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अनुशासन पर्व · अध्याय 161

दीर्घायु देनेवाले आचार

युधिष्ठिर पूछते हैं कि वेद में सौ वर्ष की आयु कही गई है, फिर लोग अल्पायु क्यों मरते हैं, और मनुष्य को दीर्घायु, कीर्ति और समृद्धि किससे मिलती है। भीष्म उत्तर देते हैं कि यह सब सदाचार से मिलता है, और फिर दैनिक जीवन के नियमों की लम्बी शृंखला बताते हैं: सन्ध्योपासना, परस्त्री का त्याग, वाणी, स्नान, भोजन, शयन और मल-मूत्र-त्याग के नियम, वृद्धों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों और गुरु का सम्मान, उपवास, त्याज्य भोजन और वस्त्र, गृहस्थी और विवाह के नियम, तथा क्षत्रिय का शिक्षण। अन्त में वे दीर्घायु के लक्षणों का सार कहते हैं और आचार को सब शिक्षाओं में श्रेष्ठ बताते हैं।

अध्याय 160अध्याय-सूचीअध्याय 162

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.161.1)

शतायुरुक्तः पुरुषः शतवीर्यश्च वैदिके । कस्मान्म्रियन्ते पुरुषा बाला अपि पितामह ॥

śatāyuruktaḥ puruṣaḥ śatavīryaśca vaidike | kasmānmriyante puruṣā bālā api pitāmaha

वेद में पुरुष को सौ वर्ष की आयु वाला और सौ गुना बलशाली कहा गया है। तब, पितामह, मनुष्य क्यों मर जाते हैं, बालक भी क्यों?

श्लोक 2 (13.161.2)

आयुष्मान्केन भवति अल्पायुर्वाऽपि मानवः । केन वा लभते कीर्तिं केन वा लभते श्रियम् ॥

āyuṣmānkena bhavati alpāyurvā'pi mānavaḥ | kena vā labhate kīrtiṃ kena vā labhate śriyam

मनुष्य किस कारण दीर्घायु होता है और किस कारण अल्पायु? किससे वह कीर्ति पाता है और किससे लक्ष्मी (समृद्धि) पाता है?

श्लोक 3 (13.161.3)

तपसा ब्रह्मचर्येण जपैर्होमैस्तथा परैः । जन्मना यदि वाऽचारात्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

tapasā brahmacaryeṇa japairhomaistathā paraiḥ | janmanā yadi vā'cārāttanme brūhi pitāmaha

क्या यह तप से, ब्रह्मचर्य से, जप और होम से तथा अन्य साधनों से होता है, या जन्म से, या आचार से? पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (13.161.4)

अत्र तेऽहं प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि । अल्पायुर्येन भवति दीर्घायुर्येन मानवः ॥

atra te'haṃ pravakṣyāmi yanmāṃ tvamanupṛcchasi | alpāyuryena bhavati dīrghāyuryena mānavaḥ

इस विषय में, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो वह मैं तुम्हें बताऊँगा: मनुष्य किससे अल्पायु होता है और किससे दीर्घायु;

श्लोक 5 (13.161.5)

येन वा लभते कीर्तिं येन वा लभते श्रियम् । यथा च वर्तयन्पुरुषः श्रेयसा सम्प्रयुज्यते ॥

yena vā labhate kīrtiṃ yena vā labhate śriyam | yathā ca vartayanpuruṣaḥ śreyasā samprayujyate

किससे वह कीर्ति पाता है, किससे समृद्धि पाता है, और किस प्रकार रहता हुआ मनुष्य परम कल्याण से युक्त होता है।

श्लोक 6 (13.161.6)

आचाराल्लभते ह्यायुराचाराल्लभते श्रियम् । आचारात्कीर्तिमाप्नोति पुरुषः प्रेत्य चेह च ॥

ācārāllabhate hyāyurācārāllabhate śriyam | ācārātkīrtimāpnoti puruṣaḥ pretya ceha ca

आचार से ही मनुष्य आयु पाता है, आचार से ही लक्ष्मी पाता है; आचार से ही पुरुष इस लोक में और परलोक में कीर्ति पाता है।

श्लोक 7 (13.161.7)

दुराचारो हि पुरुषो नेहायुर्विन्दते महत् । त्रसन्ति चास्य भूतानि तथा परिभवन्ति च ॥

durācāro hi puruṣo nehāyurvindate mahat | trasanti cāsya bhūtāni tathā paribhavanti ca

दुराचारी पुरुष इस लोक में लम्बी आयु नहीं पाता; प्राणी उससे डरते हैं और उसका तिरस्कार भी करते हैं।

श्लोक 8 (13.161.8)

तस्मात्कुर्यादिहाचारं य इच्छेद्भूतिमात्मनः । अपि पापशरीरस्य आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

tasmātkuryādihācāraṃ ya icchedbhūtimātmanaḥ | api pāpaśarīrasya ācāro hantyalakṣaṇam

इसलिए जो अपना कल्याण चाहे, उसे इस लोक में सदाचार का पालन करना चाहिए; आचार पापी शरीरवाले के भी अशुभ लक्षणों को नष्ट कर देता है।

श्लोक 9 (13.161.9)

आचारलक्षणो धर्मः सन्तश्चारित्रलक्षणाः । साधूनां च यथावृत्तमेतदाचारलक्षणम् ॥

ācāralakṣaṇo dharmaḥ santaścāritralakṣaṇāḥ | sādhūnāṃ ca yathāvṛttametadācāralakṣaṇam

धर्म की पहचान आचार से होती है और सज्जनों की पहचान चरित्र से; साधुओं का जैसा आचरण रहा है, वही सदाचार का लक्षण है।

श्लोक 10 (13.161.10)

अप्यदृष्टं श्रवादेव पुरुषं धर्मचारिणम् । स्वानि कर्माणि कुर्वाणं तं जनाः कुर्वते प्रियम् ॥

apyadṛṣṭaṃ śravādeva puruṣaṃ dharmacāriṇam | svāni karmāṇi kurvāṇaṃ taṃ janāḥ kurvate priyam

जिसे लोगों ने कभी देखा नहीं, केवल सुना है, ऐसे धर्म पर चलनेवाले और अपने कर्म करनेवाले पुरुष को भी लोग प्रिय मानने लगते हैं।

श्लोक 11 (13.161.11)

ये नास्तिका निष्क्रियाश्च गुरुशास्त्रातिलङ्घिनः । अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुषः ॥

ye nāstikā niṣkriyāśca guruśāstrātilaṅghinaḥ | adharmajñā durācārāste bhavanti gatāyuṣaḥ

जो नास्तिक हैं, कर्महीन हैं, गुरु और शास्त्र का उल्लंघन करते हैं, धर्म को नहीं जानते और दुराचारी हैं, वे गतायु (क्षीण आयुवाले) हो जाते हैं।

श्लोक 12 (13.161.12)

विशीला भिन्नमर्यादा नित्यं सङ्कीर्णमैथुनाः । अल्पायुषो भवन्तीह नरा निरयगामिनः ॥

viśīlā bhinnamaryādā nityaṃ saṅkīrṇamaithunāḥ | alpāyuṣo bhavantīha narā nirayagāminaḥ

जो शीलहीन हैं, मर्यादा तोड़ देते हैं और सदा अनियमित (वर्णसंकर) सम्बन्ध रखते हैं, वे मनुष्य इस लोक में अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं।

श्लोक 13 (13.161.13)

सर्वलक्षणहीनोऽपि समुदाचारवान्नरः । श्रद्दधानोऽनसूयुश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥

sarvalakṣaṇahīno'pi samudācāravānnaraḥ | śraddadhāno'nasūyuśca śataṃ varṣāṇi jīvati

जिसमें सभी शुभ लक्षणों का अभाव हो, फिर भी जो उत्तम आचारवाला, श्रद्धालु और ईर्ष्या से रहित हो, वह सौ वर्ष जीता है।

श्लोक 14 (13.161.14)

अक्रोधनः सत्यवादी भूतानामविहिंसकः । अनसूयुरजिह्मश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥

akrodhanaḥ satyavādī bhūtānāmavihiṃsakaḥ | anasūyurajihmaśca śataṃ varṣāṇi jīvati

जो क्रोध नहीं करता, सत्य बोलता है, किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, ईर्ष्या नहीं रखता और कुटिल नहीं है, वह सौ वर्ष जीता है।

श्लोक 15 (13.161.15)

लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः । नित्योच्छिष्टः सङ्कुसुको नेहायुर्विन्दते महत् ॥

loṣṭhamardī tṛṇacchedī nakhakhādī ca yo naraḥ | nityocchiṣṭaḥ saṅkusuko nehāyurvindate mahat

जो मनुष्य मिट्टी के ढेले मसलता है, तिनके तोड़ता है, नाखून चबाता है, सदा अपवित्र रहता है और दुष्ट तथा चंचल है, वह लम्बी आयु नहीं पाता।

श्लोक 16 (13.161.16)

ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् । उत्थाय चोपतिष्ठेत पूर्वां सन्ध्यां कृताञ्जलिः । एवमेवापरां सन्ध्यां समुपासीत वाग्यतः ॥

brāhme muhūrte budhyeta dharmārthau cānucintayet | utthāya copatiṣṭheta pūrvāṃ sandhyāṃ kṛtāñjaliḥ | evamevāparāṃ sandhyāṃ samupāsīta vāgyataḥ

ब्राह्म मुहूर्त में जागना चाहिए और धर्म तथा अर्थ का चिन्तन करना चाहिए। उठकर हाथ जोड़े हुए प्रातःसन्ध्या की उपासना करे; और उसी प्रकार मौन रहकर सायंसन्ध्या की भी उपासना करे।

श्लोक 17 (13.161.17)

नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं नास्तं यन्तं कदाचन । नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् ॥

nekṣetādityamudyantaṃ nāstaṃ yantaṃ kadācana | nopasṛṣṭaṃ na vāristhaṃ na madhyaṃ nabhaso gatam

उगते हुए सूर्य को और अस्त होते हुए सूर्य को कभी न देखे; न ग्रहण लगे सूर्य को, न जल में दिखते सूर्य को, न आकाश के मध्य में पहुँचे सूर्य को।

श्लोक 18 (13.161.18)

ऋषयो नित्यसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुवन् ॥

ṛṣayo nityasandhyatvāddīrghamāyuravāpnuvan

प्रतिदिन सन्ध्या करने के कारण ही ऋषियों ने दीर्घ आयु पाई।

श्लोक 19 (13.161.19)

सदर्भपाणिस्तत्कुर्वन्वाग्यतस्तन्मनाः शुचिः । तस्मात्तिष्ठेत्सदा पूर्वां पश्चिमां चैव वाग्यतः ॥

sadarbhapāṇistatkurvanvāgyatastanmanāḥ śuciḥ | tasmāttiṣṭhetsadā pūrvāṃ paścimāṃ caiva vāgyataḥ

हाथ में कुश लेकर, मौन रहकर, मन उसी में लगाए और पवित्र होकर वह कर्म करे; इसलिए सदा प्रातःसन्ध्या और सायंसन्ध्या में मौन रहकर खड़ा हो।

श्लोक 20 (13.161.20)

ये न पूर्वामुपासन्ते द्विजाः संध्यां न पश्चिमाम् । सर्वांस्तान्धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् ॥

ye na pūrvāmupāsante dvijāḥ saṃdhyāṃ na paścimām | sarvāṃstāndhārmiko rājā śūdrakarmāṇi kārayet

जो द्विज न प्रातःसन्ध्या करते हैं और न सायंसन्ध्या, उन सबसे धर्मात्मा राजा शूद्रों के काम करवाए।

श्लोक 21 (13.161.21)

परदारा न गन्तव्याः सर्ववर्णेषु कर्हिचित् । नहीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते ॥

paradārā na gantavyāḥ sarvavarṇeṣu karhicit | nahīdṛśamanāyuṣyaṃ loke kiñcana vidyate

किसी भी वर्ण में परस्त्री के पास कभी नहीं जाना चाहिए; इस लोक में इसके समान आयु को घटानेवाली कोई दूसरी बात नहीं है।

श्लोक 22 (13.161.22)

यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् । तादृशं विद्यते किञ्चिदनायुष्यं नृणामिह ॥

yādṛśaṃ puruṣasyeha paradāropasevanam | tādṛśaṃ vidyate kiñcidanāyuṣyaṃ nṛṇāmiha

मनुष्यों में पुरुष का परस्त्रीगमन जितनी आयु घटाता है, उतनी आयु घटानेवाली और कोई वस्तु नहीं है।

