अनुशासन पर्व · अध्याय 187
ब्राह्मण और राक्षस: मधुर वचन से विजय
युधिष्ठिर पूछते हैं कि साम और दान में कौन श्रेष्ठ है। भीष्म कहते हैं कि यह मनुष्य के स्वभाव पर निर्भर है, और एक पुराना आख्यान सुनाते हैं: वन में राक्षस द्वारा पकड़ा गया बुद्धिमान ब्राह्मण निर्भय होकर मधुर वाणी से राक्षस के इस प्रश्न का उत्तर देता है कि वह पीला और दुबला क्यों है, और दुःख के अनेक सम्भावित कारण गिनाता है। प्रसन्न होकर राक्षस उसका सत्कार करता है, उसे अपना साथी बनाता है और छोड़ देता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.187.1)
साम्नि चापि प्रदानेन च ज्यायः किं भवतो मतम् । प्रब्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते ॥
sāmni cāpi pradānena ca jyāyaḥ kiṃ bhavato matam | prabrūhi bharataśreṣṭha yadatra vyatiricyate
हे भरतश्रेष्ठ, आपके मत में साम (मधुर वचन से मनाना) श्रेष्ठ है या दान? बताइए, इनमें से कौन-सा यहाँ बढ़कर है।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.187.2)
साम्ना प्रसाद्यते कश्चिद्दानेन च तथाऽपरः । पौरुषीं प्रकृतिं ज्ञात्वा तयोरेकतरं भजेत् ॥
sāmnā prasādyate kaściddānena ca tathā'paraḥ | pauruṣīṃ prakṛtiṃ jñātvā tayorekataraṃ bhajet
कोई साम से प्रसन्न होता है, तो कोई दान से। मनुष्य के स्वभाव को जानकर इन दोनों में से एक का सहारा लेना चाहिए।
श्लोक 3 (13.187.3)
गुणांस्तु शृणु वैराजन्त्सान्त्वस्य पुरुषर्षभ । दारुणान्यपि भूतानि सान्त्वेनाराधयेद्यथा ॥
guṇāṃstu śṛṇu vairājantsāntvasya puruṣarṣabha | dāruṇānyapi bhūtāni sāntvenārādhayedyathā
हे पुरुषश्रेष्ठ, मधुर वचन के गुण सुनो, कि उससे भयंकर प्राणियों को भी कैसे वश में किया जा सकता है।
श्लोक 4 (13.187.4)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गृहीत्वा रक्षसा मुक्तो द्विजातिः कानने यथा ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | gṛhītvā rakṣasā mukto dvijātiḥ kānane yathā
इस विषय में भी लोग यह प्राचीन इतिहास सुनाते हैं कि वन में राक्षस द्वारा पकड़ा गया एक द्विज कैसे छूटा।
श्लोक 5 (13.187.5)
कश्चित्तु बुद्धिसम्पन्नो ब्राह्मणो विजने वने । गृहीतः कृच्छ्रमापन्नो रक्षसा भक्षयिष्यता ॥
kaścittu buddhisampanno brāhmaṇo vijane vane | gṛhītaḥ kṛcchramāpanno rakṣasā bhakṣayiṣyatā
एक बुद्धिमान ब्राह्मण निर्जन वन में खाने की इच्छा रखनेवाले एक राक्षस के हाथ पड़ गया और भारी संकट में पड़ा।
श्लोक 6 (13.187.6)
सुबुद्धिः श्रुतिसम्पन्नो दृष्ट्वा तमतिभीषणम् । सामैवास्मै प्रयुञ्जानो न मुमोह न विव्यधे ॥
subuddhiḥ śrutisampanno dṛṣṭvā tamatibhīṣaṇam | sāmaivāsmai prayuñjāno na mumoha na vivyadhe
सुबुद्धि और शास्त्रज्ञान से सम्पन्न उस ब्राह्मण ने उस अत्यन्त भयंकर राक्षस को देखकर उसके प्रति केवल मधुर वचन का ही प्रयोग किया; वह न घबराया, न काँपा।
श्लोक 7 (13.187.7)
रक्षस्तु वाचा सम्पूज्य प्रश्नं पप्रच्छ तं द्विजम् । मोक्ष्यसे ब्रूहि मे प्रश्नं केनास्मि हरिणः कृशः ॥
rakṣastu vācā sampūjya praśnaṃ papraccha taṃ dvijam | mokṣyase brūhi me praśnaṃ kenāsmi hariṇaḥ kṛśaḥ
राक्षस ने वाणी से उस द्विज का सम्मान करके उससे प्रश्न किया, 'यदि तुम मेरे प्रश्न का उत्तर दोगे तो छूट जाओगे। बताओ, मैं पीला और दुबला क्यों हूँ?'
