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अनुशासन पर्व · अध्याय 167

शरीर में स्थित देवता और योग का अभ्यास

सनत्कुमार रुद्र को बताते हैं कि शरीर के किस अङ्ग में कौन-से देवता रहते हैं और जीव को प्रयाण के समय कौन-सा अङ्ग किस देवता का लोक दिलाता है; जो इन देवताओं को इस प्रकार देखता और आत्मा का यजन करता है, वह योगी है और सब यज्ञ करने वालों से श्रेष्ठ है। वे बोध पाने वाले और अबुद्ध पुरुष का भेद करते हैं, फिर योग के अभ्यास का उपदेश देते हैं—स्थान, आसन, मित आहार, इन्द्रियों का निग्रह और मन की स्थिरता—जिससे भीतर बादल में बिजली की तरह ब्रह्म, अँगूठे के पोर जितने नारायण, प्रकाशित होते हैं। वे योग की आठ सिद्धियाँ गिनाते हैं, योग को परम धर्म बताते हैं और अन्त में साङ्ख्य का उपदेश देने का वचन देते हैं।

अध्याय 166अध्याय-सूचीअध्याय 168

सनत्कुमार उवाच

श्लोक 1 (13.167.1)

प्रभवश्चाप्ययस्तात वर्णितस्तेऽनुपूर्वशः । तथाऽध्यात्माधिभूतं च तथैवात्राधिदैवतम् ॥

prabhavaścāpyayastāta varṇitaste'nupūrvaśaḥ | tathā'dhyātmādhibhūtaṃ ca tathaivātrādhidaivatam

तात, उत्पत्ति और लय का वर्णन तुम्हारे सामने क्रम से हो चुका है, और अध्यात्म तथा अधिभूत का भी, और उसी प्रकार यहाँ अधिदैवत का भी।

श्लोक 2 (13.167.2)

निखिलेन तु वक्ष्यामि दैवतानि ह देहिनाम् । यान्याश्रितेषु देहेषु यानि पृच्छसि शङ्कर ॥

nikhilena tu vakṣyāmi daivatāni ha dehinām | yānyāśriteṣu deheṣu yāni pṛcchasi śaṅkara

अब मैं देहधारियों के उन देवताओं को पूर्ण रूप से बताऊँगा जो शरीरों में आश्रित हैं और जिनके विषय में, हे शङ्कर, आप पूछ रहे हैं।

श्लोक 3 (13.167.3)

वाच्यग्निस्त्वथ जिह्वायां सोमः प्राणे तु मारुतः । रूपे चाप्यथ नक्षत्रं जिह्वायां चाप एव तु ॥

vācyagnistvatha jihvāyāṃ somaḥ prāṇe tu mārutaḥ | rūpe cāpyatha nakṣatraṃ jihvāyāṃ cāpa eva tu

वाणी में अग्नि है और जिह्वा में सोम, प्राण में वायु; रूप में नक्षत्र और जिह्वा में ही जल भी।

श्लोक 4 (13.167.4)

नाभ्यां समुद्रश्च विभुर्नखरोम तथैव च । वनस्पतिवनौषध्यस्त्वङ्गेषु मरुतस्तथा ॥

nābhyāṃ samudraśca vibhurnakharoma tathaiva ca | vanaspativanauṣadhyastvaṅgeṣu marutastathā

नाभि में विशाल समुद्र है, और उसी प्रकार नखों और रोमों में भी; वनस्पतियाँ और ओषधियाँ तथा मरुद्गण अङ्गों में हैं।

श्लोक 5 (13.167.5)

संवत्सराः पर्वसु च आकाशे दैवमानुषे । उदाने विद्युदभवद्व्याने पर्जन्य एव च ॥

saṃvatsarāḥ parvasu ca ākāśe daivamānuṣe | udāne vidyudabhavadvyāne parjanya eva ca

सन्धियों में संवत्सर हैं; आकाश में दैव और मानुष; उदान में विद्युत् उत्पन्न हुई और व्यान में पर्जन्य।

श्लोक 6 (13.167.6)

स्तनयोरेव चाकाशं बले चेन्द्रस्तथैव च । मनसोऽप्यथ चेशानस्त्वपाने रुद्र एव च ॥

stanayoreva cākāśaṃ bale cendrastathaiva ca | manaso'pyatha ceśānastvapāne rudra eva ca