श्लोक 23 (13.161.23)

यावन्तो रोमकूपाः स्युः स्त्रीणां गात्रेषु निर्मिताः । तावद्वर्षसहस्राणि नरकं पर्युपासते ॥

yāvanto romakūpāḥ syuḥ strīṇāṃ gātreṣu nirmitāḥ | tāvadvarṣasahasrāṇi narakaṃ paryupāsate

स्त्रियों के शरीर पर जितने रोमकूप बने हैं, उतने हजार वर्षों तक ऐसे पुरुष नरक में रहते हैं।

श्लोक 24 (13.161.24)

मैत्रं प्रसाधनं स्नानमञ्जनं दन्तधावनम् । पूर्वाह्ण एव कुर्वीत देवतानां च पूजनम् ॥

maitraṃ prasādhanaṃ snānamañjanaṃ dantadhāvanam | pūrvāhṇa eva kurvīta devatānāṃ ca pūjanam

मलत्याग, प्रसाधन (शृंगार), स्नान, अंजन लगाना, दन्तधावन और देवताओं का पूजन — ये सब पूर्वाह्न में ही करने चाहिए।

श्लोक 25 (13.161.25)

पुरीषमूत्रे नोदीक्षेन्नाधितिष्ठेत्कदाचन । नातिकल्यं नातिसायं न च मध्यंदिने स्थिते । नाज्ञातैः सह गच्छेत नैको न वृषलैः सह ॥

purīṣamūtre nodīkṣennādhitiṣṭhetkadācana | nātikalyaṃ nātisāyaṃ na ca madhyaṃdine sthite | nājñātaiḥ saha gaccheta naiko na vṛṣalaiḥ saha

मल और मूत्र को न देखे और न कभी उन पर बैठे या खड़ा हो। न बहुत सवेरे, न बहुत सायं, और न दोपहर के समय बाहर निकले; अनजान लोगों के साथ न जाए, अकेला न जाए, और नीच जन्मवालों (वृषलों) के साथ भी न जाए।

श्लोक 26 (13.161.26)

पन्था देयो ब्राह्मणाय गोभ्यो राजभ्य एव च । वृद्धाय भारतप्ताय गर्भिण्यै दुर्बलाय च ॥

panthā deyo brāhmaṇāya gobhyo rājabhya eva ca | vṛddhāya bhārataptāya garbhiṇyai durbalāya ca

ब्राह्मण को, गायों को, राजाओं को, वृद्ध को, बोझ से दबे हुए को, गर्भवती स्त्री को और दुर्बल को रास्ता देना चाहिए।

श्लोक 27 (13.161.27)

प्रदक्षिणं च कुर्वीत परिज्ञातान्वनस्पतीन् । चतुष्पदान्मङ्गलांश्च मान्यान्वृद्धान्द्विजानपि ॥

pradakṣiṇaṃ ca kurvīta parijñātānvanaspatīn | catuṣpadānmaṅgalāṃśca mānyānvṛddhāndvijānapi

जाने-पहचाने वृक्षों की, मंगलकारी चौपायों की तथा माननीय वृद्धों और ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

श्लोक 28 (13.161.28)

मध्यंदिने निशाकाले अर्धरात्रे च सर्वदा । चतुष्पथं न सेवेत उभे सन्ध्ये तथैव च ॥

madhyaṃdine niśākāle ardharātre ca sarvadā | catuṣpathaṃ na seveta ubhe sandhye tathaiva ca

दोपहर में, रात में और आधी रात में, तथा दोनों सन्ध्याओं में भी चौराहे का सेवन कभी न करे।

श्लोक 29 (13.161.29)

उपानहौ न वस्त्रं च धृतमन्यैर्न धारयेत् । ब्रह्मचारी च नित्यं स्यात्पादं पादेन नाक्रमेत् ॥

upānahau na vastraṃ ca dhṛtamanyairna dhārayet | brahmacārī ca nityaṃ syātpādaṃ pādena nākramet

दूसरों के पहने हुए जूते-चप्पल और वस्त्र न पहने। सदा ब्रह्मचारी (संयमी) रहे और एक पैर से दूसरे पैर को न दबाए।

श्लोक 30 (13.161.30)

अमावास्यां पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां च जन्मनि । अष्टम्यामथ द्वादश्यां ब्रह्मचारी सदा भवेत् ॥

amāvāsyāṃ paurṇamāsyāṃ caturdaśyāṃ ca janmani | aṣṭamyāmatha dvādaśyāṃ brahmacārī sadā bhavet

अमावास्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, जन्म-दिन, अष्टमी और द्वादशी को सदा ब्रह्मचारी (संयमी) रहे।

श्लोक 31 (13.161.31)

वृथा मांसं न खादेत पृष्ठमांसं तथैव च । आक्रोशं परिवादं च पैशुन्यं च विवर्जयेत् ॥

vṛthā māṃsaṃ na khādeta pṛṣṭhamāṃsaṃ tathaiva ca | ākrośaṃ parivādaṃ ca paiśunyaṃ ca vivarjayet

व्यर्थ मांस न खाए, और उसी प्रकार पीठ का मांस भी न खाए (पीठ पीछे निन्दा न करे); गाली-गलौज, परनिन्दा और चुगली से बचे।

श्लोक 32 (13.161.32)

नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी । न हीनतो वरमभ्याददीत । ययाऽस्य वाचा पर उद्विजेत । न तां वदेद्रुशतीं पापलोक्याम् ॥

nāruntudaḥ syānna nṛśaṃsavādī | na hīnato varamabhyādadīta | yayā'sya vācā para udvijeta | na tāṃ vadedruśatīṃ pāpalokyām

वह दूसरों को सतानेवाला न हो और कठोर बोलनेवाला न हो; अपने से नीच से कोई उत्तम वस्तु न ले। जिस वाणी से दूसरा व्यक्ति उद्विग्न हो जाए, वह कठोर और पाप-लोकों में ले जानेवाली वाणी न बोले।

श्लोक 33 (13.161.33)

अतिवादबाणा मुखतो निःसरन्ति । यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य वा मर्मसु ये पतन्ति । तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ॥

ativādabāṇā mukhato niḥsaranti | yairāhataḥ śocati rātryahāni | parasya vā marmasu ye patanti | tānpaṇḍito nāvasṛjetpareṣu

अत्यधिक कटु वचनों के बाण मुख से निकलते हैं; उनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक करता है। वे दूसरे के मर्मस्थानों पर गिरते हैं, इसलिए विद्वान् उन्हें दूसरों पर न छोड़े।

श्लोक 34 (13.161.34)

संरोहत्यग्निना दग्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥

saṃrohatyagninā dagdhaṃ vanaṃ paraśunā hatam | vācā duruktaṃ bībhatsaṃ na saṃrohati vākkṣatam

आग से जला हुआ और कुल्हाड़ी से कटा हुआ वन फिर उग आता है; पर कठोर और घृणित वचन से किया हुआ वाणी का घाव नहीं भरता।

श्लोक 35 (13.161.35)

कर्णिनालीकनाराचान्निर्हरन्ति शरीरतः । वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदिशयो हि सः ॥

karṇinālīkanārācānnirharanti śarīrataḥ | vākśalyastu na nirhartuṃ śakyo hṛdiśayo hi saḥ

कर्णी, नालीक और नाराच बाण शरीर से निकाले जा सकते हैं; पर वाणी का बाण नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि वह हृदय में बैठा रहता है।

श्लोक 36 (13.161.36)

हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान्विद्याहीनान्वयोधिकान् । रूपद्रविणहीनांश्च सत्यहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥

hīnāṅgānatiriktāṅgānvidyāhīnānvayodhikān | rūpadraviṇahīnāṃśca satyahīnāṃśca nākṣipet

जिनका कोई अंग कम हो या अधिक हो, जो विद्याहीन हों, जो अवस्था में बड़े हों, जो रूप और धन से हीन हों, या जो सत्य से हीन हों, उनका उपहास न करे।

श्लोक 37 (13.161.37)

नास्तिक्यं वेदनिन्दां च परनिन्दां च कुत्सनम् । द्वेषस्तम्भाभिमानं च तैक्ष्ण्यं च परिवर्जयेत् ॥

nāstikyaṃ vedanindāṃ ca paranindāṃ ca kutsanam | dveṣastambhābhimānaṃ ca taikṣṇyaṃ ca parivarjayet

नास्तिकता, वेद की निन्दा, दूसरों की निन्दा, तिरस्कार, द्वेष, जड़ता (अकड़), अभिमान और तीखापन — इनका त्याग करे।

श्लोक 38 (13.161.38)

परस्य दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धो नैनं निपातयेत् । अन्यत्र पुत्राच्छिष्याच्च शिक्षार्थं ताडनं स्मृतं ॥

parasya daṇḍaṃ nodyacchetkruddho nainaṃ nipātayet | anyatra putrācchiṣyācca śikṣārthaṃ tāḍanaṃ smṛtaṃ

दूसरे पर डंडा न उठाए और क्रोध में उसे मार न गिराए; केवल पुत्र और शिष्य को शिक्षा के लिए ताड़ना देना विहित माना गया है।

श्लोक 39 (13.161.39)

न ब्राह्मणान्परिवदेन्नक्षत्राणि न निर्दिशेत् । तिथिं पक्षस्य न ब्रूयात्तथाऽस्यायुर्न रिष्यते ॥

na brāhmaṇānparivadennakṣatrāṇi na nirdiśet | tithiṃ pakṣasya na brūyāttathā'syāyurna riṣyate

ब्राह्मणों की निन्दा न करे, नक्षत्रों की ओर संकेत न करे, और पक्ष की तिथि न बताए; ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण नहीं होती।

श्लोक 40 (13.161.40)

अमावास्यामृते नित्यं दन्तधावनमाचरेत् । इतिहासपुराणानि दानं वेदं च नित्यशः । गायत्रीमननं नित्यं कुर्यात्सन्ध्यां समाहितः ॥

amāvāsyāmṛte nityaṃ dantadhāvanamācaret | itihāsapurāṇāni dānaṃ vedaṃ ca nityaśaḥ | gāyatrīmananaṃ nityaṃ kuryātsandhyāṃ samāhitaḥ

अमावास्या को छोड़कर प्रतिदिन दन्तधावन करे। नित्य इतिहास-पुराण, दान और वेद का भी अभ्यास करे; और एकाग्र मन से गायत्री का निरन्तर जप करते हुए सन्ध्या करे।

श्लोक 41 (13.161.41)

कृत्वा मूत्रपुरीषे तु रथ्यामाक्रम्य वा पुनः । पादप्रक्षालनं कुर्यात्स्वाध्याये भोजने तथा ॥

kṛtvā mūtrapurīṣe tu rathyāmākramya vā punaḥ | pādaprakṣālanaṃ kuryātsvādhyāye bhojane tathā

मल-मूत्र का त्याग करके अथवा गली-सड़क पार करके पैर धोने चाहिए; वैसे ही स्वाध्याय और भोजन के समय भी।

श्लोक 42 (13.161.42)

त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् । अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥

trīṇi devāḥ pavitrāṇi brāhmaṇānāmakalpayan | adṛṣṭamadbhirnirṇiktaṃ yacca vācā praśasyate

देवताओं ने ब्राह्मणों के लिए तीन पवित्र करनेवाली वस्तुएँ बनाईं: जो अदृष्ट है, जो जल से शुद्ध किया गया है, और जिसकी वाणी से प्रशंसा की जाती है।

श्लोक 43 (13.161.43)

यावकं कृसरं मांसं शष्कुलीं पायसं तथा । आत्मार्थं न प्रकर्तव्यं देवार्थं तु प्रकल्पयेत् ॥

yāvakaṃ kṛsaraṃ māṃsaṃ śaṣkulīṃ pāyasaṃ tathā | ātmārthaṃ na prakartavyaṃ devārthaṃ tu prakalpayet

यावक, कृसर, मांस, शष्कुली और खीर अपने लिए नहीं बनानी चाहिए; इन्हें देवताओं के लिए ही बनाना चाहिए।

श्लोक 44 (13.161.44)

नित्यमग्निं परिचरेद्भिक्षां दद्याच्च नित्यदा । दन्तकाष्ठे च सन्ध्यायां मलोत्सर्गे च मौनगः ॥

nityamagniṃ paricaredbhikṣāṃ dadyācca nityadā | dantakāṣṭhe ca sandhyāyāṃ malotsarge ca maunagaḥ

नित्य अग्नि की सेवा करे और नित्य भिक्षा दे; दातुन करते समय, सन्ध्या के समय और मल-त्याग के समय मौन रहे।

