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अनुशासन पर्व · अध्याय 186

नारद द्वारा पुण्डरीक को नारायण-उपासना का उपदेश

युधिष्ठिर सब शास्त्रों का सार पूछते हैं। भीष्म बताते हैं कि ब्राह्मण पुण्डरीक ने नारद से परम कल्याण के विषय में पूछा और नारद ने ब्रह्मा के कहे अनुसार उसे बताया कि जगत् के आदि और अन्त नारायण ही ध्यान और उपासना के योग्य हैं। पुण्डरीक ने वैसा ही किया और भगवान् के दर्शन पाए; अन्त में भीष्म युधिष्ठिर को भी इसी प्रकार उनकी आराधना करने को कहते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.186.1)

यज्ज्ञेयं परमं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः । सारं मे सर्वशास्त्राणां वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ॥

yajjñeyaṃ paramaṃ kṛtyamanuṣṭheyaṃ mahātmabhiḥ | sāraṃ me sarvaśāstrāṇāṃ vaktumarhasyanugrahāt

आप कृपा करके मुझे सब शास्त्रों का सार बताइए, कि महात्माओं के लिए जानने योग्य परम तत्त्व क्या है और आचरण करने योग्य परम कर्तव्य क्या है।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.186.2)

श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम् । श्रोतव्यं च त्वया सम्यग्ज्ञातव्यं च विशाम्पते ॥

śrūyatāmidamatyantaṃ gūḍhaṃ saṃsāramocanam | śrotavyaṃ ca tvayā samyagjñātavyaṃ ca viśāmpate

हे प्रजापति, यह अत्यन्त गूढ़ और संसार से छुड़ानेवाला उपदेश सुनो; तुम्हें इसे भली-भाँति सुनना और समझना चाहिए।

श्लोक 3 (13.186.3)

पुण्डरीकः पुरा विप्रः पुण्यतीर्थे जपान्वितः । नारदं परिपप्रच्छ श्रेयो योगपरं मुनिम् ॥

puṇḍarīkaḥ purā vipraḥ puṇyatīrthe japānvitaḥ | nāradaṃ paripapraccha śreyo yogaparaṃ munim

पूर्वकाल में पुण्डरीक नामक एक ब्राह्मण ने पवित्र तीर्थ में जप करते हुए योग में तत्पर मुनि नारद से पूछा कि परम कल्याण क्या है।

श्लोक 4 (13.186.4)

नारदश्चाब्रवीदेनं ब्रह्मणोक्तं महात्मना ॥

nāradaścābravīdenaṃ brahmaṇoktaṃ mahātmanā

और नारद ने उससे वही कहा जो महात्मा ब्रह्मा ने कहा था।

नारद उवाच

श्लोक 5 (13.186.5)

शृणुष्वावहितस्तात ज्ञानयोगमनुत्तमम् । अप्रभूतं प्रभूतार्थं वेदशास्त्रार्थसंयुतम् ॥

śṛṇuṣvāvahitastāta jñānayogamanuttamam | aprabhūtaṃ prabhūtārthaṃ vedaśāstrārthasaṃyutam

हे तात, ध्यान से ज्ञानयोग का वह सर्वोत्तम उपदेश सुनो, जो शब्दों में थोड़ा पर अर्थ में बहुत विशाल है और वेद-शास्त्रों के तात्पर्य से पूर्ण है।

श्लोक 6 (13.186.6)

यः परः प्रकृतेः प्रोक्तः पुरुषः पञ्चविंशकः । स एव सर्वभूतात्मा नर इत्यभिधीयते ॥

yaḥ paraḥ prakṛteḥ proktaḥ puruṣaḥ pañcaviṃśakaḥ | sa eva sarvabhūtātmā nara ityabhidhīyate

जो प्रकृति से परे बताया गया पचीसवाँ तत्त्व पुरुष है, वही सब प्राणियों की आत्मा है और उसी को नर कहा जाता है।

श्लोक 7 (13.186.7)

नराज्जातानि तत्वानि नाराणीति ततो विदुः । तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणः स्मृतः ॥

narājjātāni tatvāni nārāṇīti tato viduḥ | tānyeva cāyanaṃ tasya tena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ

नर से उत्पन्न हुए तत्त्वों को इसी कारण 'नार' कहा जाता है; वे ही उसका अयन (निवास) हैं, इसलिए वह नारायण कहलाता है।

श्लोक 8 (13.186.8)

नारायणाज्जगत्सर्वं सर्गकाले प्रजायते । तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ॥

nārāyaṇājjagatsarvaṃ sargakāle prajāyate | tasminneva punastacca pralaye sampralīyate

