Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 168

सनत्कुमार द्वारा रुद्र को सांख्य का उपदेश

सनत्कुमार रुद्र को सांख्य के तत्त्वों का क्रम बताते हैं: इन्द्रियों से मन, अहंकार, बुद्धि, महत्, अव्यक्त और पुरुष तक, और चौबीस तत्त्वों की गणना करते हैं। वे समझाते हैं कि अहंकार और तीन गुणों में उलझा हुआ, अप्रबुद्ध और बोधशील आत्मा बार-बार सृष्टि में कैसे आता है, और पचीसवें तथा छब्बीसवें का भेद क्या है। अन्त में वे इस ज्ञान को अज्ञान के सागर को पार करने का साधन कहते हैं और आगे तीन प्रकार के मोक्ष का वर्णन करने का वचन देते हैं।

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169

सनत्कुमार उवाच

श्लोक 1 (13.168.1)

इन्द्रियेभ्यो मनः पूर्वमहङ्कारस्ततः परम् । अहङ्कारात्परा बुद्धिर्बुद्धेः परतरं महत् ॥

indriyebhyo manaḥ pūrvamahaṅkārastataḥ param | ahaṅkārātparā buddhirbuddheḥ parataraṃ mahat

इन्द्रियों से पहले मन है, उससे परे अहंकार है; अहंकार से परे बुद्धि है और बुद्धि से भी परे महत् है।

श्लोक 2 (13.168.2)

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । एतावदेतत्सांख्यानां दर्शनं देवसत्तम ॥

mahataḥ paramavyaktamavyaktātpuruṣaḥ paraḥ | etāvadetatsāṃkhyānāṃ darśanaṃ devasattama

महत् से परे अव्यक्त है और अव्यक्त से परे पुरुष है। हे देवश्रेष्ठ, सांख्यों का दर्शन बस इतना ही है।

श्लोक 3 (13.168.3)

अव्यक्तं बुद्ध्यहङ्कारौ महाभूतानि पञ्च च । मनस्तथा विशेषाश्च दश चैवेन्द्रियाणि च । एतास्तत्वचतुर्विंशन्महापुरुषसम्मिताः ॥

avyaktaṃ buddhyahaṅkārau mahābhūtāni pañca ca | manastathā viśeṣāśca daśa caivendriyāṇi ca | etāstatvacaturviṃśanmahāpuruṣasammitāḥ

अव्यक्त, बुद्धि और अहंकार, पाँच महाभूत, मन, विशेष (विषय) और दस इन्द्रियाँ: ये चौबीस तत्त्व हैं, जिन्हें महापुरुष के तुल्य माना गया है।

श्लोक 4 (13.168.4)

बुध्यमानेन देवेश चेतनेन महात्मना । संयोगमेतयोर्नित्यमाहुरव्यक्तपुंसयोः ॥

budhyamānena deveśa cetanena mahātmanā | saṃyogametayornityamāhuravyaktapuṃsayoḥ

हे देवेश, जानने की ओर बढ़ते हुए महात्मा चेतन के द्वारा अव्यक्त और पुरुष का संयोग नित्य बताया गया है।

श्लोक 5 (13.168.5)

एकत्वं च बहुत्वं च सर्गप्रलयकोटिशः । तमःसंज्ञितमेतद्धि प्रवदन्ति त्रिशूलधृक् ॥

ekatvaṃ ca bahutvaṃ ca sargapralayakoṭiśaḥ | tamaḥsaṃjñitametaddhi pravadanti triśūladhṛk

एकत्व और बहुत्व, तथा करोड़ों सृष्टियाँ और प्रलय: हे त्रिशूलधारी, इसी को वे तमस् नाम से कहते हैं।

श्लोक 6 (13.168.6)

समुत्पाट्य यथाव्यक्ताज्जीवा यान्ति पुनःपुनः । आदिरेष महानात्मा गुणानामिति नः प्रभो ॥

samutpāṭya yathāvyaktājjīvā yānti punaḥpunaḥ | ādireṣa mahānātmā guṇānāmiti naḥ prabho

