अनुशासन पर्व · अध्याय 182
दान की श्रेष्ठता: व्यास और मैत्रेय का संवाद
युधिष्ठिर पूछते हैं कि विद्या, तप और दान में कौन श्रेष्ठ है। भीष्म बताते हैं कि अज्ञात रूप से विचरते व्यास को वाराणसी में मैत्रेय भोजन कराते हैं और भोजन के बाद उठते हुए व्यास मुस्कुराते हैं। कारण पूछे जाने पर व्यास कहते हैं कि भूखे को अन्न देने से वेद-कथित बड़े फल की प्राप्ति देखकर उन्हें विस्मय हुआ। वे दान को सब पवित्र करनेवाले साधनों में श्रेष्ठ बताते हैं और कहते हैं कि पुण्य और पाप आचरण में हैं: जो प्राणियों को पीड़ा देते हैं वे पापी हैं, और जो दान, यज्ञ और तप करते हैं वे पुण्यात्मा हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.182.1)
विद्या तपश्च दानं च किमेतेषां विशिष्यते । पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
vidyā tapaśca dānaṃ ca kimeteṣāṃ viśiṣyate | pṛcchāmi tvāṃ satāṃ śreṣṭha tanme brūhi pitāmaha
युधिष्ठिर ने कहा: विद्या, तप और दान में कौन-सा श्रेष्ठ है? हे सज्जनों में श्रेष्ठ, मैं आपसे पूछता हूँ; पितामह, मुझे यह बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.182.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मैत्रेयस्य च संवादं कृष्णद्वैपायनस्य च ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | maitreyasya ca saṃvādaṃ kṛṣṇadvaipāyanasya ca
भीष्म ने कहा: इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — मैत्रेय और कृष्णद्वैपायन का संवाद।
श्लोक 3 (13.182.3)
कृष्णद्वैपायनो राजन्नज्ञातचरितं चरन् । वाराणस्यामुपातिष्ठन्मैत्रेयं स्वैरिणीकुले ॥
kṛṣṇadvaipāyano rājannajñātacaritaṃ caran | vārāṇasyāmupātiṣṭhanmaitreyaṃ svairiṇīkule
हे राजन्, अपना परिचय छिपाकर विचरते हुए कृष्णद्वैपायन वाराणसी में स्वच्छन्द विचरनेवाले मुनियों की मण्डली में मैत्रेय के पास पहुँचे।
श्लोक 4 (13.182.4)
तमुपच्छन्नमासीनं ज्ञात्वा स मुनिसत्तमः । अर्चित्वा भोजयामास मैत्रेयोऽशनमुत्तमम् ॥
tamupacchannamāsīnaṃ jñātvā sa munisattamaḥ | arcitvā bhojayāmāsa maitreyo'śanamuttamam
वेश छिपाकर बैठे हुए उन मुनिश्रेष्ठ को पहचानकर मैत्रेय ने उनका सत्कार किया और उन्हें उत्तम भोजन कराया।
श्लोक 5 (13.182.5)
तदन्नमुत्तमं भुक्त्वा गुणवत्सार्वकामिकम् । उत्तिष्ठमानोऽस्मयत प्रीतः कृष्णो महामनाः ॥
tadannamuttamaṃ bhuktvā guṇavatsārvakāmikam | uttiṣṭhamāno'smayata prītaḥ kṛṣṇo mahāmanāḥ
गुणों से भरपूर और सब कामनाओं को तृप्त करनेवाला वह उत्तम अन्न खाकर प्रसन्न हुए महामना कृष्ण उठते समय मुस्कुराए।
श्लोक 6 (13.182.6)
तमुत्स्मयन्तं सम्प्रेक्ष्य मैत्रेयः कृष्णमब्रवीत् । कारणं ब्रूहि धर्मात्मन्व्यस्मयिष्ठाः कुतश्च ते । तपस्विनो धृतिमतः प्रमोदः समुपागतः ॥
tamutsmayantaṃ samprekṣya maitreyaḥ kṛṣṇamabravīt | kāraṇaṃ brūhi dharmātmanvyasmayiṣṭhāḥ kutaśca te | tapasvino dhṛtimataḥ pramodaḥ samupāgataḥ
