अनुशासन पर्व · अध्याय 173
कर्म और पुनर्जन्म पर बृहस्पति का उपदेश
युधिष्ठिर भीष्म से पूछ रहे होते हैं कि परलोक में मनुष्य के पीछे कौन जाता है, तभी ऋषि बृहस्पति आ पहुँचते हैं और उनसे वही प्रश्न किया जाता है। बृहस्पति बताते हैं कि मनुष्य अकेला जन्मता और मरता है और केवल धर्म ही उसके पीछे जाता है; वे समझाते हैं कि पाँच भूत और मन से वीर्य तथा गर्भ कैसे बनते हैं, और कर्मों से बँधा जीव यमलोक में कैसे कष्ट पाता है। फिर वे एक-एक अपराध के अनुसार पशु-पक्षी और मनुष्य की योनियाँ गिनाते हैं: पतित से दान लेना, गुरु या माता-पिता का अनादर, धरोहर में विश्वासघात, परस्त्रीगमन, तथा अनाज, वस्त्र, भोजन आदि की चोरी, हर एक की अवधि के साथ, जब तक पाप क्षीण होने पर जीव फिर मनुष्य नहीं बनता। अन्त में वे युधिष्ठिर को धर्म में मन लगाने का उपदेश देते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.173.1)
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । श्रोतुमिच्छामि मर्त्यानां संसारविधिमुत्तमम् ॥
pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | śrotumicchāmi martyānāṃ saṃsāravidhimuttamam
पितामह, आप महाप्राज्ञ हैं और सब शास्त्रों में निपुण हैं; मैं मनुष्यों के संसार-चक्र का उत्तम विधान सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (13.173.2)
केन वृत्तेन राजेन्द्र वर्तमाना नरा भुवि । प्राप्नुवन्त्युत्तमं स्वर्गं कथं च नरकं नृप ॥
kena vṛttena rājendra vartamānā narā bhuvi | prāpnuvantyuttamaṃ svargaṃ kathaṃ ca narakaṃ nṛpa
हे राजेन्द्र, पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य किस आचरण से उत्तम स्वर्ग पाते हैं, और किस आचरण से नरक में जाते हैं?
श्लोक 3 (13.173.3)
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः । प्रयान्त्यमुं लोकमितः को वै ताननुगच्छति ॥
mṛtaṃ śarīramutsṛjya kāṣṭhaloṣṭasamaṃ janāḥ | prayāntyamuṃ lokamitaḥ ko vai tānanugacchati
जब लोग लकड़ी और ढेले के समान हो गए शरीर को छोड़कर यहाँ से उस परलोक को जाते हैं, तब उनके पीछे कौन जाता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (13.173.4)
दूरादायाति भगवान्बृहस्पतिरुदारधीः । पृच्छैनं सुमहाभागमेतद्गुह्यं सनातनम् ॥
dūrādāyāti bhagavānbṛhaspatirudāradhīḥ | pṛcchainaṃ sumahābhāgametadguhyaṃ sanātanam
उदारबुद्धि भगवान् बृहस्पति दूर से आ रहे हैं। इस सनातन रहस्य के बारे में उन महाभाग से पूछो।
श्लोक 5 (13.173.5)
नैतदन्येन शक्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै । वक्ता बृहस्पतिसमो न ह्यन्यो विद्यते क्वचित् ॥
naitadanyena śakyaṃ hi vaktuṃ kenacidadya vai | vaktā bṛhaspatisamo na hyanyo vidyate kvacit
इसे आज कोई और नहीं बता सकता; बृहस्पति के समान वक्ता कहीं और नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (13.173.6)
तयोः संवदतोरेवं पार्थगाङ्गेययोस्तदा । आजगाम विशुद्धात्मा भगवान्स बृहस्पतिः ॥
tayoḥ saṃvadatorevaṃ pārthagāṅgeyayostadā | ājagāma viśuddhātmā bhagavānsa bṛhaspatiḥ
जब पृथापुत्र और गङ्गापुत्र इस प्रकार बात कर रहे थे, तभी विशुद्ध आत्मा वाले भगवान् बृहस्पति वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 7 (13.173.7)
ततो राजा समुत्थाय धृतराष्ट्रपुरोगमः । पूजामनुपमां चक्रे सर्वे ते च सभासदः ॥
tato rājā samutthāya dhṛtarāṣṭrapurogamaḥ | pūjāmanupamāṃ cakre sarve te ca sabhāsadaḥ
तब धृतराष्ट्र को आगे करके राजा उठ खड़े हुए और उन्होंने बृहस्पति का अनुपम सत्कार किया; सभा के सभी लोगों ने भी वैसा ही किया।
श्लोक 8 (13.173.8)
ततो धर्मसुतो राजा भगवन्तं बृहस्पतिम् । उपगम्य यथान्यायं प्रश्नं पप्रच्छ तत्त्वतः ॥
tato dharmasuto rājā bhagavantaṃ bṛhaspatim | upagamya yathānyāyaṃ praśnaṃ papraccha tattvataḥ
तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने भगवान् बृहस्पति के पास विधिपूर्वक जाकर तत्त्व के विषय में अपना प्रश्न पूछा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 9 (13.173.9)
भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । मर्त्यस्य कः सहायो वै पिता माता सुतो गुरुः । ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ॥
bhagavansarvadharmajña sarvaśāstraviśārada | martyasya kaḥ sahāyo vai pitā mātā suto guruḥ | jñātisambandhivargaśca mitravargastathaiva ca
भगवन्, आप सब धर्मों के ज्ञाता और सब शास्त्रों में निपुण हैं; मनुष्य का सहायक कौन होता है: पिता, माता, पुत्र, गुरु, जाति-सम्बन्धियों का समूह, या मित्रों का समूह?
श्लोक 10 (13.173.10)
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः । गच्छन्त्यमुं च लोकं वै क एताननुगच्छति ॥
mṛtaṃ śarīramutsṛjya kāṣṭhaloṣṭasamaṃ janāḥ | gacchantyamuṃ ca lokaṃ vai ka etānanugacchati
जब लोग लकड़ी और ढेले के समान शरीर को छोड़कर उस परलोक को जाते हैं, तब उनके पीछे कौन जाता है?
