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अनुशासन पर्व · अध्याय 169

सनत्कुमार द्वारा मृत्यु के लक्षण और मोक्ष का उपदेश

सनत्कुमार रुद्र को वे अपशकुन बताते हैं जिनसे मनुष्य जान सकता है कि उसकी मृत्यु निकट है: उत्तर में बिजली के आकार का पुरुष दिखना, किरणहीन सूर्य, छिद्रों वाली चन्द्र-छाया, भीतर की ध्वनि न सुनाई देना और कच्चे मांस की गन्ध आना। वे यह भी बताते हैं कि सब अंगों में धारणा करने से मनुष्य मृत्यु को जीत सकता है या इच्छा से देह त्याग सकता है। फिर वे एकत्व और नानात्व, विकारपुरुष और पचीसवें तत्त्व, कपिल से यह ज्ञान पाने वाले ऋषियों, तथा तीन प्रकार के बन्धन और मोक्ष का वर्णन करते हैं। अन्त में भीष्म कहते हैं कि सनत्कुमार आकाश में चले गए।

अध्याय 168अध्याय-सूचीअध्याय 170

सनत्कुमार उवाच

श्लोक 1 (13.169.1)

अरिष्टानि प्रवक्ष्यामि तत्वेन शृणु तद्भवान् । मध्य उत्तरतस्तात दक्षिणामुखनिष्ठितम् ॥

ariṣṭāni pravakṣyāmi tatvena śṛṇu tadbhavān | madhya uttaratastāta dakṣiṇāmukhaniṣṭhitam

मैं तुम्हें मृत्यु के अपशकुन यथार्थ रूप में बताऊँगा; उन्हें सुनो। हे तात, बीच में, उत्तर की ओर, दक्षिणमुख खड़े हुए,

श्लोक 2 (13.169.2)

विद्युत्संस्थानपुरुषं यदि पश्येत मानवः । वर्षत्रयेण जानीयाद्देहन्यासमुपस्थितम् । एतत्फलमरिष्टस्य शङ्कराहुर्मनीषिणः ॥

vidyutsaṃsthānapuruṣaṃ yadi paśyeta mānavaḥ | varṣatrayeṇa jānīyāddehanyāsamupasthitam | etatphalamariṣṭasya śaṅkarāhurmanīṣiṇaḥ

यदि कोई मनुष्य बिजली के आकार का पुरुष देखे, तो वह जान ले कि तीन वर्ष में देहत्याग उपस्थित होगा। हे शंकर, मनीषी इसे उस अपशकुन का फल कहते हैं।

श्लोक 3 (13.169.3)

शुद्धमण्डलमादित्यमरश्मिमथ पश्यतः । वर्षार्धकेन जानीयाद्देहन्यासमुपस्थितम् ॥

śuddhamaṇḍalamādityamaraśmimatha paśyataḥ | varṣārdhakena jānīyāddehanyāsamupasthitam

जो सूर्य के मण्डल को शुद्ध और किरणों से रहित देखता है, वह जान ले कि आधे वर्ष में देहत्याग उपस्थित होगा।

श्लोक 4 (13.169.4)

छिद्रां चन्द्रमसश्छायां पादावप्यनुपश्यतः । संवत्सरेण जानीयाद्देहन्यासमुपस्थितम् ॥

chidrāṃ candramasaśchāyāṃ pādāvapyanupaśyataḥ | saṃvatsareṇa jānīyāddehanyāsamupasthitam

जो चन्द्रमा की छाया को छिद्रों वाली देखता है और दोनों पैर भी देखता है, वह जान ले कि एक वर्ष में देहत्याग उपस्थित होगा।

श्लोक 5 (13.169.5)

कनीनिकायामशिरःपुरुषं यदि पश्यति । जानीयात्षट्सु मासेषु देहन्यासमुपस्थितम् ॥

kanīnikāyāmaśiraḥpuruṣaṃ yadi paśyati | jānīyātṣaṭsu māseṣu dehanyāsamupasthitam

यदि वह अपनी आँख की पुतली में सिर के बिना पुरुष देखे, तो जान ले कि छह महीने में देहत्याग उपस्थित होगा।