श्लोक 45 (13.161.45)

न चाभ्युदितसायी स्यात्प्रायश्चित्ती तथा भवेत् । मातापितरमुत्थाय पूर्वमेवाभिवादयेत् । आचार्यमथवाऽप्येनं तथाऽऽयुर्विन्दते महत् ॥

na cābhyuditasāyī syātprāyaścittī tathā bhavet | mātāpitaramutthāya pūrvamevābhivādayet | ācāryamathavā'pyenaṃ tathā''yurvindate mahat

वह सूर्योदय के बाद सोता न रहे, और प्रायश्चित्त करनेवाला हो। उठकर पहले माता-पिता को प्रणाम करे, अथवा आचार्य को; ऐसा करने से वह लम्बी आयु पाता है।

श्लोक 46 (13.161.46)

वर्जयेद्दन्तकाष्ठानि वर्जनीयानि नित्यशः । भक्षयेच्छास्त्रदृष्टानि पर्वस्वपि विवर्जयेत् । उदङ्मुखश्च सततं शौचं कुर्यात्समाहितः ॥

varjayeddantakāṣṭhāni varjanīyāni nityaśaḥ | bhakṣayecchāstradṛṣṭāni parvasvapi vivarjayet | udaṅmukhaśca satataṃ śaucaṃ kuryātsamāhitaḥ

जो दातुन वर्जित हैं उन्हें सदा छोड़े, शास्त्र में बताई हुई दातुन ही काम में ले, और पर्व के दिनों में उन्हें भी छोड़ दे। सदा उत्तर की ओर मुख करके एकाग्र मन से शौच करे।

श्लोक 47 (13.161.47)

अकृत्वा देवपूजां च नाचरेद्दन्तधावनम् । अकृत्वा देवपूजां च नान्यं गच्छेत्कदाचन । अन्यत्र तु गुरुं वृद्धं धार्मिकं वा विचक्षणम् ॥

akṛtvā devapūjāṃ ca nācareddantadhāvanam | akṛtvā devapūjāṃ ca nānyaṃ gacchetkadācana | anyatra tu guruṃ vṛddhaṃ dhārmikaṃ vā vicakṣaṇam

देवपूजा किए बिना दातुन न करे; देवपूजा किए बिना कभी किसी दूसरे के पास न जाए — केवल बड़े गुरु, धार्मिक पुरुष या विवेकी पुरुष के पास जा सकता है।

श्लोक 48 (13.161.48)

अवलोक्यो न चादर्शो मलिनो बुद्धिमत्तरैः । न चाज्ञातां स्त्रियं गच्छेद्गर्भिणीं वा कदाचन ॥

avalokyo na cādarśo malino buddhimattaraiḥ | na cājñātāṃ striyaṃ gacchedgarbhiṇīṃ vā kadācana

बुद्धिमान् लोग मैले दर्पण में न देखें; और अनजानी स्त्री के पास अथवा गर्भवती स्त्री के पास कभी न जाए।

श्लोक 49 (13.161.49)

दारसङ्ग्रहणात्पूर्वं नाचरेन्मैथुनं बुधः । अन्यथा त्ववकीर्णः स्यात्प्रायश्चित्तं सदाऽऽचरेत् ॥

dārasaṅgrahaṇātpūrvaṃ nācarenmaithunaṃ budhaḥ | anyathā tvavakīrṇaḥ syātprāyaścittaṃ sadā''caret

विवाह करने से पहले बुद्धिमान् पुरुष मैथुन न करे; नहीं तो वह अवकीर्णी हो जाता है और उसे सदा प्रायश्चित्त करना चाहिए।

श्लोक 50 (13.161.50)

नोदीक्षेत्परदारांश्च रहस्येकासनो भवेत् । इन्द्रियाणि सदा यच्छेत्स्वप्ने शुद्धमना भवेत् ॥

nodīkṣetparadārāṃśca rahasyekāsano bhavet | indriyāṇi sadā yacchetsvapne śuddhamanā bhavet

दूसरों की स्त्रियों की ओर न देखे और एकान्त में किसी स्त्री के साथ एक आसन पर न बैठे। इन्द्रियों को सदा वश में रखे और स्वप्न में भी मन को शुद्ध रखे।

श्लोक 51 (13.161.51)

उदक्शिरा न स्वपेत तथा प्रत्यक्शिरा न च । प्राक्शिरास्तु स्वपेद्विद्वांस्तथा वै दक्षिणाशिराः ॥

udakśirā na svapeta tathā pratyakśirā na ca | prākśirāstu svapedvidvāṃstathā vai dakṣiṇāśirāḥ

उत्तर की ओर सिर करके न सोए और पश्चिम की ओर सिर करके भी न सोए; विद्वान् पूर्व की ओर सिर करके सोए, अथवा वैसे ही दक्षिण की ओर।

श्लोक 52 (13.161.52)

न भग्ने नावशीर्णे च शयने प्रस्वपीत च । नान्तर्धानेन संयुक्ते न च तिर्यक्कदाचन ॥

na bhagne nāvaśīrṇe ca śayane prasvapīta ca | nāntardhānena saṃyukte na ca tiryakkadācana

टूटी हुई या बिखरी हुई शय्या पर न सोए, ढकी हुई शय्या पर न सोए, और तिरछा होकर कभी न सोए।

श्लोक 53 (13.161.53)

न चापि गच्छेत्कार्येण समयाद्वाऽपि नास्तिकैः । आसनं तु पदाऽऽकृष्य न प्रसज्जेत्तथा नरः ॥

na cāpi gacchetkāryeṇa samayādvā'pi nāstikaiḥ | āsanaṃ tu padā''kṛṣya na prasajjettathā naraḥ

न किसी काम से और न किसी करार से नास्तिकों के साथ जाए; और पैर से घसीटे हुए आसन पर मनुष्य न बैठे।

श्लोक 54 (13.161.54)

न नग्नः कर्हिचित्स्नायान्न निशायां कदाचन । स्नात्वा च नावमृज्येत गात्राणि सुविचक्षणः । न निशायां पुनः स्नायादापद्यग्निद्विजान्तिके ॥

na nagnaḥ karhicitsnāyānna niśāyāṃ kadācana | snātvā ca nāvamṛjyeta gātrāṇi suvicakṣaṇaḥ | na niśāyāṃ punaḥ snāyādāpadyagnidvijāntike

नंगा होकर कभी स्नान न करे, और रात में भी कभी नहीं। स्नान करने के बाद अत्यन्त विवेकी पुरुष अपने अंगों को पोंछे नहीं। संकट की स्थिति में, अग्नि और ब्राह्मणों के समीप के सिवा, रात में फिर स्नान न करे।

श्लोक 55 (13.161.55)

न चानुलिम्पेदस्नात्वा वासश्चापि न निर्धुनेत् । आर्द्र एव तु वासांसि नित्यं सेवेत मानवः ॥

na cānulimpedasnātvā vāsaścāpi na nirdhunet | ārdra eva tu vāsāṃsi nityaṃ seveta mānavaḥ

बिना स्नान किए उबटन या लेप न लगाए और वस्त्र को झाड़े नहीं; मनुष्य सदा गीले ही वस्त्र पहने।

श्लोक 56 (13.161.56)

स्रजश्च नावकृष्येत न बहिर्धारयीत च । उदक्यया च सम्भाषां न कुर्वीत कदाचन ॥

srajaśca nāvakṛṣyeta na bahirdhārayīta ca | udakyayā ca sambhāṣāṃ na kurvīta kadācana

मालाओं को खींचकर न उतारे और बाहर पहनकर न चले; और रजस्वला स्त्री के साथ कभी बातचीत न करे।

श्लोक 57 (13.161.57)

नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे मार्गस्य चान्तिके । उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात्कदाचन ॥

notsṛjeta purīṣaṃ ca kṣetre mārgasya cāntike | ubhe mūtrapurīṣe tu nāpsu kuryātkadācana

खेत में या मार्ग के समीप मल न त्यागे; और जल में मल-मूत्र कभी न करे।

श्लोक 58 (13.161.58)

देवालयेऽथ गोवृन्दे चैत्ये सस्येषु विश्रमे । भोक्ष्यन् भुक्त्वा क्षुतेऽध्वानं गत्वा मूत्रपुरीषयोः । द्विराचामेद्यथान्यायं हृद्गतं तु पिबन्नपः ॥

devālaye'tha govṛnde caitye sasyeṣu viśrame | bhokṣyan bhuktvā kṣute'dhvānaṃ gatvā mūtrapurīṣayoḥ | dvirācāmedyathānyāyaṃ hṛdgataṃ tu pibannapaḥ

देवालय में, गायों के झुंड में, चैत्य में, खेती में और विश्राम-स्थान में — भोजन करने से पहले, भोजन के बाद, छींकने के बाद, यात्रा से लौटकर, तथा मल-मूत्र त्यागने के बाद — विधि के अनुसार दो बार आचमन करे, हृदय तक पहुँचनेवाला जल पीते हुए।

श्लोक 59 (13.161.59)

अन्नं बुभुक्षमाणस्तु त्रिर्मुखेन स्पृशेदपः । भुक्त्वा चान्नं तथैव त्रिर्द्विः पुनः परिमार्जयेत् ॥

annaṃ bubhukṣamāṇastu trirmukhena spṛśedapaḥ | bhuktvā cānnaṃ tathaiva trirdviḥ punaḥ parimārjayet

भोजन करने की इच्छा रखनेवाला मुख से तीन बार जल का स्पर्श करे; और भोजन के बाद भी उसी प्रकार तीन बार और फिर दो बार मार्जन करे।

श्लोक 60 (13.161.60)

प्राङ्मुखो नित्यमश्नीयाद्वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् । प्रस्कन्दयेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत् ॥

prāṅmukho nityamaśnīyādvāgyato'nnamakutsayan | praskandayecca manasā bhuktvā cāgnimupaspṛśet

सदा पूर्व की ओर मुख करके, मौन रहकर और अन्न की निन्दा किए बिना भोजन करे; भोजन करने के बाद मन से अन्न को नीचे उतारे और अग्नि का स्पर्श करे।

श्लोक 61 (13.161.61)

आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः । धन्यं पश्चान्मुखो भुङ्क्त ऋतं भुङ्क्त उदङ्मुखः ॥

āyuṣyaṃ prāṅmukho bhuṅkte yaśasyaṃ dakṣiṇāmukhaḥ | dhanyaṃ paścānmukho bhuṅkta ṛtaṃ bhuṅkta udaṅmukhaḥ

पूर्व की ओर मुख करके खानेवाला आयु के लिए खाता है, दक्षिण की ओर मुख करके यश के लिए, पश्चिम की ओर मुख करके धन के लिए, और उत्तर की ओर मुख करके खानेवाला ऋत (सत्य) का भोजन करता है।

श्लोक 62 (13.161.62)

अग्रासनो जितक्रोधो बालपूर्वस्त्वलङ्कृतः । घृताहुतिविशुद्धान्नं हुताग्निश्च क्षिपन्ग्रसेत् ॥

agrāsano jitakrodho bālapūrvastvalaṅkṛtaḥ | ghṛtāhutiviśuddhānnaṃ hutāgniśca kṣipangraset

वह प्रथम आसन ग्रहण करे, क्रोध को जीतकर, पहले बच्चों को खिलाकर, सजा-सँवरा होकर; अग्नि में आहुति देकर घी की आहुति से शुद्ध किया हुआ अन्न (उसमें कुछ अंश डालते हुए) खाए।

श्लोक 63 (13.161.63)

अग्निमालभ्य तोयेन सर्वान्प्राणानुपस्पृशेत् । गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितले तथा ॥

agnimālabhya toyena sarvānprāṇānupaspṛśet | gātrāṇi caiva sarvāṇi nābhiṃ pāṇitale tathā

जल से अग्नि का स्पर्श करके सभी प्राणों (इन्द्रियों) का जल से स्पर्श करे, फिर सब अंगों का और हथेली से नाभि का भी।

श्लोक 64 (13.161.64)

नाधितिष्ठेत्तुषं जातु केशभस्मकपालिकाः । अन्यस्य चाप्यवस्नातं दूरतः परिवर्जयेत् ॥

nādhitiṣṭhettuṣaṃ jātu keśabhasmakapālikāḥ | anyasya cāpyavasnātaṃ dūrataḥ parivarjayet

भूसी, केश, राख और कपाल (खोपड़ी) पर कभी न खड़ा हो; और दूसरे के स्नान के जल से दूर ही रहे।

श्लोक 65 (13.161.65)

