अनुशासन पर्व · अध्याय 149
भिक्षुओं के सेवक का आचरण और प्रायश्चित्त
पराशर भिक्षुओं की सेवा करने वाले शूद्र को अपना उपदेश आगे बढ़ाते हैं: वह न अपराध करे, न पलटकर उत्तर दे, बिना माँगे कुछ न ले, और सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखे। उसे प्राणियों की हिंसा से सावधान किया गया है और विविध अपराधों के प्रायश्चित्त बताए गए हैं: तीन वर्णों की स्त्री से सम्बन्धित अपवाद पर खुले आकाश के नीचे एक वर्ष का शयन, ऊँची जाति की स्त्री के लिए अधिक अवधि; अस्थिहीन जीव के वध पर उपवास और प्राणायाम, अस्थि वाले जीवों के लिए दुगुना; और कर्म, वाणी तथा मन के पाप के लिए क्रमशः चार, दो और एक गुना। अन्त में पराशर कहते हैं कि जो शान्त मन से श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा करता है, न मृत्यु का स्वागत करता है, न जीवन का, वह शीघ्र ही अपने पुण्य और पाप का निर्णय पा लेता है।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (13.149.1)
एवं प्रयतितव्यं हि शुश्रूषार्थमतन्द्रितैः । सर्वाभिरुपसेवाभिस्तुष्यन्ति यतयो यथा ॥
evaṃ prayatitavyaṃ hi śuśrūṣārthamatandritaiḥ | sarvābhirupasevābhistuṣyanti yatayo yathā
इसी प्रकार आलस्य रहित लोग सेवा के लिए प्रयत्न करें, और सब प्रकार की परिचर्या से ऐसा करें कि यति प्रसन्न हों।
श्लोक 2 (13.149.2)
नापराध्येत भिक्षोस्तु न चैनमवधीरयेत् । उत्तरं च न सन्दद्यात्क्रुद्धं चैव प्रसादयेत् ॥
nāparādhyeta bhikṣostu na cainamavadhīrayet | uttaraṃ ca na sandadyātkruddhaṃ caiva prasādayet
वह भिक्षु का अपराध न करे और उसकी अवहेलना न करे। पलटकर उत्तर न दे, और यदि वह क्रुद्ध हो तो उसे मनाए।
श्लोक 3 (13.149.3)
श्रेय एवाभिधातव्यं कर्तव्यं च प्रहृष्टवत् । तूष्णींभावेन वै तत्र न क्रुद्धमभिसंवदेत् ॥
śreya evābhidhātavyaṃ kartavyaṃ ca prahṛṣṭavat | tūṣṇīṃbhāvena vai tatra na kruddhamabhisaṃvadet
वह केवल कल्याणकारी बात कहे और प्रसन्नता से कार्य करे। वहाँ मौन रहकर क्रुद्ध व्यक्ति से विवाद न करे।
श्लोक 4 (13.149.4)
नाददीत परस्वानि न गृह्णीयादयाचितम् । लब्धालब्धेन जीवेत तथैव परितोषयेत् ॥
nādadīta parasvāni na gṛhṇīyādayācitam | labdhālabdhena jīveta tathaiva paritoṣayet
वह दूसरों की वस्तुएँ न ले और बिना माँगी वस्तु स्वीकार न करे। जो मिले या न मिले उसी पर जीवन चलाए और इस तरह सन्तोष दे।
श्लोक 5 (13.149.5)
कोपिनं तु न याचेत ज्ञानविद्वेषकारितः । स्थावरेषु दयां कुर्याज्जङ्गमेषु च प्राणिषु ॥
kopinaṃ tu na yāceta jñānavidveṣakāritaḥ | sthāvareṣu dayāṃ kuryājjaṅgameṣu ca prāṇiṣu
ज्ञान से द्वेष के कारण क्रोधित हुए व्यक्ति से वह याचना न करे। स्थावर और जंगम सब प्राणियों पर दया करे।
श्लोक 6 (13.149.6)
यथाऽऽत्मनि तथाऽन्येषु समां दृष्टिं निपातयेत् । सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । सम्पश्यमानो विचरन्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