श्लोक 6 (13.169.6)

कर्णौ पिधाय हस्ताभ्यां शब्दं न शृणुयाद्यदि । विजानीयात्तु मासेन देहन्यासमुपस्थितम् ॥

karṇau pidhāya hastābhyāṃ śabdaṃ na śṛṇuyādyadi | vijānīyāttu māsena dehanyāsamupasthitam

यदि हाथों से कान बन्द करने पर उसे कोई शब्द सुनाई न दे, तो वह जान ले कि एक महीने में देहत्याग उपस्थित होगा।

श्लोक 7 (13.169.7)

आमगन्धमुपाघ्राति सुरभिं प्राप्य भास्वरम् । देवतायतनस्थोपि सप्तरात्रेण मृत्युभाक् ॥

āmagandhamupāghrāti surabhiṃ prāpya bhāsvaram | devatāyatanasthopi saptarātreṇa mṛtyubhāk

जो सुगन्धित और चमकती वस्तु के पास पहुँचकर कच्चे मांस की गन्ध सूँघता है, वह देवमन्दिर में रहता हुआ भी सात रात में मृत्यु को प्राप्त होता है।

श्लोक 8 (13.169.8)

सर्वाङ्गधारणावस्थां धारयेत समाहितः । यथा स मृत्युं जयति नान्यथेह महेश्वर । यदि जीवितुमिच्छेत चिरकालं महामुने ॥

sarvāṅgadhāraṇāvasthāṃ dhārayeta samāhitaḥ | yathā sa mṛtyuṃ jayati nānyatheha maheśvara | yadi jīvitumiccheta cirakālaṃ mahāmune

वह एकाग्र होकर सब अंगों की धारणा की अवस्था को धारण करे; इसी से वह मृत्यु को जीतता है, अन्यथा नहीं, हे महेश्वर, यदि वह, हे महामुने, दीर्घकाल तक जीना चाहे।

श्लोक 9 (13.169.9)

अथ नेच्छेच्चिरं कालं त्यजेदात्मानमात्मना । केवलं चिन्तयानस्तु निष्कलं स निरामयम् ॥

atha necchecciraṃ kālaṃ tyajedātmānamātmanā | kevalaṃ cintayānastu niṣkalaṃ sa nirāmayam

और यदि वह देर तक रहना न चाहे, तो केवल निष्कल, निर्मल तत्त्व का ध्यान करते हुए अपने आप देह त्याग दे।

श्लोक 10 (13.169.10)

अथ तं निर्विकारं तु प्रकृतेः परमं शुचिः । पुरुषं देहसाधर्म्यं देहन्यासमुपाश्नुयात् ॥

atha taṃ nirvikāraṃ tu prakṛteḥ paramaṃ śuciḥ | puruṣaṃ dehasādharmyaṃ dehanyāsamupāśnuyāt

तब शुद्ध होकर वह प्रकृति से परे, निर्विकार पुरुष को, जो देह के साथ समान धर्म वाला है, प्राप्त करे और देहत्याग को पहुँचे।

श्लोक 11 (13.169.11)

जाग्रतो हि मयोक्तानि तवारिष्टानि तत्वतः । धारणाच्चैव सर्वाङ्गे मृत्युं जीयात्सुरर्षभ ॥

jāgrato hi mayoktāni tavāriṣṭāni tatvataḥ | dhāraṇāccaiva sarvāṅge mṛtyuṃ jīyātsurarṣabha

ये अपशकुन मैंने तुम्हें जाग्रत् अवस्था के लिए यथार्थ रूप में कहे; और हे सुरश्रेष्ठ, सब अंगों में धारणा करने से मृत्यु को जीता जा सकता है।

श्लोक 12 (13.169.12)

एकत्वदर्शनं भूयो नानात्वं च निबोध मे । अक्षरं च क्षरं चैव चतुष्टयविधानतः ॥

ekatvadarśanaṃ bhūyo nānātvaṃ ca nibodha me | akṣaraṃ ca kṣaraṃ caiva catuṣṭayavidhānataḥ