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 11 (13.173.11)
एकः प्रसूयते राजन्नेक एव विनश्यति । एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम् ॥
ekaḥ prasūyate rājanneka eva vinaśyati | ekastarati durgāṇi gacchatyekastu durgatim
हे राजन्, मनुष्य अकेला जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट होता है; अकेला ही कठिनाइयाँ पार करता है और अकेला ही दुर्गति को जाता है।
श्लोक 12 (13.173.12)
न सहायः पिता माता तथा भ्राता सुतो गुरुः । ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ॥
na sahāyaḥ pitā mātā tathā bhrātā suto guruḥ | jñātisambandhivargaśca mitravargastathaiva ca
न पिता, न माता, न भाई, न पुत्र, न गुरु सहायक होता है; न जाति-सम्बन्धियों का समूह और न मित्रों का समूह ही।
श्लोक 13 (13.173.13)
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः । मुहूर्तमुपयुञ्ज्याथ ततो यान्ति पराङ्मुखाः ॥
mṛtaṃ śarīramutsṛjya kāṣṭhaloṣṭasamaṃ janāḥ | muhūrtamupayuñjyātha tato yānti parāṅmukhāḥ
लोग लकड़ी और ढेले के समान शरीर को छोड़ देते हैं; क्षण भर उसके पास रहकर फिर मुँह फेरकर चले जाते हैं।
श्लोक 14 (13.173.14)
तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्म एकोऽनुगच्छति । तस्माद्धर्मः सहायार्थे सेवितव्यः सदा नृपः ॥
taistaccharīramutsṛṣṭaṃ dharma eko'nugacchati | tasmāddharmaḥ sahāyārthe sevitavyaḥ sadā nṛpaḥ
उनके द्वारा छोड़े गए उस शरीर के पीछे केवल धर्म जाता है। इसलिए हे राजन्, सहायता के लिए धर्म का सदा पालन करना चाहिए।
श्लोक 15 (13.173.15)
प्राणी धर्मसमायुक्तो गच्छेत्स्वर्गगतिं पराम् । तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं चोपपद्यते ॥
prāṇī dharmasamāyukto gacchetsvargagatiṃ parām | tathaivādharmasaṃyukto narakaṃ copapadyate
धर्म से युक्त प्राणी स्वर्ग की परम गति को जाता है, और उसी प्रकार अधर्म से युक्त प्राणी नरक में पड़ता है।
श्लोक 16 (13.173.16)
तस्मान्न्यायागतैरर्थैर्धर्मं सेवेत पण्डितः । धर्म एको मनुष्याणां सहायः पारलौकिकः ॥
tasmānnyāyāgatairarthairdharmaṃ seveta paṇḍitaḥ | dharma eko manuṣyāṇāṃ sahāyaḥ pāralaukikaḥ
इसलिए बुद्धिमान् मनुष्य को न्यायपूर्वक कमाए धन से धर्म का सेवन करना चाहिए; परलोक में मनुष्यों का एकमात्र सहायक धर्म ही है।
श्लोक 17 (13.173.17)
लोभान्मोहादनुक्रोशाद्भयाद्वाऽप्यबहुश्रुतः । नरः करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः ॥
lobhānmohādanukrośādbhayādvā'pyabahuśrutaḥ | naraḥ karotyakāryāṇi parārthe lobhamohitaḥ
लोभ, मोह, दया या भय के कारण अल्पज्ञ मनुष्य, लोभ से मोहित होकर, दूसरे के लिए न करने योग्य कर्म कर बैठता है।
श्लोक 18 (13.173.18)
धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रितयं जीविते फलम् । एतत्त्रयमवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम् ॥
dharmaścārthaśca kāmaśca tritayaṃ jīvite phalam | etattrayamavāptavyamadharmaparivarjitam
धर्म, अर्थ और काम: जीवन के ये तीन फल हैं; इन तीनों को अधर्म से बचकर प्राप्त करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 19 (13.173.19)
श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मयुक्तं परं हितम् । शरीरनिश्चयं ज्ञातुं बुद्धिस्तु मम जायते ॥
śrutaṃ bhagavato vākyaṃ dharmayuktaṃ paraṃ hitam | śarīraniścayaṃ jñātuṃ buddhistu mama jāyate
मैंने भगवान् के धर्मयुक्त और परम हितकारी वचन सुने। अब शरीर के विषय में निश्चित तत्त्व जानने की इच्छा मुझे हो रही है।
श्लोक 20 (13.173.20)
मृतं शरीरं हि नृणां सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम् । अचक्षुर्विषयं प्राप्तं कथं धर्मोऽनुगच्छति ॥
mṛtaṃ śarīraṃ hi nṛṇāṃ sūkṣmamavyaktatāṃ gatam | acakṣurviṣayaṃ prāptaṃ kathaṃ dharmo'nugacchati
मरे हुए मनुष्यों का शरीर सूक्ष्म होकर अव्यक्त हो जाता है और आँखों की पहुँच से परे चला जाता है; ऐसी दशा में धर्म उसके पीछे कैसे जाता है?
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 21 (13.173.21)
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिरनन्तरम् । बुद्धिरात्मा च सहिता धर्मं पश्यन्ति नित्यदा ॥
pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiranantaram | buddhirātmā ca sahitā dharmaṃ paśyanti nityadā
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और उनके बाद अग्नि, तथा बुद्धि और आत्मा: ये सब मिलकर सदा धर्म को देखते रहते हैं।
श्लोक 22 (13.173.22)
प्राणिनामिह सर्वेषां साक्षिभूतं दिवानिशम् । एतैश्च सह धर्मोऽपि तं जीवमनुगच्छति ॥
prāṇināmiha sarveṣāṃ sākṣibhūtaṃ divāniśam | etaiśca saha dharmo'pi taṃ jīvamanugacchati
ये यहाँ सभी प्राणियों के रात-दिन साक्षी हैं; और इनके साथ धर्म भी उस जीव के पीछे जाता है।
श्लोक 23 (13.173.23)
त्वगस्थि मांसं शुक्रं च शोणितं च महामते । शरीरं वर्जयन्त्येते जीवितेन विवर्जितम् ॥
tvagasthi māṃsaṃ śukraṃ ca śoṇitaṃ ca mahāmate | śarīraṃ varjayantyete jīvitena vivarjitam
हे महामते, त्वचा, हड्डी, मांस, वीर्य और रक्त: ये प्राणहीन शरीर को छोड़ देते हैं।
श्लोक 24 (13.173.24)
ततो धर्मसमायुक्तः स जीवः सुखमेधते । इह लोके परे चैव किं भूयः कथयामि ते ॥
tato dharmasamāyuktaḥ sa jīvaḥ sukhamedhate | iha loke pare caiva kiṃ bhūyaḥ kathayāmi te
तब धर्म से युक्त वह जीव इस लोक में और परलोक में भी सुख से बढ़ता है। अब मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 25 (13.173.25)
तद्दर्शितं भगवता यथा धर्मोऽनुगच्छति । एतत्तु ज्ञातुमिच्छामि कथं रेतः प्रवर्तते ॥
taddarśitaṃ bhagavatā yathā dharmo'nugacchati | etattu jñātumicchāmi kathaṃ retaḥ pravartate
भगवन्, आपने बताया कि धर्म कैसे पीछे जाता है। पर मैं यह जानना चाहता हूँ कि वीर्य कैसे उत्पन्न होता है?
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 26 (13.173.26)
अन्नमश्नन्ति यद्देवाः शरीरस्था नरेश्वर । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनस्तथा ॥
annamaśnanti yaddevāḥ śarīrasthā nareśvara | pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotirmanastathā
हे नरेश्वर, शरीर में रहने वाले जो देवता अन्न खाते हैं, वे पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि और मन हैं।
श्लोक 27 (13.173.27)
ततस्तृप्तेषु राजेन्द्र तेषु भूतेषु पञ्चसु । मनःषष्ठेषु शुद्धात्मन्रेतः सम्पद्यते महत् ॥
tatastṛpteṣu rājendra teṣu bhūteṣu pañcasu | manaḥṣaṣṭheṣu śuddhātmanretaḥ sampadyate mahat
हे राजेन्द्र, जब इन पाँच तत्त्वों के तृप्त हो जाने पर, मन को छठा मानकर, हे शुद्धात्मन्, प्रचुर वीर्य बनता है।
श्लोक 28 (13.173.28)
ततो गर्भः सम्भवति श्लेषात्स्त्रीपुंसयोर्नृप । एतत्ते सर्वमाख्यातं भूयः किं श्रोतुमिच्छसि ॥
tato garbhaḥ sambhavati śleṣātstrīpuṃsayornṛpa | etatte sarvamākhyātaṃ bhūyaḥ kiṃ śrotumicchasi
हे राजन्, उसी से स्त्री-पुरुष के संयोग से गर्भ बनता है। यह सब तुम्हें बता दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 29 (13.173.29)
आख्यातं मे भगवता गर्भः सञ्जायते यथा । यथा जातस्तु पुरुषः प्रपद्यति तदुच्यताम् ॥
ākhyātaṃ me bhagavatā garbhaḥ sañjāyate yathā | yathā jātastu puruṣaḥ prapadyati taducyatām
आपने बताया कि गर्भ कैसे बनता है। अब बताइए कि उत्पन्न हुआ पुरुष आगे क्या पाता है।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 30 (13.173.30)
आसन्नमात्रः पुरुषस्तैर्भूतैरभिभूयते । विप्रयुक्तश्च तैर्भूतैः पुनर्यात्यपरां गतिम् । स च भूतसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ॥
āsannamātraḥ puruṣastairbhūtairabhibhūyate | viprayuktaśca tairbhūtaiḥ punaryātyaparāṃ gatim | sa ca bhūtasamāyuktaḥ prāpnute jīva eva hi
पास आते ही पुरुष उन भूतों से अभिभूत हो जाता है; उन भूतों से अलग होकर वह फिर दूसरी गति को जाता है। और भूतों से फिर युक्त होकर जीव ही उसे पाता है।
श्लोक 31 (13.173.31)
ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् । देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
tato'sya karma paśyanti śubhaṃ vā yadi vāśubham | devatāḥ pañcabhūtasthāḥ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
तब पाँच भूतों में रहने वाले देवता उसके शुभ या अशुभ कर्म को देखते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 32 (13.173.32)
त्वगस्थिमांसमुत्सृज्य तैश्च भूतैर्विवर्जितः । जीवः सह वसन्कृत्स्नं सुखदुःखसहः प्रभो ॥
tvagasthimāṃsamutsṛjya taiśca bhūtairvivarjitaḥ | jīvaḥ saha vasankṛtsnaṃ sukhaduḥkhasahaḥ prabho
हे प्रभो, जब जीव त्वचा, हड्डी और मांस को छोड़कर उन भूतों से अलग हो जाता है, तब वह किस प्रकार रहकर अपने सारे सुख-दुःख सहता है?
