अनुशासन पर्व · अध्याय 172
सर्वाङ्गपूर्णता के लिए चान्द्र व्रत
युधिष्ठिर शरशय्या पर लेटे भीष्म के पास जाकर पूछते हैं कि मनुष्य को अङ्गों का सौन्दर्य, सौभाग्य और दूसरों का प्रेम कैसे मिले तथा वह धर्म, अर्थ और काम से युक्त होकर सुखी कैसे हो। भीष्म मार्गशीर्ष मास में चन्द्रमा के मूल नक्षत्र में रहने पर आरम्भ किया जाने वाला चान्द्र व्रत बताते हैं, जिसमें मूल से लेकर भरणी और आर्द्रा तक के नक्षत्र पैरों से केशों तक शरीर के अङ्गों में बाँटे जाते हैं। व्रत की समाप्ति पर वेदपारंगत ब्राह्मण को घी दिया जाता है, और व्रती सुन्दर, भाग्यवान् तथा पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह सब अङ्गों से परिपूर्ण होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (13.172.1)
शरतल्पगतं भीष्मं वृद्धं कुरुपितामहम् । उपगम्य महाप्राज्ञः पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ॥
śaratalpagataṃ bhīṣmaṃ vṛddhaṃ kurupitāmaham | upagamya mahāprājñaḥ paryapṛcchadyudhiṣṭhiraḥ
महाप्राज्ञ युधिष्ठिर शरशय्या पर लेटे हुए वृद्ध कुरुपितामह भीष्म के पास गए और उनसे यह प्रश्न पूछा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (13.172.2)
अङ्गानां रूपसौभाग्यं प्रियं चैव कथं भवेत् । धर्मार्थकामसंयुक्तः सुखभागी कथं भवेत् ॥
aṅgānāṃ rūpasaubhāgyaṃ priyaṃ caiva kathaṃ bhavet | dharmārthakāmasaṃyuktaḥ sukhabhāgī kathaṃ bhavet
मनुष्य के अङ्गों में रूप, सौभाग्य और सबकी प्रियता कैसे आती है? और धर्म, अर्थ तथा काम से युक्त होकर वह सुख का भागी कैसे बनता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.172.3)
मार्गशीर्षस्य मासस्य चन्द्रे मूलेन संयुते । पादौ मूलेन राजेन्द्र जङ्घायामथ रोहिणीम् ॥
mārgaśīrṣasya māsasya candre mūlena saṃyute | pādau mūlena rājendra jaṅghāyāmatha rohiṇīm
मार्गशीर्ष मास में जब चन्द्रमा मूल नक्षत्र से युक्त हो, तब हे राजेन्द्र, पैरों को मूल से और पिंडलियों को रोहिणी से जोड़ना चाहिए।
श्लोक 4 (13.172.4)
अश्विन्यां सक्थिनी चैव ऊरू चाषाढयोस्तथा । गुह्यं तु फाल्गुनी विद्यात्कृत्तिका कटिकास्तथा ॥
aśvinyāṃ sakthinī caiva ūrū cāṣāḍhayostathā | guhyaṃ tu phālgunī vidyātkṛttikā kaṭikāstathā
कूल्हे अश्विनी के हैं और जाँघें दोनों आषाढ़ाओं की। गुह्य अङ्ग को फाल्गुनी जानो और कमर को कृत्तिका।
श्लोक 5 (13.172.5)
नाभिं भाद्रपदे विद्याद्रेवत्यामक्षिमण्डलम् । पृष्ठमेव धनिष्ठासु अनुराधोत्तरास्तथा ॥
nābhiṃ bhādrapade vidyādrevatyāmakṣimaṇḍalam | pṛṣṭhameva dhaniṣṭhāsu anurādhottarāstathā
नाभि को भाद्रपदा जानो और नेत्रमण्डल को रेवती। पीठ धनिष्ठा है, और वैसे ही अनुराधा तथा उत्तरा नक्षत्र भी।
श्लोक 6 (13.172.6)
बाहुभ्यां तु विशाखासु हस्तौ हस्तेन निर्दिशेत् । पुनर्वस्वङ्गुली राजन्नाश्लेषासु नखास्तथा ॥
bāhubhyāṃ tu viśākhāsu hastau hastena nirdiśet | punarvasvaṅgulī rājannāśleṣāsu nakhāstathā
दोनों भुजाएँ विशाखा की हैं; हाथों को हस्त नक्षत्र से जोड़ना चाहिए। हे राजन्, उँगलियाँ पुनर्वसु हैं और नाखून आश्लेषा।
श्लोक 7 (13.172.7)
ग्रीवां ज्येष्ठा च राजेन्द्र श्रवणेन तु कर्णयोः । मुखं पुष्येण दानेन दन्तोष्ठौ स्वातिरुच्यते ॥
grīvāṃ jyeṣṭhā ca rājendra śravaṇena tu karṇayoḥ | mukhaṃ puṣyeṇa dānena dantoṣṭhau svātirucyate
हे राजेन्द्र, गर्दन ज्येष्ठा है और दोनों कान श्रवण को दिए गए हैं। मुख पुष्य का है, और दान के साथ दाँत तथा होंठ स्वाति कहे जाते हैं।
श्लोक 8 (13.172.8)
हासं शतभिषां चैव मघां चैवाथ नासिकाम् । नेत्रे मृगशिरो विद्याल्ललाटे मित्रमेव तु ॥
hāsaṃ śatabhiṣāṃ caiva maghāṃ caivātha nāsikām | netre mṛgaśiro vidyāllalāṭe mitrameva tu
हँसी शतभिषा है और नाक मघा। नेत्रों को मृगशिरा जानो और ललाट को मित्र।
श्लोक 9 (13.172.9)
भरण्यां तु शिरो विद्यात्केशानार्द्रां नराधिप । समाप्ते तु घृतं दद्याद्ब्राह्मणे वेदपारगे ॥
bharaṇyāṃ tu śiro vidyātkeśānārdrāṃ narādhipa | samāpte tu ghṛtaṃ dadyādbrāhmaṇe vedapārage
हे नरेश्वर, सिर को भरणी जानो और केशों को आर्द्रा। व्रत पूरा होने पर वेदपारंगत ब्राह्मण को घी देना चाहिए।
श्लोक 10 (13.172.10)
सुभगो दर्शनीयश्च ज्ञानभाग्यथ जायते । जायते परिपूर्णाङ्गः पौर्णमास्येव चन्द्रमाः ॥
subhago darśanīyaśca jñānabhāgyatha jāyate | jāyate paripūrṇāṅgaḥ paurṇamāsyeva candramāḥ
वह सौभाग्यशाली और देखने में सुन्दर होता है, ज्ञान का भागी होता है, और पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह सब अङ्गों से परिपूर्ण होकर जन्म लेता है।