मानो अव्यक्त से उखड़कर जीव बार-बार निकलते हैं। हे प्रभो, हमारे मत में यह महान् आत्मा गुणों का आदि है।

श्लोक 7 (13.168.7)

गुणस्थत्वाद्गुणं चैनमाहुरव्यक्तलक्षणम् । एतेनाध्युषितो व्यक्तस्त्रिगुणं चेतयत्युत ॥

guṇasthatvādguṇaṃ cainamāhuravyaktalakṣaṇam | etenādhyuṣito vyaktastriguṇaṃ cetayatyuta

गुणों में स्थित होने के कारण इसे गुण भी कहते हैं; इसका लक्षण अव्यक्तता है। इससे अधिष्ठित होकर व्यक्त तीनों गुणों का बोध करता है।

श्लोक 8 (13.168.8)

अचेतनः प्रकृत्येषु न चान्यमनुबुध्यते । बुध्यमानो ह्यहंकारो नित्यं मानाप्रबोधनात् ॥

acetanaḥ prakṛtyeṣu na cānyamanubudhyate | budhyamāno hyahaṃkāro nityaṃ mānāprabodhanāt

प्रकृति के विकारों में अचेतन होने से वह किसी दूसरे को नहीं जान पाता। जानता हुआ-सा अहंकार सदा अभिमान के कारण ही जानता है, सच्चे बोध से नहीं।

श्लोक 9 (13.168.9)

विमलस्य विशुद्धस्य नीरुजस्य महात्मनः । विमलोदारशीलः स्याद्बुध्यमानाप्रबुद्धयोः ॥

vimalasya viśuddhasya nīrujasya mahātmanaḥ | vimalodāraśīlaḥ syādbudhyamānāprabuddhayoḥ

निर्मल, परम शुद्ध, निर्दोष और महान् आत्मा का स्वभाव, जानने वाले और न जागे हुए दोनों के प्रति, निर्मल और उदार होता है।

श्लोक 10 (13.168.10)

द्रष्टा भवत्यभोक्ता च सत्वमूर्तिश्च निर्गुणः । बुध्यमानाप्रबुद्धाभ्यामन्य एव तु निर्गुणः ॥

draṣṭā bhavatyabhoktā ca satvamūrtiśca nirguṇaḥ | budhyamānāprabuddhābhyāmanya eva tu nirguṇaḥ

वह द्रष्टा होता है, भोक्ता नहीं; सत्त्व की मूर्ति होकर भी निर्गुण है। जानने वाले और अप्रबुद्ध, दोनों से भिन्न जो है, वही सचमुच निर्गुण है।

श्लोक 11 (13.168.11)

उपेक्षकः शुचिस्ताभ्यामुभाभ्यामयुतस्तथा । बुध्यमानो न बुध्येत बुद्धमेवं सनातनम् ॥

upekṣakaḥ śucistābhyāmubhābhyāmayutastathā | budhyamāno na budhyeta buddhamevaṃ sanātanam

उदासीन, शुद्ध और उन दोनों से अलग, वह सनातन बुद्ध है; जानने वाला उसे नहीं जान पाता।

श्लोक 12 (13.168.12)

स एव बुद्धेरव्यक्तस्वभावत्वादचेतनः । सोहमेव न मेऽन्योस्ति य एवमभिमन्यते ॥

sa eva buddheravyaktasvabhāvatvādacetanaḥ | sohameva na me'nyosti ya evamabhimanyate

बुद्धि का स्वभाव अव्यक्त होने से वही अचेतन है। जो ऐसा मानता है, वह कहता है, "मैं वही हूँ, मुझसे भिन्न कोई नहीं।"

श्लोक 13 (13.168.13)

न मन्यते ममान्योस्ति येन चेतोस्म्यचेतनः । एवमेवाभिमन्येत बुध्यमानोप्यनात्मवान् ॥

na manyate mamānyosti yena cetosmyacetanaḥ | evamevābhimanyeta budhyamānopyanātmavān