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 33 (13.173.33)
भोगवश्यं कर्मवश्यं यातनावश्यमित्यपि । एतत्त्रयाणामासाद्य कर्मतः सोऽश्नुते फलम् ॥
bhogavaśyaṃ karmavaśyaṃ yātanāvaśyamityapi | etattrayāṇāmāsādya karmataḥ so'śnute phalam
वह भोग के वश में है, कर्म के वश में है और यातना के वश में है; इन तीनों के अधीन होकर वह अपने कर्म के अनुसार फल भोगता है।
श्लोक 34 (13.173.34)
जीवः कर्मसमायुक्तः शीघ्रं रेतस्त्वमागतः । स्त्रीणां पुष्पं समासाद्य सूतिकाले लभेत तत् ॥
jīvaḥ karmasamāyuktaḥ śīghraṃ retastvamāgataḥ | strīṇāṃ puṣpaṃ samāsādya sūtikāle labheta tat
कर्म से युक्त जीव शीघ्र ही वीर्य रूप को प्राप्त होता है; स्त्री के रज को पाकर प्रसव के समय वह शरीर पाता है।
श्लोक 35 (13.173.35)
यमस्य पुरुषैः क्लेशं यमस्य पुरुषैर्वधम् । दुःखं संसारचक्रं च नरः क्लेशं स विन्दति ॥
yamasya puruṣaiḥ kleśaṃ yamasya puruṣairvadham | duḥkhaṃ saṃsāracakraṃ ca naraḥ kleśaṃ sa vindati
वह यम के दूतों के हाथों कष्ट पाता है, यम के दूतों के हाथों वध पाता है; और दुःख, संसार-चक्र तथा क्लेश भोगता है।
श्लोक 36 (13.173.36)
इह लोके स च प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव । सुकृतं कर्म वै भुङ्क्ते धर्मस्य फलमाश्रितः ॥
iha loke sa ca prāṇī janmaprabhṛti pārthiva | sukṛtaṃ karma vai bhuṅkte dharmasya phalamāśritaḥ
हे राजन्, इस लोक में वह प्राणी जन्म से ही धर्म के फल का आश्रय लेकर अपने पुण्य कर्म का भोग करता है।
श्लोक 37 (13.173.37)
यदि धर्मं यथाशक्ति जन्मप्रभृति सेवते । ततः स पुरुषो भूत्वा सेवते नियतं सुखम् ॥
yadi dharmaṃ yathāśakti janmaprabhṛti sevate | tataḥ sa puruṣo bhūtvā sevate niyataṃ sukham
यदि वह जन्म से ही अपनी शक्ति भर धर्म का सेवन करता है, तो मनुष्य होकर सदा सुख भोगता है।
श्लोक 38 (13.173.38)
अथान्तरा तु धर्मस्याप्यधर्ममुपसेवते । सुखस्यानन्तरं दुःखं स जीवोऽप्यधिगच्छति ॥
athāntarā tu dharmasyāpyadharmamupasevate | sukhasyānantaraṃ duḥkhaṃ sa jīvo'pyadhigacchati
पर यदि बीच में वह धर्म को छोड़कर अधर्म का सेवन करने लगता है, तो वह जीव सुख के बाद ही दुःख पाता है।
श्लोक 39 (13.173.39)
अधर्मेण समायुक्तो यमस्य विषयं गतः । महद्दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजायते ॥
adharmeṇa samāyukto yamasya viṣayaṃ gataḥ | mahadduḥkhaṃ samāsādya tiryagyonau prajāyate
अधर्म से युक्त होकर वह यम के लोक में जाता है और भारी दुःख भोगकर पशु-पक्षी की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 40 (13.173.40)
कर्मणा येन येनेह यस्यां योनौ प्रजायते । जीवो मोहसमायुक्तस्तन्मे निगदतः शृणु ॥
karmaṇā yena yeneha yasyāṃ yonau prajāyate | jīvo mohasamāyuktastanme nigadataḥ śṛṇu
मोह से बँधा हुआ जीव जिस-जिस कर्म से जिस योनि में जन्म लेता है, वह मैं बताता हूँ, सुनो।
श्लोक 41 (13.173.41)
यदेतदुच्यते शास्त्रे सेतिहासे च च्छन्दसि । यमस्य विषयं घोरं मर्त्यो लोकः प्रपद्यते ॥
yadetaducyate śāstre setihāse ca cchandasi | yamasya viṣayaṃ ghoraṃ martyo lokaḥ prapadyate
शास्त्र में, इतिहास के साथ और वेद में जो कहा जाता है, वह यह है कि मर्त्यलोक यम के भयंकर राज्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 42 (13.173.42)
इह स्थानानि पुण्यानि देवतुल्यानि भूपते । तिर्यग्योन्यतिरिक्तानि गतिमन्ति च सर्वशः ॥
iha sthānāni puṇyāni devatulyāni bhūpate | tiryagyonyatiriktāni gatimanti ca sarvaśaḥ
हे भूपते, यहाँ देवताओं के समान पुण्य स्थान हैं, जो पशु-पक्षी की योनियों से अलग हैं और सब प्रकार से अपनी निश्चित गति वाले हैं।
श्लोक 43 (13.173.43)
यमस्य भवने दिव्ये ब्रह्मलोकसमे गुणैः । कर्मभिर्नियतैर्बद्धो जन्तुर्दुःखान्युपाश्नुते ॥
yamasya bhavane divye brahmalokasame guṇaiḥ | karmabhirniyatairbaddho janturduḥkhānyupāśnute
गुणों में ब्रह्मलोक के समान यम के दिव्य भवन में जीव, निश्चित कर्मों से बँधा हुआ, दुःख भोगता है।
श्लोक 44 (13.173.44)
येनयेन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम् । प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यतः परम् ॥
yenayena tu bhāvena karmaṇā puruṣo gatim | prayāti paruṣāṃ ghorāṃ tatte vakṣyāmyataḥ param
पुरुष जिस-जिस भाव और कर्म से कठोर और भयंकर गति को जाता है, वह मैं आगे तुम्हें बताऊँगा।
श्लोक 45 (13.173.45)
अधीत्य चतुरो वेदान्द्विजो मोहसमन्वितः । पतितात्प्रतिगृह्याथ खरयोनौ प्रजायते ॥
adhītya caturo vedāndvijo mohasamanvitaḥ | patitātpratigṛhyātha kharayonau prajāyate
चारों वेद पढ़कर भी जो द्विज मोह में पड़कर पतित से दान लेता है, वह गधे की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 46 (13.173.46)
खरो जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत । खरो मृतो बलीवर्दः सप्तवर्षाणि जीवति ॥
kharo jīvati varṣāṇi daśa pañca ca bhārata | kharo mṛto balīvardaḥ saptavarṣāṇi jīvati
हे भारत, गधा पन्द्रह वर्ष जीता है; मरने पर वह बैल होता है और सात वर्ष जीता है।
श्लोक 47 (13.173.47)
बलीवर्दो मृतश्चापि जायते ब्रह्मराक्षसः । ब्रह्मरक्षश्च मासांस्त्रींस्ततो जायेत ब्राह्मणः ॥
balīvardo mṛtaścāpi jāyate brahmarākṣasaḥ | brahmarakṣaśca māsāṃstrīṃstato jāyeta brāhmaṇaḥ
बैल भी मरकर ब्रह्मराक्षस होता है; तीन महीने ब्रह्मराक्षस रहकर फिर ब्राह्मण के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 48 (13.173.48)
पतितं याजयित्वा तु कृमियोनौ प्रजायते । तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ॥
patitaṃ yājayitvā tu kṛmiyonau prajāyate | tatra jīvati varṣāṇi daśa pañca ca bhārata
पतित का यज्ञ कराने वाला कीड़े की योनि में जन्म लेता है; हे भारत, वहाँ वह पन्द्रह वर्ष जीता है।
श्लोक 49 (13.173.49)
कृमिभावाद्विमुक्तस्तु ततो जायेत गर्दभः । गर्दभः पञ्चवर्षाणि पञ्चवर्षाणि सूकरः ॥
kṛmibhāvādvimuktastu tato jāyeta gardabhaḥ | gardabhaḥ pañcavarṣāṇi pañcavarṣāṇi sūkaraḥ
कीड़े के जन्म से छूटकर वह गधा होता है; पाँच वर्ष गधा और पाँच वर्ष सूअर रहता है।
श्लोक 50 (13.173.50)
कुक्कुटः पञ्चवर्षाणि पञ्चवर्षाणि जम्बुकः । श्वा वर्षमेकं भवति ततो जायेत मानवः ॥