स्तनों में आकाश ही है और बल में इन्द्र; मन में ईशान हैं और अपान में रुद्र।

श्लोक 7 (13.167.7)

गन्धर्वाप्सरसो व्याने सत्ये मित्रश्च शङ्कर । प्रज्ञायां वरुणश्चैव चक्षुष्यादित्य एव च ॥

gandharvāpsaraso vyāne satye mitraśca śaṅkara | prajñāyāṃ varuṇaścaiva cakṣuṣyāditya eva ca

व्यान में गन्धर्व और अप्सराएँ हैं; सत्य में, हे शङ्कर, मित्र हैं; प्रज्ञा में वरुण हैं और नेत्र में आदित्य।

श्लोक 8 (13.167.8)

शरीरे पृथिवी चैव पादयोर्विष्णुरेव च । पायौ मित्रस्तथोपस्थे प्रजापतिररिंदम ॥

śarīre pṛthivī caiva pādayorviṣṇureva ca | pāyau mitrastathopasthe prajāpatirariṃdama

शरीर में पृथ्वी है और चरणों में विष्णु; गुदा में मित्र और उपस्थ में प्रजापति, हे अरिंदम।

श्लोक 9 (13.167.9)

मूर्ध्नि चैव दिशः प्राहुर्बुद्धौ ब्रह्मा प्रतिष्ठितः । बुध्यमानोऽऽत्मनिष्ठः स्यादधिष्ठाता तु शङ्करः ॥

mūrdhni caiva diśaḥ prāhurbuddhau brahmā pratiṣṭhitaḥ | budhyamāno''tmaniṣṭhaḥ syādadhiṣṭhātā tu śaṅkaraḥ

मस्तक में दिशाएँ कही जाती हैं; बुद्धि में ब्रह्मा प्रतिष्ठित हैं। बोध पाने वाला आत्मा में स्थित होता है, परन्तु, हे शङ्कर, वही अधिष्ठाता भी है।

श्लोक 10 (13.167.10)

अबुद्धश्चाभवत्तस्माद्बुध्यमानान्न संशयः । आभ्यामन्यः परो बुद्धो वेदवादेषु शङ्कर ॥

abuddhaścābhavattasmādbudhyamānānna saṃśayaḥ | ābhyāmanyaḥ paro buddho vedavādeṣu śaṅkara

और बोध पाने वाले से, इसमें सन्देह नहीं, अबुद्ध उत्पन्न हुआ। वेदवादों में, हे शङ्कर, इन दोनों से भिन्न एक परम प्रबुद्ध है।

श्लोक 11 (13.167.11)

यदाश्रितानि देहेषु दैवतानि पृथक्पृथक् । योऽग्नये यजते नित्यमात्मयाजी समाहितः ॥

yadāśritāni deheṣu daivatāni pṛthakpṛthak | yo'gnaye yajate nityamātmayājī samāhitaḥ

देवता शरीरों में अलग-अलग आश्रित हैं। जो आत्मयाजी समाहित होकर नित्य अग्नि को यज्ञ करता है,

श्लोक 12 (13.167.12)

य एवमनुपश्येत दैवतानि समाहितः । सोत्र योगी भवत्येव य एवमनुपश्यति । स सर्वयज्ञयाजिभ्यो ह्यात्मयाजी विशिष्यते ॥

ya evamanupaśyeta daivatāni samāhitaḥ | sotra yogī bhavatyeva ya evamanupaśyati | sa sarvayajñayājibhyo hyātmayājī viśiṣyate

और जो समाहित होकर देवताओं को इस प्रकार देखता है—वह यहाँ योगी है, जो भी इस प्रकार देखता है। वह आत्मयाजी सब यज्ञ करने वालों से श्रेष्ठ ठहरता है।

श्लोक 13 (13.167.13)

मुखे जुहोति यो नित्यं कृत्स्नं विश्वमिदं जगत् । सोऽऽत्मवित्प्रोच्यते तज्ज्ञैर्महादेव महात्मभिः ॥

mukhe juhoti yo nityaṃ kṛtsnaṃ viśvamidaṃ jagat | so''tmavitprocyate tajjñairmahādeva mahātmabhiḥ

जो नित्य मुख में इस सम्पूर्ण विश्व की आहुति देता है, उसे उसके जानने वाले महात्मा आत्मवेत्ता कहते हैं, हे महादेव।

श्लोक 14 (13.167.14)

