अनुशासन पर्व · अध्याय 166
सनत्कुमार द्वारा प्रलय और इन्द्रियों के देवताओं का वर्णन
सनत्कुमार रुद्र को अपना उपदेश जारी रखते हैं और चेताते हैं कि यह रहस्य अपरीक्षित, श्रद्धाहीन और अभिमानी को नहीं दिया जाना चाहिए। वे बताते हैं कि ब्रह्मा के दिन के अन्त में तत्त्व उलटे क्रम से—पृथ्वी से लेकर अव्यक्त तक—कैसे लीन होते हैं, और फिर अङ्ग-अङ्ग के क्रम से अध्यात्म, अधिभूत तथा अधिदैवत का निरूपण करते हैं: प्राण, मन, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा आदि और उनके अधिष्ठाता देवता। अन्त में वे नारायण की उपासना, एकाक्षर ब्रह्म 'ओम्' तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं का वर्णन करते हैं।
सनत्कुमार उवाच
श्लोक 1 (13.166.1)
तत्वसङ्ख्या श्रुता चैषा येषां ब्रह्मविदांवर । सर्गसङ्ख्या मया प्रोक्ता नवानामानुपूर्व्यशः । प्रवक्ष्यामि तु तेऽध्यात्ममधिभूताधिदैवतम् ॥
tatvasaṅkhyā śrutā caiṣā yeṣāṃ brahmavidāṃvara | sargasaṅkhyā mayā proktā navānāmānupūrvyaśaḥ | pravakṣyāmi tu te'dhyātmamadhibhūtādhidaivatam
हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, तत्त्वों की यह गणना आपने सुन ली, और मैंने नौ सर्गों की गणना क्रम से कह दी। अब मैं आपको अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत का वर्णन सुनाऊँगा।
श्लोक 2 (13.166.2)
नैतद्युक्तैर्वेदविद्भिर्गृहस्थैः । मान्यैरेभिस्तपसा वाभिपन्नैः । यत्नेन दृष्टं परमात्मतत्वं । तत्वेन प्राप्यं तु यथोक्तमेतत् । परं परेभ्यस्त्वमृतार्थतत्वं । स्वभावसत्वस्थमनीशमीशम् ॥
naitadyuktairvedavidbhirgṛhasthaiḥ | mānyairebhistapasā vābhipannaiḥ | yatnena dṛṣṭaṃ paramātmatatvaṃ | tatvena prāpyaṃ tu yathoktametat | paraṃ parebhyastvamṛtārthatatvaṃ | svabhāvasatvasthamanīśamīśam
इसे वे गृहस्थ नहीं देख पाते जो संयमी, वेदज्ञ और सम्मानित हैं, और न वे जो तप के द्वारा इसके समीप आते हैं। परमात्मा का तत्त्व प्रयत्न से ही देखा जाता है, और जैसा कहा गया है, वह सत्य के द्वारा ही प्राप्त करने योग्य है—परों से भी पर, अमृत-स्वरूप अर्थ का तत्त्व, अपने स्वभाव और शुद्ध सत्त्व में स्थित वह ईश्वर, जिसका कोई ईश नहीं।
श्लोक 3 (13.166.3)
कैवल्यतां प्राप्य महासुरोत्तम । तवैतदाख्यामि मुनीन्द्रवृत्त्या । रहस्यमेवान्यदवाप्य दिव्यं । पवित्रपूतस्तव मृत्युजालम् ॥
kaivalyatāṃ prāpya mahāsurottama | tavaitadākhyāmi munīndravṛttyā | rahasyamevānyadavāpya divyaṃ | pavitrapūtastava mṛtyujālam
हे महासुरों में श्रेष्ठ, कैवल्य की अवस्था को पाकर मैं मुनीन्द्र की रीति से आपको यह बताता हूँ; और इस एक अन्य दिव्य रहस्य को पाकर, पवित्रता से शुद्ध होकर, आप मृत्यु के जाल से मुक्त हो जाएँगे।
श्लोक 4 (13.166.4)
पृथ्वीमिमां यद्यपि रत्नपूर्णां । दद्यान्न देयं त्वपरीक्षिताय । नाश्रद्दधानाय न चान्यबुद्धे । र्नाज्ञानयुक्ताय न विस्मिताय ॥
