अनुशासन पर्व · अध्याय 174
बृहस्पति द्वारा प्रायश्चित्त और अन्नदान का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पापकर्म करने वाले मनुष्य शुभ गति कैसे पा सकते हैं। बृहस्पति उत्तर देते हैं कि पश्चात्ताप, धर्मवादी ब्राह्मणों के सामने खुला स्वीकार और ब्राह्मणों को दान मनुष्य को पापों से मुक्त करते हैं। वे अन्न को सर्वश्रेष्ठ दान बताते हैं, पाप धोने वाले अन्य दान और कर्म गिनाते हैं, फिर दिखाते हैं कि क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र प्रत्येक न्याय से कमाया अन्न देकर कैसे मुक्त हो सकते हैं। अन्त में विद्वान् ब्राह्मणों को भोजन कराने के फल बताते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.174.1)
अधर्मस्य गतिर्ब्रह्मन्कथिता मे त्वयाऽनघ । धर्मस्य तु गतिं श्रोतुमिच्छामि वदतांवर ॥
adharmasya gatirbrahmankathitā me tvayā'nagha | dharmasya tu gatiṃ śrotumicchāmi vadatāṃvara
हे ब्रह्मन्, हे निष्पाप, आपने मुझे अधर्म की गति बता दी। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, अब मैं धर्म की गति सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (13.174.2)
कृत्वा कर्माणि पापानि कथं यान्ति शुभां गतिम् । कर्मणा च कृतेनेह केन यान्ति शुभां गतिम् ॥
kṛtvā karmāṇi pāpāni kathaṃ yānti śubhāṃ gatim | karmaṇā ca kṛteneha kena yānti śubhāṃ gatim
पापकर्म करके मनुष्य शुभ गति कैसे प्राप्त करते हैं? और यहाँ किए गए किस कर्म से वे शुभ गति को पाते हैं?
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 3 (13.174.3)
कृत्वा पापानि कर्माणि अधर्मवशमागतः । मनसा विपरीतेन निरयं प्रतिपद्यते ॥
kṛtvā pāpāni karmāṇi adharmavaśamāgataḥ | manasā viparītena nirayaṃ pratipadyate
जो मनुष्य पापकर्म करके अधर्म के वश में पड़ गया है, वह यदि विपरीत मन वाला ही बना रहे तो नरक को प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (13.174.4)
मोहादधर्मं यः कृत्वा पुनः समनुतप्यते । मनःसमाधिसंयुक्तो न स सेवेत दुष्कृतम् ॥
mohādadharmaṃ yaḥ kṛtvā punaḥ samanutapyate | manaḥsamādhisaṃyukto na sa seveta duṣkṛtam
किन्तु जो मोह के कारण अधर्म करके बाद में पछताता है और मन की एकाग्रता से युक्त होता है, वह फिर पाप का सेवन नहीं करता।
श्लोक 5 (13.174.5)
यथायथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हते । तथातथा शरीरं तु तेनाधर्मेण मुच्यते ॥
yathāyathā manastasya duṣkṛtaṃ karma garhate | tathātathā śarīraṃ tu tenādharmeṇa mucyate
जैसे-जैसे उसका मन उस दुष्कर्म की निन्दा करता है, वैसे-वैसे उसका शरीर उस अधर्म से छूटता जाता है।
श्लोक 6 (13.174.6)
यदि व्याहरते राजन्विप्राणां धर्मवादिनाम् । ततोऽधर्मकृतात्क्षिप्रमपवादात्प्रमुच्यते ॥
yadi vyāharate rājanviprāṇāṃ dharmavādinām | tato'dharmakṛtātkṣipramapavādātpramucyate