शान्तिहोमांश्च कुर्वीत सावित्राणि च धारयेत् । निषष्णश्चापि खादेत न तु गच्छन्कदाचन ॥

śāntihomāṃśca kurvīta sāvitrāṇi ca dhārayet | niṣaṣṇaścāpi khādeta na tu gacchankadācana

शान्ति-होम करे और सावित्री मन्त्रों को धारण करे। बैठकर खा सकता है, पर चलते हुए कभी नहीं।

श्लोक 66 (13.161.66)

मूत्रं नोत्तिष्ठता कार्यं न भस्मनि न गोव्रजे । आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् ॥

mūtraṃ nottiṣṭhatā kāryaṃ na bhasmani na govraje | ārdrapādastu bhuñjīta nārdrapādastu saṃviśet

खड़े होकर, भस्म पर या गोशाला में मूत्र न करे। गीले पैर रहते भोजन करे, पर गीले पैर रहते सोए नहीं।

श्लोक 67 (13.161.67)

आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो वर्षाणां जीवते शतम् । त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट आलभेत कदाचन । अग्निं गां ब्राह्मणं चैव तथा ह्यायुर्न रिष्यते ॥

ārdrapādastu bhuñjāno varṣāṇāṃ jīvate śatam | trīṇi tejāṃsi nocchiṣṭa ālabheta kadācana | agniṃ gāṃ brāhmaṇaṃ caiva tathā hyāyurna riṣyate

गीले पैर भोजन करनेवाला सौ वर्ष जीता है। जूठे मुख या हाथ रहते अग्नि, गाय और ब्राह्मण — इन तीन तेजस्वियों का कभी स्पर्श न करे; ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण नहीं होती।

श्लोक 68 (13.161.68)

त्रीणि ज्योतींषि नोच्छिष्ट उदीक्षेत कदाचन । सूर्याचन्द्रमसौ चैव नक्षत्राणि च सर्वशः ॥

trīṇi jyotīṃṣi nocchiṣṭa udīkṣeta kadācana | sūryācandramasau caiva nakṣatrāṇi ca sarvaśaḥ

जूठे रहते सूर्य, चन्द्रमा और सब नक्षत्र — इन तीन ज्योतियों की ओर कभी न देखे।

श्लोक 69 (13.161.69)

ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रमन्ति यूनः स्थविर आगते । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥

ūrdhvaṃ prāṇā hyutkramanti yūnaḥ sthavira āgate | pratyutthānābhivādābhyāṃ punastānpratipadyate

जब वृद्ध पुरुष आता है तो युवक के प्राण ऊपर की ओर उठ जाते हैं; उठकर सम्मान करने और प्रणाम करने से वह उन्हें फिर पा लेता है।

श्लोक 70 (13.161.70)

अभिवादयीत वृद्धांश्च दद्याच्चैवासनं स्वयम् । कृताञ्जलिरुपासीत गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वियात् ॥

abhivādayīta vṛddhāṃśca dadyāccaivāsanaṃ svayam | kṛtāñjalirupāsīta gacchantaṃ pṛṣṭhato'nviyāt

वृद्धों को प्रणाम करे और उन्हें स्वयं आसन दे; हाथ जोड़कर उनके समीप बैठे और जब वे जाएँ तो उनके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 71 (13.161.71)

न चासीतासने भिन्ने भिन्नकांस्यं च वर्जयेत् । नैकवस्त्रेण भोक्तव्यं न नग्नः स्नातुमर्हति ॥

na cāsītāsane bhinne bhinnakāṃsyaṃ ca varjayet | naikavastreṇa bhoktavyaṃ na nagnaḥ snātumarhati

टूटे आसन पर न बैठे और टूटे काँसे के पात्र को छोड़ दे; एक ही वस्त्र पहनकर भोजन न करे, और नंगे होकर स्नान करना भी उचित नहीं।

श्लोक 72 (13.161.72)

स्वप्तव्यं नैव नग्नेन न चोच्छिष्टोपि संविशेत् । उच्छिष्टो न स्पृशेच्छीर्षं सर्वे प्राणास्तदाश्रयाः ॥

svaptavyaṃ naiva nagnena na cocchiṣṭopi saṃviśet | ucchiṣṭo na spṛśecchīrṣaṃ sarve prāṇāstadāśrayāḥ

नंगा होकर न सोए, और जूठा होने पर भी लेटे नहीं। जूठा मनुष्य सिर को न छुए, क्योंकि सब प्राण उसी में स्थित हैं।

श्लोक 73 (13.161.73)

केशग्रहं प्रहारांश्च शिरस्येतान्विवर्जयेत् । न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः । न चाभीक्ष्णं शिरःस्नायात्तथास्यायुर्न रिष्यते ॥

keśagrahaṃ prahārāṃśca śirasyetānvivarjayet | na saṃhatābhyāṃ pāṇibhyāṃ kaṇḍūyedātmanaḥ śiraḥ | na cābhīkṣṇaṃ śiraḥsnāyāttathāsyāyurna riṣyate

सिर के बाल पकड़ना और सिर पर प्रहार करना छोड़ दे। दोनों हाथ मिलाकर अपने सिर को न खुजलाए; और बार-बार सिर से स्नान न करे; ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण नहीं होती।

श्लोक 74 (13.161.74)

शिरःस्नातस्तु तैलैश्च नाङ्गं किञ्चिदपि स्पृशेत् । तिलपिष्टं न चाश्नीयाद्गतसर्वरसं तथा ॥

śiraḥsnātastu tailaiśca nāṅgaṃ kiñcidapi spṛśet | tilapiṣṭaṃ na cāśnīyādgatasarvarasaṃ tathā

सिर धो लेने के बाद शरीर के किसी भी अंग को तेलों से न छुए; तिल की पिट्ठी न खाए और जिसका सारा रस निकल गया हो ऐसा अन्न भी न खाए।

श्लोक 75 (13.161.75)

नाध्यापयेत्तथोच्छिष्टो नाधीयीत कदाचन । वाते च पूतिगन्धे च मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥

nādhyāpayettathocchiṣṭo nādhīyīta kadācana | vāte ca pūtigandhe ca manasā'pi na cintayet

जूठा होने पर न पढ़ाए और न कभी पढ़े; आँधी में और दुर्गन्ध में मन से भी अध्ययन का विचार न करे।

श्लोक 76 (13.161.76)

अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । आयुरस्य निकृन्तामि प्रज्ञामस्याददे तथा ॥

atra gāthā yamodgītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | āyurasya nikṛntāmi prajñāmasyādade tathā

इस विषय में पुरानी बातों के जाननेवाले यम के गाए हुए श्लोक सुनाते हैं: ‘मैं उसकी आयु काट देता हूँ और उसकी प्रज्ञा हर लेता हूँ।’

श्लोक 77 (13.161.77)

उच्छिष्टो यः प्राद्रवति स्वाध्यायं चाधिगच्छति । यश्चानध्यायकालेऽपि मोहादभ्यस्यति द्विजः ॥

ucchiṣṭo yaḥ prādravati svādhyāyaṃ cādhigacchati | yaścānadhyāyakāle'pi mohādabhyasyati dvijaḥ

जो द्विज जूठा होते हुए झपटकर वेदाध्ययन में लग जाता है, अथवा मोहवश अनध्याय के समय भी अभ्यास करता है —

श्लोक 78 (13.161.78)

तस्य वेदः प्रणश्येत आयुश्च परिहीयते । तस्माद्युक्तो ह्यनध्याये नाधीयीत कदाचन ॥

tasya vedaḥ praṇaśyeta āyuśca parihīyate | tasmādyukto hyanadhyāye nādhīyīta kadācana

उसका वेद नष्ट हो जाता है और उसकी आयु घट जाती है। इसलिए अध्ययन-निषिद्ध समय में कितना ही तत्पर होकर भी कभी न पढ़े।

श्लोक 79 (13.161.79)

प्रत्यादित्यं प्रत्यनलं प्रतिगां च प्रतिद्विजान् । ये मेहन्ति च पन्थानं ते भवन्ति गतायुषः ॥

pratyādityaṃ pratyanalaṃ pratigāṃ ca pratidvijān | ye mehanti ca panthānaṃ te bhavanti gatāyuṣaḥ

जो सूर्य, अग्नि, गाय और ब्राह्मणों की ओर मुँह करके मूत्र करते हैं, तथा जो मार्ग में मूत्र करते हैं, वे गतायु हो जाते हैं।

श्लोक 80 (13.161.80)

उभे मूत्रपुरीषे तु दिवा कुर्यादुदङ्मुखः । दक्षिणाभिमुखो रात्रौ तथास्यायुर्न रिष्यते ॥

ubhe mūtrapurīṣe tu divā kuryādudaṅmukhaḥ | dakṣiṇābhimukho rātrau tathāsyāyurna riṣyate

दिन में उत्तर की ओर मुख करके और रात में दक्षिण की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग करे; ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण नहीं होती।

श्लोक 81 (13.161.81)

त्रीन्कृशान्नावजानीयाद्दीर्घमायुर्जिजीविषुः । ब्राह्मणं क्षत्रियं सर्पं सर्वे ह्याशीविषास्त्रयः ॥

trīnkṛśānnāvajānīyāddīrghamāyurjijīviṣuḥ | brāhmaṇaṃ kṣatriyaṃ sarpaṃ sarve hyāśīviṣāstrayaḥ

जो दीर्घ जीवन चाहे, वह तीन दुर्बल दीखनेवालों का अनादर कभी न करे: ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प; क्योंकि ये तीनों ही विषधर हैं।

श्लोक 82 (13.161.82)

दहत्याशीविषः क्रुद्धो यावत्पश्यति चक्षुषा । क्षत्रियोपि दहेत्क्रुद्धो यावत्स्पृशति तेजसा ॥

dahatyāśīviṣaḥ kruddho yāvatpaśyati cakṣuṣā | kṣatriyopi dahetkruddho yāvatspṛśati tejasā

क्रुद्ध विषधर सर्प अपनी दृष्टि से जहाँ तक देखता है वहाँ तक जला देता है; क्रुद्ध क्षत्रिय भी अपने तेज से जिसे छू लेता है उसे जला देता है।

श्लोक 83 (13.161.83)

ब्राह्मणस्तु कुलं हन्याद्ध्यानेनावेक्षितेन च । तस्मादेतत्त्रयं यत्नादुपसेवेत पण्डितः ॥

brāhmaṇastu kulaṃ hanyāddhyānenāvekṣitena ca | tasmādetattrayaṃ yatnādupaseveta paṇḍitaḥ

और ब्राह्मण अपने ध्यान और दृष्टि से पूरे कुल का नाश कर सकता है। इसलिए बुद्धिमान् पुरुष इन तीनों की यत्नपूर्वक सेवा करे।

श्लोक 84 (13.161.84)

गुरुणा वैरनिर्बन्धो न कर्तव्यः कदाचन । अनुमान्यः प्रसाद्यश्च गुरुः क्रुद्धो युधिष्ठिर ॥

guruṇā vairanirbandho na kartavyaḥ kadācana | anumānyaḥ prasādyaśca guruḥ kruddho yudhiṣṭhira

गुरु के साथ वैर की हठ कभी न रखे। हे युधिष्ठिर, क्रुद्ध गुरु को मनाना और प्रसन्न करना चाहिए।

श्लोक 85 (13.161.85)

सम्यङ्मिथ्याप्रवृत्तेऽपि वर्तितव्यं गुराविह । गुरुनिन्दा दहत्यायुर्मनुष्याणां न संशयः ॥

samyaṅmithyāpravṛtte'pi vartitavyaṃ gurāviha | gurunindā dahatyāyurmanuṣyāṇāṃ na saṃśayaḥ

गुरु ठीक व्यवहार करे या अनुचित, उसके प्रति सदा अच्छा बर्ताव करना चाहिए; गुरु की निन्दा मनुष्यों की आयु जला देती है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 86 (13.161.86)

दूरादावसथान्मूत्रं दूरात्पादावसेचनम् । उच्छिष्टोत्सर्जनं चैव दूरे कार्यं हितैषिणा ॥

dūrādāvasathānmūtraṃ dūrātpādāvasecanam | ucchiṣṭotsarjanaṃ caiva dūre kāryaṃ hitaiṣiṇā

अपना हित चाहनेवाले को मूत्र घर से दूर करना चाहिए, पैर धोना दूर करना चाहिए, और जूठन फेंकना भी दूर करना चाहिए।

श्लोक 87 (13.161.87)