एकत्व के दर्शन और नानात्व को, तथा अक्षर और क्षर को, चार प्रकार के विभाग से फिर मुझसे सुनो।

श्लोक 13 (13.169.13)

अव्यक्तादीनि तत्वानि सर्वाण्येव महाद्युते । आहुश्चतुर्विंशतितमं विकारपुरुषान्वितम् ॥

avyaktādīni tatvāni sarvāṇyeva mahādyute | āhuścaturviṃśatitamaṃ vikārapuruṣānvitam

हे महाद्युते, अव्यक्त से आरम्भ होने वाले सभी तत्त्व चौबीसवें तक गिने जाते हैं, जो विकारपुरुष से युक्त है।

श्लोक 14 (13.169.14)

एकत्वदर्शनं चैव नानात्वेन वरं स्मृतम् । पञ्चविंशतिवर्गः स्यादपवर्गोऽजरामरः ॥

ekatvadarśanaṃ caiva nānātvena varaṃ smṛtam | pañcaviṃśativargaḥ syādapavargo'jarāmaraḥ

एकत्व का दर्शन नानात्व से श्रेष्ठ माना गया है; पचीस का वर्ग अपवर्ग है, जरा और मृत्यु से रहित।

श्लोक 15 (13.169.15)

स निर्विकारः पुरुषस्तत्वेनैवोपदिश्यते । स एव पञ्चविंशस्तु विकारः पुरुषः स्मृतः ॥

sa nirvikāraḥ puruṣastatvenaivopadiśyate | sa eva pañcaviṃśastu vikāraḥ puruṣaḥ smṛtaḥ

वह निर्विकार पुरुष तत्त्व के रूप में ही उपदिष्ट होता है; वही पचीसवाँ विकारपुरुष माना गया है।

श्लोक 16 (13.169.16)

यद्येष निर्विकारः स्यात्तत्वं न तु भवेद्भव । विकारो विद्यमानस्तु तत्वसंज्ञकमुच्यते ॥

yadyeṣa nirvikāraḥ syāttatvaṃ na tu bhavedbhava | vikāro vidyamānastu tatvasaṃjñakamucyate

हे भव, यदि वह निर्विकार होता तो तत्त्व न होता; विद्यमान विकार ही तत्त्व नाम से कहा जाता है।

श्लोक 17 (13.169.17)

यद्येषोऽव्यक्ततां नैति व्यतिरेकान्न संशयः । तथा भवति निस्तत्वस्तथा सत्वस्तथागुणः ॥

yadyeṣo'vyaktatāṃ naiti vyatirekānna saṃśayaḥ | tathā bhavati nistatvastathā satvastathāguṇaḥ

यदि यह अव्यक्तता को प्राप्त नहीं होता, तो भेद के कारण, इसमें संशय नहीं, वह तत्त्वरहित भी होता है, सत्त्वयुक्त भी और गुणयुक्त भी।

श्लोक 18 (13.169.18)

विकारगुणसंत्यागात्प्रकृत्यन्यत्वतः शुचिः । तदा नानात्वतामेति सर्गहीनोऽपवर्गभाक् ॥

vikāraguṇasaṃtyāgātprakṛtyanyatvataḥ śuciḥ | tadā nānātvatāmeti sargahīno'pavargabhāk

विकारों और गुणों को त्यागकर और प्रकृति से भिन्न होकर शुद्ध पुरुष तब नानात्व को प्राप्त होता है, सर्ग से रहित और अपवर्ग का भागी।

श्लोक 19 (13.169.19)

बोध्यमानः प्रबुध्येत समो भवति बुद्धिमान् । अक्षरश्च भवत्येष यथावा च्युतवान्क्षणात् ॥

bodhyamānaḥ prabudhyeta samo bhavati buddhimān | akṣaraśca bhavatyeṣa yathāvā cyutavānkṣaṇāt

बोध पाने वाला जाग जाता है और बुद्धिमान् सम हो जाता है; वह अक्षर हो जाता है, मानो क्षण भर में च्युत हो गया हो।

श्लोक 20 (13.169.20)