और हे राजन्, यदि वह धर्म की चर्चा करने वाले ब्राह्मणों के सामने उसे कह दे, तो अधर्म से उत्पन्न निन्दा से शीघ्र छूट जाता है।
श्लोक 7 (13.174.7)
यथायथा नरः सम्यगधर्ममनुभाषते । समाहितेन मनसा विमुच्येत तथातथा । भुजङ्ग इव निर्मोकात्पूर्वभुक्ताज्जरान्वितात् ॥
yathāyathā naraḥ samyagadharmamanubhāṣate | samāhitena manasā vimucyeta tathātathā | bhujaṅga iva nirmokātpūrvabhuktājjarānvitāt
मनुष्य जैसे-जैसे शान्त मन से अपने अधर्म को ठीक-ठीक स्वीकार करता है, वैसे-वैसे वह उससे छूटता जाता है, जैसे साँप अपनी पुरानी, जीर्ण केंचुल से।
श्लोक 8 (13.174.8)
दत्त्वा विप्रस्य दानानि विविधानि समाहितः । मनःसमाधिसंयुक्तः सुगतिं प्रतिपद्यते ॥
dattvā viprasya dānāni vividhāni samāhitaḥ | manaḥsamādhisaṃyuktaḥ sugatiṃ pratipadyate
शान्त चित्त और मन की एकाग्रता से युक्त होकर ब्राह्मण को नाना प्रकार के दान देने से मनुष्य शुभ गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (13.174.9)
प्रदानानि तु वक्ष्यामि यानि दत्त्वा युधिष्ठिर । नरः कृत्वाऽप्यकार्याणि ततो धर्मेण युज्यते ॥
pradānāni tu vakṣyāmi yāni dattvā yudhiṣṭhira | naraḥ kṛtvā'pyakāryāṇi tato dharmeṇa yujyate
हे युधिष्ठिर, मैं उन दानों को बताऊँगा जिन्हें देकर मनुष्य अकरणीय कर्म करने के बाद भी फिर धर्म से युक्त हो जाता है।
श्लोक 10 (13.174.10)
सर्वेषामेव दानानामन्नं श्रेष्ठमुदाहृतम् । पूर्वमन्नं प्रदातव्यमृजुना धर्ममिच्छता ॥
sarveṣāmeva dānānāmannaṃ śreṣṭhamudāhṛtam | pūrvamannaṃ pradātavyamṛjunā dharmamicchatā
सभी दानों में अन्न को श्रेष्ठ कहा गया है। धर्म की इच्छा रखने वाले सरल मनुष्य को सबसे पहले अन्न का दान करना चाहिए।
श्लोक 11 (13.174.11)
प्राणा ह्यन्नं मनुष्याणां तस्माज्जन्तुश्च जायते । अन्ने प्रतिष्ठितो लोकस्तस्मादन्नं प्रशस्यते ॥
prāṇā hyannaṃ manuṣyāṇāṃ tasmājjantuśca jāyate | anne pratiṣṭhito lokastasmādannaṃ praśasyate
अन्न ही मनुष्यों के प्राण हैं और उसी से प्राणी का जन्म होता है। लोक अन्न पर टिका है, इसलिए अन्न की प्रशंसा की जाती है।
श्लोक 12 (13.174.12)
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवर्षिपितृमानवाः । अन्नस्य हि प्रदानेन स्वर्गमाप्नोति मानवः ॥
annameva praśaṃsanti devarṣipitṛmānavāḥ | annasya hi pradānena svargamāpnoti mānavaḥ
देवता, ऋषि, पितर और मनुष्य सभी अन्न की ही प्रशंसा करते हैं। अन्न का दान करने से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है।
श्लोक 13 (13.174.13)
न्यायलब्धं प्रदातव्यं द्विजातिभ्योऽन्नमुत्तमम् । स्वाध्यायसमुपेतेभ्यः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥
nyāyalabdhaṃ pradātavyaṃ dvijātibhyo'nnamuttamam | svādhyāyasamupetebhyaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā
न्यायपूर्वक प्राप्त किया हुआ उत्तम अन्न प्रसन्न मन से वेदाध्ययन में लगे द्विजों को देना चाहिए।
श्लोक 14 (13.174.14)
यस्य ह्यन्नमुपाश्नन्ति ब्राह्मणानां शतं दश । हृष्टेन मनसा दत्तं न स तिर्यग्गतिर्भवेत् ॥
yasya hyannamupāśnanti brāhmaṇānāṃ śataṃ daśa | hṛṣṭena manasā dattaṃ na sa tiryaggatirbhavet
जिसके घर का अन्न दस सौ (एक हज़ार) ब्राह्मण खाते हैं, यदि वह प्रसन्न मन से दिया गया हो, तो वह मनुष्य पशु-पक्षी की योनि को नहीं पाता।
श्लोक 15 (13.174.15)
ब्राह्मणानां सहस्राणि दश भोज्य नरर्षभ । नरोऽधर्मात्प्रमुच्येत योगेष्वभिरतः सदा ॥
brāhmaṇānāṃ sahasrāṇi daśa bhojya nararṣabha | naro'dharmātpramucyeta yogeṣvabhirataḥ sadā
हे पुरुषश्रेष्ठ, दस हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराकर, सदा योगों में लगा रहने वाला मनुष्य अधर्म से छूट जाता है।
श्लोक 16 (13.174.16)
भैक्ष्येणान्नं समाहृत्य दद्यादन्नं द्विजेषु वै । सुवर्णदानात्पापानि नश्यन्ति सुबहून्यपि ॥
bhaikṣyeṇānnaṃ samāhṛtya dadyādannaṃ dvijeṣu vai | suvarṇadānātpāpāni naśyanti subahūnyapi
भिक्षा से अन्न जुटाकर उसे द्विजों को देना चाहिए; और सुवर्ण के दान से बहुत-से पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 17 (13.174.17)
दत्त्वा वृत्तिकरीं भूमिं पातकेनापि मुच्यते । पारायणैश्च वेदानां मुच्यते पातकैर्द्विजः ॥
dattvā vṛttikarīṃ bhūmiṃ pātakenāpi mucyate | pārāyaṇaiśca vedānāṃ mucyate pātakairdvijaḥ
जीविका देने वाली भूमि का दान करके मनुष्य महापातक से भी छूट जाता है; और वेदों के पारायण से द्विज पातकों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 18 (13.174.18)
गायत्र्याश्चैव लक्षेण गोसहस्रस्य तर्पणात् । वेदार्थं ज्ञापयित्वा तु शुद्धान्विप्रान्यथार्थतः ॥
gāyatryāścaiva lakṣeṇa gosahasrasya tarpaṇāt | vedārthaṃ jñāpayitvā tu śuddhānviprānyathārthataḥ
गायत्री के एक लाख जप से, एक हज़ार गौओं को तृप्त करने से, और शुद्ध ब्राह्मणों को वेद का अर्थ यथार्थ रूप में समझाने से,
श्लोक 19 (13.174.19)
सर्वत्यागादिभिश्चैव मुच्यते पातकैर्द्विजः । सर्वातिथ्यं परं ह्येषां तस्माद्दानं परं स्मृतम् ॥
sarvatyāgādibhiścaiva mucyate pātakairdvijaḥ | sarvātithyaṃ paraṃ hyeṣāṃ tasmāddānaṃ paraṃ smṛtam
तथा सर्वस्व-त्याग आदि से भी द्विज पातकों से मुक्त हो जाता है। इन सबमें सब प्रकार का आतिथ्य सर्वोच्च है, इसीलिए दान को सर्वोच्च कहा गया है।
श्लोक 20 (13.174.20)
अहिंसन्ब्राह्मणस्वानि न्यायेन परिपाल्य च । क्षत्रियस्तरसा प्राप्तमन्नं यो वै प्रयच्छति ॥
ahiṃsanbrāhmaṇasvāni nyāyena paripālya ca | kṣatriyastarasā prāptamannaṃ yo vai prayacchati
जो क्षत्रिय ब्राह्मणों के धन की हानि न करके न्यायपूर्वक उसकी रक्षा करता है और अपने बल से प्राप्त किया हुआ अन्न दान करता है,
