अनुशासन पर्व · अध्याय 183
विद्वान् ब्राह्मण और दान के विषय में मैत्रेय का कथन
व्यास की बात का उत्तर देते हुए मैत्रेय कहते हैं कि महर्षि के दर्शन से वे अपने को बहुत धन्य मानते हैं, और विद्या, तप तथा उत्तम जन्म — ये तीनों मिलकर सच्चा ब्राह्मण बनाते हैं। ऐसे ब्राह्मण के बिना जगत् अन्धकार में डूब जाएगा और चारों वर्णों का व्यवहार रुक जाएगा। विद्वान् को दिया दान वैसे ही फलता है जैसे अच्छी जोती भूमि में बोया बीज, जबकि अपात्र को दिया अन्न व्यर्थ जाता है। दाता और ग्रहीता एक रथ के दो पहियों की तरह एक-दूसरे पर टिके हैं, और विद्वान्, शुद्ध एवं तपस्वी ब्राह्मण स्वर्ग के नेता हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.183.1)
एवमुक्तः प्रत्युवाच मैत्रेयः कर्मपूर्वकः । अत्यन्तं श्रीमति कुले जातः प्राज्ञो बहुश्रुतः ॥
evamuktaḥ pratyuvāca maitreyaḥ karmapūrvakaḥ | atyantaṃ śrīmati kule jātaḥ prājño bahuśrutaḥ
भीष्म ने कहा: ऐसा कहे जाने पर कर्म को महत्त्व देनेवाले मैत्रेय ने उत्तर दिया; वे अत्यन्त समृद्ध कुल में जन्मे, बुद्धिमान और बहुश्रुत थे।
मैत्रेय उवाच
श्लोक 2 (13.183.2)
असंशयं महाप्राज्ञ यथैवात्थ तथैव तत् । अनुज्ञातश्च भवता किञ्चिद्ब्रूयामहं विभो ॥
asaṃśayaṃ mahāprājña yathaivāttha tathaiva tat | anujñātaśca bhavatā kiñcidbrūyāmahaṃ vibho
हे महाप्राज्ञ, आप जैसा कहते हैं, वह निस्सन्देह वैसा ही है। हे प्रभो, आपकी अनुमति से मैं कुछ कहूँगा।
व्यास उवाच
श्लोक 3 (13.183.3)
यद्यदिच्छसि मैत्रेय यावद्यावद्यथायथा । ब्रूहि तत्त्वं महाप्राज्ञ शुश्रुषे वचनं तव ॥
yadyadicchasi maitreya yāvadyāvadyathāyathā | brūhi tattvaṃ mahāprājña śuśruṣe vacanaṃ tava
व्यास ने कहा: हे मैत्रेय, जो कुछ भी, जितना भी और जैसे भी तुम कहना चाहो, हे महाप्राज्ञ, सच-सच कहो; मैं तुम्हारी बात सुनने को उत्सुक हूँ।
मैत्रेय उवाच
श्लोक 4 (13.183.4)
निर्दोषं निर्मलं चैव वचनं सत्यसंहितम् । विद्यातपोभ्यां हि भवान्भावितात्मा न संशयः ॥
nirdoṣaṃ nirmalaṃ caiva vacanaṃ satyasaṃhitam | vidyātapobhyāṃ hi bhavānbhāvitātmā na saṃśayaḥ
मैत्रेय ने कहा: आपके वचन निर्दोष, निर्मल और सत्य से युक्त हैं। इसमें सन्देह नहीं कि आप विद्या और तप से शुद्ध आत्मावाले हैं।
श्लोक 5 (13.183.5)
भवतो भावितात्मत्वाल्लाभोऽयं सुमहान्मम । भूयो बुद्ध्याऽनुपश्यामि सुसमृद्धतपा इव ॥
bhavato bhāvitātmatvāllābho'yaṃ sumahānmama | bhūyo buddhyā'nupaśyāmi susamṛddhatapā iva
आपके शुद्धात्मा होने से मुझे यह बहुत बड़ा लाभ हुआ है; और विचार करने पर मैं आपको मानो अत्यन्त समृद्ध तपवाला देखता हूँ।
श्लोक 6 (13.183.6)
