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अनुशासन पर्व · अध्याय 188

श्राद्ध का रहस्य और तीन पिण्डों की गति

युधिष्ठिर पूछते हैं कि निर्धन मनुष्य को परम कल्याण के लिए क्या करना चाहिए और कौन-से दान उत्तम हैं। भीष्म बताते हैं कि एक देवदूत ने पितरों से पूछा कि श्राद्ध में मैथुन क्यों वर्जित है और तीन पिण्ड कहाँ जाते हैं, और पितरों ने उनकी गति समझाई। फिर विद्युत्प्रभ, शक्र और बृहस्पति प्रायश्चित्तों और दोषों का वर्णन करते हैं (स्नान, धूप में उपवास, सूर्य या वायु की ओर मूत्र करना, छोटे बछड़ेवाली गाय को दुहना), और पितर नीलवृष छोड़ने, वर्षा में दीपदान और अमावास्या के तिलोदक का फल बताते हैं।

अध्याय 187अध्याय-सूचीअध्याय 189

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.188.1)

जन्म मानुष्यकं प्राप्य कर्मक्षेत्रं सुदुर्लभम् । श्रेयोर्थिना दरिद्रेण किं कर्तव्यं पितामह ॥

janma mānuṣyakaṃ prāpya karmakṣetraṃ sudurlabham | śreyorthinā daridreṇa kiṃ kartavyaṃ pitāmaha

मनुष्य-जन्म पाकर, जो कर्म का अत्यन्त दुर्लभ क्षेत्र है, कल्याण चाहनेवाले निर्धन मनुष्य को क्या करना चाहिए, हे पितामह?

श्लोक 2 (13.188.2)

दानानामुत्तमं यच्च देयं यच्च यथायथा । मान्यान्पूज्यांश्च गाङ्गेय रहस्यं वक्तुमर्हसि ॥

dānānāmuttamaṃ yacca deyaṃ yacca yathāyathā | mānyānpūjyāṃśca gāṅgeya rahasyaṃ vaktumarhasi

दानों में उत्तम दान कौन-सा है, क्या देना चाहिए और किस प्रकार देना चाहिए, तथा किसका मान और पूजन करना चाहिए, हे गाङ्गेय, यह रहस्य आप मुझे बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (13.188.3)

एवं पृष्टो नरेन्द्रेण पाण्डवेन यशस्विना । धर्माणां परमं गुह्यं भीष्मः प्रोवाच पार्थिवम् ॥

evaṃ pṛṣṭo narendreṇa pāṇḍavena yaśasvinā | dharmāṇāṃ paramaṃ guhyaṃ bhīṣmaḥ provāca pārthivam

यशस्वी पाण्डव नरेन्द्र के इस प्रकार पूछने पर भीष्म ने राजा से धर्मों का परम गुह्य रहस्य कहा।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (13.188.4)

शृणुष्वावहितो राजन्धर्मगुह्यानि भारत । यथाहि भगवान्व्यासः पुरा कथितवान्मयि ॥

śṛṇuṣvāvahito rājandharmaguhyāni bhārata | yathāhi bhagavānvyāsaḥ purā kathitavānmayi

हे राजन्, हे भारत, धर्म के रहस्यों को ध्यान से सुनो, जैसे भगवान् व्यास ने पूर्वकाल में मुझे बताए थे।

श्लोक 5 (13.188.5)

देवगुह्यमिदं राजन्यमेनाक्लिष्टकर्मणा । नियमस्थेन युक्तेन तपसो महतः फलम् ॥

devaguhyamidaṃ rājanyamenākliṣṭakarmaṇā | niyamasthena yuktena tapaso mahataḥ phalam

हे राजन्, यह देवताओं का गुह्य रहस्य है; यह महान् तप का फल है, जो संयम के द्वारा उस मनुष्य को मिलता है जिसके कर्म क्लेशरहित हैं और जो नियम में स्थित तथा समाहित है।

श्लोक 6 (13.188.6)

येन यः प्रीयते देवः प्रीयन्ते पितरस्तथा । ऋषयः प्रमथाः श्रीश्च चित्रगुप्तो दिशां गजाः ॥

yena yaḥ prīyate devaḥ prīyante pitarastathā | ṛṣayaḥ pramathāḥ śrīśca citragupto diśāṃ gajāḥ

इसी से देवता प्रसन्न होते हैं और पितर भी प्रसन्न होते हैं; वैसे ही ऋषि, प्रमथगण, श्री, चित्रगुप्त और दिशाओं के हाथी भी।

श्लोक 7 (13.188.7)

ऋषिधर्मः स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफलः । महादानफलं चैव सर्वयज्ञफलं तथा ॥