श्लोक 8 (13.187.8)
मुहूर्तमथ सञ्चिन्त्य ब्राह्मणस्तं निरीक्ष्य सः । अभीतवदथाव्यग्रः प्रश्नं प्रतिजगाद ह ॥
muhūrtamatha sañcintya brāhmaṇastaṃ nirīkṣya saḥ | abhītavadathāvyagraḥ praśnaṃ pratijagāda ha
क्षण भर विचार करके वह ब्राह्मण उसकी ओर देखकर निर्भय और शान्त भाव से उसके प्रश्न का उत्तर देने लगा।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 9 (13.187.9)
विदेशस्थो विलोकस्थो विना नूनं सुहृज्जनैः । विषयानतुलान्भुङ्क्षे तेनासि हरिणः कृशः ॥
videśastho vilokastho vinā nūnaṃ suhṛjjanaiḥ | viṣayānatulānbhuṅkṣe tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम परदेश में, लोगों से दूर स्थान में रहते हो, निश्चय ही मित्रों और स्वजनों से बिछुड़कर, और अनुपम विषयों का भोग करते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 10 (13.187.10)
नूनं मित्राणि ते रक्षः साधूपचरितान्यपि । स्वदोषात्तु परित्यज्य तेनासि हरिणः कृशः ॥
nūnaṃ mitrāṇi te rakṣaḥ sādhūpacaritānyapi | svadoṣāttu parityajya tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
हे राक्षस, निश्चय ही तुम्हारे मित्रों ने भली-भाँति सेवा पाने पर भी तुम्हारे ही दोष से तुम्हें छोड़ दिया है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 11 (13.187.11)
अवृत्त्या पीड्यमानोऽपि वृत्त्युपायान्विगर्हयन् । महार्थान्ध्यायसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
avṛttyā pīḍyamāno'pi vṛttyupāyānvigarhayan | mahārthāndhyāyase nūnaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम जीविका के अभाव से पीड़ित होकर भी जीविका के उपायों की निन्दा करते हो और निश्चय ही बड़े-बड़े प्रयोजनों का चिन्तन करते रहते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 12 (13.187.12)
परकार्याधिकारस्थाः सद्गुणैरधमा नराः । अवजानन्ति नूनं त्वां तेनासि हरिणः कृशः ॥
parakāryādhikārasthāḥ sadguṇairadhamā narāḥ | avajānanti nūnaṃ tvāṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
दूसरों के कार्यों के अधिकारी बने हुए, गुणों में तुमसे हीन लोग निश्चय ही तुम्हारा अनादर करते हैं; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 13 (13.187.13)
गुणवान्निर्गुणानन्यान्नूनं पश्यसि तत्कृतान् । प्राज्ञैरपि विनीतात्मा तेनासि हरिणः कृशः ॥
guṇavānnirguṇānanyānnūnaṃ paśyasi tatkṛtān | prājñairapi vinītātmā tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम गुणवान् हो, विद्वानों के बीच भी विनीत हो; निश्चय ही तुम गुणहीन दूसरे लोगों को ऊँचा उठा हुआ देखते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 14 (13.187.14)
सम्पीड्यात्मानमार्यत्वात्त्वया कश्चिदुपस्कृतः । जितं त्वां मन्यते साधो तेनासि हरिणः कृशः ॥
sampīḍyātmānamāryatvāttvayā kaścidupaskṛtaḥ | jitaṃ tvāṃ manyate sādho tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
हे साधु, तुमने उदारता से अपने को कष्ट देकर जिस किसी का उपकार किया, वह तुम्हें अपने से हारा हुआ मानता है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 15 (13.187.15)
क्लिश्यमानान्विमार्गेषु कामक्रोधावृतात्मनः । मन्येऽनुध्यायसि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥
kliśyamānānvimārgeṣu kāmakrodhāvṛtātmanaḥ | manye'nudhyāyasi janāṃstenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
मेरा विचार है कि तुम उन लोगों के लिए चिन्ता करते हो जो काम और क्रोध से घिरे हुए कुमार्गों पर चलकर दुःख पा रहे हैं; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 16 (13.187.16)
प्राज्ञैरपूजितो नूनं प्राज्ञैरप्यभिनिन्दितः । ह्रीमानमर्षी दुर्वृत्तस्तेनासि हरिणः कृशः ॥
prājñairapūjito nūnaṃ prājñairapyabhininditaḥ | hrīmānamarṣī durvṛttastenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही तुम विद्वानों से सम्मानित नहीं हो, बल्कि उनसे निन्दित भी हुए हो; तुम लज्जाशील हो, असहनशील हो और आचरण में दोषी हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 17 (13.187.17)
नूनं मित्रमुखः शत्रुः कश्चिदार्यवदाचरन् । वञ्चयित्वा गतस्त्वां वै तेनासि हरिणः कृशः ॥
nūnaṃ mitramukhaḥ śatruḥ kaścidāryavadācaran | vañcayitvā gatastvāṃ vai tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही मित्र का मुख धारण किए हुए, श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करनेवाला कोई शत्रु तुम्हें ठगकर चला गया; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 18 (13.187.18)
नूनमद्य सतां मध्ये तव वाक्यमनुत्तमम् । न भाति कालेऽभिहितं तेनासि हरिणः कृशः ॥
nūnamadya satāṃ madhye tava vākyamanuttamam | na bhāti kāle'bhihitaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही सज्जनों के बीच कहा गया तुम्हारा उत्तम वचन असमय कहे जाने के कारण शोभा नहीं पाता; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 19 (13.187.19)
दृष्टपूर्वाञ्श्रुतपूर्वान्कुपितान्हृदयप्रियान् । अनुनेतुं न शक्रोषि तेनासि हरिणः कृशः ॥
dṛṣṭapūrvāñśrutapūrvānkupitānhṛdayapriyān | anunetuṃ na śakroṣi tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
जिन्हें तुमने पहले देखा-सुना था और जो तुम्हारे हृदय के प्रिय थे, उन कुपित जनों को तुम मना नहीं पाते; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 20 (13.187.20)
नूनमासञ्जयित्वा त्वा कृत्ये कस्मिंश्चिदीप्सिते । कच्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥
nūnamāsañjayitvā tvā kṛtye kasmiṃścidīpsite | kaccidarthayate nityaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही किसी प्रिय कार्य में तुम्हें लगाकर कोई तुमसे निरन्तर कुछ माँगता रहता है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 21 (13.187.21)
परोक्षवादिभिर्मिथ्यादोषस्ते सम्प्रदर्शितः । तज्ज्ञैर्न पूज्यसे व्यक्तं तेनासि हरिणः कृशः ॥
parokṣavādibhirmithyādoṣaste sampradarśitaḥ | tajjñairna pūjyase vyaktaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
पीठ पीछे बोलनेवालों ने तुम्हारे झूठे दोष प्रकट कर दिए हैं; इसी से तुम्हें जाननेवाले तुम्हारा स्पष्ट ही आदर नहीं करते; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 22 (13.187.22)
नूनं त्वां सद्गुणापेक्षं पूजयानं सुहृत्प्रजाः । मायावीति च जानन्ति तेनासि हरिणः कृशः ॥
nūnaṃ tvāṃ sadguṇāpekṣaṃ pūjayānaṃ suhṛtprajāḥ | māyāvīti ca jānanti tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही तुम गुणों की अपेक्षा रखकर जिनका सम्मान करते हो, वे मित्र और प्रजाजन तुम्हें मायावी समझते हैं; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 23 (13.187.23)
