Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 181

कीट को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति

क्षत्रिय-योनि में जन्मा पूर्व कीट अपना पूर्वजन्म स्मरण कर वन में जाकर तप करता है। व्यास आकर उससे कहते हैं कि वह लौटकर क्षत्रिय-धर्म से सब प्राणियों की रक्षा करे, और उस शरीर को छोड़ने पर उसे ब्राह्मणत्व मिलेगा। वह न्यायपूर्वक राज्य करता है और कालान्तर में ब्राह्मण के रूप में जन्म लेता है। व्यास फिर उसके पास आकर कहते हैं कि मृत्यु से मत डरो, क्योंकि सब अपने कर्मों के अनुसार जन्म पाते हैं। वह उन्हें धन्यवाद देता है, सैकड़ों यज्ञ करता है और ब्रह्मलोक पहुँचता है। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि कुरुक्षेत्र में मारे गए क्षत्रियों के लिए शोक न करें।

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.181.1)

क्षत्रधर्ममनुप्राप्तः स्मरन्नेव च वीर्यवान् । त्यक्त्वा हि कीटतां राजंश्चचार विपुलं तपः ॥

kṣatradharmamanuprāptaḥ smaranneva ca vīryavān | tyaktvā hi kīṭatāṃ rājaṃścacāra vipulaṃ tapaḥ

भीष्म ने कहा: क्षत्रिय-धर्म को प्राप्त होकर और अपने पूर्वजन्म को स्मरण करते हुए उस पराक्रमी ने, हे राजन्, कीट-भाव को त्यागकर विपुल तप किया।

श्लोक 2 (13.181.2)

तस्य धर्मार्थविदुषो दृष्ट्वा तद्विपुलं तपः । आजगाम द्विजश्रेष्ठः कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥

tasya dharmārthaviduṣo dṛṣṭvā tadvipulaṃ tapaḥ | ājagāma dvijaśreṣṭhaḥ kṛṣṇadvaipāyanastadā

धर्म और अर्थ को जाननेवाले उस राजा का वह विपुल तप देखकर द्विजश्रेष्ठ कृष्णद्वैपायन उस समय उसके पास आए।

व्यास उवाच

श्लोक 3 (13.181.3)

क्षात्रादेव व्रतात्कीट भूतानां परिपालय । क्षात्रं देवव्रतं ध्यायंस्ततो विप्रत्वमेष्यसि ॥

kṣātrādeva vratātkīṭa bhūtānāṃ paripālaya | kṣātraṃ devavrataṃ dhyāyaṃstato vipratvameṣyasi

व्यास ने कहा: हे कीट, क्षत्रिय के व्रत से ही सब प्राणियों की रक्षा करो। देवताओं के प्रिय इस क्षात्र-व्रत का ध्यान करते हुए तुम आगे चलकर ब्राह्मणत्व पाओगे।

श्लोक 4 (13.181.4)

पाहि सर्वाः प्रजाः सम्यक् शुभाशुभविदात्मवान् । शुभैः संविभजन्कामैरशुभानां च भावनैः ॥

pāhi sarvāḥ prajāḥ samyak śubhāśubhavidātmavān | śubhaiḥ saṃvibhajankāmairaśubhānāṃ ca bhāvanaiḥ

शुभ-अशुभ को जानते हुए और आत्मसंयमी रहकर सब प्रजाओं की भली-भाँति रक्षा करो; वाञ्छित शुभ वस्तुओं का बँटवारा करो और दुष्टों के लिए सुधार के उपाय करो।

श्लोक 5 (13.181.5)

आत्मवान्भव सुप्रीतः स्वधर्माचरणे रतः । क्षात्रीं तनुं समुत्सृज्य ततो विप्रत्वमेष्यसि ॥

ātmavānbhava suprītaḥ svadharmācaraṇe rataḥ | kṣātrīṃ tanuṃ samutsṛjya tato vipratvameṣyasi

आत्मसंयमी और प्रसन्नचित्त रहो, अपने धर्म के आचरण में लगे रहो; क्षत्रिय शरीर छोड़ने पर तुम तब ब्राह्मणत्व को प्राप्त करोगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (13.181.6)

सोऽप्यरण्यादभिप्रेत्य पुनरेव युधिष्ठिर । महर्षेर्वचनं श्रुत्वा प्रजा धर्मेण पालयन् ॥

so'pyaraṇyādabhipretya punareva yudhiṣṭhira | maharṣervacanaṃ śrutvā prajā dharmeṇa pālayan

भीष्म ने कहा: तब, हे युधिष्ठिर, वह वन से लौट आया और महर्षि का वचन सुनकर धर्म से प्रजा का पालन करने लगा।

श्लोक 7 (13.181.7)

अचिरेणैव कालेन कीटः पार्थिवसत्तम । प्रजापालनधर्मेण प्रेत्य विप्रत्वमागतः ॥

acireṇaiva kālena kīṭaḥ pārthivasattama | prajāpālanadharmeṇa pretya vipratvamāgataḥ