वह यह नहीं मानता कि "मुझसे भिन्न कोई है, जिसके कारण मैं अचेतन होकर भी चेतन हूँ।" जानता हुआ भी आत्मज्ञान से रहित होकर वह ऐसा ही मानता है।

श्लोक 14 (13.168.14)

अहमेव न मेऽन्योस्ति न प्रबुद्धवशानुगः । अव्यक्तस्थो गुणानेष नित्यमेवाभिमन्यते ॥

ahameva na me'nyosti na prabuddhavaśānugaḥ | avyaktastho guṇāneṣa nityamevābhimanyate

"मैं ही हूँ, मुझसे भिन्न कोई नहीं, मैं प्रबुद्ध के वश में नहीं चलता।" अव्यक्त में स्थित रहकर वह सदा गुणों को अपना मानता है।

श्लोक 15 (13.168.15)

तेनाधिष्ठिततत्वज्ञैर्महद्भिरभिधीयते । अहङ्कारेण संयुक्तस्ततस्तमभिमन्यते ॥

tenādhiṣṭhitatatvajñairmahadbhirabhidhīyate | ahaṅkāreṇa saṃyuktastatastamabhimanyate

इसीलिए तत्त्वज्ञ महापुरुष कहते हैं कि वह उसी से अधिष्ठित है। अहंकार से युक्त होकर वह फिर उसे अपना मान लेता है।

श्लोक 16 (13.168.16)

क्षेत्रं प्रविश्य दुर्बुद्धिर्बुध्यमानो ह्यनात्मवान् । अहमेव सृजत्यन्यद्द्वितीयं लोकसारथिः ॥

kṣetraṃ praviśya durbuddhirbudhyamāno hyanātmavān | ahameva sṛjatyanyaddvitīyaṃ lokasārathiḥ

क्षेत्र में प्रवेश करके वह दुर्बुद्धि, जानता हुआ भी, आत्मवान् नहीं रहता। "अहम्" ही दूसरे, एक द्वितीय को रचता है, जो लोक का सारथि है।

श्लोक 17 (13.168.17)

सर्वभावैरहङ्कारैस्तृतीयं सर्गसंज्ञितम् । ततो भूतान्यहङ्कारमहङ्कारो मनोऽसृजत् ॥

sarvabhāvairahaṅkāraistṛtīyaṃ sargasaṃjñitam | tato bhūtānyahaṅkāramahaṅkāro mano'sṛjat

सब भावों और अहंकारों से तीसरी, सर्ग नाम की रचना हुई। फिर अहंकार ने भूतों को रचा और अहंकार ने ही मन को रचा।

श्लोक 18 (13.168.18)

सर्वस्रोतस्यभिमुखं सम्प्रावर्तत बुद्धिमान् । तथैव यज्ञे भूतेषु विषयार्थी पुनःपुनः । इन्द्रियैः सह शूलाङ्क पञ्च पञ्चभिरेव च ॥

sarvasrotasyabhimukhaṃ samprāvartata buddhimān | tathaiva yajñe bhūteṣu viṣayārthī punaḥpunaḥ | indriyaiḥ saha śūlāṅka pañca pañcabhireva ca

बुद्धिमान् सब धाराओं की ओर मुख करके प्रवृत्त हुआ; वैसे ही यज्ञ में और भूतों में बार-बार विषयों की चाह करता हुआ, हे शूलांकधारी, पाँच और पाँच इन्द्रियों के साथ।

श्लोक 19 (13.168.19)

मनो वेद न चात्मानमहङ्कारं प्रजापतिः । न वेद वाप्यहङ्कारो बुद्धिं बुद्धिमतांवर ॥

mano veda na cātmānamahaṅkāraṃ prajāpatiḥ | na veda vāpyahaṅkāro buddhiṃ buddhimatāṃvara