kukkuṭaḥ pañcavarṣāṇi pañcavarṣāṇi jambukaḥ | śvā varṣamekaṃ bhavati tato jāyeta mānavaḥ
पाँच वर्ष मुर्गा, पाँच वर्ष सियार और एक वर्ष कुत्ता होकर वह फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 51 (13.173.51)
उपाध्यायस्त्रियः पापं शिष्यः कुर्यादबुद्धिमान् । स जीव इह संसारांस्त्रीनाप्नोति न संशयः ॥
upādhyāyastriyaḥ pāpaṃ śiṣyaḥ kuryādabuddhimān | sa jīva iha saṃsārāṃstrīnāpnoti na saṃśayaḥ
जो मूर्ख शिष्य गुरु की स्त्री के साथ पाप करता है, वह यहाँ तीन संसार-चक्रों से गुज़रता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 52 (13.173.52)
वृको भवति राजेन्द्र ततः क्रव्यात्ततः खरः । ततः प्रेतः परिक्लिष्टः पश्चाज्जायेत ब्राह्मणः ॥
vṛko bhavati rājendra tataḥ kravyāttataḥ kharaḥ | tataḥ pretaḥ parikliṣṭaḥ paścājjāyeta brāhmaṇaḥ
हे राजेन्द्र, वह पहले भेड़िया होता है, फिर मांसभक्षी पशु, फिर गधा; उसके बाद कष्ट पाता हुआ प्रेत होता है और अन्त में ब्राह्मण के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 53 (13.173.53)
मनसाऽपि गुरोर्भार्यां यः शिष्यो याति पापकृत् । स उग्रान्प्रैति संसारानधर्मेणेह चेतसा ॥
manasā'pi gurorbhāryāṃ yaḥ śiṣyo yāti pāpakṛt | sa ugrānpraiti saṃsārānadharmeṇeha cetasā
जो शिष्य पाप करके मन से भी गुरुपत्नी के पास जाता है, वह अपने मन के अधर्म के कारण उग्र संसार-चक्रों में जाता है।
श्लोक 54 (13.173.54)
श्वयोनौ तु स सम्भूतस्त्रीणि वर्षाणि जीवति । तत्रापि निधनं प्राप्तः कृमियोनौ प्रजायते ॥
śvayonau tu sa sambhūtastrīṇi varṣāṇi jīvati | tatrāpi nidhanaṃ prāptaḥ kṛmiyonau prajāyate
वह कुत्ते की योनि में जन्म लेकर तीन वर्ष जीता है; वहाँ भी मृत्यु पाकर कीड़े की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 55 (13.173.55)
कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेकं तु जीवति । ततस्तु निधनं प्राप्तो ब्रह्मयोनौ प्रजायते ॥
kṛmibhāvamanuprāpto varṣamekaṃ tu jīvati | tatastu nidhanaṃ prāpto brahmayonau prajāyate
कीड़े का जन्म पाकर वह एक वर्ष जीता है; फिर मृत्यु पाकर ब्राह्मण की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 56 (13.173.56)
यदि पुत्रसमं शिष्यं गुरुर्हन्यादकारणे । आत्मनः कामकारेण सोपि हिंस्रः प्रजायते ॥
yadi putrasamaṃ śiṣyaṃ gururhanyādakāraṇe | ātmanaḥ kāmakāreṇa sopi hiṃsraḥ prajāyate
यदि गुरु पुत्र के समान शिष्य को बिना कारण अपनी इच्छा से मार डालता है, तो वह भी हिंसक पशु के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 57 (13.173.57)
पितरं मातरं चैव यस्तु पुत्रोऽवमन्यते । सोऽपि राजन्मृतो जन्तुः पूर्वं जायेत गर्दभः ॥
pitaraṃ mātaraṃ caiva yastu putro'vamanyate | so'pi rājanmṛto jantuḥ pūrvaṃ jāyeta gardabhaḥ
हे राजन्, जो पुत्र अपने माता-पिता का अपमान करता है, वह मरकर पहले गधे के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 58 (13.173.58)
गर्दभत्वं तु सम्प्राप्य दशवर्षाणि जीवति । संवत्सरं तु कुम्भीरस्ततो जायेत मानवः ॥
gardabhatvaṃ tu samprāpya daśavarṣāṇi jīvati | saṃvatsaraṃ tu kumbhīrastato jāyeta mānavaḥ
गधे का जन्म पाकर वह दस वर्ष जीता है; फिर एक वर्ष मगर रहकर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 59 (13.173.59)
पुत्रस्य मातापितरौ यस्य रुष्टावुभावपि । गुर्वपध्यानतः सोपि मृतो जायति गर्दभः ॥
putrasya mātāpitarau yasya ruṣṭāvubhāvapi | gurvapadhyānataḥ sopi mṛto jāyati gardabhaḥ
जिस पुत्र से माता और पिता दोनों रुष्ट हों, वह बड़ों का अहित सोचने के कारण मरकर गधे के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 60 (13.173.60)
खरो जीवति मासांस्तु दश श्वा च चतुर्दशः । बिडालः सप्तमासांस्तु ततो जायेत मानवः ॥
kharo jīvati māsāṃstu daśa śvā ca caturdaśaḥ | biḍālaḥ saptamāsāṃstu tato jāyeta mānavaḥ
वह दस महीने गधा, चौदह महीने कुत्ता और सात महीने बिल्ली रहकर फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 61 (13.173.61)
मातापितरावाक्रुश्य शारिका सम्प्रजायते । ताडयित्वा तु तावेव जायते कच्छपो नृप ॥
mātāpitarāvākruśya śārikā samprajāyate | tāḍayitvā tu tāveva jāyate kacchapo nṛpa
माता-पिता को गाली देने वाला शारिका (मैना) होता है; हे राजन्, उन्हें मारने वाला कछुआ होकर जन्म लेता है।
श्लोक 62 (13.173.62)
कच्छपो दशवर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यकः । व्यालो भूत्वा च षण्मासांस्ततो जायति मानुषः ॥
kacchapo daśavarṣāṇi trīṇi varṣāṇi śalyakaḥ | vyālo bhūtvā ca ṣaṇmāsāṃstato jāyati mānuṣaḥ
कछुआ दस वर्ष, साही तीन वर्ष और साँप छह महीने रहकर वह फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 63 (13.173.63)
भर्तृपिण्डमुपाश्नन्यो राजद्विष्टानि सेवते । सोपि मोहसमापन्नो मृतो जायति वानरः ॥
bhartṛpiṇḍamupāśnanyo rājadviṣṭāni sevate | sopi mohasamāpanno mṛto jāyati vānaraḥ
जो अपने स्वामी का अन्न खाकर भी राजा के अप्रिय कामों में लगता है, वह मोह में पड़ा हुआ मरकर बन्दर के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 64 (13.173.64)
वानरो दशवर्षाणि पञ्चवर्षाणि सूकरः । श्वाऽथ भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जायति मानुषः ॥
vānaro daśavarṣāṇi pañcavarṣāṇi sūkaraḥ | śvā'tha bhūtvā tu ṣaṇmāsāṃstato jāyati mānuṣaḥ
बन्दर दस वर्ष और सूअर पाँच वर्ष रहकर, फिर छह महीने कुत्ता होकर वह मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 65 (13.173.65)
न्यासापहर्ता तु नरो यमस्य विषयं गतः । यातनानां शतं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते ॥
nyāsāpahartā tu naro yamasya viṣayaṃ gataḥ | yātanānāṃ śataṃ gatvā kṛmiyonau prajāyate
धरोहर हड़पने वाला मनुष्य यम के लोक में जाता है और सौ यातनाएँ भोगकर कीड़े की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 66 (13.173.66)
तत्र जीवति वर्षाणि दशपञ्च च भारत । दुष्कृतस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुषः ॥
tatra jīvati varṣāṇi daśapañca ca bhārata | duṣkṛtasya kṣayaṃ kṛtvā tato jāyati mānuṣaḥ
हे भारत, वह वहाँ पन्द्रह वर्ष जीता है; अपने बुरे कर्म का क्षय करके फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 67 (13.173.67)