pṛthvīmimāṃ yadyapi ratnapūrṇāṃ | dadyānna deyaṃ tvaparīkṣitāya | nāśraddadhānāya na cānyabuddhe | rnājñānayuktāya na vismitāya
यदि कोई रत्नों से भरी यह सारी पृथ्वी भी दे सके, तब भी यह उपदेश अपरीक्षित को, श्रद्धाहीन को, चञ्चल बुद्धि वाले को, अज्ञानी को और अभिमानी को नहीं देना चाहिए।
श्लोक 5 (13.166.5)
स्वाध्याययुक्ताय गुणान्विताय । प्रदेयमेतन्नियतेन्द्रियाय ॥
svādhyāyayuktāya guṇānvitāya | pradeyametanniyatendriyāya
इसे उसी को देना चाहिए जो स्वाध्याय में लगा हो, गुणवान् हो और जिसकी इन्द्रियाँ संयत हों।
श्लोक 6 (13.166.6)
संक्षेपं चाप्यथैतेषां तत्वानां वृषभध्वज । अनुलोमानुजातानां प्रतिलोमं प्रलीयताम् ॥
saṃkṣepaṃ cāpyathaiteṣāṃ tatvānāṃ vṛṣabhadhvaja | anulomānujātānāṃ pratilomaṃ pralīyatām
हे वृषभध्वज, संक्षेप में, ये तत्त्व जो अनुलोम क्रम से उत्पन्न हुए हैं, वे प्रतिलोम क्रम से लीन हों।
श्लोक 7 (13.166.7)
प्रवक्ष्यामि तमध्यात्मं साधिभूताधिदैवतम् । यथांशुजालमर्कस्य तथैतत्प्रवदन्ति वै ॥
pravakṣyāmi tamadhyātmaṃ sādhibhūtādhidaivatam | yathāṃśujālamarkasya tathaitatpravadanti vai
मैं उस अध्यात्म को अधिभूत और अधिदैवत सहित कहूँगा। वे कहते हैं कि वह सूर्य की किरणों के जाल के समान है।
श्लोक 8 (13.166.8)
संक्षीणे ब्रह्मदिवसे जगज्जलधिमाविशेत् । प्रलीयते जले भूमिर्जलमग्नौ प्रलीयते ॥
saṃkṣīṇe brahmadivase jagajjaladhimāviśet | pralīyate jale bhūmirjalamagnau pralīyate
ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर जगत् समुद्र में प्रवेश करता है; पृथ्वी जल में लीन होती है और जल अग्नि में।
श्लोक 9 (13.166.9)
लीयतेऽग्निस्तथा वायौ वायुराकाश एव तु । मनसि प्रलीयते खं तु मनोऽहंकार एव च ॥
līyate'gnistathā vāyau vāyurākāśa eva tu | manasi pralīyate khaṃ tu mano'haṃkāra eva ca
अग्नि वायु में लीन होती है और वायु आकाश में; आकाश मन में लीन होता है और मन अहङ्कार में।
श्लोक 10 (13.166.10)
अहङ्कारस्तथा तस्मिन्महति प्रविलीयते । महानव्यक्त इत्याहुस्तदेकत्वं प्रचक्षते ॥
ahaṅkārastathā tasminmahati pravilīyate | mahānavyakta ityāhustadekatvaṃ pracakṣate
अहङ्कार उसी प्रकार महत् में लीन हो जाता है। महत् को ही वे अव्यक्त कहते हैं और उसे एकत्व बताते हैं।
श्लोक 11 (13.166.11)
अव्यक्तस्य महादेव प्रलयं विद्धि ब्रह्मणि । एवमस्यासकृत्क्रीडामाहुस्तत्वविदो जनाः ॥
avyaktasya mahādeva pralayaṃ viddhi brahmaṇi | evamasyāsakṛtkrīḍāmāhustatvavido janāḥ
हे महादेव, अव्यक्त का प्रलय ब्रह्म में जानिए। इसी प्रकार तत्त्वज्ञ लोग इसकी बार-बार होने वाली क्रीड़ा का वर्णन करते हैं।
श्लोक 12 (13.166.12)
अध्यात्ममधिभूतं च तथैवाप्यधिदैवतम् । यथावदुदितं शास्त्रं योगे तु सुमहात्मभिः ॥