सृष्टि के समय सारा जगत् नारायण से उत्पन्न होता है और प्रलय के समय फिर उसी में लीन हो जाता है।

श्लोक 9 (13.186.9)

नारायणः परं ब्रह्म तत्वं नारायणः परः । परादपि परश्चासौ तस्मान्नास्ति परात्परः ॥

nārāyaṇaḥ paraṃ brahma tatvaṃ nārāyaṇaḥ paraḥ | parādapi paraścāsau tasmānnāsti parātparaḥ

नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तत्त्व हैं। वे परे से भी परे हैं; उनसे परे कुछ भी नहीं है।

श्लोक 10 (13.186.10)

वासुदेवं तथा विष्णुमात्मानं च तथा विदुः । संज्ञाभेदैः स एवैकः सर्वशास्त्राभिसंस्कृतः ॥

vāsudevaṃ tathā viṣṇumātmānaṃ ca tathā viduḥ | saṃjñābhedaiḥ sa evaikaḥ sarvaśāstrābhisaṃskṛtaḥ

उन्हें ही वासुदेव, विष्णु और आत्मा के नाम से जानते हैं। वे एक ही हैं, जिन्हें सब शास्त्र अनेक नामों से प्रतिपादित करते हैं।

श्लोक 11 (13.186.11)

आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनःपुनः । इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥

āloḍya sarvaśāstrāṇi vicārya ca punaḥpunaḥ | idamekaṃ suniṣpannaṃ dhyeyo nārāyaṇaḥ sadā

सब शास्त्रों का मन्थन करके और बार-बार विचार करके यही एक बात भली-भाँति सिद्ध हुई है कि नारायण का ही सदा ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 12 (13.186.12)

तस्मात्त्वं गहनान्सर्वांस्त्यक्त्वा शास्त्रार्थविस्तरान् । अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमजं विभुम् ॥

tasmāttvaṃ gahanānsarvāṃstyaktvā śāstrārthavistarān | ananyacetā dhyāyasva nārāyaṇamajaṃ vibhum

इसलिए तुम शास्त्रों के अर्थ के सब गहन विस्तारों को छोड़कर एकाग्र मन से अजन्मा और सर्वव्यापी नारायण का ध्यान करो।

श्लोक 13 (13.186.13)

मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः । सोऽपि तद्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः ॥

muhūrtamapi yo dhyāyennārāyaṇamatandritaḥ | so'pi tadgatimāpnoti kiṃ punastatparāyaṇaḥ

जो आलस्य छोड़कर एक मुहूर्त भी नारायण का ध्यान करता है, वह भी उसी गति को पाता है; फिर जो उन्हीं के परायण है, उसकी तो बात ही क्या!

श्लोक 14 (13.186.14)

नमो नारायणायेति यो वेद ब्रह्म शाश्वतम् । अन्त्यकाले जपन्नेति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥

namo nārāyaṇāyeti yo veda brahma śāśvatam | antyakāle japanneti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam

जो 'नमो नारायणाय' को शाश्वत ब्रह्म जानता है और अन्त समय में उसका जप करता हुआ देह छोड़ता है, वह विष्णु के उस परमपद को पाता है।

श्लोक 15 (13.186.15)

श्रवणान्मननाच्चैव गीतिस्तुत्यर्चनादिभिः । आराध्यं सर्वदा ब्रह्म पुरुषेण हितैषिणा ॥

śravaṇānmananāccaiva gītistutyarcanādibhiḥ | ārādhyaṃ sarvadā brahma puruṣeṇa hitaiṣiṇā

अपना हित चाहनेवाले पुरुष को श्रवण, मनन, गान, स्तुति और अर्चना आदि के द्वारा उस ब्रह्म की सदा आराधना करनी चाहिए।

श्लोक 16 (13.186.16)

लिप्यते न स पापेन नारायणपरायणः । पुनाति सकलं लोकं सहस्रांशुरिवोदितः ॥

lipyate na sa pāpena nārāyaṇaparāyaṇaḥ | punāti sakalaṃ lokaṃ sahasrāṃśurivoditaḥ

जो नारायण के परायण है, उसे पाप नहीं लगता; वह उदित हुए सहस्र-किरण सूर्य के समान सारे संसार को पवित्र कर देता है।

श्लोक 17 (13.186.17)

ब्रह्मचारी गृहस्थोऽपि वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । केशवाराधनं हित्वा नैव याति परां गतिम् ॥

brahmacārī gṛhastho'pi vānaprastho'tha bhikṣukaḥ | keśavārādhanaṃ hitvā naiva yāti parāṃ gatim