असूयकः कुत्सितश्च चण्डालो दुःखमश्नुते । विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जायति दुर्मतिः ॥
asūyakaḥ kutsitaśca caṇḍālo duḥkhamaśnute | viśvāsahartā tu naro mīno jāyati durmatiḥ
ईर्ष्यालु, तिरस्कृत और चाण्डाल दुःख भोगते हैं; पर विश्वासघात करने वाला दुर्बुद्धि मनुष्य मछली के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 68 (13.173.68)
भूत्वा मीनोऽष्टमासांस्तु मृगो जायति भारत । मृगस्तु चतुरो मासांस्ततश्छागः प्रजायते ॥
bhūtvā mīno'ṣṭamāsāṃstu mṛgo jāyati bhārata | mṛgastu caturo māsāṃstataśchāgaḥ prajāyate
हे भारत, आठ महीने मछली रहकर वह हिरन होता है; चार महीने हिरन रहकर फिर बकरे के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 69 (13.173.69)
छागस्तु निधनं प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः । गौः स सञ्जायते जन्तुस्ततो जायति मानुषः ॥
chāgastu nidhanaṃ prāpya pūrṇe saṃvatsare tataḥ | gauḥ sa sañjāyate jantustato jāyati mānuṣaḥ
बकरा पूरा एक वर्ष बीतने पर मरकर गाय के रूप में जन्म लेता है, और उसके बाद मनुष्य होता है।
श्लोक 70 (13.173.70)
धान्यान्यवांस्तिलान्माषान्कुलत्थान्सर्षपांश्चणान् । कलायानथ मुद्गांश्च गोधूमानतसीस्तथा ॥
dhānyānyavāṃstilānmāṣānkulatthānsarṣapāṃścaṇān | kalāyānatha mudgāṃśca godhūmānatasīstathā
अनाज, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, मूँग, गेहूँ और अलसी:
श्लोक 71 (13.173.71)
यस्तु धान्यापहर्ता च मोहाज्जन्तुरचेतनः । स जायते महाराज मूषिको निरपत्रपः ॥
yastu dhānyāpahartā ca mohājjanturacetanaḥ | sa jāyate mahārāja mūṣiko nirapatrapaḥ
जो मोह के कारण अचेत होकर अनाज चुराता है, हे महाराज, वह निर्लज्ज चूहे के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 72 (13.173.72)
ततः प्रेत्य महाराज मृतो जायति सूकरः । सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप ॥
tataḥ pretya mahārāja mṛto jāyati sūkaraḥ | sūkaro jātamātrastu rogeṇa mriyate nṛpa
हे महाराज, फिर मरकर वह सूअर के रूप में जन्म लेता है; और हे राजन्, सूअर जन्म लेते ही रोग से मर जाता है।
श्लोक 73 (13.173.73)
श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव । भूत्वा श्वा पञ्चवर्षाणि ततो जायति मानवः ॥
śvā tato jāyate mūḍhaḥ karmaṇā tena pārthiva | bhūtvā śvā pañcavarṣāṇi tato jāyati mānavaḥ
हे राजन्, फिर उसी कर्म के कारण वह मूढ़ कुत्ता होता है; पाँच वर्ष कुत्ता रहकर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 74 (13.173.74)
परदाराभिमर्शं तु कृत्वा जायति वै वृकः । श्वा शृगालस्ततो गृध्रो व्यालः कङ्को बकस्तथा ॥
paradārābhimarśaṃ tu kṛtvā jāyati vai vṛkaḥ | śvā śṛgālastato gṛdhro vyālaḥ kaṅko bakastathā
पराई स्त्री का स्पर्श करने वाला भेड़िया होकर जन्म लेता है; फिर कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक पक्षी और बगुला होता है।
श्लोक 75 (13.173.75)
भ्रातुर्भार्यां तु पापात्मा यो धर्षयति मोहितः । पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोऽपि संवत्सरं नृप ॥
bhrāturbhāryāṃ tu pāpātmā yo dharṣayati mohitaḥ | puṃskokilatvamāpnoti so'pi saṃvatsaraṃ nṛpa
जो पापी मोह में पड़कर भाई की पत्नी का अपमान करता है, वह नर कोयल बनता है, और हे राजन्, एक वर्ष तक वैसा ही रहता है।
श्लोक 76 (13.173.76)
सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्यां तथैव च । प्रधर्षयित्वा कामाद्यो मृतो जायति सूकरः ॥
sakhibhāryāṃ gurorbhāryāṃ rājabhāryāṃ tathaiva ca | pradharṣayitvā kāmādyo mṛto jāyati sūkaraḥ
जो कामवश मित्र की पत्नी, गुरु की पत्नी या राजा की पत्नी पर बलात्कार करता है, वह मरकर सूअर के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 77 (13.173.77)
सूकरः पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि श्वाविधः । बिडालः पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि कुक्कुटः ॥
sūkaraḥ pañcavarṣāṇi daśavarṣāṇi śvāvidhaḥ | biḍālaḥ pañcavarṣāṇi daśavarṣāṇi kukkuṭaḥ
पाँच वर्ष सूअर, दस वर्ष साही; पाँच वर्ष बिल्ली, दस वर्ष मुर्गा।
श्लोक 78 (13.173.78)
पिपीलिका तु मासांस्त्रीन्वानरो मासमेव तु । एतानासाद्य संसारान्कृमियोनौ प्रजायते ॥
pipīlikā tu māsāṃstrīnvānaro māsameva tu | etānāsādya saṃsārānkṛmiyonau prajāyate
तीन महीने चींटी और एक महीना बन्दर रहकर, इन संसार-चक्रों से गुज़रकर वह कीड़े की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 79 (13.173.79)
तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश । ततोऽधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानवः ॥
tatra jīvati māsāṃstu kṛmiyonau caturdaśa | tato'dharmakṣayaṃ kṛtvā punarjāyati mānavaḥ
वह कीड़े की योनि में चौदह महीने जीता है; फिर अपने अधर्म का क्षय करके दोबारा मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 80 (13.173.80)
उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेऽपि वा विभो । मोहात्करोति यो विघ्नं स मृतो जायते कृमिः ॥
upasthite vivāhe tu yajñe dāne'pi vā vibho | mohātkaroti yo vighnaṃ sa mṛto jāyate kṛmiḥ
हे विभो, जब विवाह, यज्ञ या दान का अवसर आया हो, उस समय जो मोह से उसमें विघ्न डालता है, वह मरकर कीड़ा होता है।
श्लोक 81 (13.173.81)
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत । अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानवः ॥
kṛmirjīvati varṣāṇi daśa pañca ca bhārata | adharmasya kṣayaṃ kṛtvā tato jāyati mānavaḥ
हे भारत, कीड़ा पन्द्रह वर्ष जीता है; अपने अधर्म का क्षय करके फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 82 (13.173.82)
पूर्वं दत्त्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति । सोपि राजन्मृतो जन्तुः कृमियोनौ प्रजायते ॥
pūrvaṃ dattvā tu yaḥ kanyāṃ dvitīye dātumicchati | sopi rājanmṛto jantuḥ kṛmiyonau prajāyate
जो पहले कन्या देकर फिर दूसरी बार उसे देना चाहता है, वह भी हे राजन्, मरकर कीड़े की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 83 (13.173.83)