रक्तमाल्यं न धार्यं स्याच्छुक्लं धार्यं तु पण्डितैः । वर्जयित्वा तु कमलं तथा कुवलयं प्रभो ॥

raktamālyaṃ na dhāryaṃ syācchuklaṃ dhāryaṃ tu paṇḍitaiḥ | varjayitvā tu kamalaṃ tathā kuvalayaṃ prabho

लाल मालाएँ नहीं पहननी चाहिए; विद्वानों को सफेद मालाएँ पहननी चाहिए, केवल कमल और नील कुमुद को छोड़कर, हे प्रभो।

श्लोक 88 (13.161.88)

रक्तं शिरसि धार्यं तु तथा वानेयमित्यपि । काञ्चनीयाऽपि माला या न सा दुष्यति कर्हिचित् ॥

raktaṃ śirasi dhāryaṃ tu tathā vāneyamityapi | kāñcanīyā'pi mālā yā na sā duṣyati karhicit

लाल माला सिर पर धारण की जा सकती है, और वन के फूलों की भी; तथा सोने की जो माला है, वह कभी दोष नहीं बनती।

श्लोक 89 (13.161.89)

स्नातस्य वर्णकं नित्यमार्द्रं दद्याद्विशांपते ॥

snātasya varṇakaṃ nityamārdraṃ dadyādviśāṃpate

हे राजन्, स्नान के बाद सदा ताज़ा, गीला अंगराग लगाना चाहिए।

श्लोक 90 (13.161.90)

विपर्ययं न कुर्वीत वाससो बुद्धिमान्नरः । तथा नान्यधृतं धार्यं न चातिविकृतं तथा ॥

viparyayaṃ na kurvīta vāsaso buddhimānnaraḥ | tathā nānyadhṛtaṃ dhāryaṃ na cātivikṛtaṃ tathā

बुद्धिमान मनुष्य वस्त्र को उलटा न पहने; न दूसरे का पहना हुआ वस्त्र पहने और न अत्यन्त विकृत (बिगड़ा हुआ) वस्त्र।

श्लोक 91 (13.161.91)

अन्यदेव भवेद्वासः शयनीये नरोत्तम । अन्यद्रथ्यासु देवानामर्चायामन्यदेव हि ॥

anyadeva bhavedvāsaḥ śayanīye narottama | anyadrathyāsu devānāmarcāyāmanyadeva hi

हे नरश्रेष्ठ, शयन के लिए एक वस्त्र अलग रहे, मार्गों पर चलने के लिए दूसरा, और देवताओं की पूजा के लिए फिर एक और।

श्लोक 92 (13.161.92)

प्रियङ्गुचन्दनाभ्यां च बिल्वेन स्थगरेण च । पृथगेवानुलिम्पेत केसरेण च बुद्धिमान् ॥

priyaṅgucandanābhyāṃ ca bilvena sthagareṇa ca | pṛthagevānulimpeta kesareṇa ca buddhimān

बुद्धिमान मनुष्य प्रियंगु और चन्दन, बिल्व और स्थगर (तगर), तथा केसर का लेप अलग-अलग लगाए।

श्लोक 93 (13.161.93)

उपवासं च कुर्वीत स्नातः शुचिरलङ्कृतः । नोपवासं वृथा कुर्याद्धनं नापहरेदिह ॥

upavāsaṃ ca kurvīta snātaḥ śuciralaṅkṛtaḥ | nopavāsaṃ vṛthā kuryāddhanaṃ nāpaharediha

स्नान करके, पवित्र और अलंकृत होकर उपवास करे। व्यर्थ उपवास न करे, और उसमें धन का अपव्यय भी न करे।

श्लोक 94 (13.161.94)

पर्वकालेषु सर्वेषु ब्रह्मचारी सदा भवेत् । समानमेकपात्रे तु भुञ्जेन्नान्नं जनेश्वर ॥

parvakāleṣu sarveṣu brahmacārī sadā bhavet | samānamekapātre tu bhuñjennānnaṃ janeśvara

सब पर्वों के समय मनुष्य सदा ब्रह्मचारी रहे। और हे राजन्, एक ही पात्र में साथ मिलकर अन्न न खाए।

श्लोक 95 (13.161.95)

नावलीढमवज्ञातमाघ्रातं भक्षयेदपि । तथा नोद्धृतसाराणि प्रेक्षतामप्रदाय च ॥

nāvalīḍhamavajñātamāghrātaṃ bhakṣayedapi | tathā noddhṛtasārāṇi prekṣatāmapradāya ca

जिसे चाटा गया हो, जिसका तिरस्कार किया गया हो, या जिसे सूँघ लिया गया हो, उसे न खाए; न वे भोजन खाए जिनका सार निकाल लिया गया हो, और देखनेवालों को दिए बिना भी न खाए।

श्लोक 96 (13.161.96)

नासंनिविष्टो मेधावी नाशुचिर्न च सत्सु च । प्रतिषिद्धान्नं धर्मेषु भक्ष्यान्भुञ्जीत पृष्ठतः ॥

nāsaṃniviṣṭo medhāvī nāśucirna ca satsu ca | pratiṣiddhānnaṃ dharmeṣu bhakṣyānbhuñjīta pṛṣṭhataḥ

समझदार मनुष्य ठीक से बैठे बिना भोजन न करे, न अपवित्र अवस्था में, और न सज्जनों के सामने। निषिद्ध अन्न न खाए; शास्त्र-विधि में जो भक्ष्य हैं, वही खाए, और वह भी बाद में।

श्लोक 97 (13.161.97)

पिप्पलं च वटं चैव शणशाकं तथैव च । उदुम्बरं न खादेच्च भवार्थी पुरुषो नृप ॥

pippalaṃ ca vaṭaṃ caiva śaṇaśākaṃ tathaiva ca | udumbaraṃ na khādecca bhavārthī puruṣo nṛpa

हे राजन्, कल्याण चाहनेवाला पुरुष पीपल, वट, सन का साग और गूलर न खाए।

श्लोक 98 (13.161.98)

आजं गव्यं च यन्मांसं मायूरं चैव वर्जयेत् । वर्जयेच्छुष्कमांसं च तथा पर्युषितं च यत् ॥

ājaṃ gavyaṃ ca yanmāṃsaṃ māyūraṃ caiva varjayet | varjayecchuṣkamāṃsaṃ ca tathā paryuṣitaṃ ca yat

बकरे और गाय का मांस तथा मोर का मांस वर्जित करे; सूखा मांस और जो बासी हो, वह भी वर्जित करे।

श्लोक 99 (13.161.99)

न पाणौ लवणं विद्वान्प्राश्नीयान्न च रात्रिषु । दधिसक्तून्न दोषायां पिबेन्मधु च नित्यशः ॥

na pāṇau lavaṇaṃ vidvānprāśnīyānna ca rātriṣu | dadhisaktūnna doṣāyāṃ pibenmadhu ca nityaśaḥ

विद्वान हथेली पर रखकर नमक न खाए, और रात में भोजन न करे; रात्रि में दही और सत्तू न ले, पर शहद सदा पी सकता है।

श्लोक 100 (13.161.100)

सायं प्रातश्च भुञ्जीत नान्तराले समाहितः । वालेन तु न भुञ्जीत परश्राद्धं तथैव च ॥

sāyaṃ prātaśca bhuñjīta nāntarāle samāhitaḥ | vālena tu na bhuñjīta paraśrāddhaṃ tathaiva ca

सावधान रहकर वह सायंकाल और प्रातःकाल भोजन करे, बीच में नहीं; बाल पड़ा हुआ अन्न न खाए, और शत्रु के श्राद्ध में भी भोजन न करे।

श्लोक 101 (13.161.101)

वाग्यतो नैकवस्त्रश्च नासंविष्टः कदाचन । भूमौ सदैव नाश्नीयान्नाशौचं न च शब्दवत् ॥

vāgyato naikavastraśca nāsaṃviṣṭaḥ kadācana | bhūmau sadaiva nāśnīyānnāśaucaṃ na ca śabdavat

मौन रहकर, एक ही वस्त्र में नहीं, कभी बिना बैठे नहीं; भूमि पर कभी नहीं, अपवित्र अवस्था में नहीं, और शब्द करते हुए भी नहीं खाए।

श्लोक 102 (13.161.102)

तोयपूर्वं प्रदायान्नमतिथिभ्यो विशाम्पते । पश्चाद्भुञ्जीत मेधावी न चाप्यन्यमना नरः ॥

toyapūrvaṃ pradāyānnamatithibhyo viśāmpate | paścādbhuñjīta medhāvī na cāpyanyamanā naraḥ

हे राजन्, पहले जलसहित अन्न अतिथियों को देकर बुद्धिमान पुरुष बाद में भोजन करे; और उस समय उसका मन कहीं और न लगा हो।

श्लोक 103 (13.161.103)

समानमेकपङ्क्त्यां तु भोज्यमन्नं नरेश्वर । विषं हालाहलं भुङ्क्ते योऽप्रदाय सुहृज्जने ॥

samānamekapaṅktyāṃ tu bhojyamannaṃ nareśvara | viṣaṃ hālāhalaṃ bhuṅkte yo'pradāya suhṛjjane

हे नरेश्वर, भोजन एक ही पंक्ति में सबके साथ करना चाहिए; जो अपने मित्रों को दिए बिना खाता है, वह हालाहल विष खाता है।

श्लोक 104 (13.161.104)

पानीयं पायसं सक्तून्दधि सर्पिर्मधून्यपि । निरस्य शेषमन्येषां न प्रदेयं तु कस्यचित् ॥

pānīyaṃ pāyasaṃ saktūndadhi sarpirmadhūnyapi | nirasya śeṣamanyeṣāṃ na pradeyaṃ tu kasyacit

जल, खीर, सत्तू, दही, घी और शहद को छोड़कर, अन्य भोज्य पदार्थों का बचा हुआ भाग किसी को नहीं देना चाहिए।

श्लोक 105 (13.161.105)

भुञ्जानो मनुजव्याघ्र नैव शङ्कां समाचरेत् । दधि चाप्यनु पानं वै न कर्तव्यं भवार्थिना ॥

bhuñjāno manujavyāghra naiva śaṅkāṃ samācaret | dadhi cāpyanu pānaṃ vai na kartavyaṃ bhavārthinā

हे पुरुषव्याघ्र, भोजन करते समय वह कोई शंका न करे; और कल्याण चाहनेवाला भोजन के बाद दही का अनुपान न करे।

श्लोक 106 (13.161.106)

आचम्य चैकहस्तेन परिस्राव्य तथोदकम् । अङ्गुष्ठं चरणस्याथ दक्षिणस्यावसेचयेत् ॥

ācamya caikahastena parisrāvya tathodakam | aṅguṣṭhaṃ caraṇasyātha dakṣiṇasyāvasecayet

एक हाथ से आचमन करके और जल को बहने देकर वह दाहिने पैर के अँगूठे पर जल छिड़के।

श्लोक 107 (13.161.107)

पाणिं मूर्ध्नि समाधाय स्पृष्ट्वा चाग्निं समाहितः । ज्ञातिश्रैष्ठ्यमवाप्नोति प्रयोगकुशलो नरः ॥

pāṇiṃ mūrdhni samādhāya spṛṣṭvā cāgniṃ samāhitaḥ | jñātiśraiṣṭhyamavāpnoti prayogakuśalo naraḥ

हाथ को सिर पर रखकर और सावधान होकर अग्नि का स्पर्श करके, विधि में कुशल मनुष्य अपने जाति-बन्धुओं में श्रेष्ठता पाता है।

श्लोक 108 (13.161.108)

अद्भिः प्राणान्समालभ्य नाभिं पाणितले तथा । स्पृशंश्चैव प्रतिष्ठेत न चाप्यार्द्रेण पाणिना ॥

adbhiḥ prāṇānsamālabhya nābhiṃ pāṇitale tathā | spṛśaṃścaiva pratiṣṭheta na cāpyārdreṇa pāṇinā

जल से प्राणों (नासिका आदि) का और हथेली से नाभि का स्पर्श करके वह स्थिर रहे; पर गीले हाथ से यह कभी न करे।

श्लोक 109 (13.161.109)

अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थमुदाहृतम् । कनिष्ठिकायाः पश्चात्तु देवतीर्थमिहोच्यते ॥

aṅguṣṭhamūlasya tale brāhmaṃ tīrthamudāhṛtam | kaniṣṭhikāyāḥ paścāttu devatīrthamihocyate

अँगूठे की जड़ के नीचे ब्राह्म तीर्थ कहा गया है; और कनिष्ठिका के पीछे (मूल में) यहाँ देवतीर्थ कहा जाता है।