अपि मे दर्शनादेव भवतोऽभ्युदयो महान् । मन्ये भवत्प्रसादोऽयं बुद्धिकर्मस्वभावतः ॥
api me darśanādeva bhavato'bhyudayo mahān | manye bhavatprasādo'yaṃ buddhikarmasvabhāvataḥ
आपके दर्शन मात्र से मेरा बड़ा अभ्युदय हुआ है। मैं इसे आपकी कृपा मानता हूँ, जो बुद्धि और कर्म के स्वभाव से उत्पन्न हुई है।
श्लोक 7 (13.183.7)
तपः श्रुतं च योनिश्चाप्येतद्ब्राह्मण्यकारणम् । त्रिभिर्गुणैः समुदितः स्नातो भवति वै द्विजः ॥
tapaḥ śrutaṃ ca yoniścāpyetadbrāhmaṇyakāraṇam | tribhirguṇaiḥ samuditaḥ snāto bhavati vai dvijaḥ
तप, शास्त्र-ज्ञान और उत्तम जन्म — ये ब्राह्मणत्व के कारण हैं; जो द्विज इन तीनों गुणों से युक्त है, वही सच्चा स्नातक होता है।
श्लोक 8 (13.183.8)
अस्मिंस्तृप्ते च तृप्यन्ति पितरो दैवतानि च । न हि श्रुतवतां किञ्चिदधिकं ब्राह्मणादृते ॥
asmiṃstṛpte ca tṛpyanti pitaro daivatāni ca | na hi śrutavatāṃ kiñcidadhikaṃ brāhmaṇādṛte
उसके तृप्त होने पर पितर और देवता तृप्त होते हैं; क्योंकि विद्वानों में ब्राह्मण से बढ़कर कुछ नहीं है।
श्लोक 9 (13.183.9)
असंस्कारात्क्षत्रवैश्यौ नश्येते ब्राह्मणादृते । शूद्रो नश्यत्यशुश्रूषुराश्रमाणां यथार्हतः ॥
asaṃskārātkṣatravaiśyau naśyete brāhmaṇādṛte | śūdro naśyatyaśuśrūṣurāśramāṇāṃ yathārhataḥ
ब्राह्मण के बिना संस्कारों के अभाव में क्षत्रिय और वैश्य नष्ट हो जाते हैं; और शूद्र, यदि वह आश्रमों की यथायोग्य सेवा न करे, तो नष्ट हो जाता है।
श्लोक 10 (13.183.10)
अन्धं स्यात्तम एवेदं न प्रज्ञायेत किञ्चन । चातुर्वर्ण्यं न वर्तेत धर्माधर्मावृतानृते ॥
andhaṃ syāttama evedaṃ na prajñāyeta kiñcana | cāturvarṇyaṃ na varteta dharmādharmāvṛtānṛte
यह सब अन्धकार ही हो जाता, कुछ भी जाना न जाता; चारों वर्णों की व्यवस्था न चलती, और धर्म-अधर्म तथा सत्य-असत्य का भेद लुप्त हो जाता।
श्लोक 11 (13.183.11)
यथाहि सुकृते क्षेत्रे फलं विन्दति मानवः । एवं दत्त्वा श्रुतवते फलं दाता समश्नुते ॥
yathāhi sukṛte kṣetre phalaṃ vindati mānavaḥ | evaṃ dattvā śrutavate phalaṃ dātā samaśnute
जैसे मनुष्य भली-भाँति जोते हुए खेत में फल पाता है, वैसे ही दाता विद्वान् को दान देकर फल पाता है।
श्लोक 12 (13.183.12)
ब्राह्मणश्चेन्न विन्देत श्रुतवृत्तोपसंहितः । प्रतिग्रहीता दानस्य मोघं स्याद्धनिनां धनम् ॥
brāhmaṇaścenna vindeta śrutavṛttopasaṃhitaḥ | pratigrahītā dānasya moghaṃ syāddhanināṃ dhanam
यदि शास्त्र और सदाचार से युक्त कोई ब्राह्मण दान ग्रहण करने के लिए न मिले, तो धनवानों का धन व्यर्थ हो जाए।
श्लोक 13 (13.183.13)
अन्नं ह्यविद्वान्हन्त्येवमविद्वांसं च हन्ति तत् । तच्चान्यं हन्ति यच्चान्यत्स भुक्त्वा हन्यतेऽबुधः ॥