yathā''tmani tathā'nyeṣu samāṃ dṛṣṭiṃ nipātayet | sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani | sampaśyamāno vicaranbrahmabhūyāya kalpate
जैसे अपने ऊपर, वैसे दूसरों पर भी वह समान दृष्टि डाले। सब प्राणियों में अपने को और अपने में सब प्राणियों को देखता हुआ विचरण करने वाला ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।
श्लोक 7 (13.149.7)
हिंसां वा यदि वाऽहिंसां न कुर्यादात्मकारणात् । यत्रेतरो भवेन्नित्यं दोषं तत्र न कारयेत् ॥
hiṃsāṃ vā yadi vā'hiṃsāṃ na kuryādātmakāraṇāt | yatretaro bhavennityaṃ doṣaṃ tatra na kārayet
हिंसा हो या अहिंसा, वह अपने स्वार्थ के लिए न करे; जहाँ दोष सदा दूसरे पर पड़ता हो, वहाँ दोष न कराए।
श्लोक 8 (13.149.8)
एवं स मुच्यते दोषात्परानाश्रित्य वर्तयन् । आत्माश्रयेण दोषेण लिप्यते ह्यल्पबुद्धिमान् ॥
evaṃ sa mucyate doṣātparānāśritya vartayan | ātmāśrayeṇa doṣeṇa lipyate hyalpabuddhimān
इस प्रकार दूसरों के आश्रय से जीवन बिताने वाला दोष से छूट जाता है; अल्पबुद्धि पुरुष अपने ही आश्रित दोष से लिप्त होता है।
श्लोक 9 (13.149.9)
जरायुजाण्डजाश्चैव उद्भिज्जाः स्वेदजाश्च ये । अवध्याः सर्व एवैते बुधैः समनुवर्णिताः ॥
jarāyujāṇḍajāścaiva udbhijjāḥ svedajāśca ye | avadhyāḥ sarva evaite budhaiḥ samanuvarṇitāḥ
जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज: इन सभी को विद्वानों ने अवध्य बताया है।
श्लोक 10 (13.149.10)
निश्चयार्थं विबुद्धानां प्रायश्चित्तं विधीयते । हिंसा यथाऽन्या विहिता तथा दोषं प्रयोजयेत् । तथोपदिष्टं गुरुणा शिष्यस्य चरतो विधिम् ॥
niścayārthaṃ vibuddhānāṃ prāyaścittaṃ vidhīyate | hiṃsā yathā'nyā vihitā tathā doṣaṃ prayojayet | tathopadiṣṭaṃ guruṇā śiṣyasya carato vidhim
ज्ञानी जनों के निश्चय के लिए प्रायश्चित्त का विधान है। जैसी अन्य हिंसा बताई गई है, वैसा ही दोष वह लगाए; यही विधि गुरु ने आचरण करने वाले शिष्य को बताई।
श्लोक 11 (13.149.11)
न हि लोभः प्रभवति हिंसा वाऽपि तदात्मिका । शास्त्रदर्शनमेतद्धि विहितं विश्वयोनिना ॥
na hi lobhaḥ prabhavati hiṃsā vā'pi tadātmikā | śāstradarśanametaddhi vihitaṃ viśvayoninā
लोभ प्रभाव नहीं डालता, और उसी के स्वभाव वाली हिंसा भी नहीं। यह शास्त्र का मत है, जिसे विश्व के उत्पन्न करने वाले ने विधान किया है।
श्लोक 12 (13.149.12)
यद्येतदेवं मन्येत शूद्रो ह्यपि च बुद्धिमान् । कृतं कृतवतां गच्छेत्किं पुनर्यो निषेवते ॥
yadyetadevaṃ manyeta śūdro hyapi ca buddhimān | kṛtaṃ kṛtavatāṃ gacchetkiṃ punaryo niṣevate
यदि बुद्धिमान् शूद्र भी ऐसा मानता है, तो वह उसे पा जाएगा जो कर चुकने वालों ने पाया; फिर जो इसका आचरण करता है, उसकी तो बात ही क्या?