अव्यक्ताव्यक्तिरुक्ता स्यान्निर्गुणस्य गुणाकरात् । एतदेकत्वनानात्वमक्षरः क्षर एव च ॥

avyaktāvyaktiruktā syānnirguṇasya guṇākarāt | etadekatvanānātvamakṣaraḥ kṣara eva ca

निर्गुण के लिए अव्यक्त की अभिव्यक्ति गुणों की खान से कही गई है। यही एकत्व और नानात्व है, अक्षर और क्षर है।

श्लोक 21 (13.169.21)

व्याख्यातं तव शूलाङ्क तथारिष्टानि चैव हि । विमोक्षलक्षणं शेषं तदपीह ब्रवीमि ते । यं ज्ञात्वा यतयः प्राप्ताः केवलत्वमनामयम् ॥

vyākhyātaṃ tava śūlāṅka tathāriṣṭāni caiva hi | vimokṣalakṣaṇaṃ śeṣaṃ tadapīha bravīmi te | yaṃ jñātvā yatayaḥ prāptāḥ kevalatvamanāmayam

हे शूलांक, यह तुम्हें समझा दिया गया, और अपशकुन भी। मोक्ष का शेष लक्षण मैं तुम्हें यहाँ और बताता हूँ, जिसे जानकर यति निर्मल कैवल्य को प्राप्त हुए।

श्लोक 22 (13.169.22)

साङ्ख्याश्चाप्यथ योगाश्च दग्धपङ्का गतज्वराः । अमूर्तित्वमनुप्राप्ता निर्गुणा निर्भया भव ॥

sāṅkhyāścāpyatha yogāśca dagdhapaṅkā gatajvarāḥ | amūrtitvamanuprāptā nirguṇā nirbhayā bhava

सांख्य और योगी दोनों, जिनका कीचड़ जल चुका और जिनके ताप शान्त हो गए, अमूर्त अवस्था को प्राप्त हुए हैं; तुम निर्गुण और निर्भय होओ।

श्लोक 23 (13.169.23)

विपाप्मानो महादेव मुक्ताः संसारसागरात् । सरणे प्रजनादाने गुणानां प्रकृतिः सदा । परा प्रमत्ता सततमेतावत्कार्यकारणम् ॥

vipāpmāno mahādeva muktāḥ saṃsārasāgarāt | saraṇe prajanādāne guṇānāṃ prakṛtiḥ sadā | parā pramattā satatametāvatkāryakāraṇam

हे महादेव, पापरहित होकर वे संसार-सागर से मुक्त हो गए। निकलने में, उत्पन्न करने में और समेटने में गुणों की प्रकृति सदा परे और सदा असावधान है; कार्य और कारण बस इतना ही है।

श्लोक 24 (13.169.24)

असच्चैव च सच्चैव कुरुते स पुनः पुनः । चैतन्येन पुराणेन चेतनाचेतनात्परः ॥

asaccaiva ca saccaiva kurute sa punaḥ punaḥ | caitanyena purāṇena cetanācetanātparaḥ

वह बार-बार असत् और सत् को रचता है; पुरातन चैतन्य के द्वारा वह चेतन और अचेतन से परे है।

श्लोक 25 (13.169.25)

यस्तु चेतयते चेतो मनसा चैकबुद्धिकम् । स नैव सन्न चैवासन्सदसन्न च संस्मृतः ॥

yastu cetayate ceto manasā caikabuddhikam | sa naiva sanna caivāsansadasanna ca saṃsmṛtaḥ

जो एकबुद्धि वाला मन से चित्त को चेतन करता है, वह न सत् है, न असत्, और न सत्-असत् दोनों ही माना गया है।

श्लोक 26 (13.169.26)

व्यतिरिक्तश्च शुद्धश्च सोऽन्यश्चाप्रकृतिस्तथा । उपेक्षकश्च प्रकृतेर्विकारपुरुषः स्मृतः ॥

vyatiriktaśca śuddhaśca so'nyaścāprakṛtistathā | upekṣakaśca prakṛtervikārapuruṣaḥ smṛtaḥ

भिन्न और शुद्ध, प्रकृति से अन्य और प्रकृतिरहित, तथा प्रकृति के प्रति उदासीन, वह विकारपुरुष माना गया है।