श्लोक 110 (13.161.110)

अङ्गुष्ठस्य च यन्मध्यं प्रदेशिन्याश्च भारत । तेन पित्र्याणि कुर्वीत स्पृष्ट्वाऽऽपो न्यायतः सदा ॥

aṅguṣṭhasya ca yanmadhyaṃ pradeśinyāśca bhārata | tena pitryāṇi kurvīta spṛṣṭvā''po nyāyataḥ sadā

हे भारत, अँगूठे और तर्जनी के बीच के भाग से जल का विधिपूर्वक स्पर्श करके वह सदा पितृकर्म करे।

श्लोक 111 (13.161.111)

परापवादं न ब्रूयान्नाप्रियं च कदाचन । न मन्युः कश्चिदुत्पाद्यः पुरुषेण भवार्थिना ॥

parāpavādaṃ na brūyānnāpriyaṃ ca kadācana | na manyuḥ kaścidutpādyaḥ puruṣeṇa bhavārthinā

वह कभी दूसरों की निन्दा न करे और न अप्रिय बात कहे; कल्याण चाहनेवाला पुरुष किसी में क्रोध उत्पन्न न करे।

श्लोक 112 (13.161.112)

पतितैस्तु कथां नेच्छेद्दर्शनं च विवर्जयेत् । संसर्गं च न गच्छेत तथाऽऽयुर्विन्दते महत् ॥

patitaistu kathāṃ neccheddarśanaṃ ca vivarjayet | saṃsargaṃ ca na gaccheta tathā''yurvindate mahat

पतित लोगों से वह बातचीत की इच्छा न करे, उनके दर्शन से भी बचे, और उनका संसर्ग न करे। ऐसा करने से मनुष्य दीर्घ आयु पाता है।

श्लोक 113 (13.161.113)

न दिवा मैथुनं गच्छेन्न कन्यां न च बन्धकीम् । न चास्नातां स्त्रियं गच्छेत्तथाऽऽयुर्विन्दते महत् ॥

na divā maithunaṃ gacchenna kanyāṃ na ca bandhakīm | na cāsnātāṃ striyaṃ gacchettathā''yurvindate mahat

दिन में स्त्री-संग न करे; न कन्या के पास जाए, न व्यभिचारिणी के पास, और न उस स्त्री के पास जिसने स्नान न किया हो। ऐसा करने से दीर्घ आयु पाता है।

श्लोक 114 (13.161.114)

स्वेस्वे तीर्थे समाचम्य कार्ये समुपकल्पिते । त्रिः पीत्वाऽऽपो द्विः प्रमृज्य कृतशौचो भवेन्नरः ॥

svesve tīrthe samācamya kārye samupakalpite | triḥ pītvā''po dviḥ pramṛjya kṛtaśauco bhavennaraḥ

कार्य उपस्थित होने पर अपने-अपने तीर्थ से आचमन करके, तीन बार जल पीकर और दो बार मार्जन करके मनुष्य शुद्ध हो जाए।

श्लोक 115 (13.161.115)

इन्द्रियाणि सकृत्स्पृश्य त्रिरभ्युक्ष्य च मानवः । कुर्वीत पित्र्यं दैवं च वेददृष्टेन कर्मणा ॥

indriyāṇi sakṛtspṛśya trirabhyukṣya ca mānavaḥ | kurvīta pitryaṃ daivaṃ ca vedadṛṣṭena karmaṇā

इन्द्रियों को एक बार छूकर और तीन बार जल से सींचकर मनुष्य वेद में बताई विधि से पितृकर्म और देवकर्म करे।

श्लोक 116 (13.161.116)

ब्राह्मणार्थे च यच्छौचं तच्च मे शृणु कौरव । प्रवृत्तं चाहितं चोक्त्वा बहुभोजनवत्तदा ॥

brāhmaṇārthe ca yacchaucaṃ tacca me śṛṇu kaurava | pravṛttaṃ cāhitaṃ coktvā bahubhojanavattadā

हे कुरुवंशी, ब्राह्मण के विषय में जो शौच है, वह भी मुझसे सुनो: जो प्रचलित है और जो अहितकर है, उसे कहकर, फिर बहुत भोजन करनेवाले की भाँति।

श्लोक 117 (13.161.117)

सर्वशौचेषु ब्राह्मेण तीर्थेन समुपस्पृशेत् । निष्ठीव्य तु तथा क्षुत्वा स्पृश्यापो हि शुचिर्भवेत् ॥

sarvaśauceṣu brāhmeṇa tīrthena samupaspṛśet | niṣṭhīvya tu tathā kṣutvā spṛśyāpo hi śucirbhavet

सब शुद्धि-कर्मों में वह ब्राह्म तीर्थ से जल का स्पर्श करे; थूकने और छींकने के बाद भी जल का स्पर्श करके मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 118 (13.161.118)

निष्ठिवने मैथुने च क्षुते कक्ष्याविमोचने । उदक्या दर्शने तद्वन्नग्नस्याचमनं स्मृतम् । स्पृशेत्कर्णं सप्रणवं सूर्यमीक्षेत्सदा तदा ॥

niṣṭhivane maithune ca kṣute kakṣyāvimocane | udakyā darśane tadvannagnasyācamanaṃ smṛtam | spṛśetkarṇaṃ sapraṇavaṃ sūryamīkṣetsadā tadā

थूकने पर, मैथुन करने पर, छींकने पर, कटिबन्ध खोलने पर, रजस्वला स्त्री को देखने पर, और वैसे ही नग्न को देखने पर आचमन करना बताया गया है। प्रणव (ॐ) के साथ कान को छुए और तब सदा सूर्य को देखे।

श्लोक 119 (13.161.119)

वृद्धो ज्ञातिस्तथा मित्रमनाथा च स्वसा गुरुः । कुलीनः पण्डित इति रक्ष्या निःस्वः स्वशक्तितः । गृहे वासयितव्यास्ते धन्यमायुष्यमेव च ॥

vṛddho jñātistathā mitramanāthā ca svasā guruḥ | kulīnaḥ paṇḍita iti rakṣyā niḥsvaḥ svaśaktitaḥ | gṛhe vāsayitavyāste dhanyamāyuṣyameva ca

वृद्ध, जाति-भाई, मित्र, अनाथ बहन, गुरु, कुलीन, पण्डित और निर्धन की अपनी शक्ति के अनुसार रक्षा करनी चाहिए। इन्हें अपने घर में बसाना चाहिए; यह सौभाग्य और आयु देनेवाला है।

श्लोक 120 (13.161.120)

गृहे पारावता धार्याः शुकाश्च सहशारिकाः । देवताप्रतिमाऽऽदर्शश्चन्दनाः पुष्पवल्लिकाः ॥

gṛhe pārāvatā dhāryāḥ śukāśca sahaśārikāḥ | devatāpratimā''darśaścandanāḥ puṣpavallikāḥ

घर में कबूतर पाले जाएँ, तोते और मैना भी; देवताओं की प्रतिमाएँ, दर्पण, चन्दन और फूलों की लताएँ भी रखी जाएँ,

श्लोक 121 (13.161.121)

शुद्धं जलं सुवर्णं च रजतं गृहमङ्गलम् । गृहेष्वेते न पापाय यथा वै तैलपायिकाः ॥

śuddhaṃ jalaṃ suvarṇaṃ ca rajataṃ gṛhamaṅgalam | gṛheṣvete na pāpāya yathā vai tailapāyikāḥ

स्वच्छ जल, सोना और चाँदी, जो घर के लिए मंगलकारी हैं। घरों में ये अनिष्ट के लिए नहीं होते, जैसे तेल पीनेवाले जीव (तैलपायिक) नहीं होते।

श्लोक 122 (13.161.122)

उद्दीपकाश्च गृध्राश्च कपोता भ्रमरास्तथा । निविशेयुर्यदा तत्र शान्तिमेव तदाऽऽचरेत् ॥

uddīpakāśca gṛdhrāśca kapotā bhramarāstathā | niviśeyuryadā tatra śāntimeva tadā''caret

यदि घर में उद्दीपक, गिद्ध, कबूतर या भौंरे आकर बस जाएँ, तो तब शान्ति-कर्म ही करे।

श्लोक 123 (13.161.123)

अमङ्गल्यः सतां शापस्तथाऽऽक्रोशो महात्मनाम् । महात्मनोतिगुह्यानि न वक्तव्यानि कर्हिचित् ॥

amaṅgalyaḥ satāṃ śāpastathā''krośo mahātmanām | mahātmanotiguhyāni na vaktavyāni karhicit

सज्जनों का शाप और महात्माओं की भर्त्सना अमंगलकारी है; और महात्माओं की अत्यन्त गोपनीय बातें कभी नहीं कहनी चाहिए।

श्लोक 124 (13.161.124)

अगम्याश्च न गच्छेत राज्ञः पत्नीं सखीस्तथा । वैद्यानां बालवृद्धानां भृत्यानां च युधिष्ठिर ॥

agamyāśca na gaccheta rājñaḥ patnīṃ sakhīstathā | vaidyānāṃ bālavṛddhānāṃ bhṛtyānāṃ ca yudhiṣṭhira

वह अगम्या स्त्रियों के पास न जाए: राजा की पत्नी, मित्रों की पत्नियाँ, तथा वैद्यों, बालकों, वृद्धों और सेवकों की पत्नियाँ, हे युधिष्ठिर,

श्लोक 125 (13.161.125)

बन्धूनां ब्राह्मणानां च तथा शारणिकस्य च । सम्बन्धिनां च राजेन्द्र तथाऽऽयुर्विन्दते महत् ॥

bandhūnāṃ brāhmaṇānāṃ ca tathā śāraṇikasya ca | sambandhināṃ ca rājendra tathā''yurvindate mahat

तथा बन्धुओं, ब्राह्मणों, शरण में आए हुए व्यक्ति और सम्बन्धियों की पत्नियों के पास भी, हे राजेन्द्र। ऐसा करने से वह दीर्घ आयु पाता है।

श्लोक 126 (13.161.126)

ब्राह्मणस्थपतिभ्यां च निर्मितं यन्निवेशनम् । तदा वसेत्सदा प्राज्ञो भवार्थी मनुजेश्वर ॥

brāhmaṇasthapatibhyāṃ ca nirmitaṃ yanniveśanam | tadā vasetsadā prājño bhavārthī manujeśvara

हे मनुजेश्वर, कल्याण चाहनेवाला बुद्धिमान पुरुष सदा उसी घर में रहे जिसे किसी ब्राह्मण और स्थपति (शिल्पी) ने बनाया हो।

श्लोक 127 (13.161.127)

सन्ध्यायां न स्वपेद्राजन्विद्यां न च समाचरेत् । न भुञ्जीत च मेधावी तथाऽऽयुर्विन्दते महत् ॥

sandhyāyāṃ na svapedrājanvidyāṃ na ca samācaret | na bhuñjīta ca medhāvī tathā''yurvindate mahat

हे राजन्, बुद्धिमान पुरुष सन्ध्या के समय न सोए, न विद्याभ्यास करे, न भोजन करे। ऐसा करने से वह दीर्घ आयु पाता है।

श्लोक 128 (13.161.128)

नक्तं न कुर्यात्पित्र्याणि नक्तं चैव प्रसाधनम् । पानीयस्य क्रिया नक्तं न कार्या भूतिमिच्छता ॥

naktaṃ na kuryātpitryāṇi naktaṃ caiva prasādhanam | pānīyasya kriyā naktaṃ na kāryā bhūtimicchatā

रात में पितृकर्म न करे, रात में श्रृंगार भी न करे; और कल्याण चाहनेवाला रात में जल-क्रिया (स्नान) न करे।

श्लोक 129 (13.161.129)

वर्जनीयाश्चैव नित्यं सक्तवो निशि भारत । शेषाणि चावदातानि पानीयं चापि भोजने ॥

varjanīyāścaiva nityaṃ saktavo niśi bhārata | śeṣāṇi cāvadātāni pānīyaṃ cāpi bhojane

हे भारत, रात में सत्तू सदा वर्जित है; और अन्य श्वेत वस्तुएँ तथा भोजन के समय जल पीना भी।

श्लोक 130 (13.161.130)

सौहित्यं न च कर्तव्यं रात्रौ न च समाचरेत् । न भुक्त्वा मैथुनं गच्छेन्न धावेन्नातिहासकम् । द्विजच्छेदं न कुर्वीत भुक्त्वा न च समाचरेत् ॥

sauhityaṃ na ca kartavyaṃ rātrau na ca samācaret | na bhuktvā maithunaṃ gacchenna dhāvennātihāsakam | dvijacchedaṃ na kurvīta bhuktvā na ca samācaret

