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अनुशासन पर्व · अध्याय 171

वर्ष भर द्वादशी को विष्णु-पूजन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि कौन-सा उपवास सबसे बड़ा फल देता है। भीष्म वह बताते हैं जो स्वयम्भू ने स्वयं कहा था: मार्गशीर्ष से कार्तिक तक प्रत्येक मास की द्वादशी को जो मनुष्य एक दिन-रात विष्णु की उनके अलग-अलग नाम से, केशव से दामोदर तक, पूजा करता है, उसे एक-एक यज्ञ का फल मिलता है। जो पूरे वर्ष इस प्रकार पूजा करता है, उसे पूर्वजन्मों की स्मृति और बहुत स्वर्ण मिलता है; समाप्ति पर वह ब्राह्मणों को भोजन कराए या घृत दान करे। इससे बढ़कर कोई उपवास नहीं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.171.1)

सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् । यच्चाप्यसंशयं लोके तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥

sarveṣāmupavāsānāṃ yacchreyaḥ sumahatphalam | yaccāpyasaṃśayaṃ loke tanme tvaṃ vaktumarhasi

सब उपवासों में जो सबसे श्रेष्ठ और महान् फल देने वाला है, और जो लोक में निःसंदेह है, वह आप मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.171.2)

शृणु राजन्यथा गीतं स्वयमेव स्वयंभुवा । यत्कृत्वा निर्वृतो भूयात्पुरुषो नात्र संशयः ॥

śṛṇu rājanyathā gītaṃ svayameva svayaṃbhuvā | yatkṛtvā nirvṛto bhūyātpuruṣo nātra saṃśayaḥ

हे राजन्, सुनो, जो स्वयम्भू ने स्वयं कहा, जिसे करके मनुष्य तृप्त हो जाता है; इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 3 (13.171.3)

द्वादश्यां मार्गशीर्षे तु अहोरात्रेण केशवम् । अर्च्याश्वमेधं प्राप्नोति दुष्कृतं चास्य नश्यति ॥

dvādaśyāṃ mārgaśīrṣe tu ahorātreṇa keśavam | arcyāśvamedhaṃ prāpnoti duṣkṛtaṃ cāsya naśyati

मार्गशीर्ष की द्वादशी को एक दिन-रात केशव की पूजा करके वह अश्वमेध का फल पाता है और उसका पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 4 (13.171.4)

तथैव पौषमासे तु पूज्यो नारायणेति च । वाजपेयमवाप्नोति सिद्धिं च परमां व्रजेत् ॥

tathaiva pauṣamāse tu pūjyo nārāyaṇeti ca | vājapeyamavāpnoti siddhiṃ ca paramāṃ vrajet

इसी प्रकार पौष मास में नारायण के नाम से पूजा करने पर वह वाजपेय का फल पाता है और परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (13.171.5)

अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम् । राजसूयमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥

ahorātreṇa dvādaśyāṃ māghamāse tu mādhavam | rājasūyamavāpnoti kulaṃ caiva samuddharet

माघ मास की द्वादशी को एक दिन-रात माधव की पूजा करके वह राजसूय का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।

श्लोक 6 (13.171.6)

तथैव फाल्गुने मासि गोविन्देति च पूजयन् । अतिरात्रमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥

tathaiva phālgune māsi govindeti ca pūjayan | atirātramavāpnoti somalokaṃ ca gacchati

इसी प्रकार फाल्गुन मास में गोविन्द के नाम से पूजा करने पर वह अतिरात्र का फल पाता है और सोमलोक को जाता है।

श्लोक 7 (13.171.7)

अहोरात्रेण द्वादश्यां चैत्रे विष्णुरिति स्मरन् । पौण्डरीकमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥

ahorātreṇa dvādaśyāṃ caitre viṣṇuriti smaran | pauṇḍarīkamavāpnoti devalokaṃ ca gacchati

चैत्र की द्वादशी को एक दिन-रात विष्णु के नाम से स्मरण करके वह पौण्डरीक का फल पाता है और देवलोक को जाता है।

श्लोक 8 (13.171.8)

वैशाखमासे द्वादश्यां पूजयन्मधुसूदनम् । अग्निष्टोममवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥

vaiśākhamāse dvādaśyāṃ pūjayanmadhusūdanam | agniṣṭomamavāpnoti somalokaṃ ca gacchati

वैशाख मास की द्वादशी को मधुसूदन की पूजा करके वह अग्निष्टोम का फल पाता है और सोमलोक को जाता है।

श्लोक 9 (13.171.9)