सर्वेभ्यः परमेभ्यो वै दैवतेभ्यो ह्यात्मयाजिना । गन्तव्यं परमाकाङ्क्षन्परमेव च चिन्तयन् ॥

sarvebhyaḥ paramebhyo vai daivatebhyo hyātmayājinā | gantavyaṃ paramākāṅkṣanparameva ca cintayan

आत्मयाजी को सब परम देवताओं से भी आगे जाना चाहिए—परम की आकांक्षा करते हुए और केवल परम का ही चिन्तन करते हुए।

श्लोक 15 (13.167.15)

यथा संक्रमते देहाद्देही त्रिपुरसूदन । तथास्य स्थानमाख्यास्ये पृथक्त्वेनेह शङ्कर ॥

yathā saṃkramate dehāddehī tripurasūdana | tathāsya sthānamākhyāsye pṛthaktveneha śaṅkara

हे त्रिपुरसूदन, देही जैसे देह से निकलता है, उसी प्रकार उसके स्थान को मैं, हे शङ्कर, अलग-अलग बताऊँगा।

श्लोक 16 (13.167.16)

पादाभ्यां वैष्णवं स्थानमाप्नोति विनियोजनात् । पायुना मित्रमाप्नोति उपस्थेन प्रजापतिम् ॥

pādābhyāṃ vaiṣṇavaṃ sthānamāpnoti viniyojanāt | pāyunā mitramāpnoti upasthena prajāpatim

चरणों के उचित उपयोग से वह विष्णु का स्थान पाता है; गुदा से मित्र को और उपस्थ से प्रजापति को पाता है।

श्लोक 17 (13.167.17)

नाभ्या च वारुणं स्थानं स्तनाभ्यां तु भवो लभेत् । बाहुभ्यां वासवं स्थानं श्रोत्राभ्यामाप्नुयाद्दिशः । आदित्यं चक्षुषा स्थानं मूर्ध्ना ब्रह्मण एव च ॥

nābhyā ca vāruṇaṃ sthānaṃ stanābhyāṃ tu bhavo labhet | bāhubhyāṃ vāsavaṃ sthānaṃ śrotrābhyāmāpnuyāddiśaḥ | ādityaṃ cakṣuṣā sthānaṃ mūrdhnā brahmaṇa eva ca

नाभि से वरुण का स्थान; स्तनों से भव का लोक पाया जा सकता है; भुजाओं से इन्द्र का स्थान; कानों से दिशाओं को वह पाता है; नेत्र से आदित्य का स्थान और मस्तक से ब्रह्मा का।

श्लोक 18 (13.167.18)

अथ मूर्धसु यः प्राणान्धारयेत समाहितः । बुद्ध्या मानमवाप्नोति द्रव्यावस्थं न संशयः ॥

atha mūrdhasu yaḥ prāṇāndhārayeta samāhitaḥ | buddhyā mānamavāpnoti dravyāvasthaṃ na saṃśayaḥ

जो समाहित होकर प्राणों को मस्तक में धारण करता है, वह बुद्धि के द्वारा मान (मापने की शक्ति) और द्रव्य की अवस्था को पाता है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 19 (13.167.19)

अव्यक्तात्परमं शुद्धमप्रमेयमनामयम् । तमाहुः परमं नित्यं यद्यदाप्नोति बुद्धिमान् ॥

avyaktātparamaṃ śuddhamaprameyamanāmayam | tamāhuḥ paramaṃ nityaṃ yadyadāpnoti buddhimān

अव्यक्त से परे शुद्ध, अप्रमेय, निरामय तत्त्व है। उसे वे परम और नित्य कहते हैं—जो कुछ भी बुद्धिमान् प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (13.167.20)

बुध्यमानाप्रबुद्धाभ्यां स बुद्ध इति पठ्यते । बुध्यमानमबुद्धश्च नित्यमेवानुपश्यति ॥

budhyamānāprabuddhābhyāṃ sa buddha iti paṭhyate | budhyamānamabuddhaśca nityamevānupaśyati

बोध पाने वाले और अबुद्ध के द्वारा वह 'बुद्ध' कहा जाता है। अबुद्ध सदा बोध पाने वाले को देखता रहता है।

श्लोक 21 (13.167.21)