तत्र जीवति वर्षाणि त्रयोदश युधिष्ठिर । अधर्मसंक्षये युक्तस्ततो जायति मानवः ॥
tatra jīvati varṣāṇi trayodaśa yudhiṣṭhira | adharmasaṃkṣaye yuktastato jāyati mānavaḥ
हे युधिष्ठिर, वह वहाँ तेरह वर्ष जीता है; अधर्म के नष्ट हो जाने पर फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 84 (13.173.84)
देवकार्यमकृत्वा तु पितृकार्यमथापि वा । अनिर्वाप्य समश्नन्वै मृतो जायति वायसः ॥
devakāryamakṛtvā tu pitṛkāryamathāpi vā | anirvāpya samaśnanvai mṛto jāyati vāyasaḥ
जो देवकार्य या पितृकार्य किए बिना, बिना अर्पण किए भोजन करता है, वह मरकर कौआ होता है।
श्लोक 85 (13.173.85)
वायसः शतवर्षाणि ततो जायति कुक्कुटः । जायते व्यालकश्चापि मासं तस्मात्तु मानुषः ॥
vāyasaḥ śatavarṣāṇi tato jāyati kukkuṭaḥ | jāyate vyālakaścāpi māsaṃ tasmāttu mānuṣaḥ
कौआ सौ वर्ष जीता है, फिर मुर्गा होता है; एक महीना छोटा साँप भी होता है, और उसके बाद मनुष्य।
श्लोक 86 (13.173.86)
ज्येष्ठं पितृसमं चापि भ्रातरं योऽवमन्यते । सोऽपि मृत्युमुपागम्य क्रौञ्चयोनौ प्रजायते ॥
jyeṣṭhaṃ pitṛsamaṃ cāpi bhrātaraṃ yo'vamanyate | so'pi mṛtyumupāgamya krauñcayonau prajāyate
जो पिता के समान बड़े भाई का अपमान करता है, वह भी मृत्यु को प्राप्त होकर क्रौञ्च पक्षी की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 87 (13.173.87)
क्रौञ्चो जीवति वर्षं तु ततो जायति चीरकः । ततो निधनमापन्नो मानुषत्वमुपाश्नुते ॥
krauñco jīvati varṣaṃ tu tato jāyati cīrakaḥ | tato nidhanamāpanno mānuṣatvamupāśnute
क्रौञ्च एक वर्ष जीता है, फिर चीरक होकर जन्म लेता है; उसके बाद मृत्यु पाकर मनुष्य-जन्म प्राप्त करता है।
श्लोक 88 (13.173.88)
वृषलो ब्राह्मणीं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते । ततः सम्प्राप्य निधनं जायते सूकरः पुनः ॥
vṛṣalo brāhmaṇīṃ gatvā kṛmiyonau prajāyate | tataḥ samprāpya nidhanaṃ jāyate sūkaraḥ punaḥ
ब्राह्मणी के पास जाने वाला शूद्र कीड़े की योनि में जन्म लेता है; वहाँ मृत्यु पाकर फिर सूअर के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 89 (13.173.89)
सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप । श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव ॥
sūkaro jātamātrastu rogeṇa mriyate nṛpa | śvā tato jāyate mūḍhaḥ karmaṇā tena pārthiva
हे राजन्, सूअर जन्म लेते ही रोग से मर जाता है; फिर हे पार्थिव, उसी कर्म के कारण वह मूढ़ कुत्ता होता है।
श्लोक 90 (13.173.90)
श्वा भूत्वा कृतकर्माऽसौ जायते मानुषस्ततः । तत्रापत्यं समुत्पाद्य मृतो जायति मूषिकः ॥
śvā bhūtvā kṛtakarmā'sau jāyate mānuṣastataḥ | tatrāpatyaṃ samutpādya mṛto jāyati mūṣikaḥ
कुत्ता होकर अपना कर्म भोग लेने पर वह फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है; वहाँ सन्तान उत्पन्न करके मरता है और चूहा होकर जन्म लेता है।
श्लोक 91 (13.173.91)
कृतघ्नस्तु मृतो राजन्यमस्य विषयं गतः । यमस्य पुरुषैः क्रुद्धैर्वधं प्राप्नोति दारणम् ॥
kṛtaghnastu mṛto rājanyamasya viṣayaṃ gataḥ | yamasya puruṣaiḥ kruddhairvadhaṃ prāpnoti dāraṇam
हे राजन्, कृतघ्न मनुष्य मरकर यम के लोक में जाता है और यम के क्रुद्ध दूतों के हाथों चीर-फाड़ वाली मृत्यु पाता है।
श्लोक 92 (13.173.92)
दण्डं समुद्गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम् । असिपत्रवनं घोरवालुकं कूटशाल्मलीम् ॥
daṇḍaṃ samudgaraṃ śūlamagnikumbhaṃ ca dāruṇam | asipatravanaṃ ghoravālukaṃ kūṭaśālmalīm
दण्ड और गदा, शूल, भयंकर अग्निकुम्भ; असिपत्र वन, भयावह बालू और कूटशाल्मली वृक्ष:
श्लोक 93 (13.173.93)
एताश्चान्याश्च बह्वीश्च यमस्य विषयं गतः । यातनाः प्राप्य तत्रोग्रास्ततो वध्यति भारत ॥
etāścānyāśca bahvīśca yamasya viṣayaṃ gataḥ | yātanāḥ prāpya tatrogrāstato vadhyati bhārata
यम के लोक में पहुँचकर वह इन और अन्य बहुत-सी उग्र यातनाओं को पाता है, और हे भारत, उसके बाद वहाँ मारा जाता है।
श्लोक 94 (13.173.94)
ततो हतः कृतघ्नः स तत्रोग्रैर्भरतर्षभ । संसारचक्रमासाद्य कृमियोनौ प्रजायते ॥
tato hataḥ kṛtaghnaḥ sa tatrograirbharatarṣabha | saṃsāracakramāsādya kṛmiyonau prajāyate
हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ उन उग्र दूतों से मारा गया वह कृतघ्न संसार-चक्र में आ पड़ता है और कीड़े की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 95 (13.173.95)
कृमिर्भवति वर्षाणि दशपञ्च च भारत । ततो गर्भं समासाद्य तत्रैव म्रियते शिशुः ॥
kṛmirbhavati varṣāṇi daśapañca ca bhārata | tato garbhaṃ samāsādya tatraiva mriyate śiśuḥ
हे भारत, वह पन्द्रह वर्ष कीड़ा रहता है; फिर गर्भ में आकर वहीं शिशु के रूप में मर जाता है।
श्लोक 96 (13.173.96)
ततो गर्भशतैर्जन्तुर्बहुभिः सम्प्रपद्यते । संसारांश्च बहून्गत्वा ततस्तिर्यक्षु जायते ॥
tato garbhaśatairjanturbahubhiḥ samprapadyate | saṃsārāṃśca bahūngatvā tatastiryakṣu jāyate
फिर वह जीव सैकड़ों गर्भों से होकर गुज़रता है; बहुत-से संसार-चक्र बिताकर फिर पशु-पक्षियों में जन्म लेता है।
श्लोक 97 (13.173.97)
ततो दुःखमनुप्राप्य बहुवर्षगणानिह । स पुनर्भवसंयुक्तस्ततः कूर्मः प्रजायते ॥
tato duḥkhamanuprāpya bahuvarṣagaṇāniha | sa punarbhavasaṃyuktastataḥ kūrmaḥ prajāyate
फिर यहाँ बहुत वर्षों तक दुःख भोगकर, पुनर्जन्म से बँधा हुआ वह कछुए के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 98 (13.173.98)
दधि हृत्वा बकश्चापि प्लवो मत्स्यानसंस्कृतान् । चोरयित्वा तु दुर्बुद्धिर्मधुदंशः प्रजायते ॥
dadhi hṛtvā bakaścāpi plavo matsyānasaṃskṛtān | corayitvā tu durbuddhirmadhudaṃśaḥ prajāyate
दही चुराने वाला बगुला होता है; बिना साफ की हुई मछलियाँ चुराने वाला प्लव पक्षी; और दुर्बुद्धि चोर मधुदंश (डंक मारने वाला कीट) के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 99 (13.173.99)
फलं वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिकाः । चोरयित्वा च निष्पावं जायते हलगोलकः ॥
phalaṃ vā mūlakaṃ hṛtvā apūpaṃ vā pipīlikāḥ | corayitvā ca niṣpāvaṃ jāyate halagolakaḥ
फल, मूली या पुआ चुराने वाला चींटी बनता है; सेम चुराकर वह हलगोलक नाम का कीट होकर जन्म लेता है।
श्लोक 100 (13.173.100)