अन्तर्गतमभिप्रायं न नूनं लज्जयेच्छसि । विवक्तुं प्राप्य शैथिल्यात्तेनासि हरिणः कृशः ॥
antargatamabhiprāyaṃ na nūnaṃ lajjayecchasi | vivaktuṃ prāpya śaithilyāttenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही तुम लज्जावश अपने मन की बात कहना नहीं चाहते, और अवसर पाकर भी शिथिलता के कारण कह नहीं पाते; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 24 (13.187.24)
नानाबुद्धिरुचीँल्लोके मानुषान्नूनमिच्छसि । ग्रहीतुं स्वैर्गुणैः सर्वांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥
nānābuddhirucīm̐lloke mānuṣānnūnamicchasi | grahītuṃ svairguṇaiḥ sarvāṃstenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही तुम चाहते हो कि इस संसार में भिन्न-भिन्न बुद्धि और रुचिवाले सब मनुष्यों को अपने गुणों से अपना बना लो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 25 (13.187.25)
असत्सु विनिविष्टेषु न गुणान्वदतः स्वयम् । गुणास्ते न विराजन्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥
asatsu viniviṣṭeṣu na guṇānvadataḥ svayam | guṇāste na virājante tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
दुष्टों के हठ में डटे रहने पर, तुम स्वयं अपने गुणों की चर्चा नहीं करते, इसलिए तुम्हारे गुण शोभा नहीं पाते; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 26 (13.187.26)
धर्मवृत्तः श्रुतैर्हीनः पदं त्वं रजसान्वितः । महत्प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
dharmavṛttaḥ śrutairhīnaḥ padaṃ tvaṃ rajasānvitaḥ | mahatprārthayase nūnaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम धर्मपूर्वक आचरण करनेवाले हो, पर विद्या से हीन हो और केवल रजोगुण से युक्त हो; निश्चय ही तुम ऊँचे पद की चाह रखते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 27 (13.187.27)
तपःप्रणिहितात्मानं मन्ये त्वारण्यकाङ्क्षिणम् । बन्धुवर्गो निगृह्णाति तेनासि हरिणः कृशः ॥
tapaḥpraṇihitātmānaṃ manye tvāraṇyakāṅkṣiṇam | bandhuvargo nigṛhṇāti tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
मेरा विचार है कि तप में मन लगाए हुए तुम वन में जाना चाहते हो और बन्धु-वर्ग तुम्हें रोकता है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 28 (13.187.28)
इष्टभार्यस्य ते नूनं प्रातिवेश्यो महाधनः । युवा सुललितः कामी तेनासि हरिणः कृशः ॥
iṣṭabhāryasya te nūnaṃ prātiveśyo mahādhanaḥ | yuvā sulalitaḥ kāmī tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम अपनी पत्नी से प्रेम करते हो और निश्चय ही तुम्हारा पड़ोसी बहुत धनी, युवा, विलासी और कामी है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 29 (13.187.29)
दुर्विनीतहतः पुत्रो जामाता वाऽप्रमार्जकः । दारा वा प्रतिकूलास्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥
durvinītahataḥ putro jāmātā vā'pramārjakaḥ | dārā vā pratikūlāste tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
या तो तुम्हारा पुत्र अपने दुराचार से नष्ट हो गया है, या दामाद कलंक को धोनेवाला नहीं है, या पत्नी तुम्हारे प्रतिकूल है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 30 (13.187.30)