विकारपुरुषस्त्वेष बुध्यमान इति स्मृतः । पञ्चविंशतितत्वं तत्प्रोच्यते तत्र संशयः ॥

vikārapuruṣastveṣa budhyamāna iti smṛtaḥ | pañcaviṃśatitatvaṃ tatprocyate tatra saṃśayaḥ

यह विकारपुरुष ही बोध पाने वाला कहा गया है। वही पचीस तत्त्वों वाला तत्त्व कहा जाता है; उसके विषय में सन्देह है।

श्लोक 22 (13.167.22)

स एष प्रकृतिस्थत्वात्तस्थुरित्युपदिश्यते । महानात्मा महादेव महानत्राधितिष्ठति ॥

sa eṣa prakṛtisthatvāttasthurityupadiśyate | mahānātmā mahādeva mahānatrādhitiṣṭhati

प्रकृति में स्थित होने के कारण उसे 'तस्थु' (स्थिर) कहा जाता है। हे महादेव, यहाँ महान् आत्मा महान् रूप से अधिष्ठित है।

श्लोक 23 (13.167.23)

अधिष्ठानादधिष्ठाता प्रोच्यते शास्त्रदर्शनात् । एष चेतयते देव मोहजालमबुद्धिमान् ॥

adhiṣṭhānādadhiṣṭhātā procyate śāstradarśanāt | eṣa cetayate deva mohajālamabuddhimān

शास्त्र की दृष्टि से अधिष्ठान होने के कारण वह अधिष्ठाता कहा जाता है। हे देव, यह अबुद्धिमान् मोह के जाल को देखता-जानता है।

श्लोक 24 (13.167.24)

अव्यक्तस्यैव साधर्म्यमेतदाहुर्मनीषिणः । सोहं सोहमतो नित्यादज्ञानादिति मन्यते ॥

avyaktasyaiva sādharmyametadāhurmanīṣiṇaḥ | sohaṃ sohamato nityādajñānāditi manyate

मनीषी इसे अव्यक्त का ही साधर्म्य कहते हैं—'मैं वही हूँ, मैं वही हूँ'—इस प्रकार वह नित्य अज्ञान से मानता है।

श्लोक 25 (13.167.25)

यदि बुध्यति चैवायं मन्येयमिति भास्वरः । न प्रबुद्धो न वर्तेत पानीयं मत्स्यको यथा ॥

yadi budhyati caivāyaṃ manyeyamiti bhāsvaraḥ | na prabuddho na varteta pānīyaṃ matsyako yathā

यदि यह तेजस्वी जाग जाए और सोचे—'मैं ऐसा मानूँ', तो अप्रबुद्ध वैसे ही नहीं रह पाएगा जैसे जल में छोटी मछली।

श्लोक 26 (13.167.26)

देवता निखिलेनैताः प्रोक्तास्त्रिभुवनेश्वर । योगकृत्यं तु तावन्मे त्वं निबोधानुपूर्वशः ॥

devatā nikhilenaitāḥ proktāstribhuvaneśvara | yogakṛtyaṃ tu tāvanme tvaṃ nibodhānupūrvaśaḥ

हे त्रिभुवनेश्वर, ये देवता पूर्ण रूप से कह दिए गए। अब योग के कर्तव्य को मुझसे क्रम से सुनिए।

श्लोक 27 (13.167.27)

शून्यागारेष्वरण्येषु सागरे वा गुहासु वा । विष्टम्भयित्वा त्रीन्दण्डानवाप्तो ह्यद्वयो भवेत् ॥

śūnyāgāreṣvaraṇyeṣu sāgare vā guhāsu vā | viṣṭambhayitvā trīndaṇḍānavāpto hyadvayo bhavet

सूने घरों में, वनों में, समुद्र के तट पर या गुफाओं में, तीनों दण्डों को स्थिर करके, प्राप्त हुआ पुरुष अद्वय हो जाए।

श्लोक 28 (13.167.28)

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि तथा पश्चान्मुखोपि वा । दक्षिणावदनो वापि बद्ध्वा विधिवदासनम् ॥

prāṅmukhodaṅmukho vāpi tathā paścānmukhopi vā | dakṣiṇāvadano vāpi baddhvā vidhivadāsanam

पूर्वमुख या उत्तरमुख, अथवा पश्चिममुख या दक्षिणमुख होकर, विधिपूर्वक आसन बाँधकर,

श्लोक 29 (13.167.29)