annaṃ hyavidvānhantyevamavidvāṃsaṃ ca hanti tat | taccānyaṃ hanti yaccānyatsa bhuktvā hanyate'budhaḥ
अविद्वान् अन्न को खाकर उसका नाश करता है, और वह अन्न भी उस अविद्वान् का नाश करता है; वह उस दूसरे को भी नष्ट करता है जिसका अन्न था, और मूर्ख खाकर स्वयं नष्ट हो जाता है।
श्लोक 14 (13.183.14)
प्राहुर्ह्यन्नमदन्विद्वान्पुनर्जनयतीश्वरः । स चान्नाज्जायते तस्मात्सूक्ष्म एष व्यतिक्रमः ॥
prāhurhyannamadanvidvānpunarjanayatīśvaraḥ | sa cānnājjāyate tasmātsūkṣma eṣa vyatikramaḥ
कहते हैं कि विद्वान् अन्न खाकर समर्थ स्वामी की भाँति फिर जन्म देता है; और वह स्वयं उसी अन्न से उत्पन्न होता है, इसलिए यहाँ चूक बहुत सूक्ष्म है।
श्लोक 15 (13.183.15)
ब्राह्मं ह्यनुपयोगी यो ददंश्चान्नमसंशयम् । यस्तारयति वै विद्वान्पितॄन्देवान्सदाऽमृतान् ॥
brāhmaṃ hyanupayogī yo dadaṃścānnamasaṃśayam | yastārayati vai vidvānpitṝndevānsadā'mṛtān
जो ब्राह्मण को निस्सन्देह अन्न देता है, उसे अपने उपयोग के लिए नहीं रखता, वह विद्वान् पितरों और सदा अमर देवताओं को तार देता है।
श्लोक 16 (13.183.16)
यदेव ददतः पुण्यं तदेव प्रतिगृह्णतः । न ह्येकचक्रं वर्तेत इत्येवमृषयो विदुः ॥
yadeva dadataḥ puṇyaṃ tadeva pratigṛhṇataḥ | na hyekacakraṃ varteta ityevamṛṣayo viduḥ
दाता को जो पुण्य मिलता है, वही प्रतिग्रह लेनेवाले को भी मिलता है; क्योंकि एक पहिये का रथ नहीं चल सकता — ऐसा ऋषि जानते हैं।
श्लोक 17 (13.183.17)
यत्र वै ब्राह्मणाः सन्ति श्रुतवृत्तोपसंहिताः । तत्र दानफलं पुण्यमिह चामुत्र चाश्नुते ॥
yatra vai brāhmaṇāḥ santi śrutavṛttopasaṃhitāḥ | tatra dānaphalaṃ puṇyamiha cāmutra cāśnute
जहाँ शास्त्र और सदाचार से युक्त ब्राह्मण होते हैं, वहाँ दान का पुण्य फल इस लोक में और परलोक में भी मिलता है।
श्लोक 18 (13.183.18)
ये योनिशुद्धाः सततं तपस्यभिरता भृशम् । दानाध्ययनसम्पन्नास्ते वै पूज्यतमाः सदा ॥
ye yoniśuddhāḥ satataṃ tapasyabhiratā bhṛśam | dānādhyayanasampannāste vai pūjyatamāḥ sadā
जो शुद्ध कुल में जन्मे हैं, सदा तप में दृढ़ता से लगे रहते हैं और दान तथा अध्ययन से सम्पन्न हैं, वे सदा सबसे अधिक पूजनीय हैं।
श्लोक 19 (13.183.19)
तैर्हि सद्भिः कृतः पन्था देवयानो न मुह्यते । ते हि स्वर्गस्य नेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः ॥
tairhi sadbhiḥ kṛtaḥ panthā devayāno na muhyate | te hi svargasya netāro yajñavāhāḥ sanātanāḥ
देवयान मार्ग उन सज्जनों ने बनाया है और वह लुप्त नहीं होता; क्योंकि वे ही स्वर्ग के नेता और सनातन यज्ञवाहक हैं।