श्लोक 27 (13.169.27)

विकारपुरुषेणैषा संयुक्ता सृजते जगत् । पुनराददते चैव गुणानामन्यथात्मनि ॥

vikārapuruṣeṇaiṣā saṃyuktā sṛjate jagat | punarādadate caiva guṇānāmanyathātmani

विकारपुरुष से संयुक्त होकर यह जगत् की सृष्टि करती है, और फिर गुणों को दूसरे प्रकार से आत्मा में समेट लेती है।

श्लोक 28 (13.169.28)

मत्स्योदकात्ससंज्ञातः प्रकृतेरेव कर्मणः । तद्वत्क्षेत्रसहस्राणि स एव प्रकरिष्यति ॥

matsyodakātsasaṃjñātaḥ prakṛtereva karmaṇaḥ | tadvatkṣetrasahasrāṇi sa eva prakariṣyati

जैसे प्रकृति के ही कर्म से मछली जल से उत्पन्न होती है, वैसे ही वही हजारों क्षेत्रों को रचेगा।

श्लोक 29 (13.169.29)

क्षेत्रप्रलयतज्ज्ञस्तु क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते । संयोगो नित्य इत्याहुर्ये जनास्तत्वदर्शिनः ॥

kṣetrapralayatajjñastu kṣetrajña iti cocyate | saṃyogo nitya ityāhurye janāstatvadarśinaḥ

जो क्षेत्रों के प्रलय को जानता है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। तत्त्वदर्शी लोग कहते हैं कि संयोग नित्य है।

श्लोक 30 (13.169.30)

एवमेष ह्यसत्सच्च विकारपुरुषः स्मृतः । विकारापद्यमानं तु विकृतिं प्रवदन्ति नः ॥

evameṣa hyasatsacca vikārapuruṣaḥ smṛtaḥ | vikārāpadyamānaṃ tu vikṛtiṃ pravadanti naḥ

इस प्रकार यह, सत् और असत् दोनों, विकारपुरुष माना गया है; और जो विकार को प्राप्त होता है, उसे हम विकृति कहते हैं।

श्लोक 31 (13.169.31)

यदा त्वेष विकारस्य प्रकृतानिति मन्यते । तदा विकारतामेति विकारान्यत्वतां व्रजेत् ॥

yadā tveṣa vikārasya prakṛtāniti manyate | tadā vikāratāmeti vikārānyatvatāṃ vrajet

जब यह उन्हें विकार से उत्पन्न मानता है, तब वह विकार-भाव को प्राप्त होता है; और विकार से भिन्न होने की स्थिति को भी जा सकता है।

श्लोक 32 (13.169.32)

प्रकृत्या च विकारैश्च व्यतिरिक्तो यदा भवेत् । शुचि यत्परमं शुद्धं प्रतिबुद्धं सनातनम् । अयुक्तं निष्कलं शुद्धमव्ययं चाजरामरम् ॥

prakṛtyā ca vikāraiśca vyatirikto yadā bhavet | śuci yatparamaṃ śuddhaṃ pratibuddhaṃ sanātanam | ayuktaṃ niṣkalaṃ śuddhamavyayaṃ cājarāmaram

जब वह प्रकृति और विकारों से भिन्न हो जाता है, तब वह शुद्ध, परम निर्मल, प्रबुद्ध और सनातन है, अयुक्त, निष्कल, शुद्ध, अव्यय, अजर और अमर।

श्लोक 33 (13.169.33)

समेत्य तेन शुद्धेन बुध्यमानः स भास्वरः । विमोक्षं भजते व्यक्तादप्रबुद्धादचेतनात् ॥

sametya tena śuddhena budhyamānaḥ sa bhāsvaraḥ | vimokṣaṃ bhajate vyaktādaprabuddhādacetanāt

उस शुद्ध के साथ मिलकर जानने वाला तेजस्वी पुरुष व्यक्त, अप्रबुद्ध और अचेतन से मोक्ष पाता है।

श्लोक 34 (13.169.34)