श्लोक 21 (13.174.21)
द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्यः प्रयतः सुसमाहितः । तेनापोहति धर्मात्मन्दुष्कृतं कर्म पाण्डव ॥
dvijebhyo vedavṛddhebhyaḥ prayataḥ susamāhitaḥ | tenāpohati dharmātmanduṣkṛtaṃ karma pāṇḍava
यदि वह संयमी और पूर्णतः शान्त चित्त होकर वेद में वृद्ध द्विजों को वह अन्न दे, तो हे धर्मात्मा पाण्डव, उसके द्वारा वह अपना पापकर्म धो डालता है।
श्लोक 22 (13.174.22)
षड्भागपरिशुद्धं च कृषेर्भागमुपार्जितम् । वैश्योऽददद्द्विजातिभ्यः पापेभ्यः परिमुच्यते ॥
ṣaḍbhāgapariśuddhaṃ ca kṛṣerbhāgamupārjitam | vaiśyo'dadaddvijātibhyaḥ pāpebhyaḥ parimucyate
जो वैश्य खेती से कमाया हुआ, छठा भाग देकर शुद्ध किया हुआ अन्न का भाग द्विजों को देता है, वह पापों से छूट जाता है।
श्लोक 23 (13.174.23)
अवाप्य प्राणसंदेहं कार्कश्येन समार्जितम् । अन्नं दत्त्वा द्विजातिभ्यः शूद्रः पापात्प्रमुच्यते ॥
avāpya prāṇasaṃdehaṃ kārkaśyena samārjitam | annaṃ dattvā dvijātibhyaḥ śūdraḥ pāpātpramucyate
जो शूद्र प्राणों का संशय उठाकर कठोर परिश्रम से कमाया हुआ अन्न द्विजों को देता है, वह पाप से छूट जाता है।
श्लोक 24 (13.174.24)
औरसेन बलेनान्नमर्जयित्वाऽविहिंसकः । यः प्रयच्छति विप्रेभ्यो न स दुर्गाणि पश्यति ॥
aurasena balenānnamarjayitvā'vihiṃsakaḥ | yaḥ prayacchati viprebhyo na sa durgāṇi paśyati
जो अपने स्वाभाविक बल से बिना किसी की हिंसा किए अन्न कमाकर ब्राह्मणों को देता है, वह कठिन संकटों को नहीं देखता।
श्लोक 25 (13.174.25)
न्यायेनैवाप्तमन्नं तु नरो हर्षसमन्वितः । द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्यो दत्त्वा पापात्प्रमुच्यते ॥
nyāyenaivāptamannaṃ tu naro harṣasamanvitaḥ | dvijebhyo vedavṛddhebhyo dattvā pāpātpramucyate
जो मनुष्य केवल न्यायपूर्वक प्राप्त अन्न को हर्षित मन से वेद में वृद्ध द्विजों को देता है, वह पाप से छूट जाता है।
श्लोक 26 (13.174.26)
अन्नमूर्जस्करं लोके दत्त्वोर्जस्वी भवेन्नरः । सतां पन्थानमावृत्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
annamūrjaskaraṃ loke dattvorjasvī bhavennaraḥ | satāṃ panthānamāvṛtya sarvapāpaiḥ pramucyate
अन्न लोक में बल देने वाला है; उसे देकर मनुष्य तेजस्वी होता है। सज्जनों के मार्ग पर चलकर वह सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 27 (13.174.27)
शूद्रान्नं नैव भोक्तव्यं विप्रैर्धर्मपरायणैः । आपद्येव स्वदासानां भोक्तव्यं स्वयमुद्यतैः ॥
śūdrānnaṃ naiva bhoktavyaṃ viprairdharmaparāyaṇaiḥ | āpadyeva svadāsānāṃ bhoktavyaṃ svayamudyataiḥ
धर्म में लगे ब्राह्मणों को शूद्र का अन्न कभी नहीं खाना चाहिए। केवल आपत्ति में ही अपने सेवकों का अन्न खाया जा सकता है, और वह भी तब जब वे स्वयं प्रयत्नशील हों।
श्लोक 28 (13.174.28)
