अनुशासन पर्व · अध्याय 16
विष्णु ही सम्पूर्ण यज्ञ हैं
भीष्म वह उपदेश सुनाते हैं जो व्यास ने द्वारका में वेद और ब्राह्मणों के सार रूप वासुदेव के विषय में दिया था। विष्णु ही यूप, यज्ञ और पूज्य देवता हैं; कृष्ण ही वेद और उसके अंग हैं। जो ब्राह्मण यह जानता है वह ब्रह्म को पाता है; पापकर्म करनेवाला भी ओंकार और कृष्ण का ध्यान करके दुर्गति से बचता है, और यज्ञ की सब सामग्री विष्णु ही है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.16.1)
द्वारकायां यथा प्राह पुराऽयं मुनिसत्तमः । वेदविप्रमयत्वं तु वासुदेवस्य तच्छृणु ॥
dvārakāyāṃ yathā prāha purā'yaṃ munisattamaḥ | vedavipramayatvaṃ tu vāsudevasya tacchṛṇu
इन मुनिश्रेष्ठ ने पहले द्वारका में जैसा कहा था, उसी प्रकार वासुदेव के वेद और ब्राह्मणों से युक्त स्वरूप की बात सुनो।
श्लोक 2 (13.16.2)
यूपं विष्णुं वासुदेवं विजानन् । सर्वान्विप्रान्बोधते तत्वदर्शी । विष्णुं क्रान्तं वासुदेवं विजानन् । विप्रो विप्रत्वं गच्छते तत्वदर्शी ॥
yūpaṃ viṣṇuṃ vāsudevaṃ vijānan | sarvānviprānbodhate tatvadarśī | viṣṇuṃ krāntaṃ vāsudevaṃ vijānan | vipro vipratvaṃ gacchate tatvadarśī
जो तत्त्वदर्शी यूप को विष्णु, वासुदेव के रूप में जानता है, वह सब ब्राह्मणों को जगाता है; और जो तत्त्वदर्शी क्रमण करनेवाले विष्णु को वासुदेव जानता है, वह ब्राह्मण सच्चे विप्रत्व को प्राप्त होता है।
श्लोक 3 (13.16.3)
विष्णुर्यज्ञस्त्विज्यते चापि विष्णुः । कृष्णो विष्णुर्यश्च कृत्स्नः प्रभुश्च । कृष्णो वेदाङ्गं वेदवादाश्च कृष्ण । एवं जानन्ब्राह्मणो ब्रह्म एति ॥
viṣṇuryajñastvijyate cāpi viṣṇuḥ | kṛṣṇo viṣṇuryaśca kṛtsnaḥ prabhuśca | kṛṣṇo vedāṅgaṃ vedavādāśca kṛṣṇa | evaṃ jānanbrāhmaṇo brahma eti
विष्णु ही यज्ञ हैं और विष्णु ही पूजे जाते हैं; कृष्ण ही विष्णु हैं, जो सम्पूर्ण और प्रभु हैं। कृष्ण ही वेदांग हैं और वेदों के प्रतिपादन भी कृष्ण ही हैं। जो ब्राह्मण ऐसा जानता है वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (13.16.4)
स्थानं सर्वं वैष्णवं यज्ञमार्गे । चातुर्होत्रं वैष्णवं तत्र कृष्णः । सर्वैर्भावैरिज्यते सर्वकामैः । पुण्याँल्लोकान्ब्राह्मणाः प्राप्नुवन्ति ॥
sthānaṃ sarvaṃ vaiṣṇavaṃ yajñamārge | cāturhotraṃ vaiṣṇavaṃ tatra kṛṣṇaḥ | sarvairbhāvairijyate sarvakāmaiḥ | puṇyām̐llokānbrāhmaṇāḥ prāpnuvanti