उदुम्बराद्वा मशकः प्रलयान्निर्गतो यथा । तथाऽव्यक्तस्य संत्यागान्निर्ममः पञ्च विंशकः ॥

udumbarādvā maśakaḥ pralayānnirgato yathā | tathā'vyaktasya saṃtyāgānnirmamaḥ pañca viṃśakaḥ

जैसे फूटे हुए गूलर से निकला मच्छर, वैसे ही पचीसवाँ अव्यक्त को त्यागकर ममता से रहित हो जाता है।

श्लोक 35 (13.169.35)

यथा पुष्करपर्णस्थो जलबिन्दुर्न संश्लिषेत् । तथैवाव्यक्तविषये न लिप्येत्पञ्चविंशकः ॥

yathā puṣkaraparṇastho jalabindurna saṃśliṣet | tathaivāvyaktaviṣaye na lipyetpañcaviṃśakaḥ

जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद नहीं चिपकती, वैसे ही पचीसवाँ अव्यक्त के क्षेत्र में लिप्त नहीं होता।

श्लोक 36 (13.169.36)

आकाश इव निःसङ्गस्तथाऽसङ्गस्तथा वरः । पञ्चविंशतिमो बुद्धो बुद्धेन समतां गतः ॥

ākāśa iva niḥsaṅgastathā'saṅgastathā varaḥ | pañcaviṃśatimo buddho buddhena samatāṃ gataḥ

आकाश के समान निःसंग, इसी प्रकार असंग और श्रेष्ठ, पचीसवाँ बुद्ध, बुद्ध के साथ समता को प्राप्त हो गया है।

श्लोक 37 (13.169.37)

एतद्धि प्रकृतं ज्ञानं तत्वतश्च समुत्थितम् । पूर्वजेभ्यस्तथोत्पन्नं ब्रह्मजेभ्यस्तथानघ ॥

etaddhi prakṛtaṃ jñānaṃ tatvataśca samutthitam | pūrvajebhyastathotpannaṃ brahmajebhyastathānagha

हे निष्पाप, यह वही ज्ञान है जो कहा गया, तत्त्व से उत्पन्न हुआ, पहले जन्मे हुए ब्रह्मपुत्रों से आया।

श्लोक 38 (13.169.38)

आदिसर्गो महाबाहो तामसेनावृतं परम् । प्रविष्टावयवं देवमभेद्यमजरामरम् ॥

ādisargo mahābāho tāmasenāvṛtaṃ param | praviṣṭāvayavaṃ devamabhedyamajarāmaram

हे महाबाहु, आदिसर्ग में परम तत्त्व तम से ढका था, वह देव जो अवयवों में प्रविष्ट है, अभेद्य, अजर और अमर।

श्लोक 39 (13.169.39)

सनकः सनन्दनश्चैव तृतीयश्च सनातनः । ते विदुः परमं धर्ममव्ययं व्ययधर्षणम् ॥

sanakaḥ sanandanaścaiva tṛtīyaśca sanātanaḥ | te viduḥ paramaṃ dharmamavyayaṃ vyayadharṣaṇam

सनक, सनन्दन और तीसरे सनातन: उन्होंने उस परम, अव्यय धर्म को जाना जो नाश को परास्त करता है।

श्लोक 40 (13.169.40)

अव्यक्तात्परमात्सूक्ष्मादव्रणान्मूर्तिसंज्ञकात् । क्षेत्रज्ञो भगवानास्ते नारायणपरायणः ॥

avyaktātparamātsūkṣmādavraṇānmūrtisaṃjñakāt | kṣetrajño bhagavānāste nārāyaṇaparāyaṇaḥ

परम, सूक्ष्म, निर्दोष और मूर्ति नाम से कहे जाने वाले अव्यक्त से भी परे भगवान् क्षेत्रज्ञ स्थित हैं, जिनका आश्रय नारायण हैं।

श्लोक 41 (13.169.41)

अस्माकं सहजातानामुत्पन्नं ज्ञानमुत्तमम् । एते हि मूर्तिमन्तो वै लोकान्प्रविचरामहे ॥

asmākaṃ sahajātānāmutpannaṃ jñānamuttamam | ete hi mūrtimanto vai lokānpravicarāmahe

