अनुशासन पर्व · अध्याय 185
शाण्डिली द्वारा सुमना को पतिव्रता-धर्म का उपदेश
युधिष्ठिर भीष्म से स्त्रियों के उचित आचरण के विषय में पूछते हैं। भीष्म बताते हैं कि देवलोक में सुमना (कैकेयी) ने तेजस्विनी शाण्डिली से पूछा कि वह किस आचरण से वहाँ पहुँची। शाण्डिली उत्तर देती है कि उसे स्वर्ग वेश-भूषा से नहीं, बल्कि पति की निष्ठापूर्वक सेवा, घर-परिवार और बालकों की देखभाल तथा संयम और मर्यादा से मिला; फिर वह अदृश्य हो जाती है। अन्त में भीष्म इस आख्यान के पाठ का फल बताते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.185.1)
स्त्रीणां हि समुदाचारं सर्वधर्मविदांवर । श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
strīṇāṃ hi samudācāraṃ sarvadharmavidāṃvara | śrotumicchāmyahaṃ tvattastanme brūhi pitāmaha
हे सब धर्मों के जाननेवालों में श्रेष्ठ पितामह, मैं आपसे स्त्रियों के उचित आचरण के विषय में सुनना चाहता हूँ; वह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.185.2)
सर्वज्ञां सर्वतत्त्वज्ञां देवलोके मनस्विनीम् । कैकेयी सुमना नाम शाण्डिलीं पर्यपृच्छत ॥
sarvajñāṃ sarvatattvajñāṃ devaloke manasvinīm | kaikeyī sumanā nāma śāṇḍilīṃ paryapṛcchata
देवलोक में कैकेयी सुमना ने सर्वज्ञा, सब तत्त्वों को जाननेवाली और उदार मन की शाण्डिली से पूछा।
सुमना उवाच
श्लोक 3 (13.185.3)
केन वृत्तेन कल्याणि समाचारेण केन वा । विधूय सर्वपापानि देवलोकं त्वमागता ॥
kena vṛttena kalyāṇi samācāreṇa kena vā | vidhūya sarvapāpāni devalokaṃ tvamāgatā
हे कल्याणी, किस आचरण से और किस सदाचार से तुम सब पापों को धोकर देवलोक में आई हो?
श्लोक 4 (13.185.4)
हुताशनशिखेव त्वं ज्वलमाना स्वतेजसा । सुता ताराधिपस्येव प्रभया दिवमागता ॥
hutāśanaśikheva tvaṃ jvalamānā svatejasā | sutā tārādhipasyeva prabhayā divamāgatā
तुम अपने ही तेज से अग्निशिखा की भाँति जगमगा रही हो; तारापति (चन्द्रमा) की पुत्री के समान प्रभा से तुम स्वर्ग में आई हो।
श्लोक 5 (13.185.5)
अरजांसि च वस्त्राणि धारयन्ती गतक्लमा । विमानस्था शुभा भासि सहस्रगुणमोजसा ॥
arajāṃsi ca vastrāṇi dhārayantī gataklamā | vimānasthā śubhā bhāsi sahasraguṇamojasā
निर्मल वस्त्र धारण किए, थकान से रहित, विमान में बैठी हुई तुम, हे शुभे, हजार गुने तेज से शोभित हो रही हो।
श्लोक 6 (13.185.6)
न त्वमल्पेन तपसा दानेन नियमेन वा । इमं लोकमनुप्राप्ता त्वं हि तत्त्वं वदस्व मे ॥
na tvamalpena tapasā dānena niyamena vā | imaṃ lokamanuprāptā tvaṃ hi tattvaṃ vadasva me
तुम इस लोक में थोड़े तप, दान या नियम से नहीं आई हो; इसलिए मुझे सच-सच बताओ।
भीष्म उवाच
श्लोक 7 (13.185.7)
इति पृष्टा सुमनया मधुरं चारुहासिनी । शाण्डिली निभृतं वाक्यं सुमनामिदमब्रवीत् ॥
iti pṛṣṭā sumanayā madhuraṃ cāruhāsinī | śāṇḍilī nibhṛtaṃ vākyaṃ sumanāmidamabravīt
सुमना के इस प्रकार पूछने पर सुन्दर मुस्कानवाली शाण्डिली ने सुमना से ये शान्त और मधुर वचन कहे।
शाण्डिल्युवाच
श्लोक 8 (13.185.8)
नाहं काषायवसना नापि वल्कलधारिणी । न च मुण्डा च जटिला भूत्वा देवत्वमागता ॥
nāhaṃ kāṣāyavasanā nāpi valkaladhāriṇī | na ca muṇḍā ca jaṭilā bhūtvā devatvamāgatā