श्लोक 13 (13.149.13)
न शूद्रः पतते कश्चिन्न च संस्कारमर्हति । नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मात्प्रतिषेधनम् ॥
na śūdraḥ patate kaścinna ca saṃskāramarhati | nāsyādhikāro dharme'sti na dharmātpratiṣedhanam
कोई शूद्र पतित नहीं होता, और वह संस्कार के योग्य भी नहीं है। धर्म में उसका अधिकार नहीं है, पर धर्म से उसका निषेध भी नहीं है।
श्लोक 14 (13.149.14)
अनुग्रहार्थं मनुना सर्ववर्णेषु वर्णितम् ॥
anugrahārthaṃ manunā sarvavarṇeṣu varṇitam
मनु ने उनके हित के लिए यह सब वर्णों में कहा है।
श्लोक 15 (13.149.15)
यदापवादस्तु भवेत्स्त्रीकृतः परिचारके । अभ्रावकाशशयनं तस्य संवत्सरं स्मृतम् । तेन तस्य भवेच्छान्तिस्ततो भूयोप्युपाव्रजेत् ॥
yadāpavādastu bhavetstrīkṛtaḥ paricārake | abhrāvakāśaśayanaṃ tasya saṃvatsaraṃ smṛtam | tena tasya bhavecchāntistato bhūyopyupāvrajet
यदि सेवक पर किसी स्त्री के कारण अपवाद लगे, तो उसके लिए एक वर्ष तक खुले आकाश के नीचे सोना बताया गया है। उससे उसकी शुद्धि होती है; फिर वह पुनः आ सकता है।
श्लोक 16 (13.149.16)
सवर्णाया भवेदेतद्धीनायास्त्वर्धमर्हति । वर्षत्रयं तु वैश्यायाः क्षत्रियायास्तु षट् समाः । ब्राह्मण्या तु समेतस्य समा द्वादश कीर्तिताः ॥
savarṇāyā bhavedetaddhīnāyāstvardhamarhati | varṣatrayaṃ tu vaiśyāyāḥ kṣatriyāyāstu ṣaṭ samāḥ | brāhmaṇyā tu sametasya samā dvādaśa kīrtitāḥ
यह अपने वर्ण की स्त्री के लिए है; नीच वर्ण की स्त्री के लिए आधा उचित है। वैश्य स्त्री के लिए तीन वर्ष, क्षत्रिय स्त्री के लिए छह वर्ष; और ब्राह्मण स्त्री से संयोग करने वाले के लिए बारह वर्ष बताए गए हैं।
श्लोक 17 (13.149.17)
कटाग्निना वा दग्धव्यस्तस्मिन्नेव क्षणे भवेत् । शिश्नावपातनाद्वाऽपि विशुद्धिं समवाप्नुयात् ॥
kaṭāgninā vā dagdhavyastasminneva kṣaṇe bhavet | śiśnāvapātanādvā'pi viśuddhiṃ samavāpnuyāt
अथवा उसी क्षण उसे चटाई की आग में जला देना चाहिए; या अपने जननांग के कट जाने से वह शुद्धि पाएगा।
श्लोक 18 (13.149.18)
अनस्थिबन्धमेकं तु यदि प्राणैर्वियोजयेत् । उपोष्यैकाहमादद्यात्प्राणायामांस्तु द्वादश ॥
anasthibandhamekaṃ tu yadi prāṇairviyojayet | upoṣyaikāhamādadyātprāṇāyāmāṃstu dvādaśa
यदि वह बिना हड्डी वाले एक जीव के प्राण ले ले, तो एक दिन उपवास करके बारह प्राणायाम करे।
श्लोक 19 (13.149.19)
त्रिः स्नानमुदके कृत्वा तस्मात्पापात्प्रमुच्यते । अस्थिबन्धेषु द्विगुणं प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
triḥ snānamudake kṛtvā tasmātpāpātpramucyate | asthibandheṣu dviguṇaṃ prāyaścittaṃ vidhīyate