हम सहजात भाइयों में उत्तम ज्ञान उत्पन्न हुआ। हम मूर्तिमान् होकर लोकों में विचरते हैं।

श्लोक 42 (13.169.42)

पुनःपुनः प्रजाता वै तत्रतत्र पिनाकधृक् । द्वन्द्वैर्विरज्यमानस्य ज्ञानमुत्पन्नमुत्तमम् ॥

punaḥpunaḥ prajātā vai tatratatra pinākadhṛk | dvandvairvirajyamānasya jñānamutpannamuttamam

हे पिनाकधारी, बार-बार जहाँ-तहाँ जन्म लेकर, द्वन्द्वों से विरक्त होते हुए उसमें उत्तम ज्ञान उत्पन्न हुआ।

श्लोक 43 (13.169.43)

कपिलान्मूलआचार्यात्तत्वबुद्धिविनिश्चयम् । योगसांख्यमवाप्तं मे कार्त्स्न्येन मुनिसत्तमात् ॥

kapilānmūlaācāryāttatvabuddhiviniścayam | yogasāṃkhyamavāptaṃ me kārtsnyena munisattamāt

आदि आचार्य कपिल से तत्त्वबुद्धि का निश्चय, और योग तथा सांख्य पूर्ण रूप से, मुझे उन श्रेष्ठ मुनि से प्राप्त हुए।

श्लोक 44 (13.169.44)

तेन संबोधिताः शिष्या बहवस्तत्वदर्शिनः । तद्बुद्ध्वा बहवः शिष्या मयाप्येतन्निदर्शिताः ॥

tena saṃbodhitāḥ śiṣyā bahavastatvadarśinaḥ | tadbuddhvā bahavaḥ śiṣyā mayāpyetannidarśitāḥ

उनके द्वारा तत्त्व को देखने वाले बहुत-से शिष्य बोध को प्राप्त हुए; उसे समझकर बहुत-से शिष्यों को मैंने भी यह दिखाया।

श्लोक 45 (13.169.45)

जन्ममृत्युहरं तथ्यं ज्ञानं ज्ञेयं सनातनम् । यज्ज्ञात्वा नानुशोचन्ति तत्वज्ञानान्निरिन्द्रियाः ॥

janmamṛtyuharaṃ tathyaṃ jñānaṃ jñeyaṃ sanātanam | yajjñātvā nānuśocanti tatvajñānānnirindriyāḥ

जन्म और मृत्यु को हरने वाला, सत्य, जानने योग्य और सनातन ज्ञान: जिसे जानकर तत्त्वज्ञान से इन्द्रियरहित हुए लोग शोक नहीं करते।

श्लोक 46 (13.169.46)

शुद्धबीजमलाश्चैव विपङ्का वै निरक्षराः । स्वतन्त्रास्ते स्वतन्त्रेण सम्मिता निष्कलाः स्मृताः ॥

śuddhabījamalāścaiva vipaṅkā vai nirakṣarāḥ | svatantrāste svatantreṇa sammitā niṣkalāḥ smṛtāḥ

जिनके बीज के मल शुद्ध हो गए, जो कीचड़ से रहित और अक्षररहित हैं, वे स्वतन्त्र हैं, स्वतन्त्र के समान हैं और निष्कल माने गए हैं।

श्लोक 47 (13.169.47)

शाश्वताश्चाव्ययाश्चैव तमोग्राह्याश्च भास्वर । विपाप्मानस्तथा सर्वे सत्वस्थाश्चापि निर्व्रणाः ॥

śāśvatāścāvyayāścaiva tamogrāhyāśca bhāsvara | vipāpmānastathā sarve satvasthāścāpi nirvraṇāḥ

हे भास्वर, शाश्वत और अव्यय, तम की पकड़ से परे, पापरहित, सब सत्त्व में स्थित और व्रणरहित,

श्लोक 48 (13.169.48)

विमुक्ताः केवलाश्चैव वीतमोहभयास्तथा । अमूर्तास्ते महाभाग सर्वे च विगतज्वराः ॥

vimuktāḥ kevalāścaiva vītamohabhayāstathā | amūrtāste mahābhāga sarve ca vigatajvarāḥ

