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अनुशासन पर्व · अध्याय 179

गाड़ी के मार्ग पर कीट

युधिष्ठिर पूछते हैं कि युद्ध में मारे गए लोग किन योनियों में गए, और प्राणी हर अवस्था में जीवन से इतने क्यों चिपके रहते हैं। भीष्म एक पुरानी कथा सुनाते हैं: कृष्णद्वैपायन (व्यास) आती हुई गाड़ियों के शोर से भागते एक कीट को देखकर उससे उसके भय का कारण पूछते हैं। कीट उत्तर देता है कि हर प्राणी अपनी योनि के अनुरूप जीवन में सुख मानता है, और बताता है कि पूर्वजन्म में वह धनी, क्रूर और कंजूस शूद्र था और बहुत पाप किया, पर एक बार ब्राह्मण अतिथि का सत्कार किया था, इसी से उसकी स्मृति बनी रही।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.179.1)

अकामाश्च सकामाश्च ये हताः स्म महामृधे । कां योनिं प्रतिपन्नास्ते तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

akāmāśca sakāmāśca ye hatāḥ sma mahāmṛdhe | kāṃ yoniṃ pratipannāste tanme brūhi pitāmaha

युधिष्ठिर ने कहा: पितामह, इस महासंग्राम में जो लोग मारे गए, चाहे वे मरना चाहते थे या नहीं, वे किस योनि को प्राप्त हुए? यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (13.179.2)

दुःखं प्राणपरित्यागः पुरुषाणां महामृधे । जानामि चाहं धर्मज्ञ प्राणत्यागं सुदुष्करम् ॥

duḥkhaṃ prāṇaparityāgaḥ puruṣāṇāṃ mahāmṛdhe | jānāmi cāhaṃ dharmajña prāṇatyāgaṃ suduṣkaram

हे धर्मज्ञ, महायुद्ध में प्राण त्यागना पुरुषों के लिए दुःखदायी है, और मैं जानता हूँ कि प्राणों का त्याग करना अत्यन्त कठिन है।

श्लोक 3 (13.179.3)

समृद्धे वाऽसमृद्धे वा शुभे वा यदि वाऽशुभे । संसारेऽस्मिन्सदाजाताः प्राणिनोऽभिरताः कथम् । कारणं तत्र मे ब्रूहि सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥

samṛddhe vā'samṛddhe vā śubhe vā yadi vā'śubhe | saṃsāre'sminsadājātāḥ prāṇino'bhiratāḥ katham | kāraṇaṃ tatra me brūhi sarvajño hyasi me mataḥ

चाहे वे समृद्ध हों या निर्धन, सुख की दशा में हों या दुःख की, इस संसार में सदा जन्म लेनेवाले प्राणी इसमें इतने आसक्त क्यों रहते हैं? इसका कारण मुझे बताइए, क्योंकि मैं आपको सर्वज्ञ मानता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (13.179.4)

समृद्धे वाऽसमृद्धे वा शुभे वा यदि वाऽशुभे । संसारेऽस्मिन्समे जाताः प्राणिनः पृथिवीपते ॥

samṛddhe vā'samṛddhe vā śubhe vā yadi vā'śubhe | saṃsāre'sminsame jātāḥ prāṇinaḥ pṛthivīpate

भीष्म ने कहा: हे पृथ्वीपते, इस संसार में प्राणी चाहे समृद्धि में हों या अभाव में, शुभ दशा में हों या अशुभ में, सब एक समान ही जन्म लेते हैं।

श्लोक 5 (13.179.5)

निरता येन भावेन तत्र मे शृणु कारणम् । सम्यक्चायमनुप्रश्नस्त्वयोक्तस्तु युधिष्ठिर ॥

niratā yena bhāvena tatra me śṛṇu kāraṇam | samyakcāyamanupraśnastvayoktastu yudhiṣṭhira

वे जिस भाव से इसमें आसक्त रहते हैं, उसका कारण मुझसे सुनो। हे युधिष्ठिर, तुमने यह अनुप्रश्न ठीक ही पूछा है।

श्लोक 6 (13.179.6)

अत्र ते वर्तयिष्यामि पुरावृत्तमिदं नृप । द्वैपायनस्य संवादं कीटस्य च युधिष्ठिर ॥

atra te vartayiṣyāmi purāvṛttamidaṃ nṛpa | dvaipāyanasya saṃvādaṃ kīṭasya ca yudhiṣṭhira

हे राजन्, इस विषय में मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाऊँगा, हे युधिष्ठिर — द्वैपायन और एक कीट का संवाद।

श्लोक 7 (13.179.7)