भ्रातरोऽतीव विषमाः पिता वा क्षुत्क्षतो मृतः । माता ज्येष्ठो गुरुर्वाऽपि तेनासि हरिणः कृशः ॥
bhrātaro'tīva viṣamāḥ pitā vā kṣutkṣato mṛtaḥ | mātā jyeṣṭho gururvā'pi tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
या तो तुम्हारे भाई तुमसे बहुत विरोध रखते हैं, या पिता भूख से मर गए, या माता, बड़े भाई अथवा गुरु पर कोई विपत्ति आई है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 31 (13.187.31)
ब्राह्मणो वा हतो गौर्वा ब्रह्मस्वं वापहृतं पुरा । देवस्वं वा हृतं काले तेनासि हरिणः कृशः ॥
brāhmaṇo vā hato gaurvā brahmasvaṃ vāpahṛtaṃ purā | devasvaṃ vā hṛtaṃ kāle tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
या तो किसी ब्राह्मण या गाय का वध हुआ है, या पहले ब्राह्मण का धन छीना गया है, या समय आने पर देवता का धन हर लिया गया है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 32 (13.187.32)
हृतदारोऽथ वृद्धो वा लोके द्विष्टोऽथवा नरैः । अविज्ञानेन वा वृद्धस्तेनासि हरिणः कृशः ॥
hṛtadāro'tha vṛddho vā loke dviṣṭo'thavā naraiḥ | avijñānena vā vṛddhastenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
या तो तुम्हारी पत्नी छिन गई है, या तुम वृद्ध हो गए हो, या लोग तुमसे द्वेष करते हैं, या अज्ञान में ही बूढ़े हो गए हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 33 (13.187.33)
वार्धकार्थं धनं दृष्ट्वा स्वा श्रीर्वाऽपि परैर्हृता । वृत्तिर्वा दुर्जनापेक्षा तेनासि हरिणः कृशः ॥
vārdhakārthaṃ dhanaṃ dṛṣṭvā svā śrīrvā'pi parairhṛtā | vṛttirvā durjanāpekṣā tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
या तो बुढ़ापे के लिए रखा धन तुमने जाते देखा है, या तुम्हारी अपनी सम्पत्ति दूसरों ने छीन ली है, या तुम्हारी जीविका दुष्टों पर निर्भर है; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 34 (13.187.34)
सम्पत्कालेन ते धर्मः क्षीणस्तात सुहृद्बुवैः । असंन्यासमतिस्तत्र तेनासि हरिणः कृशः ॥
sampatkālena te dharmaḥ kṣīṇastāta suhṛdbuvaiḥ | asaṃnyāsamatistatra tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
हे तात, तुम्हारी सम्पन्नता के समय झूठे मित्रों ने तुम्हारा धर्म क्षीण कर दिया, और तुम्हारा मन संन्यास की ओर नहीं गया; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 35 (13.187.35)
अविद्वान्भीरुरल्पार्थे विद्याविक्रमदानजम् । यशः प्रार्थयसे नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥
avidvānbhīruralpārthe vidyāvikramadānajam | yaśaḥ prārthayase nityaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम विद्याहीन, डरपोक और थोड़े साधनवाले हो, फिर भी विद्या, पराक्रम और दान से मिलनेवाला यश निरन्तर चाहते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 36 (13.187.36)
चिराभिलषितं किञ्चित्फलमप्राप्तमेव ते । कृतमन्यैरपहृतं तेनासि हरिणः कृशः ॥
cirābhilaṣitaṃ kiñcitphalamaprāptameva te | kṛtamanyairapahṛtaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
जिस फल की तुमने बहुत समय से इच्छा की थी और जो तुम्हें मिलने ही वाला था, उसे दूसरों ने कर लिया और छीन लिया; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 37 (13.187.37)
नूनमात्मगतं दोषमपश्यन्किंचिदात्मनि । अकारणेऽभिशस्तो हि तेनासि हरिणः कृशः ॥