मन आत्मा को नहीं जानता; प्रजापति अहंकार को नहीं जानता; और हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, अहंकार बुद्धि को नहीं जानता।

श्लोक 20 (13.168.20)

एवमेते महाभाग नेतरे नयवादिनः । अहङ्कारेण संयुक्तः स्रोतस्यभिमुखः सदा ॥

evamete mahābhāga netare nayavādinaḥ | ahaṅkāreṇa saṃyuktaḥ srotasyabhimukhaḥ sadā

हे महाभाग, इनकी यही स्थिति है, अन्यथा नहीं, ऐसा न्यायवादी कहते हैं। अहंकार से युक्त होकर वह सदा धारा की ओर मुख किए रहता है।

श्लोक 21 (13.168.21)

एवमेष विकारात्मा महापुरुषसञ्ज्ञकः । प्रतनोति जगत्कृत्स्नं पुनराददतेऽसकृत् ॥

evameṣa vikārātmā mahāpuruṣasañjñakaḥ | pratanoti jagatkṛtsnaṃ punarādadate'sakṛt

इस प्रकार महापुरुष नाम का यह विकारात्मा सारे जगत् को फैलाता है और बार-बार फिर समेट लेता है।

श्लोक 22 (13.168.22)

ससंज्ञत्वाज्जगत्कृत्स्नमव्यक्तस्य हृदि स्थितम् । संविशद्रजनीं कृत्स्नां निशान्ते दिवसागमे ॥

sasaṃjñatvājjagatkṛtsnamavyaktasya hṛdi sthitam | saṃviśadrajanīṃ kṛtsnāṃ niśānte divasāgame

चेतना से युक्त होने के कारण सारा जगत् अव्यक्त के हृदय में स्थित रहता है; वह पूरी रात उसमें प्रवेश किए रहता है, जब तक रात का अन्त होकर दिन नहीं आता।

श्लोक 23 (13.168.23)

पुनरात्मा विजयते बहवो निर्गुणास्तथा । अज्ञानेन समायुक्तः सोव्यक्तेन तमोत्मना ॥

punarātmā vijayate bahavo nirguṇāstathā | ajñānena samāyuktaḥ sovyaktena tamotmanā

आत्मा फिर विजयी होता है, और बहुत-से निर्गुण भी होते हैं। अज्ञान से युक्त होकर वह तमोमय अव्यक्त के साथ रहता है।

श्लोक 24 (13.168.24)

यदि ह्येषो नु मन्येत ममास्ति परतो वरः । स पुनः पुनरात्मानं न कुर्यादाक्षिपेत च ॥

yadi hyeṣo nu manyeta mamāsti parato varaḥ | sa punaḥ punarātmānaṃ na kuryādākṣipeta ca

यदि वह सोचे कि "मुझसे परे कोई श्रेष्ठ है," तो वह बार-बार अपने को रचता नहीं रहेगा और उसे त्याग देगा।

श्लोक 25 (13.168.25)

एतमव्यक्तविषयं सूक्ष्मं मन्येत बुद्धिमान् । पञ्चविंशं महादेव महापुरुषवैकृतम् ॥

etamavyaktaviṣayaṃ sūkṣmaṃ manyeta buddhimān | pañcaviṃśaṃ mahādeva mahāpuruṣavaikṛtam

हे महादेव, बुद्धिमान् इसे अव्यक्त का सूक्ष्म विषय और महापुरुष का विकार, पचीसवाँ तत्त्व, माने।

श्लोक 26 (13.168.26)

प्रबुद्धौ बुद्धवानेतत्सृजमानमबुद्धवान् । गुणान्पुनश्च तानेव सोत्मनात्मनि निक्षिपेत् ॥

prabuddhau buddhavānetatsṛjamānamabuddhavān | guṇānpunaśca tāneva sotmanātmani nikṣipet

जागने पर उसने इसे जाना; जब यह रच रहा था, तब नहीं जाना था। वह उन्हीं गुणों को फिर आत्मा के द्वारा आत्मा में स्थापित कर दे।

