अनुशासन पर्व · अध्याय 170
सर्वश्रेष्ठ तीर्थ: मानस तीर्थ
युधिष्ठिर पूछते हैं कि सब तीर्थों में श्रेष्ठ कौन-सा है और परम शुद्धि कहाँ है। भीष्म उत्तर देते हैं कि सच्चा तीर्थ मन है, जो सत्य, धैर्य, संयम, अहिंसा और ज्ञान में स्नान करता है, और नारायण या रुद्र में भक्ति परम तीर्थ है। वे पहले शरीर में स्थित तीर्थ गिनाते हैं और फिर पृथ्वी के पवित्र जलों की बात करते हैं। अन्त में वे कहते हैं कि जो शरीर की शुद्धि और तीर्थ की शुद्धि, दोनों से युक्त है, वह सिद्धि पाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.170.1)
यद्वरं सर्वतीर्थानां तद्ब्रवीहि पितामह । यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
yadvaraṃ sarvatīrthānāṃ tadbravīhi pitāmaha | yatra caiva paraṃ śaucaṃ tanme vyākhyātumarhasi
हे पितामह, सब तीर्थों में जो श्रेष्ठ है वह मुझे बताइए, और जहाँ परम शुद्धि है उसकी भी व्याख्या कीजिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.170.2)
सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः । यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ॥
sarvāṇi khalu tīrthāni guṇavanti manīṣiṇaḥ | yattu tīrthaṃ ca śaucaṃ ca tanme śṛṇu samāhitaḥ
हे बुद्धिमान्, सभी तीर्थ गुणों से युक्त हैं। परन्तु तीर्थ और शुद्धि के विषय में जो मैं कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनो।
श्लोक 3 (13.170.3)
अगाधे विमले शुद्धे सत्यतीर्थे धृतिह्रदे । स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्वमालम्ब्य शाश्वतम् ॥
agādhe vimale śuddhe satyatīrthe dhṛtihrade | snātavyaṃ mānase tīrthe satvamālambya śāśvatam
सत्य ही जिसका तीर्थ है, उस अगाध, निर्मल, शुद्ध धैर्य के सरोवर में, अर्थात् मानस तीर्थ में, शाश्वत सत्त्व का आश्रय लेकर स्नान करना चाहिए।
श्लोक 4 (13.170.4)
तीर्थशौचं तपो ज्ञानं मार्दवं सत्यमार्जवम् । अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥
tīrthaśaucaṃ tapo jñānaṃ mārdavaṃ satyamārjavam | ahiṃsā sarvabhūtānāmānṛśaṃsyaṃ damaḥ śamaḥ
तीर्थ की शुद्धि, तप, ज्ञान, कोमलता, सत्य, सरलता, सब प्राणियों के प्रति अहिंसा, दयालुता, दम और शम:
श्लोक 5 (13.170.5)
निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः । योगिनस्तीर्थभूतास्ते तीर्थं परममुच्यते ॥
nirmamā nirahaṅkārā nirdvandvā niṣparigrahāḥ | yoginastīrthabhūtāste tīrthaṃ paramamucyate
जो ममता, अहंकार, द्वन्द्वों और परिग्रह से रहित हैं, वे योगी स्वयं तीर्थ-रूप हैं, और वही परम तीर्थ कहा जाता है।
श्लोक 6 (13.170.6)
नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मतम् । शौचलक्षणमेतत्ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥
nārāyaṇe'tha rudre vā bhaktistīrthaṃ paraṃ matam | śaucalakṣaṇametatte sarvatraivānvavekṣataḥ
नारायण या रुद्र में भक्ति को परम तीर्थ माना गया है। यह तुम्हारे लिए शुद्धि का लक्षण है, जिसे सर्वत्र देखना चाहिए।
श्लोक 7 (13.170.7)
रजस्तमःसत्वमथो येषां निर्धूतमात्मना । तीर्थमाचारशुद्धिश्च स्वमार्गपरिमार्गणम् ॥
rajastamaḥsatvamatho yeṣāṃ nirdhūtamātmanā | tīrthamācāraśuddhiśca svamārgaparimārgaṇam
जिनका आत्मा रज, तम और सत्त्व से धुल चुका है, उनका तीर्थ आचार की शुद्धि और अपने मार्ग की खोज है।
श्लोक 8 (13.170.8)
सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः । शौचेष्वेतेष्वभिरतास्ते तीर्थशुचयोऽपि च ॥
sarvatyāgeṣvabhiratāḥ sarvajñāḥ samadarśinaḥ | śauceṣveteṣvabhiratāste tīrthaśucayo'pi ca
जो सब कुछ त्यागने में लगे हैं, जो सर्वज्ञ और समदर्शी हैं, और जो इन शुद्धियों में रमते हैं, वे स्वयं तीर्थ हैं और शुद्ध भी हैं।
श्लोक 9 (13.170.9)
नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते । स स्नातो यो दमस्नातः स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
nodakaklinnagātrastu snāta ityabhidhīyate | sa snāto yo damasnātaḥ sa bāhyābhyantaraḥ śuciḥ
जिसका शरीर केवल जल से भीगा है, वह स्नान किया हुआ नहीं कहलाता। स्नान किया हुआ वही है जो दम में स्नान कर चुका है; वह बाहर और भीतर शुद्ध है।
श्लोक 10 (13.170.10)
अदृष्टेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः । शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा ॥
