्षालनादिभिः । प्रतिकर्मक्रिया कार्या भेषजानयनैस्तथा ॥

vyādhitānāṃ tu bhikṣūṇāṃ celaprakṣālanādibhiḥ | pratikarmakriyā kāryā bheṣajānayanaistathā

रोगी भिक्षुओं की परिचर्या उनके वस्त्र धोने आदि से और औषधियाँ लाने से करनी चाहिए।

श्लोक 8 (13.148.8)

पिंषणालेपनं चूर्णं कषायमथ साधनम् । नान्यस्य प्रतिचारेषु सुखार्थमुपपादयेत् ॥

piṃṣaṇālepanaṃ cūrṇaṃ kaṣāyamatha sādhanam | nānyasya praticāreṣu sukhārthamupapādayet

पीसना, लेप लगाना, चूर्ण, काढ़ा और अन्य साधन: ये वह रोगी की परिचर्या में उसके सुख के लिए जुटाए, किसी और के लिए नहीं।

श्लोक 9 (13.148.9)

भिक्षाटनोऽभिगच्छेत भिषजश्च विपश्चितः । ततो विनिष्क्रियार्थानि द्रव्याणि समुपार्जयेत् ॥

bhikṣāṭano'bhigaccheta bhiṣajaśca vipaścitaḥ | tato viniṣkriyārthāni dravyāṇi samupārjayet

भिक्षा माँगते हुए वह विद्वान् वैद्यों के पास जाए, और उससे चिकित्सा का मूल्य चुकाने के लिए आवश्यक वस्तुएँ जुटाए।

श्लोक 10 (13.148.10)

यश्च प्रीतमना दद्यादादद्याद्भेषजं नरः । अश्रद्धया हि दत्तानि तान्यभोज्यानि भिक्षुभिः ॥

yaśca prītamanā dadyādādadyādbheṣajaṃ naraḥ | aśraddhayā hi dattāni tānyabhojyāni bhikṣubhiḥ

मनुष्य प्रसन्न मन से औषधि दे या ले; पर श्रद्धा के बिना दी हुई वस्तुएँ भिक्षुओं के खाने योग्य नहीं हैं।

श्लोक 11 (13.148.11)

श्रद्धया यदुपादत्तं श्रद्धया चोपपादितम् । तस्योपभोगाद्धर्मः स्याद्व्याधिभिश्च निवर्त्यते ॥

śraddhayā yadupādattaṃ śraddhayā copapāditam | tasyopabhogāddharmaḥ syādvyādhibhiśca nivartyate

जो श्रद्धा से लिया गया और श्रद्धा से जुटाया गया हो, उसके उपयोग से धर्म होता है और रोग दूर होते हैं।

श्लोक 12 (13.148.12)

आदेहपतनादेवं शुश्रूषेद्विधिपूर्वकम् । न त्वेवं धर्ममुत्सृज्य कुर्यात्तेषां प्रतिक्रियाम् ॥

ādehapatanādevaṃ śuśrūṣedvidhipūrvakam | na tvevaṃ dharmamutsṛjya kuryātteṣāṃ pratikriyām

देह छूटने तक वह इसी प्रकार विधिपूर्वक सेवा करे; किन्तु धर्म को छोड़कर कभी उनका उपचार न करे।

श्लोक 13 (13.148.13)

स्वभावतो हि द्वन्द्वानि विप्रयान्त्युपयान्ति च । स्वभावतः सर्वभावा भवन्ति न भवन्ति च । सागरस्योर्मिसदृशा विज्ञातव्या गुणात्मकाः ॥

svabhāvato hi dvandvāni viprayāntyupayānti ca | svabhāvataḥ sarvabhāvā bhavanti na bhavanti ca | sāgarasyormisadṛśā vijñātavyā guṇātmakāḥ

स्वभाव से ही द्वन्द्व बिछड़ते और मिलते हैं; स्वभाव से ही सब भाव उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं। उन्हें समुद्र की लहरों के समान गुणरूप जानना चाहिए।

श्लोक 14 (13.148.14)

विद्यादेवं हि यो धीमांस्तत्ववित्तत्वदर्शनः । न स लिप्येत पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

vidyādevaṃ hi yo dhīmāṃstatvavittatvadarśanaḥ | na sa lipyeta pāpena padmapatramivāmbhasā

जो बुद्धिमान्, तत्त्व को जानने और तत्त्व को देखने वाला पुरुष इसे इस प्रकार जानता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं होता।

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