दानवद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः । ते हि प्राणस्य दातारस्तेभ्यो धर्मः सनातनः ॥
dānavadbhiḥ kṛtaḥ panthā yena yānti manīṣiṇaḥ | te hi prāṇasya dātārastebhyo dharmaḥ sanātanaḥ
दानियों ने वह मार्ग बनाया है जिस पर ज्ञानी लोग चलते हैं। वे प्राण के दाता हैं, और सनातन धर्म उन्हीं का है।
श्लोक 29 (13.174.29)
सर्वावस्थं मनुष्येण न्यायेनान्नमुपार्जितम् । कार्यं पात्रागतं नित्यमन्नं हि परमा गतिः ॥
sarvāvasthaṃ manuṣyeṇa nyāyenānnamupārjitam | kāryaṃ pātrāgataṃ nityamannaṃ hi paramā gatiḥ
मनुष्य को सभी अवस्थाओं में न्याय से कमाया हुआ अन्न आए हुए सुपात्र को सदा देना चाहिए; क्योंकि अन्न ही परम गति है।
श्लोक 30 (13.174.30)
अन्नस्य हि प्रदानेन नरो रौद्रं न सेवते । तस्मादन्नं प्रदातव्यमन्यायपरिवर्जितम् ॥
annasya hi pradānena naro raudraṃ na sevate | tasmādannaṃ pradātavyamanyāyaparivarjitam
अन्न का दान करने से मनुष्य को कोई भयंकर गति नहीं मिलती। इसलिए अन्याय से रहित अन्न का दान करना चाहिए।
श्लोक 31 (13.174.31)
यतेद्ब्राह्मणपूर्वं हि भोक्तुमन्नं गृही सदा । अवन्ध्यं दिवसं कुर्यादन्नपानीयदानतः ॥
yatedbrāhmaṇapūrvaṃ hi bhoktumannaṃ gṛhī sadā | avandhyaṃ divasaṃ kuryādannapānīyadānataḥ
गृहस्थ को सदा यही यत्न करना चाहिए कि पहले ब्राह्मण को खिलाकर ही स्वयं भोजन करे; अन्न और जल के दान से वह अपने दिन को सफल बनाए।
श्लोक 32 (13.174.32)
भोजयित्वा दशशतं नरो वेदविदां नृप । न्यायविद्धर्मविदुषामितिहासविदां तथा ॥
bhojayitvā daśaśataṃ naro vedavidāṃ nṛpa | nyāyaviddharmaviduṣāmitihāsavidāṃ tathā
हे राजन्, जो मनुष्य दस सौ (एक हज़ार) ऐसे लोगों को भोजन कराता है जो वेद के ज्ञाता हैं, न्याय और धर्म के जानकार हैं तथा इतिहासों के भी ज्ञाता हैं,
श्लोक 33 (13.174.33)
न याति नरकं घोरं संसारांश्च न सेवते । सर्वकामसमायुक्तः प्रेत्य चाप्यश्नुते सुखम् ॥
na yāti narakaṃ ghoraṃ saṃsārāṃśca na sevate | sarvakāmasamāyuktaḥ pretya cāpyaśnute sukham
वह भयंकर नरक में नहीं जाता और न संसार-चक्रों में पड़ता है; सब कामनाओं से युक्त होकर मरने के बाद भी वह सुख भोगता है।
श्लोक 34 (13.174.34)
एवं सुखसमायुक्तो रमते विगतज्वरः । रूपवान्कीर्तिमांश्चैव धनवांश्चोपपद्यते ॥
evaṃ sukhasamāyukto ramate vigatajvaraḥ | rūpavānkīrtimāṃścaiva dhanavāṃścopapadyate
इस प्रकार सुख से युक्त होकर वह चिन्ता से रहित हो आनन्द करता है और रूपवान्, यशस्वी तथा धनवान् होकर जन्म लेता है।
श्लोक 35 (13.174.35)
एतत्ते सर्वमाख्यातमन्नदानफलं महत् । मूलमेतत्तु धर्माणां प्रदानानां च भारत ॥
etatte sarvamākhyātamannadānaphalaṃ mahat | mūlametattu dharmāṇāṃ pradānānāṃ ca bhārata
मैंने तुम्हें अन्नदान का यह सारा महान् फल बता दिया। हे भारत, यही सब धर्मों और सब दानों की जड़ है।