वह तृप्ति से अधिक न खाए, और रात में भी ऐसा न करे। भोजन के बाद मैथुन के लिए न जाए, न दौड़े, न अधिक हँसे; दाँतों को हानि न पहुँचाए, और भोजन के बाद कोई परिश्रम का काम भी न करे।

श्लोक 131 (13.161.131)

महाकुले प्रसूतां च प्रशस्तां लक्षणैस्तथा । वयसाऽवरां सुनक्षत्रां कन्यामावोढुमर्हति ॥

mahākule prasūtāṃ ca praśastāṃ lakṣaṇaistathā | vayasā'varāṃ sunakṣatrāṃ kanyāmāvoḍhumarhati

उसे ऐसी कन्या से विवाह करना उचित है जो उच्च कुल में जन्मी हो, शुभ लक्षणों से युक्त हो, आयु में उससे छोटी हो और शुभ नक्षत्र में उत्पन्न हुई हो।

श्लोक 132 (13.161.132)

अपत्यमुत्पाद्य ततः प्रतिष्ठाप्य कुलं तथा । पुत्राः प्रदेया जातेषु कुलधर्मेषु भारत ॥

apatyamutpādya tataḥ pratiṣṭhāpya kulaṃ tathā | putrāḥ pradeyā jāteṣu kuladharmeṣu bhārata

सन्तान उत्पन्न करके और इस प्रकार कुल को प्रतिष्ठित करके, हे भारत, उत्पन्न हुए पुत्रों को कुल-धर्मों में लगा देना चाहिए।

श्लोक 133 (13.161.133)

कन्या चोत्पाद्य दातव्या कुलपुत्राय धीमते । पुत्रा निवेश्याश्च कुलाद्भृत्या लभ्याश्च भारत ॥

kanyā cotpādya dātavyā kulaputrāya dhīmate | putrā niveśyāśca kulādbhṛtyā labhyāśca bhārata

कन्या उत्पन्न होने पर उसे किसी कुलीन, बुद्धिमान युवक को देना चाहिए; पुत्रों का विवाह अच्छे कुल की कन्याओं से कराना चाहिए, और सेवक प्राप्त करने चाहिए, हे भारत।

श्लोक 134 (13.161.134)

शिरःस्नातोथ कुर्वीत दैवं पित्र्यमथापि च ॥

śiraḥsnātotha kurvīta daivaṃ pitryamathāpi ca

सिर से स्नान करके वह फिर देवकर्म और पितृकर्म करे।

श्लोक 135 (13.161.135)

तैलं जन्मदिनेऽष्टम्यां चतुर्दश्यां च पर्वसु । नक्षत्रे न च कुर्वीत यस्मिञ्जातो भवेन्नरः । न प्रोष्ठपदयोः कार्यं तथाऽऽग्नेये च भारत ॥

tailaṃ janmadine'ṣṭamyāṃ caturdaśyāṃ ca parvasu | nakṣatre na ca kurvīta yasmiñjāto bhavennaraḥ | na proṣṭhapadayoḥ kāryaṃ tathā''gneye ca bhārata

जन्मदिन पर, अष्टमी, चतुर्दशी और पर्वों पर तेल लगाना, तथा जिस नक्षत्र में मनुष्य जन्मा हो उसमें भी, नहीं करना चाहिए; और हे भारत, प्रोष्ठपद नक्षत्रों में तथा आग्नेय (कृत्तिका) में भी नहीं।

श्लोक 136 (13.161.136)

दारुणेषु च सर्वेषु प्रत्यरिं च विवर्जयेत् । ज्योतिषे यानि चोक्तानि तानि सर्वाणि वर्जयेत् ॥

dāruṇeṣu ca sarveṣu pratyariṃ ca vivarjayet | jyotiṣe yāni coktāni tāni sarvāṇi varjayet

वह सब दारुण नक्षत्रों को और प्रत्यरि तारा को वर्जित करे; और ज्योतिष में जो कुछ भी निषिद्ध कहा गया है, उस सबको वर्जित करे।

श्लोक 137 (13.161.137)

प्राङ्मुखः श्मश्रुकर्माणि कारयेत्सुसमाहितः । उदङ्मुखो वा राजेन्द्र तथाऽऽयुर्विन्दते महत् ॥

prāṅmukhaḥ śmaśrukarmāṇi kārayetsusamāhitaḥ | udaṅmukho vā rājendra tathā''yurvindate mahat

पूर्ण सावधानी से वह पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके क्षौरकर्म कराए, हे राजेन्द्र। ऐसा करने से वह दीर्घ आयु पाता है।

श्लोक 138 (13.161.138)

सामुद्रेणाम्भसा स्नानं क्षौरं श्राद्धेषु भोजनम् । अन्तर्वत्नीपतिः कुर्वन्न पुत्रफलमश्नुते ॥

sāmudreṇāmbhasā snānaṃ kṣauraṃ śrāddheṣu bhojanam | antarvatnīpatiḥ kurvanna putraphalamaśnute

समुद्र के जल से स्नान, क्षौरकर्म और श्राद्ध में भोजन: ऐसा करनेवाला गर्भिणी का पति पुत्र का फल नहीं पाता।

श्लोक 139 (13.161.139)

सतां गुरूणां वृद्धानां कुलस्त्रीणां विशेषतः । परिवादं न च ब्रूयात्परेषामात्मनस्तथा । परिवादो ह्यधर्माय प्रोच्यते भरतर्षभ ॥

satāṃ gurūṇāṃ vṛddhānāṃ kulastrīṇāṃ viśeṣataḥ | parivādaṃ na ca brūyātpareṣāmātmanastathā | parivādo hyadharmāya procyate bharatarṣabha

सज्जनों, गुरुओं, वृद्धों और विशेषकर कुलस्त्रियों की निन्दा न करे, चाहे दूसरों की हो या अपनी; क्योंकि हे भरतश्रेष्ठ, परिवाद अधर्म का कारण कहा गया है।

श्लोक 140 (13.161.140)

वर्जयेद्व्यङ्गिनीं नारीं तथा कन्यां नरोत्तम । समार्षां व्यङ्गिकां चैव मातुः सकुलजां तथा ॥

varjayedvyaṅginīṃ nārīṃ tathā kanyāṃ narottama | samārṣāṃ vyaṅgikāṃ caiva mātuḥ sakulajāṃ tathā

हे नरोत्तम, अंगहीन स्त्री को और वैसी कन्या को भी वर्जित करे; एक ही आर्ष गोत्र-प्रवर की, अधिक अंगवाली, और माता के कुल में उत्पन्न स्त्री को भी।

श्लोक 141 (13.161.141)

वृद्धां प्रव्रजितां चैव तथैव च पतिव्रताम् । तथा निकृष्टवर्णां च वर्णोत्कृष्टां च वर्जयेत् ॥

vṛddhāṃ pravrajitāṃ caiva tathaiva ca pativratām | tathā nikṛṣṭavarṇāṃ ca varṇotkṛṣṭāṃ ca varjayet

वृद्धा, प्रव्रजिता (संन्यासिनी), पतिव्रता, निम्न वर्ण की और उच्च वर्ण की स्त्री को भी वर्जित करे।

श्लोक 142 (13.161.142)

अयोनिं च वियोनिं च न गच्छेत विचक्षणः । पिङ्गलां कुष्ठिनीं नारीं न त्वमुद्वोढुमर्हसि ॥

ayoniṃ ca viyoniṃ ca na gaccheta vicakṣaṇaḥ | piṅgalāṃ kuṣṭhinīṃ nārīṃ na tvamudvoḍhumarhasi

विवेकी पुरुष अज्ञात कुल की या हीन कुल की स्त्री के पास न जाए; और तुम्हें पिंगल वर्ण की तथा कुष्ठ रोगवाली स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 143 (13.161.143)

अपस्मारिकुले जातां निहीनां चापि वर्जयेत् । श्वित्रिणां च कुले जातां क्षयिणां मनुजेश्वर ॥

apasmārikule jātāṃ nihīnāṃ cāpi varjayet | śvitriṇāṃ ca kule jātāṃ kṣayiṇāṃ manujeśvara

मिर्गी के रोग से ग्रस्त कुल में उत्पन्न, अत्यन्त हीन, श्वित्र (सफेद दाग) वाले या क्षय-रोगियों के कुल में उत्पन्न कन्या को वर्जित करे, हे मनुजेश्वर।

श्लोक 144 (13.161.144)

सुरोमशामतिस्थूलां कन्यां मातृपितृस्थिताम् । अलज्जां भ्रातृजां दुष्टां वर्जयेद्रक्तकेशिनीम् ॥

suromaśāmatisthūlāṃ kanyāṃ mātṛpitṛsthitām | alajjāṃ bhrātṛjāṃ duṣṭāṃ varjayedraktakeśinīm

अत्यन्त रोमवाली, अत्यन्त स्थूल, माता-पिता के पास रहनेवाली कन्या, निर्लज्ज, भाई की पुत्री, दुष्ट और लाल केशोंवाली स्त्री को वर्जित करे।

श्लोक 145 (13.161.145)

लक्षणैरन्विता या च प्रशस्ता या च लक्षणैः । मनोज्ञां दर्शनीयां च तां भवान्वोढुमर्हति ॥

lakṣaṇairanvitā yā ca praśastā yā ca lakṣaṇaiḥ | manojñāṃ darśanīyāṃ ca tāṃ bhavānvoḍhumarhati

जो शुभ लक्षणों से युक्त हो और लक्षणों के कारण प्रशंसित हो, मनोहर और देखने योग्य हो, उससे तुम विवाह कर सकते हो।

श्लोक 146 (13.161.146)

महाकुले निवेष्टव्यं सदृशे वा युधिष्ठिर । अवरा पतिता चैव न ग्राह्या भूतिमिच्छता ॥

mahākule niveṣṭavyaṃ sadṛśe vā yudhiṣṭhira | avarā patitā caiva na grāhyā bhūtimicchatā

हे युधिष्ठिर, महान कुल में या अपने समान कुल में विवाह करना चाहिए; कल्याण चाहनेवाला हीन या पतित स्त्री को न ग्रहण करे।

श्लोक 147 (13.161.147)

अग्नीनुत्पाद्य यत्नेन क्रियाः सुविहिताश्च याः । वेदे च ब्राह्मणैः प्रोक्तास्ताश्च सर्वाः समाचरेत् ॥

agnīnutpādya yatnena kriyāḥ suvihitāśca yāḥ | vede ca brāhmaṇaiḥ proktāstāśca sarvāḥ samācaret

यत्नपूर्वक अग्नियों को प्रज्वलित करके, वेद में ब्राह्मणों ने जिन सुविहित कर्मों का उपदेश किया है, उन सबका आचरण करे।

श्लोक 148 (13.161.148)

न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या रक्ष्या दाराश्च सर्वशः । अनायुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्यां विवर्जयेत् ॥

na cerṣyā strīṣu kartavyā rakṣyā dārāśca sarvaśaḥ | anāyuṣyā bhavedīrṣyā tasmādīrṣyāṃ vivarjayet

स्त्रियों के प्रति ईर्ष्या न करे; पत्नियों की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए। ईर्ष्या आयु घटाती है, इसलिए ईर्ष्या त्याग दे।

श्लोक 149 (13.161.149)

अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाऽभ्युदितशायिता । प्रातर्निशायां च तथा ये चोच्छिष्टा भवन्ति च ॥

anāyuṣyaṃ divā svapnaṃ tathā'bhyuditaśāyitā | prātarniśāyāṃ ca tathā ye cocchiṣṭā bhavanti ca

दिन में सोना, सूर्योदय के बाद भी सोते रहना, प्रातःकाल तथा रात्रि में सोना, और जूठे बने रहना: ये आयु घटानेवाले हैं।

श्लोक 150 (13.161.150)

पारदार्यमनायुष्यं नापितोच्छिष्टता तथा । यत्नतो वै न कर्तव्यमत्याशश्चैव भारत ॥

pāradāryamanāyuṣyaṃ nāpitocchiṣṭatā tathā | yatnato vai na kartavyamatyāśaścaiva bhārata

परस्त्रीगमन आयु घटाता है, और क्षौर के बाद बिना स्नान किए रहना भी; इन्हें यत्नपूर्वक नहीं करना चाहिए, और अधिक भोजन भी नहीं, हे भारत।

श्लोक 151 (13.161.151)