nūnamātmagataṃ doṣamapaśyankiṃcidātmani | akāraṇe'bhiśasto hi tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही अपने भीतर कोई दोष न देखते हुए भी तुम बिना कारण निन्दित हुए हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 38 (13.187.38)
सुहृदां दुःखमार्तानां न प्रमोक्ष्यसि हानिजम् । अलमर्थगुणैर्हीनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
suhṛdāṃ duḥkhamārtānāṃ na pramokṣyasi hānijam | alamarthaguṇairhīnaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम अपने दुःखी मित्रों के हानि से उत्पन्न दुःख को दूर नहीं कर सकते, क्योंकि तुम धन और गुणों से सर्वथा हीन हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 39 (13.187.39)
साधून्गृहस्थान्दृष्ट्वा च तथा साधून्वनेचरान् । मुक्तांश्चावसथे सक्तांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥
sādhūngṛhasthāndṛṣṭvā ca tathā sādhūnvanecarān | muktāṃścāvasathe saktāṃstenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
सदाचारी गृहस्थों को और वैसे ही सदाचारी वनवासियों को देखकर, तथा घर में आसक्त मुक्त पुरुषों को देखकर; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 40 (13.187.40)
धर्म्यमर्थ्यं च काम्यं च देशे च रहितं वचः । न प्रसिद्ध्यति ते नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
dharmyamarthyaṃ ca kāmyaṃ ca deśe ca rahitaṃ vacaḥ | na prasiddhyati te nūnaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम्हारी वाणी धर्मसंगत, हितकर और प्रिय होकर भी उचित स्थान के अभाव में निश्चय ही नहीं टिकती; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 41 (13.187.41)
दत्तानकुशलैरर्थान्मनीषी संजिजीविषुः । प्राप्य वर्तयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
dattānakuśalairarthānmanīṣī saṃjijīviṣuḥ | prāpya vartayase nūnaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
तुम बुद्धिमान् हो और जीना चाहते हो; अयोग्य लोगों के दिए धन को लेकर निश्चय ही उसी से निर्वाह करते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 42 (13.187.42)
परस्परविरुद्धानां प्रियं नूनं चिकीर्षसि । सुहृदामुपरोधेन तेनासि हरिणः कृशः ॥
parasparaviruddhānāṃ priyaṃ nūnaṃ cikīrṣasi | suhṛdāmuparodhena tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
निश्चय ही तुम परस्पर विरोधी लोगों को प्रसन्न करना चाहते हो, और इसके लिए मित्रों को रोकते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
श्लोक 43 (13.187.43)
पापान्विवर्धितान्दृष्ट्वा कल्याणांश्चावसीदतः । ध्रुवं गर्हयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
pāpānvivardhitāndṛṣṭvā kalyāṇāṃścāvasīdataḥ | dhruvaṃ garhayase nūnaṃ tenāsi hariṇaḥ kṛśaḥ
पापियों को बढ़ते और भले लोगों को दुःख पाते देखकर तुम निश्चय ही इसकी निन्दा करते हो; इसी से तुम पीले और दुबले हो।
भीष्म उवाच
श्लोक 44 (13.187.44)
एवं सम्पूजितं रक्षो विप्रं तं प्रत्यपूजयत् । सहायमकरोच्चैनं सम्पूज्यामुं मुमोच ह ॥
evaṃ sampūjitaṃ rakṣo vipraṃ taṃ pratyapūjayat | sahāyamakaroccainaṃ sampūjyāmuṃ mumoca ha
इस प्रकार सम्मान पाकर राक्षस ने भी उस ब्राह्मण का सत्कार किया, उसे अपना सहायक बना लिया और आदरपूर्वक उसे छोड़ दिया।