मैं गेरुए वस्त्र पहनकर या वल्कल धारण करके, अथवा सिर मुँड़ाकर या जटा रखकर देवत्व को नहीं पहुँची हूँ।
श्लोक 9 (13.185.9)
अहितानि च वाक्यानि सर्वाणि परुषाणि च । अप्रमत्ता च भर्तारं कदाचिन्नाहमब्रवम् ॥
ahitāni ca vākyāni sarvāṇi paruṣāṇi ca | apramattā ca bhartāraṃ kadācinnāhamabravam
सदा सावधान रहकर मैंने अपने पति से कभी कोई अहितकर या कठोर बात नहीं कही।
श्लोक 10 (13.185.10)
देवतानां पितॄणां च ब्राह्मणानां च पूजने । अप्रमत्ता सदा युक्ता श्वश्रूश्वशुरवर्तिनी ॥
devatānāṃ pitṝṇāṃ ca brāhmaṇānāṃ ca pūjane | apramattā sadā yuktā śvaśrūśvaśuravartinī
देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों की पूजा में मैं सदा सावधान और तत्पर रही, और सास-ससुर की सेवा में लगी रही।
श्लोक 11 (13.185.11)
पैशुन्ये न प्रवर्तामि न ममैतन्मनो गतम् । अद्वारि न च तिष्ठामि चिरं न कथयामि च ॥
paiśunye na pravartāmi na mamaitanmano gatam | advāri na ca tiṣṭhāmi ciraṃ na kathayāmi ca
मैं चुगली में नहीं पड़ती, मेरा मन कभी उस ओर गया ही नहीं। न मैं द्वार पर खड़ी रहती हूँ और न देर तक बातें करती हूँ।
श्लोक 12 (13.185.12)
असद्वा हसितं किञ्चिदहितं वाऽपि कर्मणा । रहस्यमरहस्यं वा न प्रवर्तामि सर्वथा ॥
asadvā hasitaṃ kiñcidahitaṃ vā'pi karmaṇā | rahasyamarahasyaṃ vā na pravartāmi sarvathā
न मैं अनुचित हँसी-ठट्ठे में पड़ती हूँ, न किसी अहितकारी कर्म में, चाहे वह गुप्त हो या प्रकट।
श्लोक 13 (13.185.13)
कार्यार्थे निर्गतं चापि भर्तारं गृहमागतम् । आसनेनोपसंयोज्य पूजयामि समाहिता ॥
kāryārthe nirgataṃ cāpi bhartāraṃ gṛhamāgatam | āsanenopasaṃyojya pūjayāmi samāhitā
जब पति किसी काम से बाहर जाकर घर लौटते, तो मैं उन्हें आसन देकर एकाग्र मन से उनका सत्कार करती थी।
श्लोक 14 (13.185.14)
यदन्नं नाभिजानाति यद्भोज्यं नाभिनन्दति । भक्ष्यं वा यदि वा लेह्यं तत्सर्वं वर्जयाम्यहम् ॥
yadannaṃ nābhijānāti yadbhojyaṃ nābhinandati | bhakṣyaṃ vā yadi vā lehyaṃ tatsarvaṃ varjayāmyaham
जो अन्न वे नहीं पहचानते और जिस भोजन से उन्हें प्रसन्नता नहीं होती, चाहे वह चबाने का हो या चाटने का, उस सबको मैं छोड़ देती हूँ।
श्लोक 15 (13.185.15)
कुटुंबार्थे समानीतं यत्किञ्चित्कार्यमेव तु । पुनरुत्थाय तत्सर्वं कारयामि करोमि च ॥
kuṭuṃbārthe samānītaṃ yatkiñcitkāryameva tu | punarutthāya tatsarvaṃ kārayāmi karomi ca
परिवार के लिए जो भी काम आ पड़ता है, उसे मैं फिर उठकर स्वयं करती हूँ और दूसरों से भी कराती हूँ।
श्लोक 16 (13.185.16)
अग्निसंरक्षणपरा गृहशुद्धिं च कारये । कुमारान्पालये नित्यं कुमारीं परिशिक्षये ॥
agnisaṃrakṣaṇaparā gṛhaśuddhiṃ ca kāraye | kumārānpālaye nityaṃ kumārīṃ pariśikṣaye
अग्नि की रक्षा में तत्पर रहकर मैं घर की शुद्धि कराती हूँ। मैं सदा बालकों का पालन करती हूँ और कन्या को शिक्षा देती हूँ।
श्लोक 17 (13.185.17)
आत्मप्रियाणि हित्वाऽपि गर्भसंरक्षणे रता । बालानां वर्जये नित्यं शापं कोपं प्रतापनम् ॥
ātmapriyāṇi hitvā'pi garbhasaṃrakṣaṇe ratā | bālānāṃ varjaye nityaṃ śāpaṃ kopaṃ pratāpanam
अपनी प्रिय वस्तुओं को छोड़कर भी मैं गर्भ की रक्षा में लगी रहती हूँ, और बालकों के प्रति शाप, क्रोध और सन्ताप को सदा दूर रखती हूँ।