श्लोक 27 (13.168.27)

अव्यक्तस्य वशीभूतो योऽज्ञानस्य तमोत्मनः । बुध्यमानो ह्यबुद्धस्य बुद्धस्तदनुभुज्यते ॥

avyaktasya vaśībhūto yo'jñānasya tamotmanaḥ | budhyamāno hyabuddhasya buddhastadanubhujyate

जो अव्यक्त और तमोमय अज्ञान के वश में हो गया है, वह जानता हुआ भी अप्रबुद्ध का है; तब उसके द्वारा बुद्ध का अनुभव किया जाता है।

श्लोक 28 (13.168.28)

उपेक्षकः शुचिर्व्यग्रः सोलिङ्गः सोव्रणोऽमलः । षड्विंशो भगवानास्ते बुद्धः शुद्धो निरामयः ॥

upekṣakaḥ śucirvyagraḥ soliṅgaḥ sovraṇo'malaḥ | ṣaḍviṃśo bhagavānāste buddhaḥ śuddho nirāmayaḥ

उदासीन, शुद्ध, निर्विकार, लिंगरहित, व्रणरहित और निर्मल, छब्बीसवें भगवान् जागे हुए, शुद्ध और रोगरहित होकर स्थित हैं।

श्लोक 29 (13.168.29)

अव्यक्तादिविशेषान्तमेतद्वैद्या वदन्त्युत । एतैरेव विहीनं तु केचिदाहुर्मनीषिणः ॥

avyaktādiviśeṣāntametadvaidyā vadantyuta | etaireva vihīnaṃ tu kecidāhurmanīṣiṇaḥ

विद्वान् कहते हैं कि यह सब अव्यक्त से लेकर विशेषों तक है। पर कुछ मनीषी इसे इन्हीं से रहित बताते हैं।

श्लोक 30 (13.168.30)

निस्तत्वं बुध्यमानास्तु केचिदाहुर्महामते । केचिदाहुर्महात्मानस्तत्वसंज्ञितमेव तु ॥

nistatvaṃ budhyamānāstu kecidāhurmahāmate | kecidāhurmahātmānastatvasaṃjñitameva tu

हे महामते, जानने वालों में कुछ इसे निस्तत्त्व कहते हैं, और कुछ महात्मा इसे तत्त्व नाम से ही कहते हैं।

श्लोक 31 (13.168.31)

तत्वस्य श्रवणादेनं तत्वमेवं वदन्ति वै । सत्वसंश्रयणाच्चैव सत्ववन्तं महेश्वर ॥

tatvasya śravaṇādenaṃ tatvamevaṃ vadanti vai | satvasaṃśrayaṇāccaiva satvavantaṃ maheśvara

तत्त्व के श्रवण के कारण इसे तत्त्व ही कहते हैं, और सत्त्व का आश्रय लेने के कारण, हे महेश्वर, सत्त्ववान् कहते हैं।

श्लोक 32 (13.168.32)

एवमेष विकारात्मा बुध्यमानो महाभुज । अव्यक्तो भवते व्यक्तौ सत्वंसत्वं तथा गुणौ । विद्या च भवतेऽविद्या भवेत्तु ग्रहसंज्ञितम् ॥

evameṣa vikārātmā budhyamāno mahābhuja | avyakto bhavate vyaktau satvaṃsatvaṃ tathā guṇau | vidyā ca bhavate'vidyā bhavettu grahasaṃjñitam

हे महाबाहु, इस प्रकार यह विकारात्मा जानते-जानते व्यक्त में अव्यक्त हो जाता है: सत्त्व, सत्त्व और दोनों गुण भी। विद्या अविद्या बन जाती है, और वह ग्रह नाम की स्थिति बन जाए।

श्लोक 33 (13.168.33)