स्वस्तिकेनोपसंविष्टः कायमुन्नाम्य भास्वरम् । यथोपदिष्टं गुरुणा तथा तद्ब्रह्म धारयेत् ॥

svastikenopasaṃviṣṭaḥ kāyamunnāmya bhāsvaram | yathopadiṣṭaṃ guruṇā tathā tadbrahma dhārayet

स्वस्तिक आसन से बैठकर, तेजस्वी शरीर को सीधा उठाकर, गुरु के उपदेश के अनुसार उसी प्रकार ब्रह्म को धारण करे।

श्लोक 30 (13.167.30)

लघ्वाहारो यतो दान्तस्त्रिकालपरिवर्जकः । मूत्रोत्सर्गपुरीषाभ्यामाहारे च समाहितः ॥

laghvāhāro yato dāntastrikālaparivarjakaḥ | mūtrotsargapurīṣābhyāmāhāre ca samāhitaḥ

हल्का आहार लेने वाला, संयमी, तीनों कालों को छोड़ने वाला, मल-मूत्र के त्याग में और भोजन में सावधान,

श्लोक 31 (13.167.31)

शेषकालं तु युञ्जीत मनसा सुसमाहितः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो मनसा विनिवर्तयेत् ॥

śeṣakālaṃ tu yuñjīta manasā susamāhitaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyo manasā vinivartayet

शेष समय में सुसमाहित मन से योग का अभ्यास करे और इन्द्रियों को मन से उनके विषयों से लौटा ले।

श्लोक 32 (13.167.32)

मनस्तथैव सङ्गृह्य बुद्ध्या बुद्धिमतां वर । विधावमानं धैर्येण विस्फुरन्तमितस्ततः ॥

manastathaiva saṅgṛhya buddhyā buddhimatāṃ vara | vidhāvamānaṃ dhairyeṇa visphurantamitastataḥ

हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, उसी प्रकार इधर-उधर दौड़ते और चञ्चल मन को बुद्धि से समेटकर धैर्य से रोके,

श्लोक 33 (13.167.33)

निरुध्य सर्वसङ्कल्पांस्ततो वै स्थिरतां व्रजेत् । एकाग्रस्तद्विजानीयात्सर्वं गुह्यतमं परम् ॥

nirudhya sarvasaṅkalpāṃstato vai sthiratāṃ vrajet | ekāgrastadvijānīyātsarvaṃ guhyatamaṃ param

और सब सङ्कल्पों को रोककर वह फिर स्थिरता को प्राप्त हो। एकाग्र होकर वह सब कुछ—परम गुह्यतम तत्त्व—जान ले।

श्लोक 34 (13.167.34)

निवातस्थ इवालोलो यथा दीपोऽतिदीप्यते । ऊर्ध्वमेव न तिर्यक्च तथैवाभ्रान्ति ते मनः ॥

nivātastha ivālolo yathā dīpo'tidīpyate | ūrdhvameva na tiryakca tathaivābhrānti te manaḥ

जैसे वायुरहित स्थान में दीपक अचञ्चल होकर खूब जलता है—ऊपर की ओर ही, तिरछा नहीं—वैसे ही तुम्हारा मन भटकन से रहित हो।

श्लोक 35 (13.167.35)

हृदिस्थस्तिष्ठते योसौ तस्यैवाभिमुखो यदा । मनो भवति देवेश पाषाणमिव निश्चलम् ॥

hṛdisthastiṣṭhate yosau tasyaivābhimukho yadā | mano bhavati deveśa pāṣāṇamiva niścalam

जब मन हृदय में स्थित उसी की ओर मुड़ जाता है, हे देवेश, तब वह पत्थर की भाँति निश्चल हो जाता है।

श्लोक 36 (13.167.36)

स निर्जने विनिर्घोषे सघोषे चाऽऽवसञ्जने । युक्तो यो न विकम्पेत योगी योगविधिः श्रुतः ॥

sa nirjane vinirghoṣe saghoṣe cā''vasañjane | yukto yo na vikampeta yogī yogavidhiḥ śrutaḥ

निर्जन में, नीरव स्थान में, अथवा जनसमाज के कोलाहल में भी जो स्थिर रहकर काँपता नहीं—ऐसा योगी के योग का विधान हमने सुना है।

श्लोक 37 (13.167.37)