adhyātmamadhibhūtaṃ ca tathaivāpyadhidaivatam | yathāvaduditaṃ śāstraṃ yoge tu sumahātmabhiḥ
अध्यात्म, अधिभूत और उसी प्रकार अधिदैवत—इनका शास्त्र महात्माओं ने योग में यथावत् कहा है।
श्लोक 13 (13.166.13)
तथैव चेह साङ्ख्ये तु परिसंख्यात्मचिन्तकैः । प्रपञ्चितार्थमेतावन्महादेव महात्मभिः ॥
tathaiva ceha sāṅkhye tu parisaṃkhyātmacintakaiḥ | prapañcitārthametāvanmahādeva mahātmabhiḥ
इसी प्रकार यहाँ साङ्ख्य में भी आत्मा की गणना पर चिन्तन करने वाले महात्माओं ने इसे कहा है। हे महादेव, इतना ही विषय उन्होंने विस्तार से कहा है।
श्लोक 14 (13.166.14)
ब्रह्मेति विद्यादध्यात्मं पुरुषं चाधिदैवतम् । प्रभवं सर्वभूतानां रक्षणं तत्र कर्म च ॥
brahmeti vidyādadhyātmaṃ puruṣaṃ cādhidaivatam | prabhavaṃ sarvabhūtānāṃ rakṣaṇaṃ tatra karma ca
अध्यात्म को ब्रह्म और अधिदैवत को पुरुष जानिए; वहाँ समस्त प्राणियों का उद्गम है और उसमें रक्षण ही कर्म है।
श्लोक 15 (13.166.15)
अध्यात्मं प्राणमित्याहुः क्रतुमप्यधिदैवतम् । रथं च यज्ञवाहोऽत्र कर्माहङ्कारमेव च ॥
adhyātmaṃ prāṇamityāhuḥ kratumapyadhidaivatam | rathaṃ ca yajñavāho'tra karmāhaṅkārameva ca
वे कहते हैं कि प्राण अध्यात्म है और यज्ञ अधिदैवत; यहाँ रथ और यज्ञ को वहन करने वाला भी है, और कर्म अहङ्कार ही है।
श्लोक 16 (13.166.16)
अध्यात्मं तु मनो विद्याच्चन्द्रमाश्चाधिदैवतम् । दैवं च प्रभवश्चैव कर्म व्याहृतयस्तथा ॥
adhyātmaṃ tu mano vidyāccandramāścādhidaivatam | daivaṃ ca prabhavaścaiva karma vyāhṛtayastathā
मन को अध्यात्म और चन्द्रमा को अधिदैवत जानिए; दैव, उद्गम और कर्म—ये उसी प्रकार व्याहृतियाँ हैं।
श्लोक 17 (13.166.17)
विद्यात्तु श्रोत्रमध्यात्ममाकाशमधिदैवतम् । सर्वभावाभिधानार्थं शब्दः कर्म सदा स्मृतं ॥
vidyāttu śrotramadhyātmamākāśamadhidaivatam | sarvabhāvābhidhānārthaṃ śabdaḥ karma sadā smṛtaṃ
श्रोत्र को अध्यात्म और आकाश को अधिदैवत जानिए; सब भावों के नामकरण के लिए शब्द सदा इसका कर्म माना गया है।
श्लोक 18 (13.166.18)
त्वगध्यात्ममथो विद्याद्वायुरत्राधिदैवतम् । सन्निपातय विज्ञानं सर्वकर्म च तत्र ह ॥
tvagadhyātmamatho vidyādvāyuratrādhidaivatam | sannipātaya vijñānaṃ sarvakarma ca tatra ha
फिर त्वचा को अध्यात्म जानिए, यहाँ वायु अधिदैवत है; स्पर्श, विज्ञान और सब कर्म वहीं हैं।
श्लोक 19 (13.166.19)
अध्यात्मं चक्षुरित्याहुर्भास्करोऽत्राधिदैवतम् । ज्ञापनं सर्ववर्णानां रूपं कर्म सदा स्मृतम् ॥
adhyātmaṃ cakṣurityāhurbhāskaro'trādhidaivatam | jñāpanaṃ sarvavarṇānāṃ rūpaṃ karma sadā smṛtam
वे नेत्र को अध्यात्म कहते हैं, यहाँ सूर्य अधिदैवत है; सब रंगों का ज्ञान कराना और रूप—यही इसका कर्म सदा माना गया है।
श्लोक 20 (13.166.20)
जिह्वेति विद्यादध्यात्ममापश्चात्राधिदैवतम् ॥
jihveti vidyādadhyātmamāpaścātrādhidaivatam