तीन बार जल में स्नान करके वह उस पाप से मुक्त हो जाता है। हड्डी वाले जीवों के लिए दुगुना प्रायश्चित्त बताया गया है।
श्लोक 20 (13.149.20)
अनेन विधिना वाऽपि स्थावरेषु न संशयः । कायेन पद्भ्यां हस्ताभ्यामपराधात्तु मुच्यते ॥
anena vidhinā vā'pi sthāvareṣu na saṃśayaḥ | kāyena padbhyāṃ hastābhyāmaparādhāttu mucyate
इसी विधि से स्थावर प्राणियों के विषय में भी, इसमें सन्देह नहीं, वह शरीर, पैरों या हाथों से हुए अपराध से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 21 (13.149.21)
अदुष्टं क्षपयेद्यस्तु सर्ववर्णेषु यश्चरेत् । तस्याप्यष्टगुणं विद्यात्प्रायश्चित्तं तदेव तु ॥
aduṣṭaṃ kṣapayedyastu sarvavarṇeṣu yaścaret | tasyāpyaṣṭaguṇaṃ vidyātprāyaścittaṃ tadeva tu
जो निर्दोष का नाश करता है, और जो सब वर्णों के बीच विचरता है, उसके लिए भी उसी प्रायश्चित्त को आठगुना जानो।
श्लोक 22 (13.149.22)
चतुर्गुणं कर्मकृते द्विगुणं वाक्प्रदूषिते । कृत्वा तु मानसं पापं तथैवैकगुणं स्मृतम् ॥
caturguṇaṃ karmakṛte dviguṇaṃ vākpradūṣite | kṛtvā tu mānasaṃ pāpaṃ tathaivaikaguṇaṃ smṛtam
कर्म से किए पाप के लिए चारगुना, वाणी से बिगाड़े पाप के लिए दुगुना, और मन से किए पाप के लिए, ऐसा कहा गया है, एकगुना।
श्लोक 23 (13.149.23)
तस्मादेतानि सर्वाणि विदित्वा न समाचरेत् । सर्वभूतहितार्थं हि कुशलानि समाचरेत् ॥
tasmādetāni sarvāṇi viditvā na samācaret | sarvabhūtahitārthaṃ hi kuśalāni samācaret
इसलिए इन सब को जानकर वह इन्हें न करे; सब प्राणियों के हित के लिए कल्याणकारी कर्म करे।
श्लोक 24 (13.149.24)
एवं समाहितमनाः सेवते यदि सत्तमान् । तद्गतिस्तत्समाचारस्तन्मनास्तत्परायणः ॥
evaṃ samāhitamanāḥ sevate yadi sattamān | tadgatistatsamācārastanmanāstatparāyaṇaḥ
इस प्रकार शान्त मन से यदि वह श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा करता है, तो उसकी गति उनकी गति होती है, उसका आचार उनका आचार, उसका मन उनमें, और वे ही उसका परम आश्रय हैं।
श्लोक 25 (13.149.25)
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् । कालमेव प्रतीक्षेत निर्वेशं भृतको यथा ॥
nābhinandeta maraṇaṃ nābhinandeta jīvitam | kālameva pratīkṣeta nirveśaṃ bhṛtako yathā
वह न मृत्यु का स्वागत करे, न जीवन का; वह केवल समय की प्रतीक्षा करे, जैसे भृत्य अपनी मजदूरी की प्रतीक्षा करता है।
श्लोक 26 (13.149.26)
एवं प्रवर्तमानस्तु विनीतः प्रयतात्मवान् । निर्णयं पुण्यपापाभ्यामचिरेणोपगच्छति ॥
evaṃ pravartamānastu vinītaḥ prayatātmavān | nirṇayaṃ puṇyapāpābhyāmacireṇopagacchati
इस प्रकार आचरण करता हुआ, विनीत और संयमी पुरुष शीघ्र ही पुण्य और पाप का निर्णय पा लेता है।