पायसं चोरयित्वा तु तित्तिरित्वमवाप्नुते । हृत्वा पिष्टमयं पूपं कुम्भोलूकः प्रजायते ॥
pāyasaṃ corayitvā tu tittiritvamavāpnute | hṛtvā piṣṭamayaṃ pūpaṃ kumbholūkaḥ prajāyate
खीर चुराने वाला तीतर बनता है; आटे का पुआ चुराने वाला कुम्भोलूक (एक प्रकार का उल्लू) होकर जन्म लेता है।
श्लोक 101 (13.173.101)
अयो हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्वायसो जायते नरः । कांस्यं हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्हारितो जायते नरः ॥
ayo hṛtvā tu durbuddhirvāyaso jāyate naraḥ | kāṃsyaṃ hṛtvā tu durbuddhirhārito jāyate naraḥ
लोहा चुराने वाला दुर्बुद्धि मनुष्य कौआ होता है; काँसा चुराने वाला दुर्बुद्धि मनुष्य हारित पक्षी होकर जन्म लेता है।
श्लोक 102 (13.173.102)
राजतं भाजनं हृत्वा कपोतः सम्प्रजायते । हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते ॥
rājataṃ bhājanaṃ hṛtvā kapotaḥ samprajāyate | hṛtvā tu kāñcanaṃ bhāṇḍaṃ kṛmiyonau prajāyate
चाँदी का पात्र चुराने वाला कबूतर के रूप में जन्म लेता है; सोने का पात्र चुराने वाला कीड़े की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 103 (13.173.103)
पत्रोर्णं चोरयित्वा तु कृकलत्वं निगच्छति । कौशिकं तु ततो हृत्वा नरो जायति वर्तकः ॥
patrorṇaṃ corayitvā tu kṛkalatvaṃ nigacchati | kauśikaṃ tu tato hṛtvā naro jāyati vartakaḥ
धुला हुआ रेशमी कपड़ा चुराने वाला गिरगिट की अवस्था पाता है; कौशिक (रेशमी वस्त्र) चुराने वाला मनुष्य फिर बटेर के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 104 (13.173.104)
अंशुकं चोरयित्वा तु शुको जायति मानवः । चोरयित्वा दुकूलं तु मृतो हंसः प्रजायते ॥
aṃśukaṃ corayitvā tu śuko jāyati mānavaḥ | corayitvā dukūlaṃ tu mṛto haṃsaḥ prajāyate
महीन वस्त्र चुराने वाला मनुष्य तोता होकर जन्म लेता है; दुकूल (रेशमी या सन का वस्त्र) चुराने वाला मरकर हंस होता है।
श्लोक 105 (13.173.105)
क्रौञ्चः कार्पासिकं हृत्वा मृतो जायति मानवः । चोरयित्वा नरः पट्टं त्वाविकं चैव भारत । क्षौमं च वस्त्रमादाय शशो जन्तुः प्रजायते ॥
krauñcaḥ kārpāsikaṃ hṛtvā mṛto jāyati mānavaḥ | corayitvā naraḥ paṭṭaṃ tvāvikaṃ caiva bhārata | kṣaumaṃ ca vastramādāya śaśo jantuḥ prajāyate
सूती कपड़ा चुराने वाला क्रौञ्च होता है और मरकर मनुष्य बनता है; हे भारत, रेशमी और ऊनी कपड़ा चुराने वाला, या सन का वस्त्र लेने वाला मनुष्य खरगोश होकर जन्म लेता है।
श्लोक 106 (13.173.106)
वर्णान्हृत्वा तु पुरुषो मृतो जायति बर्हिणः । हृत्वा रक्तानि वस्त्राणि जायते जीवजीवकः ॥
varṇānhṛtvā tu puruṣo mṛto jāyati barhiṇaḥ | hṛtvā raktāni vastrāṇi jāyate jīvajīvakaḥ
रंग चुराने वाला मनुष्य मरकर मोर होता है; लाल रंगे वस्त्र चुराने वाला जीवजीवक (चकोर) के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 107 (13.173.107)
वर्णकादींस्तथा गन्धांश्चोरयित्वेह मानवः । छुन्दुन्दरित्वमाप्नोति राजँल्लोभपरायणः ॥
varṇakādīṃstathā gandhāṃścorayitveha mānavaḥ | chundundaritvamāpnoti rājam̐llobhaparāyaṇaḥ
हे राजन्, लोभ में डूबा हुआ जो मनुष्य यहाँ अङ्गराग और सुगन्धित पदार्थ चुराता है, वह छछूँदर की अवस्था पाता है।
श्लोक 108 (13.173.108)
तत्र जीवति वर्षाणि ततो दश च पञ्च च । अधर्मस्य क्षयं गत्वा ततो जायति मानुषः ॥
tatra jīvati varṣāṇi tato daśa ca pañca ca | adharmasya kṣayaṃ gatvā tato jāyati mānuṣaḥ
वह वहाँ दस और पाँच यानी पन्द्रह वर्ष जीता है; अधर्म का क्षय हो जाने पर फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 109 (13.173.109)
चोरयित्वा पयश्चापि बलाका सम्प्रजायते ॥
corayitvā payaścāpi balākā samprajāyate
दूध चुराने वाला मादा बगुला होकर जन्म लेता है।
श्लोक 110 (13.173.110)
यस्तु चोरयते तैलं नरो मोहसमन्वितः । सोपि राजन्मृतो जन्तुस्तैलपायी प्रजायते ॥
yastu corayate tailaṃ naro mohasamanvitaḥ | sopi rājanmṛto jantustailapāyī prajāyate
और जो मोह से भरा मनुष्य तेल चुराता है, वह भी हे राजन्, मरकर तैलपायी (तेल पीने वाला कीट) के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 111 (13.173.111)
अशस्त्रं पुरुषं हत्वा सशस्त्रः पुरुषाधमः । अर्थार्थी यदि वा वैरी स मृतो जायते खरः ॥
aśastraṃ puruṣaṃ hatvā saśastraḥ puruṣādhamaḥ | arthārthī yadi vā vairī sa mṛto jāyate kharaḥ
जो अधम पुरुष शस्त्र लेकर निहत्थे मनुष्य को मारता है, चाहे धन के लिए या वैर के कारण, वह मरकर गधे के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 112 (13.173.112)
खरो जीवति वर्षे द्वे ततः शस्त्रेण वध्यते । स मृतो मृगयोनौ तु नित्योद्विग्नोऽभिजायते ॥
kharo jīvati varṣe dve tataḥ śastreṇa vadhyate | sa mṛto mṛgayonau tu nityodvigno'bhijāyate
गधा दो वर्ष जीता है, फिर शस्त्र से मारा जाता है; मरकर वह हिरन की योनि में जन्म लेता है और सदा भयभीत रहता है।
श्लोक 113 (13.173.113)
मृगो वध्यति शस्त्रेण गते संवत्सरे तु सः । हतो मृगस्ततो मीनः सोपि जालेन बध्यते ॥
mṛgo vadhyati śastreṇa gate saṃvatsare tu saḥ | hato mṛgastato mīnaḥ sopi jālena badhyate
एक वर्ष बीतने पर हिरन शस्त्र से मारा जाता है; मारा गया हिरन फिर मछली होता है, और वह भी जाल में फँसकर मारी जाती है।
श्लोक 114 (13.173.114)
मासे चतुर्थे सम्प्राप्ते श्वापदः सम्प्रजायते । श्वापदो दशवर्षाणि द्वीपी वर्षाणि पञ्च च ॥
māse caturthe samprāpte śvāpadaḥ samprajāyate | śvāpado daśavarṣāṇi dvīpī varṣāṇi pañca ca
चौथा महीना आने पर वह हिंसक पशु के रूप में जन्म लेता है; हिंसक पशु दस वर्ष और तेंदुआ पाँच वर्ष जीता है।
श्लोक 115 (13.173.115)
ततस्तु निधनं प्राप्तः कालपर्यायचोदितः । अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुषः ॥
tatastu nidhanaṃ prāptaḥ kālaparyāyacoditaḥ | adharmasya kṣayaṃ kṛtvā tato jāyati mānuṣaḥ
फिर काल के चक्र से प्रेरित होकर वह मृत्यु पाता है और अधर्म का क्षय करके मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 116 (13.173.116)
स्त्रियं हत्वा तु दुर्बुद्धिर्यमस्य विषयं गतः । बहून्क्लेशान्समासाद्य नरकानेकविंशतिम् ॥
striyaṃ hatvā tu durbuddhiryamasya viṣayaṃ gataḥ | bahūnkleśānsamāsādya narakānekaviṃśatim