ब्रह्मभूतश्चरन्विप्रः कृष्णद्वैपायनः पुरा । ददर्श कीटं धावन्तं शीघ्रं शकटवर्त्मनि ॥

brahmabhūtaścaranvipraḥ kṛṣṇadvaipāyanaḥ purā | dadarśa kīṭaṃ dhāvantaṃ śīghraṃ śakaṭavartmani

बहुत पहले ब्रह्मभाव को प्राप्त विप्र कृष्णद्वैपायन विचरण कर रहे थे, तभी उन्होंने गाड़ी के मार्ग पर तेज़ी से भागते हुए एक कीट को देखा।

श्लोक 8 (13.179.8)

गतिज्ञः सर्वभूतानां रुतज्ञश्च शरीरिणाम् । सर्वज्ञस्त्वरितं दृष्ट्वा कीटं वचनमब्रवीत् ॥

gatijñaḥ sarvabhūtānāṃ rutajñaśca śarīriṇām | sarvajñastvaritaṃ dṛṣṭvā kīṭaṃ vacanamabravīt

सब प्राणियों की गति जाननेवाले और देहधारियों की बोली समझनेवाले उन सर्वज्ञ ने कीट को जल्दी में देखकर उससे कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 9 (13.179.9)

कीट संत्रस्तरूपोऽसि त्वरितश्चैव लक्ष्यसे । क्व च वासस्तदाचक्ष्व कुतस्ते भयमागतम् ॥

kīṭa saṃtrastarūpo'si tvaritaścaiva lakṣyase | kva ca vāsastadācakṣva kutaste bhayamāgatam

हे कीट, तू डरा हुआ दिखता है और बड़ी जल्दी में लगता है। बता, तू कहाँ रहता है, और तुझ पर यह भय कहाँ से आया है?

कीट उवाच

श्लोक 10 (13.179.10)

शकटव्रजस्य महतो घोषं श्रुत्वा भयं मम । आगतं वै महाबुद्धे स्वन एष हि दारुणः ॥

śakaṭavrajasya mahato ghoṣaṃ śrutvā bhayaṃ mama | āgataṃ vai mahābuddhe svana eṣa hi dāruṇaḥ

कीट ने कहा: हे महाबुद्धिमान, बैलगाड़ियों के एक बड़े काफ़िले की आवाज़ सुनकर मुझे भय हुआ है; यह ध्वनि बड़ी भयंकर है।

श्लोक 11 (13.179.11)

श्रूयते तु स मा हन्यादिति ह्यस्मादपक्रमे । श्वसतां च शृणोम्येनं गोवृषाणां प्रतोद्यताम् ॥

śrūyate tu sa mā hanyāditi hyasmādapakrame | śvasatāṃ ca śṛṇomyenaṃ govṛṣāṇāṃ pratodyatām

उसे सुनकर मैं सोचता हूँ कि कहीं यह मुझे मार न डाले, इसीलिए मैं यहाँ से हट रहा हूँ; और मैं प्रतोद से हाँके जाते बैलों की हाँफने की आवाज़ भी सुन रहा हूँ,

श्लोक 12 (13.179.12)

वहतां सुमहाभारं सन्निकर्षे स्वनं प्रभो । नृणां च संवाहयतां श्रूयन्ते विविधाः स्वनाः ॥

vahatāṃ sumahābhāraṃ sannikarṣe svanaṃ prabho | nṛṇāṃ ca saṃvāhayatāṃ śrūyante vividhāḥ svanāḥ

और हे प्रभो, भारी बोझ ढोते पशुओं की पास आती आवाज़, तथा उन्हें हाँकनेवाले मनुष्यों की तरह-तरह की पुकारें भी सुनाई दे रही हैं।

श्लोक 13 (13.179.13)

वोढुमस्मद्विधेनैव न शक्यः कीटयोनिना । तस्मादतिक्रमाम्येष भयादस्मात्सुदारुणात् ॥

voḍhumasmadvidhenaiva na śakyaḥ kīṭayoninā | tasmādatikramāmyeṣa bhayādasmātsudāruṇāt

मेरे जैसा कीट-योनि में जन्मा जीव इसे सह नहीं सकता; इसलिए मैं इस अत्यन्त भयंकर संकट से बचकर निकल रहा हूँ।

श्लोक 14 (13.179.14)

दुःखं हि मृत्युर्भूतानां जीवितं च सुदुर्लभम् । अतो भीतः पलायामि गच्छेयं नापदं यथा ॥

duḥkhaṃ hi mṛtyurbhūtānāṃ jīvitaṃ ca sudurlabham | ato bhītaḥ palāyāmi gaccheyaṃ nāpadaṃ yathā

प्राणियों के लिए मृत्यु दुःखदायी है और जीवन अत्यन्त दुर्लभ है; इसलिए मैं डरकर भाग रहा हूँ, ताकि किसी विपत्ति में न पड़ूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 15 (13.179.15)