जिह्वा को अध्यात्म जानिए, यहाँ जल अधिदैवत है।
श्लोक 21 (13.166.21)
पायुरध्यात्ममित्याहुर्यथावद्यतिसत्तमाः । विसर्गमधिभूतं च मित्रं चाप्यधिदैवतम् ॥
pāyuradhyātmamityāhuryathāvadyatisattamāḥ | visargamadhibhūtaṃ ca mitraṃ cāpyadhidaivatam
श्रेष्ठ यति यथावत् गुदा को अध्यात्म कहते हैं; मलत्याग अधिभूत है और मित्र अधिदैवत।
श्लोक 22 (13.166.22)
उपस्थोऽध्यात्ममित्याहुर्देवदेव पिनाकधृक् । अनुभावोऽधिभूतं तु दैवतं च प्रजापतिः ॥
upastho'dhyātmamityāhurdevadeva pinākadhṛk | anubhāvo'dhibhūtaṃ tu daivataṃ ca prajāpatiḥ
हे देवदेव पिनाकधारी, वे उपस्थ को अध्यात्म कहते हैं; अनुभव (आनन्द) अधिभूत है और दैवत प्रजापति हैं।
श्लोक 23 (13.166.23)
पादावध्यात्ममित्याहुस्त्रिशूलाङ्क मनीषिणः । गन्तव्यमधिभूतं तु विष्णुस्तत्राधिदैवतम् ॥
pādāvadhyātmamityāhustriśūlāṅka manīṣiṇaḥ | gantavyamadhibhūtaṃ tu viṣṇustatrādhidaivatam
हे त्रिशूलाङ्क, मनीषी चरणों को अध्यात्म कहते हैं; गन्तव्य अधिभूत है और वहाँ विष्णु अधिदैवत हैं।
श्लोक 24 (13.166.24)
वागध्यात्मं तथैवाहुः पिनाकिंस्तत्वदर्शिनः । वक्तव्यमधिभूतं तु वह्निस्तत्राधिदैवतम् ॥
vāgadhyātmaṃ tathaivāhuḥ pinākiṃstatvadarśinaḥ | vaktavyamadhibhūtaṃ tu vahnistatrādhidaivatam
हे पिनाकी, तत्त्वदर्शी इसी प्रकार वाणी को अध्यात्म कहते हैं; वक्तव्य अधिभूत है और वहाँ अग्नि अधिदैवत है।
श्लोक 25 (13.166.25)
एतदध्यात्ममतुलं साधिभूताधिदैवतम् । मया तु वर्णितं सम्यग्देहिनाममरर्षभ ॥
etadadhyātmamatulaṃ sādhibhūtādhidaivatam | mayā tu varṇitaṃ samyagdehināmamararṣabha
हे देवश्रेष्ठ, अधिभूत और अधिदैवत सहित यह अनुपम अध्यात्म मैंने देहधारियों के लिए भली-भाँति वर्णन कर दिया।
श्लोक 26 (13.166.26)
एतत्कीटपतङ्गे च श्वपाके शुनि हस्तिनि । पुत्रिकादंशमशके ब्राह्मणे गवि पार्थिवे ॥
etatkīṭapataṅge ca śvapāke śuni hastini | putrikādaṃśamaśake brāhmaṇe gavi pārthive
यह कीट और पतङ्ग में, चाण्डाल में, कुत्ते और हाथी में, छोटी चींटी, डाँस और मच्छर में, ब्राह्मण, गाय और राजा में—सर्वत्र है।
श्लोक 27 (13.166.27)
सर्वमेव हि द्रष्टव्यमन्यथा मा विचिन्तय । अतोऽन्यथा ये पश्यन्ति न सम्यक्तेषु दर्शनम् ॥
sarvameva hi draṣṭavyamanyathā mā vicintaya | ato'nyathā ye paśyanti na samyakteṣu darśanam
यह सब इसी प्रकार देखना चाहिए; अन्यथा मत सोचिए। जो इससे भिन्न देखते हैं, उनमें सम्यक् दर्शन नहीं है।
श्लोक 28 (13.166.28)
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसकिन्नराः । यन्न जानन्ति को ह्येष कुतो वा भगवानिति ॥
devadānavagandharvayakṣarākṣasakinnarāḥ | yanna jānanti ko hyeṣa kuto vā bhagavāniti
देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नर भी नहीं जानते कि "यह कौन है, अथवा यह भगवान् कहाँ से हैं?"