उन्हें मुस्कुराते देखकर मैत्रेय ने कृष्ण से कहा, "हे धर्मात्मन्, कारण बताइए — आप क्यों मुस्कुराए? धैर्यवान तपस्वी को आनन्द प्राप्त हुआ है।"
मैत्रेय उवाच
श्लोक 7 (13.182.7)
एतदिच्छामि ते विद्वन्नभिवाद्य प्रणम्य च । आत्मनश्च तपोभाग्यं सुखभाग्यं ममेह च ॥
etadicchāmi te vidvannabhivādya praṇamya ca | ātmanaśca tapobhāgyaṃ sukhabhāgyaṃ mameha ca
हे विद्वान्, मैं आपको अभिवादन और प्रणाम करके यह जानना चाहता हूँ — आपके तप का सौभाग्य, और यहाँ मेरे सुख का सौभाग्य।
श्लोक 8 (13.182.8)
तपोभाग्यान्महाभाग सुखभाग्यात्तथैव च । पृथगाचरितं तात पृथगाचरितात्मनः । अल्पान्तरमहं मन्ये विशिष्टमपि चान्वयात् ॥
tapobhāgyānmahābhāga sukhabhāgyāttathaiva ca | pṛthagācaritaṃ tāta pṛthagācaritātmanaḥ | alpāntaramahaṃ manye viśiṣṭamapi cānvayāt
हे महाभाग, तप के सौभाग्य और सुख के सौभाग्य के बीच — हे तात, अलग-अलग आचरण करनेवाले का आचरण भी अलग होता है। फिर भी मैं मानता हूँ कि अन्तर थोड़ा ही है, यद्यपि कुल के कारण कोई श्रेष्ठ भी हो सकता है।
व्यास उवाच
श्लोक 9 (13.182.9)
अतिच्छेदातिवादाभ्यां स्मयोऽयं समुपागतः । असत्यं वेदवचनं कस्माद्वेदोऽनृतं वदेत् ॥
aticchedātivādābhyāṃ smayo'yaṃ samupāgataḥ | asatyaṃ vedavacanaṃ kasmādvedo'nṛtaṃ vadet
व्यास ने कहा: यह विस्मय मुझे अत्यन्त अन्तर और अतिशयोक्ति के कारण हुआ — वेद का वचन असत्य ठहरता है, पर वेद असत्य कैसे बोल सकता है?
श्लोक 10 (13.182.10)
त्रीण्येव तु पदान्याहुः पुरुषस्योत्तमं प्रति । न द्रुह्येच्चैव दद्याच्च सत्यं चैव परान्वदेत् ॥
trīṇyeva tu padānyāhuḥ puruṣasyottamaṃ prati | na druhyeccaiva dadyācca satyaṃ caiva parānvadet
पुरुष के लिए परम की ओर केवल तीन पद बताए गए हैं: किसी से द्रोह न करना, दान देना, और दूसरों से सत्य बोलना।
श्लोक 11 (13.182.11)
इति वेदोक्तमृषिभिः पुरस्तात्परिकल्पितम् । इदानीं चैव नः कृत्यं पुरस्ताच्च परिश्रुतम् ॥
iti vedoktamṛṣibhiḥ purastātparikalpitam | idānīṃ caiva naḥ kṛtyaṃ purastācca pariśrutam
ऋषियों ने बहुत पहले वेद में कहे अनुसार यही निश्चित किया था, और हमारा वर्तमान कर्तव्य भी प्राचीन काल से सुना गया है।
श्लोक 12 (13.182.12)
अल्पोऽपि तादृशो न्यासो भवत्युत महाफलः । तृषिताय च यद्दत्तं हृदयेनानसूयता ॥
alpo'pi tādṛśo nyāso bhavatyuta mahāphalaḥ | tṛṣitāya ca yaddattaṃ hṛdayenānasūyatā
वैसा छोटा-सा दान भी बड़ा फल देता है, जब प्यासे को द्वेषरहित हृदय से दिया जाए।
श्लोक 13 (13.182.13)
तोषितास्त्रिदशा यत्ते दत्त्वैतद्दर्शनं मम । अजैषीर्महतो लोकान्महायज्ञैरिव प्रभो ॥
toṣitāstridaśā yatte dattvaitaddarśanaṃ mama | ajaiṣīrmahato lokānmahāyajñairiva prabho
आपने मेरे देखते जो दान दिया, उससे देवता संतुष्ट हुए हैं; हे प्रभो, आपने मानो बड़े-बड़े यज्ञों से महान् लोक जीत लिए हैं।