इत्युक्तः स तु तं प्राह कुतः कीट सुखं तव । मरणं ते सुखं मन्ये तिर्यग्योनौ हि वर्तसे ॥

ityuktaḥ sa tu taṃ prāha kutaḥ kīṭa sukhaṃ tava | maraṇaṃ te sukhaṃ manye tiryagyonau hi vartase

भीष्म ने कहा: ऐसा कहे जाने पर उन्होंने कीट से कहा, "हे कीट, तुझे सुख कहाँ? मैं तो मरण को ही तेरे लिए सुख मानता हूँ, क्योंकि तू पशु-योनि में पड़ा है।"

व्यास उवाच

श्लोक 16 (13.179.16)

शब्दं स्पर्शं रसं गन्धं भोगांश्चोच्चावचान्बहून् । नाभिजानासि कीट त्वं श्रेयो मरणमेव ते ॥

śabdaṃ sparśaṃ rasaṃ gandhaṃ bhogāṃścoccāvacānbahūn | nābhijānāsi kīṭa tvaṃ śreyo maraṇameva te

तू शब्द, स्पर्श, रस और गन्ध को नहीं जानता, और न ऊँचे-नीचे अनेक भोगों को। हे कीट, तेरे लिए तो मरना ही श्रेयस्कर है।

कीट उवाच

श्लोक 17 (13.179.17)

सर्वत्र निरतो जीव इहापि च सुखं मम । चेतयामि महाप्राज्ञ तस्मादिच्छामि जीवितुम् ॥

sarvatra nirato jīva ihāpi ca sukhaṃ mama | cetayāmi mahāprājña tasmādicchāmi jīvitum

कीट ने कहा: जीव हर दशा में रमता है, और यहाँ भी मुझे सुख है। हे महाप्राज्ञ, मुझमें चेतना है, इसीलिए मैं जीना चाहता हूँ।

श्लोक 18 (13.179.18)

इहापि विषयः सर्वो यथादेहं प्रवर्तितः । मनुष्यास्तिर्यगाश्चैव पृथग्भोगा विशेषतः ॥

ihāpi viṣayaḥ sarvo yathādehaṃ pravartitaḥ | manuṣyāstiryagāścaiva pṛthagbhogā viśeṣataḥ

यहाँ भी शरीर के अनुसार सारे विषय-भोग निश्चित हैं; मनुष्यों और पशुओं के भोग अलग-अलग और अपनी-अपनी विशेषता वाले होते हैं।

श्लोक 19 (13.179.19)

अहमासं मनुष्यो वै शूद्रो बहुधनः प्रभो । अब्रह्मण्यो नृशंसश्च कदर्यो बुद्धिजीवनः ॥

ahamāsaṃ manuṣyo vai śūdro bahudhanaḥ prabho | abrahmaṇyo nṛśaṃsaśca kadaryo buddhijīvanaḥ

हे प्रभो, मैं पहले मनुष्य था, बहुत धनवान शूद्र; ब्राह्मणों के प्रति मेरा कोई आदर नहीं था, मैं निर्दय और कंजूस था और अपनी चतुराई से जीविका चलाता था।

श्लोक 20 (13.179.20)

वाक्श्लक्ष्णो ह्यकृतप्रज्ञो द्वेष्टा विश्वस्य कर्मणः । मिथोगुप्तनिधिर्नित्यं परस्वहरणे रतः ॥

vākślakṣṇo hyakṛtaprajño dveṣṭā viśvasya karmaṇaḥ | mithoguptanidhirnityaṃ parasvaharaṇe rataḥ

मैं मधुर बोलनेवाला पर अशिक्षित बुद्धि का था, सबके कार्यों से द्वेष रखता था, अपना धन सदा गुप्त रूप से छिपाए रखता था और दूसरों का धन हड़पने में लगा रहता था।

श्लोक 21 (13.179.21)

भृत्यातिथिजनश्चापि गृहेऽपर्यशितो मया । मात्सर्यात्स्वादुकामेन नृशंसेन बुभुक्षता ॥

bhṛtyātithijanaścāpi gṛhe'paryaśito mayā | mātsaryātsvādukāmena nṛśaṃsena bubhukṣatā

मेरे घर में सेवक और अतिथि भूखे रह जाते थे, मेरी डाह के कारण; मैं निर्दय था और अपने ही लिए स्वादिष्ट भोजन चाहता हुआ स्वयं खा लेता था।

श्लोक 22 (13.179.22)

देवार्थं पितृयज्ञार्थं न च श्राद्धं कृतं मया । न दत्तमन्नकामेषु दत्तमन्नं लुनामि च ॥

devārthaṃ pitṛyajñārthaṃ na ca śrāddhaṃ kṛtaṃ mayā | na dattamannakāmeṣu dattamannaṃ lunāmi ca