स्त्री की हत्या करने वाला दुर्बुद्धि मनुष्य यम के लोक में जाता है और बहुत यातनाएँ सहता हुआ इक्कीस नरकों से गुज़रता है।
श्लोक 117 (13.173.117)
ततः पश्चान्महाराज कृमियोनौ प्रजायते । कृमिर्विंशतिवर्षाणि भूत्वा जायति मानुषः ॥
tataḥ paścānmahārāja kṛmiyonau prajāyate | kṛmirviṃśativarṣāṇi bhūtvā jāyati mānuṣaḥ
हे महाराज, उसके बाद वह कीड़े की योनि में जन्म लेता है; बीस वर्ष कीड़ा रहकर मनुष्य के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 118 (13.173.118)
भोजनं चोरयित्वा तु मक्षिका जायते नरः । मक्षिकासङ्घवशगो बहून्मासान्भवत्युत ॥
bhojanaṃ corayitvā tu makṣikā jāyate naraḥ | makṣikāsaṅghavaśago bahūnmāsānbhavatyuta
भोजन चुराने वाला मनुष्य मक्खी होकर जन्म लेता है; वह बहुत महीनों तक मक्खियों के झुण्ड के वश में रहता है।
श्लोक 119 (13.173.119)
ततः पापक्षयं कृत्वा मानुषत्वमवाप्नुते । भक्ष्यं हृत्वा तु पुरुषो जालपाशः प्रजायते ॥
tataḥ pāpakṣayaṃ kṛtvā mānuṣatvamavāpnute | bhakṣyaṃ hṛtvā tu puruṣo jālapāśaḥ prajāyate
फिर पाप का क्षय करके वह मनुष्य-जन्म पाता है। भक्ष्य पदार्थ चुराने वाला मनुष्य जालपाश होकर जन्म लेता है।
श्लोक 120 (13.173.120)
स्वाद्यं हृत्वा तु पुरुषश्चीरपाशः प्रजायते । धान्यं हृत्वा तु पुरुषो लोमशः सम्प्रजायते ॥
svādyaṃ hṛtvā tu puruṣaścīrapāśaḥ prajāyate | dhānyaṃ hṛtvā tu puruṣo lomaśaḥ samprajāyate
स्वादिष्ट भोजन चुराने वाला मनुष्य चीरपाश होकर जन्म लेता है; अनाज चुराने वाला रोएँदार जीव (लोमश) बनता है।
श्लोक 121 (13.173.121)
तथा पिण्याकसम्मिश्रमशनं चोरयेन्नरः । स जायते भृतिधनो दारुणो मूषिको नरः ॥
tathā piṇyākasammiśramaśanaṃ corayennaraḥ | sa jāyate bhṛtidhano dāruṇo mūṣiko naraḥ
और जो मनुष्य खली मिला भोजन चुराता है, वह मज़दूरी पर जीने वाला क्रूर चूहा होकर जन्म लेता है।
श्लोक 122 (13.173.122)
दशन्वै मानुषान्नित्यं पापात्मा स विशाम्पते । घृतं हृत्वा तु दुर्बुद्धिः काकमद्गुः प्रजायते ॥
daśanvai mānuṣānnityaṃ pāpātmā sa viśāmpate | ghṛtaṃ hṛtvā tu durbuddhiḥ kākamadguḥ prajāyate
हे विशाम्पते, वह पापी सदा मनुष्यों को काटता रहता है; घी चुराने वाला दुर्बुद्धि मनुष्य काकमद्गु (जलपक्षी) होकर जन्म लेता है।
श्लोक 123 (13.173.123)
मत्स्यमांसमथो हृत्वा काको जायति दुर्मतिः । लवणं चोरयित्वा तु चिरिकाकः प्रजायते ॥
matsyamāṃsamatho hṛtvā kāko jāyati durmatiḥ | lavaṇaṃ corayitvā tu cirikākaḥ prajāyate
मछली और मांस चुराने वाला दुर्बुद्धि कौआ होता है; नमक चुराने वाला चिरिकाक होकर जन्म लेता है।
श्लोक 124 (13.173.124)
विश्वासेन तु निक्षिप्तं यो विनिह्नोति मानवः । स गतायुर्नरस्तात मत्स्ययोनौ प्रजायते ॥
viśvāsena tu nikṣiptaṃ yo vinihnoti mānavaḥ | sa gatāyurnarastāta matsyayonau prajāyate
जो मनुष्य विश्वास से रखी हुई वस्तु को नकार देता है, हे तात, वह आयु खोकर मछली की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 125 (13.173.125)
मत्स्ययोनिमनुप्राप्य मृतो जायति मानुषः । मानुषत्वमनुप्राप्य क्षीणायुरुपपद्यते ॥
matsyayonimanuprāpya mṛto jāyati mānuṣaḥ | mānuṣatvamanuprāpya kṣīṇāyurupapadyate
मछली की योनि पार करके वह मरकर मनुष्य होता है; मनुष्य-जन्म पाकर भी वह अल्पायु होता है।
श्लोक 126 (13.173.126)
पापानि तु नराः कृत्वा तिर्यग्जायन्ति भारत । न चात्मनः प्रयाणान्ते धर्मं जानन्ति कञ्चन ॥
pāpāni tu narāḥ kṛtvā tiryagjāyanti bhārata | na cātmanaḥ prayāṇānte dharmaṃ jānanti kañcana
हे भारत, पाप करने वाले मनुष्य पशु-पक्षियों में जन्म लेते हैं, और प्राण छूटते समय वे किसी धर्म को नहीं जानते।
श्लोक 127 (13.173.127)
ये पापानि नराः कृत्वा निरस्यन्ति व्रतैः सदा । सुखदुःखसमायुक्ता व्यथितास्ते भवन्त्युत ॥
ye pāpāni narāḥ kṛtvā nirasyanti vrataiḥ sadā | sukhaduḥkhasamāyuktā vyathitāste bhavantyuta
जो मनुष्य पाप करके उन्हें सदा व्रतों से दूर करते रहते हैं, वे सुख-दुःख से युक्त होकर व्यथित रहते हैं।
श्लोक 128 (13.173.128)
अपुमांसः प्रजायन्ते म्लेच्छाश्चापि न संशयः । नराः पापसमाचारा लोभमोहसमन्विताः ॥
apumāṃsaḥ prajāyante mlecchāścāpi na saṃśayaḥ | narāḥ pāpasamācārā lobhamohasamanvitāḥ
पापी आचरण वाले, लोभ और मोह से भरे मनुष्य नपुंसक और म्लेच्छ होकर जन्म लेते हैं, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 129 (13.173.129)
वर्जयन्ति च पापानि जन्मप्रभृति ये नराः । अरोगा रूपवन्तस्ते धनिनश्च भवन्त्युत ॥
varjayanti ca pāpāni janmaprabhṛti ye narāḥ | arogā rūpavantaste dhaninaśca bhavantyuta
जो मनुष्य जन्म से ही पापों से दूर रहते हैं, वे निरोग, रूपवान् और धनवान् होते हैं।
श्लोक 130 (13.173.130)
स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन कृत्वा पापमवाप्नुयुः । एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः ॥
striyo'pyetena kalpena kṛtvā pāpamavāpnuyuḥ | eteṣāmeva jantūnāṃ bhāryātvamupayānti tāḥ
इसी प्रकार पाप करने वाली स्त्रियाँ भी वही फल पाती हैं; वे इन्हीं जीवों की पत्नियाँ बनती हैं।
श्लोक 131 (13.173.131)
परस्वहरणे दोषाः सर्व एव प्रकीर्तिताः । एतद्धि लेशमात्रेण कथितं ते मयाऽनघ ॥
parasvaharaṇe doṣāḥ sarva eva prakīrtitāḥ | etaddhi leśamātreṇa kathitaṃ te mayā'nagha
दूसरे के धन के हरण के सारे दोष बता दिए गए। हे निष्पाप, यह मैंने तुम्हें संक्षेप में ही कहा है।
श्लोक 132 (13.173.132)
अपरस्मिन्कथायोगे भूयः श्रोष्यसि भारत । एतन्मया महाराज ब्रह्मणो गदतः पुरा ॥
aparasminkathāyoge bhūyaḥ śroṣyasi bhārata | etanmayā mahārāja brahmaṇo gadataḥ purā
हे भारत, किसी दूसरे कथा-प्रसंग में तुम और सुनोगे। हे महाराज, यह मैंने बहुत पहले ब्रह्मा के बोलते समय सुना था,
श्लोक 133 (13.173.133)
सुरर्षीणां श्रुतं मध्ये पृष्टश्चापि यथातथम् । मयाऽपि तच्च कार्त्स्न्येन यथावदनुवर्णितम् । एतच्छ्रुत्वा महाराज धर्मे कुरु मनः सदा ॥
surarṣīṇāṃ śrutaṃ madhye pṛṣṭaścāpi yathātatham | mayā'pi tacca kārtsnyena yathāvadanuvarṇitam | etacchrutvā mahārāja dharme kuru manaḥ sadā
देवर्षियों के बीच, और पूछे जाने पर ज्यों का त्यों कहा गया था। मैंने भी उसे पूर्ण रूप से वैसा ही तुम्हें सुना दिया। हे महाराज, यह सुनकर सदा धर्म में मन लगाओ।