श्लोक 18 (13.185.18)
अविक्षिप्तानि धान्यानि नान्नविक्षेपणं गृहे । रत्नवत्स्पृहये गेहे गावः सयवसोदकाः । समुद्गम्य च शुद्धाऽहं भिक्षां दद्यां द्विजातिषु ॥
avikṣiptāni dhānyāni nānnavikṣepaṇaṃ gṛhe | ratnavatspṛhaye gehe gāvaḥ sayavasodakāḥ | samudgamya ca śuddhā'haṃ bhikṣāṃ dadyāṃ dvijātiṣu
मेरे घर में अनाज बिखरा नहीं रहता और अन्न की बरबादी नहीं होती। घर की गायों को, जिन्हें चारा और जल मिलता रहता है, मैं रत्न के समान चाहती हूँ। और उठकर, शुद्ध होकर, मैं द्विजातियों को भिक्षा देती थी।
श्लोक 19 (13.185.19)
प्रवासं यदि मे याति भर्ता कार्येण केनचित् । मङ्गलैर्बहुभिर्युक्ता भवामि नियता तदा ॥
pravāsaṃ yadi me yāti bhartā kāryeṇa kenacit | maṅgalairbahubhiryuktā bhavāmi niyatā tadā
यदि पति किसी काम से परदेश चले जाते, तो मैं संयम से रहती और अनेक मंगल-विधानों का पालन करती थी।
श्लोक 20 (13.185.20)
अञ्जनं रोचनां चैव स्नानं माल्यानुलेपनम् । प्रसाधनं च निष्क्रान्ते नामिनन्दामि भर्तरि ॥
añjanaṃ rocanāṃ caiva snānaṃ mālyānulepanam | prasādhanaṃ ca niṣkrānte nāminandāmi bhartari
अंजन, गोरोचन, स्नान, माला, अंगराग और शृंगार, ये सब पति के बाहर चले जाने पर मुझे अच्छे नहीं लगते।
श्लोक 21 (13.185.21)
नोत्थापयामि भर्तारं सुखं सुप्तमहं सदा । आतुरेष्वपि कार्येषु तेन तुष्यति मे मनः । नोत्थापये सुखं सुप्तं ह्यातुरं पालये पतिम् ॥
notthāpayāmi bhartāraṃ sukhaṃ suptamahaṃ sadā | ātureṣvapi kāryeṣu tena tuṣyati me manaḥ | notthāpaye sukhaṃ suptaṃ hyāturaṃ pālaye patim
जब पति सुख से सोये हों तो मैं उन्हें कभी नहीं जगाती, चाहे काम जरूरी ही क्यों न हों; इसी से मेरा मन सन्तुष्ट रहता है। सुख से सोते हुए को मैं नहीं उठाती, और रोगी होने पर पति की सेवा करती हूँ।
श्लोक 22 (13.185.22)
नायासयामि भर्तारं कुटुम्बार्थेऽपि सर्वदा । गुप्तगुह्या सदा चास्मि सुसंमृष्टनिवेशना ॥
nāyāsayāmi bhartāraṃ kuṭumbārthe'pi sarvadā | guptaguhyā sadā cāsmi susaṃmṛṣṭaniveśanā
परिवार के प्रयोजन से भी मैं पति को कभी कष्ट नहीं देती। जो बात गुप्त रखनी चाहिए उसे गुप्त रखती हूँ, और मेरा घर सदा भली-भाँति झाड़ा-बुहारा रहता है।
श्लोक 23 (13.185.23)
इमं धर्मपथं नारी पालयन्ती समाहिता । अरुन्धतीव नारीणां स्वर्गलोके महीयते ॥
imaṃ dharmapathaṃ nārī pālayantī samāhitā | arundhatīva nārīṇāṃ svargaloke mahīyate
जो नारी एकाग्र मन से इस धर्ममार्ग का पालन करती है, वह स्वर्गलोक में स्त्रियों के बीच अरुन्धती की भाँति सम्मान पाती है।
भीष्म उवाच
श्लोक 24 (13.185.24)
एतदाख्याय सा देवी सुमनायै तपस्विनी । पतिधर्मं महाभागा जगामादर्शनं तदा ॥
etadākhyāya sā devī sumanāyai tapasvinī | patidharmaṃ mahābhāgā jagāmādarśanaṃ tadā
सुमना को यह पतिधर्म बताकर वह महाभाग्यशालिनी तपस्विनी देवी उसी समय अदृश्य हो गई।
श्लोक 25 (13.185.25)
यश्चेदं पाण्डवाख्यानं पठेत्पर्वणि पर्वणि । स देवलोकं सम्प्राप्य नन्दने स सुखी वसेत् ॥
yaścedaṃ pāṇḍavākhyānaṃ paṭhetparvaṇi parvaṇi | sa devalokaṃ samprāpya nandane sa sukhī vaset
हे पाण्डव, जो मनुष्य प्रत्येक पर्व के दिन इस आख्यान का पाठ करता है, वह देवलोक को पाकर नन्दन वन में सुख से निवास करता है।