श्लोक 29 (13.166.29)
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म यत्तत्सदसतः परम् । अनादिमध्यपर्यन्तं कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
omityekākṣaraṃ brahma yattatsadasataḥ param | anādimadhyaparyantaṃ kūṭasthamacalaṃ dhruvam
'ओम्'—यह एकाक्षर ब्रह्म है, जो सत् और असत् से परे है, जिसका न आदि है, न मध्य, न अन्त; जो कूटस्थ, अचल और ध्रुव है।
श्लोक 30 (13.166.30)
योगेश्वरं पद्मनाभं विष्णुं जिष्णुं जगत्पतिम् । अनादिनिधं देवं देवदेवं सनातनम् ॥
yogeśvaraṃ padmanābhaṃ viṣṇuṃ jiṣṇuṃ jagatpatim | anādinidhaṃ devaṃ devadevaṃ sanātanam
योगेश्वर, पद्मनाभ, विष्णु, जिष्णु, जगत्पति; आदि और अन्त से रहित देव, देवों के देव, सनातन—
श्लोक 31 (13.166.31)
अप्रमेयमविज्ञेयं हरिं नारायणं प्रभुम् । कृताञ्जलिः शुचिर्भूत्वा प्रणम्य प्रयतोऽर्चयेत् ॥
aprameyamavijñeyaṃ hariṃ nārāyaṇaṃ prabhum | kṛtāñjaliḥ śucirbhūtvā praṇamya prayato'rcayet
अप्रमेय, अविज्ञेय, हरि, नारायण, प्रभु—हाथ जोड़कर, पवित्र और संयत होकर प्रणाम करके उनकी अर्चना करनी चाहिए।
श्लोक 32 (13.166.32)
अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः । एकोयं वेद भगवांस्त्राता नारायणो हरिः ॥
anādyantaṃ paraṃ brahma na devā ṛṣayo viduḥ | ekoyaṃ veda bhagavāṃstrātā nārāyaṇo hariḥ
आदि-अन्त से रहित परब्रह्म को न देवता जानते हैं, न ऋषि। केवल भगवान् रक्षक नारायण हरि ही उसे जानते हैं।
श्लोक 33 (13.166.33)
नारायणादृषिगणास्ततः सिद्धा महोरगाः । देवा देवर्षयश्चैव यं विदुर्दुःखभेषजम् ॥
nārāyaṇādṛṣigaṇāstataḥ siddhā mahoragāḥ | devā devarṣayaścaiva yaṃ vidurduḥkhabheṣajam
नारायण से ऋषिगण, फिर सिद्ध और महानाग, देवता और देवर्षि उत्पन्न हुए हैं, जो उन्हें दुःख की औषधि के रूप में जानते हैं।
श्लोक 34 (13.166.34)
यमाहुर्विजितक्लेशं यस्मिंश्च विहिताः प्रजाः । यस्मिँल्लोकाः स्फुरन्तीमे जाले शकुनयो यथा ॥
yamāhurvijitakleśaṃ yasmiṃśca vihitāḥ prajāḥ | yasmim̐llokāḥ sphurantīme jāle śakunayo yathā
उन्हें क्लेशों को जीतने वाला कहा जाता है; उन्हीं में प्रजा स्थापित है, और उन्हीं में ये लोक जाल में फँसे पक्षियों की भाँति फड़फड़ाते हैं।
श्लोक 35 (13.166.35)
सप्तर्षयो मनः सप्त साङ्ख्यास्तु मुनिदर्शनात् । सप्तर्षयश्चेन्द्रियाणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च ॥
saptarṣayo manaḥ sapta sāṅkhyāstu munidarśanāt | saptarṣayaścendriyāṇi pañca buddhīndriyāṇi ca
सप्तर्षि सात हैं, जिनमें मन भी है—ऐसा साङ्ख्य मुनियों के दर्शन के अनुसार कहते हैं; सप्तर्षि इन्द्रियाँ हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ भी।
श्लोक 36 (13.166.36)
श्रोत्रयोश्च दिशः प्राहुर्मनसि त्वथ चन्द्रमाः ॥
śrotrayośca diśaḥ prāhurmanasi tvatha candramāḥ
वे कहते हैं कि दोनों कानों में दिशाएँ हैं और मन में चन्द्रमा।
श्लोक 37 (13.166.37)