य एवमनुबुध्यन्ते योगसाङ्ख्याश्च तत्वतः । तेऽव्यक्तं शङ्करागाढं मुञ्चन्ते शास्त्रबुद्धयः ॥

ya evamanubudhyante yogasāṅkhyāśca tatvataḥ | te'vyaktaṃ śaṅkarāgāḍhaṃ muñcante śāstrabuddhayaḥ

जो योगी और सांख्य इसे इस प्रकार तत्त्व से समझते हैं, वे शास्त्र-बुद्धि वाले, हे शंकर, गाढ़ चिपके हुए अव्यक्त को छोड़ देते हैं।

श्लोक 34 (13.168.34)

तेषामेतत्तु वदतां शास्त्रार्थं सूक्ष्मदर्शिनाम् । बुद्धिर्विस्तीर्यते सर्वं तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥

teṣāmetattu vadatāṃ śāstrārthaṃ sūkṣmadarśinām | buddhirvistīryate sarvaṃ tailabindurivāmbhasi

ऐसे शास्त्रार्थ को कहते हुए उन सूक्ष्मदर्शियों की बुद्धि सब ओर फैल जाती है, जैसे जल पर तेल की बूँद।

श्लोक 35 (13.168.35)

विद्या तु सर्वविद्यानामवबोध इति स्मृतः । येन विद्यामविद्यां च विन्दन्ति यतिसत्तमाः ॥

vidyā tu sarvavidyānāmavabodha iti smṛtaḥ | yena vidyāmavidyāṃ ca vindanti yatisattamāḥ

सब विद्याओं की विद्या अवबोध कही गई है, जिससे श्रेष्ठ यति विद्या और अविद्या दोनों को पा लेते हैं।

श्लोक 36 (13.168.36)

सैषा त्रयी परा विद्या चतुर्थ्यान्वीक्षिकी स्मृता । यां बुध्यमानो बुध्येत बुद्ध्यात्मनि समं गतः ॥

saiṣā trayī parā vidyā caturthyānvīkṣikī smṛtā | yāṃ budhyamāno budhyeta buddhyātmani samaṃ gataḥ

यही परा विद्या त्रयी है और चौथी आन्वीक्षिकी कही गई है, जिसके द्वारा जानने वाला बुद्धि-रूप आत्मा में समता को प्राप्त होकर जाग सकता है।

श्लोक 37 (13.168.37)

अप्रबुद्धमथाव्यक्तमविद्यासंज्ञिकं स्मृतम् । विमोहितं तु शोकेन केवलेन समन्वितम् । एतद्बुद्ध्या भवेद्बुद्धः किमन्यद्बुद्धिलक्षणम् ॥

aprabuddhamathāvyaktamavidyāsaṃjñikaṃ smṛtam | vimohitaṃ tu śokena kevalena samanvitam | etadbuddhyā bhavedbuddhaḥ kimanyadbuddhilakṣaṇam

अप्रबुद्ध अव्यक्त अविद्या नाम से स्मरण किया गया है; वह मोहित है और केवल शोक से युक्त है। इसे समझकर मनुष्य बुद्ध हो सकता है; बोध का और कौन-सा लक्षण है?

श्लोक 38 (13.168.38)

ये त्वेतन्नावबुध्यन्ते ते प्रबुद्धवशानुगाः । ते पुनःपुनरव्यक्ताज्जनिष्यन्त्यबुधात्मनः ॥

ye tvetannāvabudhyante te prabuddhavaśānugāḥ | te punaḥpunaravyaktājjaniṣyantyabudhātmanaḥ

जो इसे नहीं समझते, वे प्रबुद्ध के वश में चलने वाले हैं; वे अबोध आत्मा वाले बार-बार अव्यक्त से जन्म लेंगे।

श्लोक 39 (13.168.39)

तमेव तुलयिष्यन्ति अबुद्धिवशवर्तिनः । ये चाप्यन्ये तन्मनसस्तेप्येतत्फलभागिनः ॥

tameva tulayiṣyanti abuddhivaśavartinaḥ | ye cāpyanye tanmanasastepyetatphalabhāginaḥ