मैंने देवताओं के लिए या पितृयज्ञ में श्राद्ध नहीं किया; अन्न चाहनेवालों को अन्न नहीं दिया, और जो अन्न दे दिया था, उसे भी वापस ले लेता था।

श्लोक 23 (13.179.23)

गुप्तं शरणमाश्रित्य भयेषु शरणागतान् । त्यक्त्वाऽकस्मान्निशायां च न दत्तमभयं मया ॥

guptaṃ śaraṇamāśritya bhayeṣu śaraṇāgatān | tyaktvā'kasmānniśāyāṃ ca na dattamabhayaṃ mayā

मैं स्वयं एक सुरक्षित आश्रय में छिपकर रहा और संकट आने पर अपनी शरण में आए लोगों को अचानक, रात में भी, छोड़ दिया; उन्हें अभय नहीं दिया।

श्लोक 24 (13.179.24)

धनं धान्यं प्रियान्दारान्यानं वासस्तथाऽद्भुतम् । श्रियं दृष्ट्वा मनुष्याणामसूयामि निरर्थकम् ॥

dhanaṃ dhānyaṃ priyāndārānyānaṃ vāsastathā'dbhutam | śriyaṃ dṛṣṭvā manuṣyāṇāmasūyāmi nirarthakam

मनुष्यों का धन-धान्य, प्रिय पत्नियाँ, सवारियाँ, सुन्दर वस्त्र और वैभव देखकर मैं व्यर्थ ही डाह करता था।

श्लोक 25 (13.179.25)

ईर्ष्युः परसुखं दृष्ट्वा अन्यस्य न बुभूषकः । त्रिवर्गहन्ता चान्येषामात्मकामानुवर्तकः ॥

īrṣyuḥ parasukhaṃ dṛṣṭvā anyasya na bubhūṣakaḥ | trivargahantā cānyeṣāmātmakāmānuvartakaḥ

दूसरों का सुख देखकर जलनेवाला, किसी और की उन्नति न चाहनेवाला, दूसरों के त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का नाश करनेवाला और सदा अपनी ही इच्छाओं के पीछे चलनेवाला था मैं।

श्लोक 26 (13.179.26)

नृशंसगुणभूयिष्ठं पुरा कर्म कृतं मया । स्मृत्वा तदनुतप्येऽहं हित्वा प्रियमिवात्मजम् ॥

nṛśaṃsaguṇabhūyiṣṭhaṃ purā karma kṛtaṃ mayā | smṛtvā tadanutapye'haṃ hitvā priyamivātmajam

पहले मैंने बहुत क्रूरता भरे कर्म किए थे; उन्हें याद करके मैं उसी तरह पछताता हूँ जैसे कोई अपने प्रिय पुत्र को त्यागकर पछताए।

श्लोक 27 (13.179.27)

शुभानां नाभिजानामि कृतानां कर्मणां फलम् । माता च पूजिता वृद्धा ब्राह्मणश्चार्चितो मया ॥

śubhānāṃ nābhijānāmi kṛtānāṃ karmaṇāṃ phalam | mātā ca pūjitā vṛddhā brāhmaṇaścārcito mayā

मैंने जो शुभ कर्म किए, उनका फल मैं नहीं जानता; फिर भी मैंने अपनी वृद्ध माता का सम्मान किया था, और एक ब्राह्मण का भी मैंने सत्कार किया था।

श्लोक 28 (13.179.28)

सकृज्जातिगुणोपेतः सङ्गत्या गृहमागतः । अतिथिः पूजितो ब्रह्मंस्तेन मां नाजहात्स्मृतिः ॥

sakṛjjātiguṇopetaḥ saṅgatyā gṛhamāgataḥ | atithiḥ pūjito brahmaṃstena māṃ nājahātsmṛtiḥ

एक बार उत्तम कुल और गुणों से युक्त एक अतिथि संयोग से मेरे घर आया और उसका सत्कार हुआ। हे ब्रह्मन्, उसी कारण मेरी स्मृति ने मुझे नहीं छोड़ा।

श्लोक 29 (13.179.29)

कर्मणामेव चैवाहं सुखाशामिव लक्षये । तच्छ्रोतुमहमिच्छामि त्वत्तः श्रेयस्तपोधन ॥

karmaṇāmeva caivāhaṃ sukhāśāmiva lakṣaye | tacchrotumahamicchāmi tvattaḥ śreyastapodhana

मुझे कर्मों से ही सुख की कोई आशा-सी झलकती दिखाई देती है। हे तपोधन, मैं आपसे सुनना चाहता हूँ कि मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है।

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