मनः षष्ठं बुद्धिः सप्तमी ह्यात्मनि स्थापितानि । शरीरेषु नात्मनि तस्य हि कारणानि भवन्ति । सर्वाण्यपि सर्वकर्मसु वा विषयेषु वा युञ्जन्ति यथात्मनि । स्वानि कर्माणि प्रवृत्तानि सप्तस्वपि ॥
manaḥ ṣaṣṭhaṃ buddhiḥ saptamī hyātmani sthāpitāni | śarīreṣu nātmani tasya hi kāraṇāni bhavanti | sarvāṇyapi sarvakarmasu vā viṣayeṣu vā yuñjanti yathātmani | svāni karmāṇi pravṛttāni saptasvapi
मन छठा और बुद्धि सातवीं है; वे आत्मा में, शरीरों में स्थापित हैं, आत्मा के भीतर नहीं, और वे उसके साधन हैं। वे सभी सब कर्मों में अथवा विषयों में लगे रहते हैं, जैसे आत्मा में अपने-अपने कर्म सातों में भी चलते रहते हैं।
श्लोक 38 (13.166.38)
विषयाणां व्यापकत्वानि तान्येव स्वपतो भूतग्रामस्य । अजमात्मानं देवलोकस्थानसंमितं देहान्तरगामिनं मुमुक्षुं वानुप्रविशन्ति । सूक्ष्माणि प्रलीयन्ते ॥
viṣayāṇāṃ vyāpakatvāni tānyeva svapato bhūtagrāmasya | ajamātmānaṃ devalokasthānasaṃmitaṃ dehāntaragāminaṃ mumukṣuṃ vānupraviśanti | sūkṣmāṇi pralīyante
विषयों में व्याप्त वे ही इन्द्रियाँ, जब प्राणिसमूह सोता है, अजन्मा आत्मा में प्रवेश करती हैं—जो देवलोक के स्थानों से मापा जाता है और दूसरे शरीर में जाता है, अथवा मुमुक्षु में—और सूक्ष्म तत्त्व लीन हो जाते हैं।
श्लोक 39 (13.166.39)
मोक्षकाले तमेकं न कश्चिद्वेत्ति स्वपरम् । एवं प्रविष्टेषु भूतेषु को जागर्तीत्युच्यते ॥
mokṣakāle tamekaṃ na kaścidvetti svaparam | evaṃ praviṣṭeṣu bhūteṣu ko jāgartītyucyate
मोक्ष के समय उस एक को कोई अपने रूप में या दूसरे के रूप में नहीं जानता। इस प्रकार प्राणियों के (उसमें) प्रविष्ट हो जाने पर कौन जागता है—ऐसा पूछा जाता है।
श्लोक 40 (13.166.40)
निद्राप्रसुप्तेषु वाऽत्र जाग्रत्स्वप्नशीलोत्र सदने च । देवद्योतनो भगवांश्चात्र क्षेत्रज्ञो बुद्धिर्वाऽभिसुप्तस्यापि । स्वप्नदर्शनानि पश्यन्ति ॥
nidrāprasupteṣu vā'tra jāgratsvapnaśīlotra sadane ca | devadyotano bhagavāṃścātra kṣetrajño buddhirvā'bhisuptasyāpi | svapnadarśanāni paśyanti
यहाँ गहरी नींद में सोए हुओं में वह भी है जिसका स्वभाव जागना और स्वप्न देखना है; और इस निवास में प्रकाशमान देव है, और यहाँ भगवान् क्षेत्रज्ञ अथवा बुद्धि है; गहरी नींद में सोए हुए का भी वे स्वप्न-दर्शन देखते हैं।
श्लोक 41 (13.166.41)
अप्रतिबुद्धेषु लोकेषु स एव प्रतिबुध्यते । स एष प्राज्ञः । अथ तैजसः कायाग्निः स हि सुप्तस्यात्मा वा ॥
apratibuddheṣu lokeṣu sa eva pratibudhyate | sa eṣa prājñaḥ | atha taijasaḥ kāyāgniḥ sa hi suptasyātmā vā
जब लोग जाग्रत नहीं होते, तब वही जागता है। यह प्राज्ञ है; फिर तैजस है, जो शरीर की अग्नि है, क्योंकि वही सोए हुए का आत्मा भी है।
श्लोक 42 (13.166.42)
अविदुषो वाऽप्रतिबुध्यमानस्यान्नं पचतीत्यन्ते वै तिष्ठति । एतदात्मानमधिकृत्यानुज्ञातमिति ॥
aviduṣo vā'pratibudhyamānasyānnaṃ pacatītyante vai tiṣṭhati | etadātmānamadhikṛtyānujñātamiti
जो अज्ञानी है अथवा जागा नहीं है, उसमें वह अन्न को पचाता है—ऐसा कहा जाता है, और अन्त में वही स्थित रहता है। यह आत्मा को लक्ष्य करके कहा गया है।