adṛṣṭeṣvanapekṣā ye prāpteṣvartheṣu nirmamāḥ | śaucameva paraṃ teṣāṃ yeṣāṃ notpadyate spṛhā
जिन्हें अदृष्ट वस्तुओं की अपेक्षा नहीं और जो प्राप्त वस्तुओं में ममता नहीं रखते, उनकी शुद्धि सर्वोपरि है, जिनमें स्पृहा उत्पन्न ही नहीं होती।
श्लोक 11 (13.170.11)
प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषतः । तथा निष्किंचनत्वं च मनसश्च प्रसन्नता ॥
prajñānaṃ śaucameveha śarīrasya viśeṣataḥ | tathā niṣkiṃcanatvaṃ ca manasaśca prasannatā
यहाँ प्रज्ञान ही शुद्धि है, विशेषकर शरीर की, और वैसे ही अकिंचनता तथा मन की प्रसन्नता।
श्लोक 12 (13.170.12)
वृत्तं शौचं महाशौचं तीर्थशौचमतः परम् । ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम् ॥
vṛttaṃ śaucaṃ mahāśaucaṃ tīrthaśaucamataḥ param | jñānotpannaṃ ca yacchaucaṃ tacchaucaṃ paramaṃ smṛtam
सदाचार शौच है, महाशौच है; उससे परे तीर्थशौच है; और ज्ञान से उत्पन्न शौच परम शौच माना गया है।
श्लोक 13 (13.170.13)
मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च । स्नाता ये मानसे तीर्थे तज्ज्ञाः क्षेत्रज्ञदर्शनाः ॥
manasā ca pradīptena brahmajñānajalena ca | snātā ye mānase tīrthe tajjñāḥ kṣetrajñadarśanāḥ
जिन्होंने प्रदीप्त मन और ब्रह्मज्ञान के जल से मानस तीर्थ में स्नान किया है, वे उसे जानने वाले हैं और क्षेत्रज्ञ का दर्शन करने वाले हैं।
श्लोक 14 (13.170.14)
समारोपितशौचस्तु नित्यं भवसमन्वितः । केवलं गुणसम्पन्नः शुचिरेव नरः सदा ॥
samāropitaśaucastu nityaṃ bhavasamanvitaḥ | kevalaṃ guṇasampannaḥ śucireva naraḥ sadā
जिसमें शुद्धि दृढ़ रूप से स्थापित हो गई है, जो सदा सद्भाव से युक्त है और केवल गुणों से सम्पन्न है, वह मनुष्य सदा शुद्ध ही है।
श्लोक 15 (13.170.15)
शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि ॥
śarīrasthāni tīrthāni proktānyetāni bhārata | pṛthivyāṃ yāni tīrthāni puṇyāni śṛṇu tānyapi
हे भारत, ये शरीर में स्थित तीर्थ बताए गए। अब पृथ्वी पर जो पुण्य तीर्थ हैं, उन्हें भी सुनो।
श्लोक 16 (13.170.16)
शरीरस्य यथोद्देशाः शरीरोपरि निर्मिताः । तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च ॥
śarīrasya yathoddeśāḥ śarīropari nirmitāḥ | tathā pṛthivyā bhāgāśca puṇyāni salilāni ca
जैसे शरीर के अंग शरीर पर ही रचे गए हैं, वैसे ही पृथ्वी के भाग पवित्र हैं और जल भी पुण्य हैं।
श्लोक 17 (13.170.17)
कीर्तनाच्चैव तीर्थस्य स्नानाच्च पितृतर्पणात् । शोध्यं हि पातकं तीर्थे पूता यान्ति सुखं दिवम् ॥
kīrtanāccaiva tīrthasya snānācca pitṛtarpaṇāt | śodhyaṃ hi pātakaṃ tīrthe pūtā yānti sukhaṃ divam
तीर्थ के कीर्तन से, स्नान से और पितृतर्पण से तीर्थ में पाप शुद्ध हो जाता है, और पवित्र हुए लोग सुखपूर्वक स्वर्ग जाते हैं।
श्लोक 18 (13.170.18)
परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्चैव तेजसा । अतीव पुण्यभागास्ते सलिलस्य च तेजसा ॥
parigrahācca sādhūnāṃ pṛthivyāścaiva tejasā | atīva puṇyabhāgāste salilasya ca tejasā
साधुओं के स्वीकार करने से, पृथ्वी के तेज से और जल के तेज से, वे भाग अत्यन्त पुण्यमय हो जाते हैं।
श्लोक 19 (13.170.19)
मनसश्च पृथिव्याश्च पुण्यास्तीर्थास्तथापरे । उभयोरेव यः स्नायात्स सिद्धिं शीघ्रमाप्नुयात् ॥
manasaśca pṛthivyāśca puṇyāstīrthāstathāpare | ubhayoreva yaḥ snāyātsa siddhiṃ śīghramāpnuyāt
मन के तीर्थ भी हैं और पृथ्वी के भी दूसरे पुण्य तीर्थ हैं। जो दोनों में स्नान करता है, वह शीघ्र सिद्धि पाता है।
श्लोक 20 (13.170.20)
यथा फलं क्रियाहीनं क्रिया वा फलवर्जिता । नेह साधयते कार्यं समायुक्ता तु सिध्यति ॥
yathā phalaṃ kriyāhīnaṃ kriyā vā phalavarjitā | neha sādhayate kāryaṃ samāyuktā tu sidhyati
जैसे क्रिया के बिना फल, या फल के बिना क्रिया, यहाँ कार्य सिद्ध नहीं करती, पर दोनों के मिलने पर वह सिद्ध होती है,
श्लोक 21 (13.170.21)
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः । शुचिः सिद्धिमवाप्नोति द्विविधं शौचमुत्तमम् ॥
evaṃ śarīraśaucena tīrthaśaucena cānvitaḥ | śuciḥ siddhimavāpnoti dvividhaṃ śaucamuttamam
वैसे ही शरीर की शुद्धि और तीर्थ की शुद्धि से युक्त शुद्ध मनुष्य सिद्धि पाता है; यह दो प्रकार का शौच सर्वोत्तम है।