यज्ञमार्ग में सब स्थान विष्णु के हैं; चातुर्होत्र विष्णु का है और उसमें कृष्ण हैं। सब भावों और सब कामनाओं से उनकी पूजा होती है, और उन्हें पूजनेवाले ब्राह्मण पुण्यलोकों को पाते हैं।
श्लोक 5 (13.16.5)
सोमं सद्भावाद्ये च जातं पिबन्ति । दीप्तिं कर्म ये विदानाश्चरन्ति । एकान्तमिष्टं चिन्तयन्तो दिविस्थाः । ते वै स्थानं प्राप्नुवन्ति व्रतज्ञाः ॥
somaṃ sadbhāvādye ca jātaṃ pibanti | dīptiṃ karma ye vidānāścaranti | ekāntamiṣṭaṃ cintayanto divisthāḥ | te vai sthānaṃ prāpnuvanti vratajñāḥ
जो सच्चे भाव से उत्पन्न सोम पीते हैं, जो कर्म की दीप्ति को जानकर उसका आचरण करते हैं, और स्वर्ग में स्थित होकर एकाग्र मन से अपने आराध्य का चिन्तन करते हैं, वे व्रतों को जाननेवाले उस स्थान को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 6 (13.16.6)
ओमित्येतद्ध्यायमानो न गच्छेत् । दुर्गं पन्थानं पापकर्मापि विप्रः । सर्वं कृष्णं वासुदेवं हि विप्राः । कृत्वा ध्यानं दुर्गतिं न प्रयान्ति ॥
omityetaddhyāyamāno na gacchet | durgaṃ panthānaṃ pāpakarmāpi vipraḥ | sarvaṃ kṛṣṇaṃ vāsudevaṃ hi viprāḥ | kṛtvā dhyānaṃ durgatiṃ na prayānti
जो ब्राह्मण ओम् का ध्यान करता है, वह पापकर्मी होने पर भी दुर्गम मार्ग पर नहीं जाता; क्योंकि जो ब्राह्मण सबको कृष्ण, वासुदेव के रूप में ध्यान करते हैं, वे दुर्गति को नहीं पाते।
श्लोक 7 (13.16.7)
आज्यं यज्ञः स्रुक्स्रुवौ यज्ञदाता । इच्छा पत्नी पत्निशाला हवींषि । इध्माः पुरोडाशं सर्वदा होतृकर्ता । कृत्स्नं विष्णुं संविजानंस्तमेति ॥
ājyaṃ yajñaḥ sruksruvau yajñadātā | icchā patnī patniśālā havīṃṣi | idhmāḥ puroḍāśaṃ sarvadā hotṛkartā | kṛtsnaṃ viṣṇuṃ saṃvijānaṃstameti
घी, यज्ञ, स्रुक् और स्रुवा, यज्ञ करानेवाला; इच्छा पत्नी, पत्नीशाला, हवि; समिधाएँ, पुरोडाश, और सदा कर्म करनेवाला होता: इन सबको पूर्ण रूप से विष्णु जाननेवाला उन्हीं को प्राप्त होता है।
श्लोक 8 (13.16.8)
योगेयोगे कर्मणां चाभिहारे । युक्ते वैताने कर्मणि ब्राह्मणस्य । पुष्ट्यर्थेषु प्राप्नुयात्कर्मसिद्धिं । शान्त्यर्थेषु प्राप्नुयात्सर्वशान्तिम् ॥
yogeyoge karmaṇāṃ cābhihāre | yukte vaitāne karmaṇi brāhmaṇasya | puṣṭyartheṣu prāpnuyātkarmasiddhiṃ | śāntyartheṣu prāpnuyātsarvaśāntim
हर उद्योग में और कर्मों की पुनः-पुनः आवृत्ति में, जब ब्राह्मण वैतानिक कर्म में लगा हो, तब पुष्टि के कर्मों में उसे कर्म की सिद्धि मिलती है और शान्ति के कर्मों में पूर्ण शान्ति।