अहोरात्रेण द्वादश्यां ज्येष्ठे मासि त्रिविक्रमम् । गवां मेधमवाप्नोति अप्सरोभिश्च मोदते ॥

ahorātreṇa dvādaśyāṃ jyeṣṭhe māsi trivikramam | gavāṃ medhamavāpnoti apsarobhiśca modate

ज्येष्ठ मास की द्वादशी को एक दिन-रात त्रिविक्रम की पूजा करके वह गो-यज्ञ का फल पाता है और अप्सराओं के साथ आनन्द करता है।

श्लोक 10 (13.171.10)

आषाढे मासि द्वादश्यां वामनेति च पूजयन् । नरमेधमवाप्नोति पुण्यं च लभते महत् ॥

āṣāḍhe māsi dvādaśyāṃ vāmaneti ca pūjayan | naramedhamavāpnoti puṇyaṃ ca labhate mahat

आषाढ़ मास की द्वादशी को वामन के नाम से पूजा करके वह नरमेध का फल पाता है और बड़ा पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 11 (13.171.11)

अहोरात्रेण द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधरम् । पञ्चयज्ञानवाप्नोति विमानस्थश्च मोदते ॥

ahorātreṇa dvādaśyāṃ śrāvaṇe māsi śrīdharam | pañcayajñānavāpnoti vimānasthaśca modate

श्रावण मास की द्वादशी को एक दिन-रात श्रीधर की पूजा करके वह पाँच यज्ञों का फल पाता है और विमान में बैठकर आनन्द करता है।

श्लोक 12 (13.171.12)

तथा भाद्रपदे मासि हृषीकेशेति पूजयन् । सौत्रामणिमवाप्नोति पूतात्मा भवते च हि ॥

tathā bhādrapade māsi hṛṣīkeśeti pūjayan | sautrāmaṇimavāpnoti pūtātmā bhavate ca hi

इसी प्रकार भाद्रपद मास में हृषीकेश के नाम से पूजा करके वह सौत्रामणि का फल पाता है और पवित्र आत्मा वाला हो जाता है।

श्लोक 13 (13.171.13)

द्वादश्यामाश्विने मासि पद्मनाभेति चार्चयन् । गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥

dvādaśyāmāśvine māsi padmanābheti cārcayan | gosahasraphalaṃ puṇyaṃ prāpnuyānnātra saṃśayaḥ

आश्विन की द्वादशी को पद्मनाभ के नाम से पूजा करके वह एक हजार गौओं के दान का पुण्य फल पाता है; इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 14 (13.171.14)

द्वादश्यां कार्तिके मासि पूज्यो दामोदरेति च । गवां यज्ञमवाप्नोति पुमान्स्त्री वा न संशयः ॥

dvādaśyāṃ kārtike māsi pūjyo dāmodareti ca | gavāṃ yajñamavāpnoti pumānstrī vā na saṃśayaḥ

कार्तिक मास की द्वादशी को दामोदर के नाम से पूजा करके वह गो-यज्ञ का फल पाता है, चाहे पुरुष हो या स्त्री; इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 15 (13.171.15)

अर्चयेत्पुण्डरीकाक्षमेवं संवत्सरं तु यः । जातिस्मरत्वं प्राप्नोति विन्द्याद्बहु सुवर्णकम् ॥

arcayetpuṇḍarīkākṣamevaṃ saṃvatsaraṃ tu yaḥ | jātismaratvaṃ prāpnoti vindyādbahu suvarṇakam

जो इस प्रकार पूरे वर्ष कमलनयन की पूजा करता है, उसे पूर्वजन्मों की स्मृति प्राप्त होती है और वह बहुत सोना पाता है।

श्लोक 16 (13.171.16)

अहन्यहनि तद्भावमुपेन्द्रं योऽधिगच्छति । समाप्ते भोजयेद्विप्रानथवा दापयेद्धृतम् ॥

ahanyahani tadbhāvamupendraṃ yo'dhigacchati | samāpte bhojayedviprānathavā dāpayeddhṛtam

जो प्रतिदिन उसी भाव से उपेन्द्र की उपासना करता है, उसे समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए अथवा घृत दिलाना चाहिए।

श्लोक 17 (13.171.17)

अतः परं नोपवासो भवतीति विनिश्चयः । उवाच भगवान्विष्णुः स्वयमेव पुरातनम् ॥

ataḥ paraṃ nopavāso bhavatīti viniścayaḥ | uvāca bhagavānviṣṇuḥ svayameva purātanam

इसके आगे कोई उपवास नहीं है, यह निश्चय है। भगवान् विष्णु ने स्वयं यह बहुत पहले कहा था।

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