श्लोक 14 (13.182.14)
ततो दानपवित्रेण प्रीतोऽस्मि तपसैव च । दूरात्पुण्यवतो गन्धः पुण्यस्यैव च दर्शनात् ॥
tato dānapavitreṇa prīto'smi tapasaiva ca | dūrātpuṇyavato gandhaḥ puṇyasyaiva ca darśanāt
इसलिए मैं तुम्हारे दान की पवित्रता से और तप से भी प्रसन्न हूँ; पुण्यवान की सुगन्ध दूर से जानी जाती है, और पुण्य का परिचय उसके दर्शन मात्र से होता है।
श्लोक 15 (13.182.15)
पुण्यश्च वातिगन्धस्ते मन्ये कर्म विधानजम् । अथ कर्मार्जितस्तात यथाचैवानुलेपनात् ॥
puṇyaśca vātigandhaste manye karma vidhānajam | atha karmārjitastāta yathācaivānulepanāt
तुमसे पवित्र और प्रबल सुगन्ध आती है, जिसे मैं विधिपूर्वक किए गए कर्मों से उत्पन्न मानता हूँ। और हे तात, वह कर्म से ही अर्जित होती है, जैसे अनुलेपन से सुगन्ध मिलती है।
श्लोक 16 (13.182.16)
शुभं सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं द्विज । नोचेत्सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं भवेत् ॥
śubhaṃ sarvapavitrebhyo dānameva paraṃ dvija | nocetsarvapavitrebhyo dānameva paraṃ bhavet
हे द्विज, सब पवित्र करनेवाले साधनों में दान ही सबसे उत्तम और श्रेष्ठ है। और यदि ऐसा न भी होता, तब भी सब पवित्रकारी साधनों से बढ़कर दान ही होता।
श्लोक 17 (13.182.17)
यानीमान्युत्तमानीह वेदोक्तानि प्रशंसति । तेषां श्रेष्ठतरं दानमिति मे नात्र संशयः ॥
yānīmānyuttamānīha vedoktāni praśaṃsati | teṣāṃ śreṣṭhataraṃ dānamiti me nātra saṃśayaḥ
वेद में कहे गए जिन उत्तम कर्मों की यहाँ प्रशंसा की जाती है, उन सबमें दान श्रेष्ठतर है — इसमें मुझे कोई संशय नहीं।
श्लोक 18 (13.182.18)
दानवद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः । ते हि प्राणस्य दातारस्तेषु धर्मः प्रतिष्ठितः ॥
dānavadbhiḥ kṛtaḥ panthā yena yānti manīṣiṇaḥ | te hi prāṇasya dātārasteṣu dharmaḥ pratiṣṭhitaḥ
दानियों ने जो मार्ग बनाया है, उसी से विवेकी लोग जाते हैं; वे प्राण के दाता हैं, और उन्हीं में धर्म प्रतिष्ठित है।
श्लोक 19 (13.182.19)
यथा वेदाः स्वधीताश्च यथा चेन्द्रियसंयमः । सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम् ॥
yathā vedāḥ svadhītāśca yathā cendriyasaṃyamaḥ | sarvatyāgo yathā ceha tathā dānamanuttamam
जैसे भली-भाँति पढ़े हुए वेद हैं, जैसे इन्द्रिय-संयम है, और जैसे यहाँ सर्वत्याग है, वैसे ही दान सर्वोत्तम है।
श्लोक 20 (13.182.20)
त्वं हि तात सुखादेव शुभमेष्यसि शोभनम् । सुखात्सुखतरप्राप्तिमाप्नुते मतिमान्नरः ॥
tvaṃ hi tāta sukhādeva śubhameṣyasi śobhanam | sukhātsukhataraprāptimāpnute matimānnaraḥ
हे तात, तुम सुख से ही सुन्दर कल्याण को प्राप्त करोगे; बुद्धिमान मनुष्य सुख से भी बढ़कर सुख पाता है।
श्लोक 21 (13.182.21)
तन्नः प्रत्यक्षमेवेदमुपलक्ष्यमसंशयम् । श्रीमन्तः प्राप्नुवन्त्यर्थान्दानं यज्ञं तथा सुखम् ॥