मुक्त, कैवल्य को पाए हुए, मोह और भय से रहित, हे महाभाग, अमूर्त और सब ताप से रहित।

श्लोक 49 (13.169.49)

हिरण्यनाभस्त्रिशिरास्तथा प्रह्लादभास्करौ । वसुर्विश्वावसुश्चैव सार्धं पञ्चशिखस्तथा ॥

hiraṇyanābhastriśirāstathā prahlādabhāskarau | vasurviśvāvasuścaiva sārdhaṃ pañcaśikhastathā

हिरण्यनाभ, त्रिशिरा, प्रह्लाद और भास्कर, वसु, विश्वावसु और उनके साथ पञ्चशिख,

श्लोक 50 (13.169.50)

गार्ग्योऽथासुरिरावन्त्यो गौतमो वृत एव च । कात्यायनोऽथ नमुचिर्हरिश्च दमनश्च ह ॥

gārgyo'thāsurirāvantyo gautamo vṛta eva ca | kātyāyano'tha namucirhariśca damanaśca ha

गार्ग्य, असुरि, आवन्त्य, गौतम और वृत, कात्यायन, नमुचि, हरि और दमन,

श्लोक 51 (13.169.51)

एते चान्ये च बहवस्तत्वमेवोपदर्शिताः । केचिन्मुक्ताः स्थिताः केचिच्छन्दतश्चापरे मृताः ॥

ete cānye ca bahavastatvamevopadarśitāḥ | kecinmuktāḥ sthitāḥ kecicchandataścāpare mṛtāḥ

ये और बहुत-से अन्य लोग तत्त्व का उपदेश पाए। कुछ मुक्त हैं, कुछ स्थित हैं और दूसरे अपनी इच्छा से मरे हैं।

श्लोक 52 (13.169.52)

दर्शितास्त्रिविधं बन्धं विमोक्षं त्रिविधं तथा । अज्ञानं चैव रागश्च संयोगं प्राकृतं तथा ॥

darśitāstrividhaṃ bandhaṃ vimokṣaṃ trividhaṃ tathā | ajñānaṃ caiva rāgaśca saṃyogaṃ prākṛtaṃ tathā

उन्हें तीन प्रकार का बन्धन और उसी प्रकार तीन प्रकार का मोक्ष दिखाया गया: अज्ञान, राग और प्राकृत संयोग।

श्लोक 53 (13.169.53)

एतेभ्यो बन्धनं प्रोक्तं विमोक्षमपि मे शृणु । परितस्तावता सम्यक्सम्बन्धो यावता कृतः ॥

etebhyo bandhanaṃ proktaṃ vimokṣamapi me śṛṇu | paritastāvatā samyaksambandho yāvatā kṛtaḥ

इन्हीं से बन्धन कहा गया है; अब मुझसे मोक्ष भी सुनो। सम्बन्ध चारों ओर उतना ही दृढ़ है जितना बनाया गया है।

श्लोक 54 (13.169.54)

कृत्स्नक्षयपरित्यागाद्विमोक्ष इति नः श्रुतिः । निवृत्तः सर्वसङ्गेभ्यः केवलः पुरुषोऽमलः ॥

kṛtsnakṣayaparityāgādvimokṣa iti naḥ śrutiḥ | nivṛttaḥ sarvasaṅgebhyaḥ kevalaḥ puruṣo'malaḥ

सम्पूर्ण क्षय के परित्याग से मोक्ष होता है, ऐसी हमारी श्रुति है। सब संगों से निवृत्त पुरुष अकेला और निर्मल है।

भीष्म उवाच

श्लोक 55 (13.169.55)

इत्येवमुक्त्वा भगवानीश्वराय महात्मने । सनत्कुमारः प्रययावाकाशं समुपाश्रितः ॥

ityevamuktvā bhagavānīśvarāya mahātmane | sanatkumāraḥ prayayāvākāśaṃ samupāśritaḥ

महात्मा ईश्वर से इस प्रकार कहकर भगवान् सनत्कुमार आकाश का आश्रय लेकर चले गए।

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