ततः पश्यति तद्ब्रह्म ज्वलदात्मनि संस्थितम् । विद्युदम्बुधरे यद्वत्तद्वदेकमनाश्रयम् ॥

tataḥ paśyati tadbrahma jvaladātmani saṃsthitam | vidyudambudhare yadvattadvadekamanāśrayam

तब वह आत्मा में स्थित उस ज्वलित ब्रह्म को देखता है—जैसे बादल में बिजली, वैसे ही अकेला और निराश्रय।

श्लोक 38 (13.167.38)

तमस्यगाधे तिष्ठन्तं निस्तमस्कमचेतनम् । चेतयानमचेतं च दीप्यमानं स्वतेजसा ॥

tamasyagādhe tiṣṭhantaṃ nistamaskamacetanam | cetayānamacetaṃ ca dīpyamānaṃ svatejasā

वह अथाह अन्धकार में स्थित है, फिर भी अन्धकार से रहित है; स्वयं अचेत होते हुए भी चेतना देने वाला, अपने ही तेज से दीप्त।

श्लोक 39 (13.167.39)

अङ्गुष्ठपर्वमात्रं तन्नैश्रेयसमनिन्दितम् । महद्भूतमनन्तं च स्वतन्त्रं विगतज्वरम् ॥

aṅguṣṭhaparvamātraṃ tannaiśreyasamaninditam | mahadbhūtamanantaṃ ca svatantraṃ vigatajvaram

अँगूठे के पोर के बराबर, परम कल्याणरूप, निन्दा से परे, महान् भूत, अनन्त, स्वतन्त्र, सन्ताप से रहित।

श्लोक 40 (13.167.40)

ज्योतिषां ज्योतिषं देवं विष्णुमत्यन्तनिर्मलम् । नारायणमणीयांसमीश्वराणामधीश्वरम् ॥

jyotiṣāṃ jyotiṣaṃ devaṃ viṣṇumatyantanirmalam | nārāyaṇamaṇīyāṃsamīśvarāṇāmadhīśvaram

ज्योतियों की भी ज्योति, देव विष्णु, अत्यन्त निर्मल, अणु से भी सूक्ष्म नारायण, ईश्वरों के भी अधीश्वर।

श्लोक 41 (13.167.41)

विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं प्रभुम् । अविज्ञाय निमज्जन्ति लोकाः संसारसागरे ॥

viśvataḥ paramaṃ nityaṃ viśvaṃ nārāyaṇaṃ prabhum | avijñāya nimajjanti lokāḥ saṃsārasāgare

विश्व से परे, नित्य, स्वयं विश्वरूप प्रभु नारायण—उन्हें न जानकर लोग संसारसागर में डूबते हैं।

श्लोक 42 (13.167.42)

यं दृष्ट्वा यतयस्तात न शोचन्ति गतज्वराः । जन्ममृत्युभयान्मुक्तास्तीर्णाः संसारसागरम् ॥

yaṃ dṛṣṭvā yatayastāta na śocanti gatajvarāḥ | janmamṛtyubhayānmuktāstīrṇāḥ saṃsārasāgaram

तात, जिन्हें देखकर यति शोक नहीं करते; उनका सन्ताप दूर हो जाता है, वे जन्म और मृत्यु के भय से मुक्त होकर संसारसागर को पार कर जाते हैं।

श्लोक 43 (13.167.43)

अणिमा लघिमा भूमा प्राप्तिः प्राकम्यमेव च । ईशित्वं च वशित्वं च यत्र कामावसायिता । एतदष्टगुणं योगं योगानाममितं स्मृतम् ॥

aṇimā laghimā bhūmā prāptiḥ prākamyameva ca | īśitvaṃ ca vaśitvaṃ ca yatra kāmāvasāyitā | etadaṣṭaguṇaṃ yogaṃ yogānāmamitaṃ smṛtam

अणिमा, लघिमा, भूमा (महिमा), प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और जहाँ सब कामनाओं की पूर्ति हो जाती है वह सिद्धि—योग का यह अष्टगुण ऐश्वर्य सब योगों में अपरिमित माना गया है।

श्लोक 44 (13.167.44)

दृष्ट्वात्मानं निरात्मानमप्रमेयं सनातनम् । ते विशन्ति शरीराणि योगेनानेन भास्वरम् । दैत्यदेवमनुष्याणां बलेन बलवत्तमाः ॥

dṛṣṭvātmānaṃ nirātmānamaprameyaṃ sanātanam | te viśanti śarīrāṇi yogenānena bhāsvaram | daityadevamanuṣyāṇāṃ balena balavattamāḥ