tannaḥ pratyakṣamevedamupalakṣyamasaṃśayam | śrīmantaḥ prāpnuvantyarthāndānaṃ yajñaṃ tathā sukham
यह हमारे सामने प्रत्यक्ष और निस्सन्देह है: समृद्ध लोग धन, दान, यज्ञ और सुख पाते हैं।
श्लोक 22 (13.182.22)
सुखादेव परं दुःखं दुःखादन्यत्परं सुखम् । दृश्यते हि महाप्राज्ञ नियतं वै स्वभावतः ॥
sukhādeva paraṃ duḥkhaṃ duḥkhādanyatparaṃ sukham | dṛśyate hi mahāprājña niyataṃ vai svabhāvataḥ
सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद दूसरा सुख; हे महाप्राज्ञ, यह स्वभाव से नियत देखा जाता है।
श्लोक 23 (13.182.23)
विविधानीह वृत्तानि नरस्याहुर्मनीषिणः । पुण्यमन्यत्पापमन्यन्न पुण्यं न च पापकम् ॥
vividhānīha vṛttāni narasyāhurmanīṣiṇaḥ | puṇyamanyatpāpamanyanna puṇyaṃ na ca pāpakam
विवेकी लोग यहाँ मनुष्य के आचरण अनेक प्रकार के बताते हैं: एक पुण्य है, दूसरा पाप है, और एक ऐसा है जो न पुण्य है न पाप।
श्लोक 24 (13.182.24)
न वृत्तं मन्यतेऽन्यस्य मन्यतेऽन्यस्य पातकम् । यथा स्वकर्मनिर्वृत्तं न पुण्यं न च पापकम् ॥
na vṛttaṃ manyate'nyasya manyate'nyasya pātakam | yathā svakarmanirvṛttaṃ na puṇyaṃ na ca pāpakam
मनुष्य एक के आचरण को ठीक नहीं मानता और दूसरे के आचरण को पाप मानता है; और अपने स्वभाव से हुआ कर्म भी इसी प्रकार न पुण्य है न पाप।
श्लोक 25 (13.182.25)
यज्ञदानतपःशीला नरा वै पुण्यकर्मिणः । येऽभिद्रुह्यन्ति भूतानि ते वै पापकृतो जनाः ॥
yajñadānatapaḥśīlā narā vai puṇyakarmiṇaḥ | ye'bhidruhyanti bhūtāni te vai pāpakṛto janāḥ
जो लोग यज्ञ, दान, तप और सदाचार में लगे रहते हैं, वे पुण्य कर्म करनेवाले हैं; जो प्राणियों से द्रोह करते हैं, वे पाप करनेवाले हैं।
श्लोक 26 (13.182.26)
द्रव्याण्याददते चैव दुःखं यान्ति पतन्ति च । ततोऽन्यत्कर्म यत्किंचिन्न पुण्यं न च पातकम् ॥
dravyāṇyādadate caiva duḥkhaṃ yānti patanti ca | tato'nyatkarma yatkiṃcinna puṇyaṃ na ca pātakam
जो दूसरों का धन छीनते हैं, वे दुःख पाते और गिरते हैं; इनके सिवा जो कोई और कर्म है, वह न पुण्य है न पाप।
श्लोक 27 (13.182.27)
नित्यं चाकृपणो भुङ्क्ते स्वजनैर्देहि याचतः । भाग्यक्षयेण क्षीयन्ते नोपभोगेन सञ्चयाः ॥
nityaṃ cākṛpaṇo bhuṅkte svajanairdehi yācataḥ | bhāgyakṣayeṇa kṣīyante nopabhogena sañcayāḥ
जो कभी कृपण नहीं होता, वह सदा अपने जनों के साथ भोजन करता है, और माँगनेवाले के आने पर कहता है, "दे दो।" संचित धन भाग्य के क्षय से घटता है, उपभोग से नहीं।
श्लोक 28 (13.182.28)
रमस्वैधस्व मोदस्व देहि दाने रमस्व च । न त्वामतिभविष्यन्ति वैद्या न च तपस्विनः ॥
ramasvaidhasva modasva dehi dāne ramasva ca | na tvāmatibhaviṣyanti vaidyā na ca tapasvinaḥ
आनन्द करो, समृद्ध होओ, प्रसन्न रहो; दान दो और दान में रमो। न विद्वान तुमसे बढ़ सकेंगे, न तपस्वी।