ब्रह्मचारी हो, गृहस्थ हो, वानप्रस्थ हो या संन्यासी, केशव की आराधना छोड़कर कोई भी परम गति को नहीं पाता।

श्लोक 18 (13.186.18)

जन्मान्तरसहस्रेषु दुर्लभा तद्गता मतिः । तद्भक्तवत्सलं देवं समराधय सुव्रत ॥

janmāntarasahasreṣu durlabhā tadgatā matiḥ | tadbhaktavatsalaṃ devaṃ samarādhaya suvrata

हजारों जन्मों में भी उसमें लगी हुई बुद्धि दुर्लभ है। हे उत्तम व्रतवाले, भक्तों पर स्नेह रखनेवाले उस देव की भली-भाँति आराधना करो।

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (13.186.19)

नारदेनैवमुक्तस्तु स विप्रोऽभ्यर्चयद्धरिम् । स्वप्नेऽपि पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥

nāradenaivamuktastu sa vipro'bhyarcayaddharim | svapne'pi puṇḍarīkākṣaṃ śaṅkhacakragadādharam

नारद के इस प्रकार कहने पर उस ब्राह्मण ने हरि की आराधना की, और स्वप्न में भी शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले कमलनयन भगवान् का पूजन किया।

श्लोक 20 (13.186.20)

किरीटकुण्डलधरं लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभम् । तं दृष्ट्वा देवदेवेशं प्राणमत्सम्भ्रमान्वितः ॥

kirīṭakuṇḍaladharaṃ lasacchrīvatsakaustubham | taṃ dṛṣṭvā devadeveśaṃ prāṇamatsambhramānvitaḥ

मुकुट और कुण्डल पहने, श्रीवत्स और कौस्तुभ से दीप्त उन देवाधिदेव को देखकर वह घबराहट के साथ प्रणाम करने लगा।

श्लोक 21 (13.186.21)

अथ कालेन महता तथा प्रत्यक्षतां गतः । संस्तुतः स्तुतिभिर्वेदैर्देवगन्धर्वकिन्नरैः ॥

atha kālena mahatā tathā pratyakṣatāṃ gataḥ | saṃstutaḥ stutibhirvedairdevagandharvakinnaraiḥ

फिर बहुत समय बाद वे उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए; वेदों ने, तथा देवताओं, गन्धर्वों और किन्नरों ने स्तुतियों से उनकी स्तुति की।

श्लोक 22 (13.186.22)

अथ तेनैव भगवानात्मलोकमधोक्षजः । गतः सम्पूजितः सर्वैः स योगिनिलयो हरिः ॥

atha tenaiva bhagavānātmalokamadhokṣajaḥ | gataḥ sampūjitaḥ sarvaiḥ sa yoginilayo hariḥ

तब योगियों के आश्रय भगवान् अधोक्षज हरि सबसे पूजित होकर अपने लोक को चले गए।

श्लोक 23 (13.186.23)

तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र तद्भक्तस्तत्परायणः । अर्चयित्वा यथायोगं भजस्व पुरुषोत्तमम् ॥

tasmāttvamapi rājendra tadbhaktastatparāyaṇaḥ | arcayitvā yathāyogaṃ bhajasva puruṣottamam

इसलिए हे राजेन्द्र, तुम भी उनके भक्त और उन्हीं के परायण बनो, यथायोग्य पूजा करके उन पुरुषोत्तम का भजन करो।

श्लोक 24 (13.186.24)

अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं । सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् । निरुपममुपमेयं योगिविज्ञानगम्यं । त्रिभुवनगुरुमीशं सम्प्रपद्यस्व विष्णुम् ॥

ajaramamaramekaṃ dhyeyamādyantaśūnyaṃ | saguṇamaguṇamādyaṃ sthūlamatyantasūkṣmam | nirupamamupameyaṃ yogivijñānagamyaṃ | tribhuvanagurumīśaṃ samprapadyasva viṣṇum

तीनों लोकों के गुरु और स्वामी भगवान् विष्णु की शरण लो, जो अजर, अमर, एक, ध्यान करने योग्य और आदि-अन्त से रहित हैं; जो सगुण भी हैं और निर्गुण भी, आदिस्वरूप हैं, स्थूल भी हैं और अत्यन्त सूक्ष्म भी; जिनकी कोई उपमा नहीं, फिर भी सबकी उपमा जिनसे दी जाती है, और जो योगियों के विज्ञान से ही जाने जाते हैं।

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