अप्रमेय और सनातन आत्मा को निरात्म (अहंभावरहित) देखकर वे इस योग से तेजस्वी रूप में शरीरों में प्रवेश करते हैं, और दैत्यों, देवताओं तथा मनुष्यों के बल में सबसे बलवान् हो जाते हैं।

श्लोक 45 (13.167.45)

एतत्तत्वमनाद्यन्तं यद्भवाननुपृच्छति । नित्यं वयमुपास्यामो योगधर्मं सनातनम् ॥

etattatvamanādyantaṃ yadbhavānanupṛcchati | nityaṃ vayamupāsyāmo yogadharmaṃ sanātanam

आप जिस अनादि-अनन्त तत्त्व के विषय में पूछ रहे हैं, उसी सनातन योगधर्म की हम नित्य उपासना करते हैं।

श्लोक 46 (13.167.46)

योगधर्मान्न धर्मोस्ति गरीयान्सुरसत्तम । एतद्धर्म हि धर्माणामपुनर्भवसंस्कृतम् ॥

yogadharmānna dharmosti garīyānsurasattama | etaddharma hi dharmāṇāmapunarbhavasaṃskṛtam

हे देवश्रेष्ठ, योगधर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं; धर्मों में यही वह धर्म है जो पुनर्जन्म की निवृत्ति के लिए संस्कृत है।

श्लोक 47 (13.167.47)

तत्वतः परमस्तीति केचिदाहुर्मनीषिणः । केचिदाहुः परं नास्ति ये ज्ञानफलमाश्रिताः ॥

tatvataḥ paramastīti kecidāhurmanīṣiṇaḥ | kecidāhuḥ paraṃ nāsti ye jñānaphalamāśritāḥ

कुछ मनीषी कहते हैं कि तत्त्व से भी परे कुछ है; और ज्ञान के फल का आश्रय लेने वाले कुछ कहते हैं कि इससे परे कुछ नहीं।

श्लोक 48 (13.167.48)

ज्ञानस्थः पुरुषस्त्वेष विकृतः स्वेन वर्णितः । ये ध्यानेनानुपश्यन्ति नित्यं योगपरायणाः ॥

jñānasthaḥ puruṣastveṣa vikṛtaḥ svena varṇitaḥ | ye dhyānenānupaśyanti nityaṃ yogaparāyaṇāḥ

ज्ञान में स्थित, विकृत और स्वयं के द्वारा वर्णित यह पुरुष उन्हें ध्यान से दिखाई देता है जो नित्य योग में तत्पर रहते हैं।

श्लोक 49 (13.167.49)

तमेव पुरुषं देवं केचिदेव महेश्वर । नित्यमन्यतमाः प्राहुर्ज्ञानं परमकं स्मृतम् ॥

tameva puruṣaṃ devaṃ kecideva maheśvara | nityamanyatamāḥ prāhurjñānaṃ paramakaṃ smṛtam

हे महेश्वर, कुछ उसी पुरुष देव को परम मानते हैं; दूसरे नित्य कहते हैं कि ज्ञान ही परम माना गया है।

श्लोक 50 (13.167.50)

ज्ञानमेव विनिर्मुक्ताः सांख्या गच्छन्ति केवलम् । चिन्ताध्यात्मनि चान्यत्र योगाः परमबुद्धयः ॥

jñānameva vinirmuktāḥ sāṃkhyā gacchanti kevalam | cintādhyātmani cānyatra yogāḥ paramabuddhayaḥ

साङ्ख्य केवल ज्ञान से मुक्त होकर कैवल्य को प्राप्त होते हैं; उच्च बुद्धि वाले योगी आत्मा में और अन्यत्र भी चिन्तन लगाते हैं।

श्लोक 51 (13.167.51)

उक्तमेतावदेतत्ते योगदर्शनमुत्तमम् । साङ्ख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि परिसंख्याविदर्शनम् ॥

uktametāvadetatte yogadarśanamuttamam | sāṅkhyajñānaṃ pravakṣyāmi parisaṃkhyāvidarśanam

योग का इतना उत्तम दर्शन मैंने आपको बता दिया। अब मैं साङ्ख्य-ज्ञान का, गणना जानने वालों के दर्शन का, वर्णन करूँगा।

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