जो अबुद्धि के वश में रहते हैं, वे उसी को तौलेंगे; और जो दूसरे उसी में मन लगाए हैं, वे भी इसके फल के भागी होते हैं।

श्लोक 40 (13.168.40)

विदित्वैनं न शोचन्ति योगोपेतार्थदर्शिनः । स्वातन्त्र्यं प्रतिलप्स्यन्ते केवलत्वं च भास्वरम् ॥

viditvainaṃ na śocanti yogopetārthadarśinaḥ | svātantryaṃ pratilapsyante kevalatvaṃ ca bhāsvaram

इसे जानकर योग से युक्त, अर्थ को देखने वाले शोक नहीं करते; वे स्वतन्त्रता और तेजोमय कैवल्य को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 41 (13.168.41)

अज्ञानबन्धनान्मुक्तास्तीर्णाः संसारबन्धनात् । अज्ञानसागरं घोरमगाधं तमसंज्ञकम् । यत्र मज्जन्ति भूतानि पुनःपुनररिंदम ॥

ajñānabandhanānmuktāstīrṇāḥ saṃsārabandhanāt | ajñānasāgaraṃ ghoramagādhaṃ tamasaṃjñakam | yatra majjanti bhūtāni punaḥpunarariṃdama

वे अज्ञान के बन्धन से मुक्त हो गए और संसार के बन्धन से तर गए, उस भयंकर, अथाह अज्ञान-सागर से, जिसका नाम तमस् है और जिसमें हे अरिंदम, प्राणी बार-बार डूबते हैं।

श्लोक 42 (13.168.42)

एषा विद्या तथाऽविद्या कथिता ते मयाऽर्थतः । यस्मिन्देयं च नो ग्राह्यं सांख्याः सांख्यं तथैव च ॥

eṣā vidyā tathā'vidyā kathitā te mayā'rthataḥ | yasmindeyaṃ ca no grāhyaṃ sāṃkhyāḥ sāṃkhyaṃ tathaiva ca

यह विद्या और यह अविद्या मैंने तुम्हें सार रूप में कह दी, जिसमें देने योग्य ग्रहण करने योग्य नहीं है; सांख्य और सांख्य-शास्त्र भी वैसे ही।

श्लोक 43 (13.168.43)

तथा चैकत्वनानात्वमक्षरं क्षरमेव च । निगदिष्यामि देवेश विमोक्षं त्रिविधं च ते ॥

tathā caikatvanānātvamakṣaraṃ kṣarameva ca | nigadiṣyāmi deveśa vimokṣaṃ trividhaṃ ca te

और एकत्व तथा नानात्व, अक्षर और क्षर भी; हे देवेश, मैं तुम्हें तीन प्रकार का विमोक्ष भी बताऊँगा।

श्लोक 44 (13.168.44)

बुध्यमानाप्रबुद्धाभ्यामबुद्धस्य प्रपञ्चनम् । भूय एव निबोध त्वं देवानां देवसत्तम ॥

budhyamānāprabuddhābhyāmabuddhasya prapañcanam | bhūya eva nibodha tvaṃ devānāṃ devasattama

जानने वाले और अप्रबुद्ध के द्वारा अबुद्ध का विस्तार, हे देवों में श्रेष्ठ देव, उसे फिर सुनो।

श्लोक 45 (13.168.45)

यच्च किञ्च श्रुतं न स्याद्दृष्टं चैव न किञ्चन । तच्च ते सम्प्रवक्ष्यामि एकाग्रः शृणु तत्परः ॥

yacca kiñca śrutaṃ na syāddṛṣṭaṃ caiva na kiñcana | tacca te sampravakṣyāmi ekāgraḥ śṛṇu tatparaḥ

जो कुछ सुना नहीं गया हो और जिसका कुछ भी देखा न गया हो, वह मैं तुम्हें कहूँगा; एकाग्र और तत्पर होकर सुनो।

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169