सन्ध्यां न भुञ्ज्यान्न स्नायेन्न पुरीषं समुत्सृजेत् । प्रयतश्च भवेत्तस्यां न च किञ्चित्समाचरेत् ॥

sandhyāṃ na bhuñjyānna snāyenna purīṣaṃ samutsṛjet | prayataśca bhavettasyāṃ na ca kiñcitsamācaret

सन्ध्या के समय वह न भोजन करे, न स्नान करे, न मल-त्याग करे; उस समय संयमित रहे और कोई और काम न करे।

श्लोक 152 (13.161.152)

ब्राह्मणान्पूजयेच्चापि तथा स्नात्वा नराधिप । देवांश्च प्रणमेत्स्नातो गुरूंश्चाप्यभिवादयेत् ॥

brāhmaṇānpūjayeccāpi tathā snātvā narādhipa | devāṃśca praṇametsnāto gurūṃścāpyabhivādayet

और हे राजन्, स्नान के बाद वह ब्राह्मणों का सम्मान करे, देवताओं को प्रणाम करे और गुरुजनों का अभिवादन करे।

श्लोक 153 (13.161.153)

अनिमन्त्रितो न गच्छेत यज्ञं गच्छेत दर्शकः । अनर्चिते ह्यनायुष्यं गमनं तत्र भारत ॥

animantrito na gaccheta yajñaṃ gaccheta darśakaḥ | anarcite hyanāyuṣyaṃ gamanaṃ tatra bhārata

बिना निमन्त्रण के यज्ञ में न जाए; दर्शक के रूप में जा सकता है। क्योंकि जहाँ सम्मान न हो वहाँ जाना आयु घटाता है, हे भारत।

श्लोक 154 (13.161.154)

न चैकेन परिव्रज्यं न गन्तव्यं तथा निशि । नानापदि परस्यान्नमनिमन्त्रितमाहरेत् ॥

na caikena parivrajyaṃ na gantavyaṃ tathā niśi | nānāpadi parasyānnamanimantritamāharet

वह अकेले परदेश की यात्रा न करे, न रात में कहीं जाए; और आपत्ति के बिना बिना निमन्त्रण के दूसरे का अन्न न ले।

श्लोक 155 (13.161.155)

एकोद्दिष्टं न भुञ्जीत प्रथमं तु विशेषतः । सपिण्डीकरणं वर्ज्यं सविधानं च मासिकम् ॥

ekoddiṣṭaṃ na bhuñjīta prathamaṃ tu viśeṣataḥ | sapiṇḍīkaraṇaṃ varjyaṃ savidhānaṃ ca māsikam

एकोद्दिष्ट श्राद्ध में, विशेषकर प्रथम में, भोजन न करे; सपिण्डीकरण भी वर्जित है, और विधानसहित मासिक श्राद्ध भी।

श्लोक 156 (13.161.156)

अनागतायां सन्ध्यायां पश्चिमायां गृहे वसेत् ॥

anāgatāyāṃ sandhyāyāṃ paścimāyāṃ gṛhe vaset

पश्चिम की सन्ध्या के आने से पहले वह घर में रहे।

श्लोक 157 (13.161.157)

मातुः पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम् । हितं चाप्यहितं चापि न विचार्यं नरर्षभ ॥

mātuḥ piturgurūṇāṃ ca kāryamevānuśāsanam | hitaṃ cāpyahitaṃ cāpi na vicāryaṃ nararṣabha

माता, पिता और गुरुजनों की आज्ञा का पालन करना ही चाहिए; वह हितकर हो या अहितकर, उस पर विचार नहीं करना चाहिए, हे नरश्रेष्ठ।

श्लोक 158 (13.161.158)

क्षत्रियस्तु विशेषेण धनुर्वेदं समभ्यसेत् । धनुर्वेदे च वेदे च यत्नः कार्यो नराधिप ॥

kṣatriyastu viśeṣeṇa dhanurvedaṃ samabhyaset | dhanurvede ca vede ca yatnaḥ kāryo narādhipa

क्षत्रिय विशेष रूप से धनुर्वेद का अभ्यास करे; हे नराधिप, धनुर्वेद और वेद दोनों में यत्न करना चाहिए।

श्लोक 159 (13.161.159)

हस्तिपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह । यत्नवान्भव राजेन्द्र यत्नवान्सुखमेधते ॥

hastipṛṣṭhe'śvapṛṣṭhe ca rathacaryāsu caiva ha | yatnavānbhava rājendra yatnavānsukhamedhate

हाथी की पीठ पर, घोड़े की पीठ पर और रथ-चालन में भी, हे राजेन्द्र, यत्नशील रहो; यत्नशील मनुष्य सुखपूर्वक उन्नति करता है।

श्लोक 160 (13.161.160)

अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च । प्रजापालनयुक्तश्च नारतिं लभते क्वचित् ॥

apradhṛṣyaśca śatrūṇāṃ bhṛtyānāṃ svajanasya ca | prajāpālanayuktaśca nāratiṃ labhate kvacit

वह शत्रुओं, सेवकों और अपने जनों से अजेय रहता है, और प्रजा के पालन में लगा हुआ वह कभी अप्रसन्नता नहीं पाता।

श्लोक 161 (13.161.161)

युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत । गान्धर्वशास्त्रं च कलाः परिज्ञेया नराधिप ॥

yuktiśāstraṃ ca te jñeyaṃ śabdaśāstraṃ ca bhārata | gāndharvaśāstraṃ ca kalāḥ parijñeyā narādhipa

हे भारत, हे नराधिप, तुम्हें युक्तिशास्त्र, शब्दशास्त्र, गान्धर्वशास्त्र (संगीत) और कलाओं का ज्ञान होना चाहिए।

श्लोक 162 (13.161.162)

पुराणमितिहासाश्च तथाऽऽख्यानानि यानि च । महात्मनां च चरितं श्रोतव्यं नित्यमेव ते ॥

purāṇamitihāsāśca tathā''khyānāni yāni ca | mahātmanāṃ ca caritaṃ śrotavyaṃ nityameva te

पुराण, इतिहास, सब प्रकार के आख्यान और महात्माओं के चरित तुम्हें सदा सुनने चाहिए।

श्लोक 163 (13.161.163)

मान्यानां माननं कुर्यान्निन्द्यानां निन्दनं तथा । गोब्राह्मणार्थे युध्येत प्राणानपि परित्यजेत् ॥

mānyānāṃ mānanaṃ kuryānnindyānāṃ nindanaṃ tathā | gobrāhmaṇārthe yudhyeta prāṇānapi parityajet

जो मान के योग्य हैं उनका सम्मान करे और जो निन्दा के योग्य हैं उनकी निन्दा करे; गौ और ब्राह्मण के लिए युद्ध करे, प्राण तक त्याग दे।

श्लोक 164 (13.161.164)

न स्त्रीषु सज्जेद्द्रष्टव्यं शक्त्या दानरुचिर्भवेत् । न ब्राह्मणान्परिभवेत्कार्पण्यं ब्राह्मणैर्वृतम् । पतितान्नाभिभाषेत नाह्वयेत रजस्वलाम् ॥

na strīṣu sajjeddraṣṭavyaṃ śaktyā dānarucirbhavet | na brāhmaṇānparibhavetkārpaṇyaṃ brāhmaṇairvṛtam | patitānnābhibhāṣeta nāhvayeta rajasvalām

वह स्त्रियों में और केवल देखने की वस्तुओं में आसक्त न हो; शक्ति के अनुसार दान में रुचि रखे। ब्राह्मणों का अनादर न करे, चाहे उन्होंने दीनता अपना रखी हो। पतितों से बात न करे, और रजस्वला स्त्री को न बुलाए।

श्लोक 165 (13.161.165)

पत्नीं रजस्वलां चैव नाभिगच्छेन्न चाह्वयेत् । स्नातां चतुर्थे दिवसे रात्रौ गच्छेद्विचक्षणः ॥

patnīṃ rajasvalāṃ caiva nābhigacchenna cāhvayet | snātāṃ caturthe divase rātrau gacchedvicakṣaṇaḥ

रजस्वला पत्नी के पास न जाए और न उसे बुलाए; चौथे दिन जब वह स्नान कर ले, तब विवेकी पुरुष रात में उसके पास जाए।

श्लोक 166 (13.161.166)

पञ्चमे दिवसे नारी षष्ठेऽहनि पुमान्भवेत् । आषोडशादृतुर्मुख्यः पुत्रजन्मनि शब्दितः ॥

pañcame divase nārī ṣaṣṭhe'hani pumānbhavet | āṣoḍaśādṛturmukhyaḥ putrajanmani śabditaḥ

पाँचवें दिन (गर्भाधान से) कन्या होती है, छठे दिन पुत्र। सोलहवीं रात्रि तक का ऋतुकाल पुत्र-जन्म के लिए मुख्य कहा गया है।

श्लोक 167 (13.161.167)

एतेन विधिना पत्नीमुपगच्छेत पण्डितः । ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणि पूजनीयानि सर्वशः ॥

etena vidhinā patnīmupagaccheta paṇḍitaḥ | jñātisambandhimitrāṇi pūjanīyāni sarvaśaḥ

इसी विधि से विद्वान पुरुष अपनी पत्नी के पास जाए। जाति-बन्धुओं, सम्बन्धियों और मित्रों का सब प्रकार से सम्मान करना चाहिए।

श्लोक 168 (13.161.168)

यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणैः । अत ऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप ॥

yaṣṭavyaṃ ca yathāśakti yajñairvividhadakṣiṇaiḥ | ata ūrdhvamaraṇyaṃ ca sevitavyaṃ narādhipa

अपनी शक्ति के अनुसार विविध दक्षिणाओंवाले यज्ञों से यजन करे; और इसके बाद, हे नराधिप, वन का आश्रय ले।

श्लोक 169 (13.161.169)

एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तितः । शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ॥

eṣa te lakṣaṇoddeśa āyuṣyāṇāṃ prakīrtitaḥ | śeṣastraividyavṛddhebhyaḥ pratyāhāryo yudhiṣṭhira

यह आयु बढ़ानेवाले आचारों के लक्षणों का संक्षेप मैंने तुम्हें बताया; शेष, हे युधिष्ठिर, तीनों वेदों में निष्णात वृद्धजनों से जान लेना चाहिए।

श्लोक 170 (13.161.170)

एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तितः । शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ॥

eṣa te lakṣaṇoddeśa āyuṣyāṇāṃ prakīrtitaḥ | śeṣastraividyavṛddhebhyaḥ pratyāhāryo yudhiṣṭhira

यह आयु बढ़ानेवाले आचारों के लक्षणों का संक्षेप मैंने तुम्हें बताया; शेष, हे युधिष्ठिर, तीनों वेदों में निष्णात वृद्धजनों से जान लेना चाहिए।

श्लोक 171 (13.161.171)

आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः । आचाराद्वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

ācāro bhūtijanana ācāraḥ kīrtivardhanaḥ | ācārādvardhate hyāyurācāro hantyalakṣaṇam

आचार से समृद्धि उत्पन्न होती है, आचार कीर्ति बढ़ाता है; आचार से आयु बढ़ती है, और आचार अशुभ लक्षणों को नष्ट करता है।

श्लोक 172 (13.161.172)

आगमानां हि सर्वेषामाचारः श्रेष्ठ उच्यते । आचारप्रभवो धर्मो धर्मादायुर्विवर्धते ॥

āgamānāṃ hi sarveṣāmācāraḥ śreṣṭha ucyate | ācāraprabhavo dharmo dharmādāyurvivardhate

सब शास्त्रों और परम्पराओं में आचार को श्रेष्ठ कहा जाता है; आचार से धर्म उत्पन्न होता है और धर्म से आयु बढ़ती है।

श्लोक 173 (13.161.173)

एतद्यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् । अनुकम्प्य सर्ववर्णान्ब्रह्मणा समुदाहृतम् ॥

etadyaśasyamāyuṣyaṃ svargyaṃ svastyayanaṃ mahat | anukampya sarvavarṇānbrahmaṇā samudāhṛtam

यह यशदायक, आयुवर्धक, स्वर्ग की ओर ले जानेवाला और महान कल्याणकारी है; ब्रह्मा ने सब वर्णों पर दया करके इसे कहा था।

श्लोक 174 (13.161.174)

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । स शुभान्प्राप्नुयाल्लोकान्सदाचारपरो नृप ॥

ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ yaścāpi parikīrtayet | sa śubhānprāpnuyāllokānsadācāraparo nṛpa

जो इसे सदा सुनता है, या इसका कीर्तन करता है, वह सदाचार में तत्पर रहकर, हे राजन्, शुभ लोकों को प्राप्त करता है।

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