हे नृपश्रेष्ठ, थोड़े ही समय में वह कीट प्रजा-पालन के धर्म से मृत्यु के बाद ब्राह्मण-भाव को प्राप्त हो गया।

श्लोक 8 (13.181.8)

ततस्तं ब्राह्मणं द्रष्टुं पुनरेव महायशाः । आजगाम महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥

tatastaṃ brāhmaṇaṃ draṣṭuṃ punareva mahāyaśāḥ | ājagāma mahāprājñaḥ kṛṣṇadvaipāyanastadā

तब महायशस्वी और महाप्राज्ञ कृष्णद्वैपायन उस ब्राह्मण को देखने फिर आए।

व्यास उवाच

श्लोक 9 (13.181.9)

भोभो ब्रह्मर्षभ श्रीमन्मा व्यथिष्ठाः कथञ्चन । शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत्पापयोनिषु ॥

bhobho brahmarṣabha śrīmanmā vyathiṣṭhāḥ kathañcana | śubhakṛcchubhayonīṣu pāpakṛtpāpayoniṣu

व्यास ने कहा: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, हे श्रीमन्, तुम किसी प्रकार दुःखी मत हो। शुभ कर्म करनेवाला शुभ योनियों में और पाप करनेवाला पाप-योनियों में जन्म लेता है,

श्लोक 10 (13.181.10)

उपपद्यति धर्मज्ञ यथाधर्मं यथाव्रतम् । तस्मान्मृत्युभयात्कीट मा व्यथिष्ठाः कथञ्चन । धर्मलाभात्परं न स्यात्तस्माद्धर्मं चरोत्तमम् ॥

upapadyati dharmajña yathādharmaṃ yathāvratam | tasmānmṛtyubhayātkīṭa mā vyathiṣṭhāḥ kathañcana | dharmalābhātparaṃ na syāttasmāddharmaṃ carottamam

हे धर्मज्ञ, अपने-अपने धर्म और व्रत के अनुसार। इसलिए हे कीट, मृत्यु के भय से किसी प्रकार दुःखी मत हो। धर्म की प्राप्ति से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता; इसलिए उत्तम धर्म का आचरण करो।

कीट उवाच

श्लोक 11 (13.181.11)

सुखात्सुखतरं प्राप्तो भगवंस्त्वत्कृते ह्यहम् । धर्ममूलं शुभं प्राप्य पाप्मा नष्ट इहाद्य मे ॥

sukhātsukhataraṃ prāpto bhagavaṃstvatkṛte hyaham | dharmamūlaṃ śubhaṃ prāpya pāpmā naṣṭa ihādya me

कीट ने कहा: भगवन्, आपकी कृपा से मैं सुख से भी अधिक सुख को प्राप्त हुआ हूँ; धर्म जिसका मूल है, उस शुभ को पाकर आज यहीं मेरा पाप नष्ट हो गया।

भीष्म उवाच

श्लोक 12 (13.181.12)

भगवद्वचनात्कीटो ब्राह्मण्यं प्राप्य दुर्लभम् । अकरोत्पृथिवीं राजन्यज्ञयूपशताङ्किताम् । ततः सालोक्यमगमद्ब्रह्मणो ब्रह्मवित्तमः ॥

bhagavadvacanātkīṭo brāhmaṇyaṃ prāpya durlabham | akarotpṛthivīṃ rājanyajñayūpaśatāṅkitām | tataḥ sālokyamagamadbrahmaṇo brahmavittamaḥ

भीष्म ने कहा: भगवान् के वचन से कीट ने दुर्लभ ब्राह्मणत्व पाकर, हे राजन्, पृथ्वी को सैकड़ों यज्ञ-स्तम्भों से अंकित कर दिया; और फिर ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ वह ब्रह्मा के सालोक्य को प्राप्त हुआ।

श्लोक 13 (13.181.13)

अथ पापहरं कीटः पार्थ ब्रह्म सनातनम् । स्वकर्मफलनिर्वृत्तं व्यासस्य वचनात्तदा ॥

atha pāpaharaṃ kīṭaḥ pārtha brahma sanātanam | svakarmaphalanirvṛttaṃ vyāsasya vacanāttadā

तब, हे पार्थ, व्यास के वचन से कीट ने सनातन ब्रह्म को प्राप्त किया, जो पापों को हरनेवाला और उसके अपने कर्मों के फल से सिद्ध हुआ था।

श्लोक 14 (13.181.14)

कुरुक्षेत्रे युद्धहताः पुण्ये क्षत्रियपुङ्गवाः । सम्प्राप्तास्ते गतिं पुण्यां तन्मा त्वं शोच पुत्रक ॥

kurukṣetre yuddhahatāḥ puṇye kṣatriyapuṅgavāḥ | samprāptāste gatiṃ puṇyāṃ tanmā tvaṃ śoca putraka

पवित्र कुरुक्षेत्र में युद्ध में मारे गए क्षत्रिय-श्रेष्ठ पुण्य गति को प्राप्त हुए हैं; इसलिए, पुत्र, तुम उनके लिए शोक मत करो।

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182