अनुशासन पर्व · अध्याय 175
बृहस्पति द्वारा अहिंसा का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि अहिंसा, वैदिक कर्म, ध्यान, संयम, तप और गुरु-सेवा में मनुष्य के लिए कौन श्रेष्ठ है। बृहस्पति कहते हैं कि सभी धर्म के द्वार हैं, पर अहिंसा को सर्वोच्च बताते हैं: सब प्राणियों के प्रति दण्ड त्याग दे, दूसरों को अपने समान माने और जो अपने लिए अप्रिय हो वह दूसरे के साथ न करे। यह कहकर वे आकाश में चले जाते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.175.1)
अहिंसा वैदिकं कर्म ध्यानमिन्द्रियसंयमः । तपोऽथ गुरुशुश्रूषा किं श्रेयः पुरुषं प्रति ॥
ahiṃsā vaidikaṃ karma dhyānamindriyasaṃyamaḥ | tapo'tha guruśuśrūṣā kiṃ śreyaḥ puruṣaṃ prati
अहिंसा, वैदिक कर्म, ध्यान, इन्द्रिय-संयम, तप और गुरु की सेवा, इनमें से मनुष्य के लिए कौन-सा श्रेयस्कर है?
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 2 (13.175.2)
सर्वाण्येतानि धर्मस्य पृथग्द्वाराणि नित्यशः । शृणु संकीर्त्यमानानि षडेव भरतर्षभ ॥
sarvāṇyetāni dharmasya pṛthagdvārāṇi nityaśaḥ | śṛṇu saṃkīrtyamānāni ṣaḍeva bharatarṣabha
ये सभी सदा धर्म के अलग-अलग द्वार हैं। हे भरतश्रेष्ठ, इन्हें बताए जाते समय सुनो; ये कुल छह ही हैं।
श्लोक 3 (13.175.3)
हन्त निःश्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् । अहिंसापाश्रयं धर्मं दान्तो विद्वान्समाचरेत् ॥
hanta niḥśreyasaṃ jantorahaṃ vakṣyāmyanuttamam | ahiṃsāpāśrayaṃ dharmaṃ dānto vidvānsamācaret
आओ, मैं प्राणी का परम कल्याण तुम्हें बताता हूँ। संयमी और विद्वान् पुरुष को अहिंसा पर आश्रित धर्म का आचरण करना चाहिए।
श्लोक 4 (13.175.4)
त्रिदण्डं सर्वभूतेषु निधाय पुरुषः शुचिः । कामक्रोधौ च संयम्य ततः सिद्धिमवाप्नुते ॥
tridaṇḍaṃ sarvabhūteṣu nidhāya puruṣaḥ śuciḥ | kāmakrodhau ca saṃyamya tataḥ siddhimavāpnute
सब प्राणियों के प्रति त्रिविध दण्ड को त्यागकर, पवित्र पुरुष काम और क्रोध को वश में करके तब सिद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक 5 (13.175.5)
अहिंसकानि भूतानि दण्डेन विनिहन्ति यः । आत्मनः सुखमन्विच्छन्स प्रेत्य न सुखी भवेत् ॥
ahiṃsakāni bhūtāni daṇḍena vinihanti yaḥ | ātmanaḥ sukhamanvicchansa pretya na sukhī bhavet
जो अपने सुख की इच्छा से हिंसा न करने वाले प्राणियों को दण्ड से मारता है, वह मरने के बाद सुखी नहीं होता।
श्लोक 6 (13.175.6)
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः । त्यक्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥
ātmopamastu bhūteṣu yo vai bhavati pūruṣaḥ | tyaktadaṇḍo jitakrodhaḥ sa pretya sukhamedhate
किन्तु जो पुरुष सब प्राणियों के प्रति अपने ही समान भाव रखता है, दण्ड त्याग चुका है और क्रोध को जीत चुका है, वह मरने के बाद सुख में बढ़ता है।
श्लोक 7 (13.175.7)
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः । देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति ह्यपदस्य पदेषिणः ॥
sarvabhūtātmabhūtasya sarvabhūtāni paśyataḥ | devā'pi mārge muhyanti hyapadasya padeṣiṇaḥ
जो सब प्राणियों का आत्मरूप हो गया है और सब प्राणियों को अपने में देखता है, उसके मार्ग में देवता भी मोहित हो जाते हैं, क्योंकि वे उस पद-रहित के पदचिह्न खोजते हैं।
श्लोक 8 (13.175.8)
न तत्परस्य संदध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः । एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥
na tatparasya saṃdadhyātpratikūlaṃ yadātmanaḥ | eṣa saṃkṣepato dharmaḥ kāmādanyaḥ pravartate
जो अपने को प्रतिकूल लगे, उसे दूसरे के साथ न करे। संक्षेप में यही धर्म है; इससे भिन्न आचरण कामना से प्रवृत्त होता है।
श्लोक 9 (13.175.9)
प्रख्यापने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥
prakhyāpane ca dāne ca sukhaduḥkhe priyāpriye | ātmaupamyena puruṣaḥ pramāṇamadhigacchati
किसी बात को प्रकट करने में और दान देने में, सुख-दुःख में, प्रिय-अप्रिय में, मनुष्य दूसरों को अपने समान मानकर ही सही प्रमाण पर पहुँचता है।
श्लोक 10 (13.175.10)
यथा परः प्रक्रमते परेषु । तथा परे प्रक्रमन्ते परस्मिन् । निषेवते स्वसमां जीवलोके । यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्टः ॥
yathā paraḥ prakramate pareṣu | tathā pare prakramante parasmin | niṣevate svasamāṃ jīvaloke | yathā dharmo naipuṇenopadiṣṭaḥ
जैसा व्यवहार मनुष्य दूसरों के प्रति करता है, वैसा ही दूसरे उसके प्रति करते हैं। जीवलोक में प्रत्येक को अपने समान ही मिलता है; इसी प्रकार धर्म का निपुणता से उपदेश किया गया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (13.175.11)
इत्युक्त्वा तं सुरगुरुधर्मराजं युधिष्ठिरम् । दिवमाचक्रमे धीमान्पश्यतामेव नस्तदा ॥
ityuktvā taṃ suragurudharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | divamācakrame dhīmānpaśyatāmeva nastadā
धर्मराज युधिष्ठिर से यह कहकर देवताओं के गुरु बुद्धिमान् बृहस्पति हमारे देखते-देखते आकाश में चले गए।