ṛṣidharmaḥ smṛto yatra sarahasyo mahāphalaḥ | mahādānaphalaṃ caiva sarvayajñaphalaṃ tathā

इसमें रहस्य-सहित ऋषिधर्म का स्मरण किया गया है, जो महान् फल देनेवाला है; इसमें महादान का फल है और वैसे ही सब यज्ञों का फल भी।

श्लोक 8 (13.188.8)

यश्चैतदेवं जानीयाज्ज्ञात्वा वा कुरुतेऽनघ । सदोषोऽदोषवांश्चेह तैर्गुणैः सह युज्यते ॥

yaścaitadevaṃ jānīyājjñātvā vā kurute'nagha | sadoṣo'doṣavāṃśceha tairguṇaiḥ saha yujyate

हे निष्पाप, जो इसे इस प्रकार जानता है, अथवा जानकर इसका आचरण करता है, वह इस लोक में सदोष हो या निर्दोष, उन गुणों से युक्त हो जाता है।

श्लोक 9 (13.188.9)

दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः । दशध्वजसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः ॥

daśasūnāsamaṃ cakraṃ daśacakrasamo dhvajaḥ | daśadhvajasamā veśyā daśaveśyāsamo nṛpaḥ

एक चक्र (तेल का कोल्हू) दस वधशालाओं के बराबर है; एक ध्वज (मदिरालय) दस चक्रों के बराबर है; एक वेश्या दस ध्वजों के बराबर है; और एक राजा दस वेश्याओं के बराबर है।

श्लोक 10 (13.188.10)

अर्धेनैतानि सर्वाणि नृपतिः कथ्यतेऽधिकः । त्रिवर्गसहितं शास्त्रं पवित्रं पुण्यलक्षणम् ॥

ardhenaitāni sarvāṇi nṛpatiḥ kathyate'dhikaḥ | trivargasahitaṃ śāstraṃ pavitraṃ puṇyalakṣaṇam

इन सबसे राजा आधे भाग से और बढ़कर कहा जाता है। त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र पवित्र और पुण्य के लक्षणों से युक्त है;

श्लोक 11 (13.188.11)

धर्मव्याकरणं पुण्यं रहस्यश्रवणं महत् । श्रोतव्यं धर्मसंयुक्तं विहितं त्रिदशैः स्वयम् ॥

dharmavyākaraṇaṃ puṇyaṃ rahasyaśravaṇaṃ mahat | śrotavyaṃ dharmasaṃyuktaṃ vihitaṃ tridaśaiḥ svayam

धर्म की व्याख्या पुण्यदायी है और रहस्य का श्रवण महान् है; जो धर्म से युक्त है और स्वयं देवताओं द्वारा विहित है, वह सुनने योग्य है;

श्लोक 12 (13.188.12)

पितॄणां यत्र गुह्यानि प्रोच्यन्ते श्राद्धकर्मणि । देवतानां च सर्वेषां रहस्यं कथ्यतेऽखिलम् ॥

pitṝṇāṃ yatra guhyāni procyante śrāddhakarmaṇi | devatānāṃ ca sarveṣāṃ rahasyaṃ kathyate'khilam

जिसमें श्राद्धकर्म के विषय में पितरों के गुह्य बताए जाते हैं और सब देवताओं का रहस्य पूरा-पूरा कहा जाता है।

श्लोक 13 (13.188.13)

ऋषिधर्मः स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफलः । महायज्ञफलं चैव सर्वदानफलं तथा ॥

ṛṣidharmaḥ smṛto yatra sarahasyo mahāphalaḥ | mahāyajñaphalaṃ caiva sarvadānaphalaṃ tathā

जहाँ रहस्य-सहित ऋषिधर्म का स्मरण किया गया है, जो महान् फल देनेवाला है, जिसमें महायज्ञों का फल है और वैसे ही सब दानों का भी।

श्लोक 14 (13.188.14)

ये पठन्ति सदा मर्त्या येषां चैवोपतिष्ठति । श्रुत्वा च फलमाचष्टे स्वयं नारायणः प्रभुः ॥

ye paṭhanti sadā martyā yeṣāṃ caivopatiṣṭhati | śrutvā ca phalamācaṣṭe svayaṃ nārāyaṇaḥ prabhuḥ

जो मनुष्य इसका सदा पाठ करते हैं और जिनके सामने यह उपस्थित होता है, उनके विषय में सुनकर स्वयं प्रभु नारायण उसका फल बताते हैं।

श्लोक 15 (13.188.15)

गवां फलं तीर्थफलं यज्ञानां चैव यत्फलम् । एतत्फलमवाप्नोति यो नरोऽतिथिपूजकः ॥

gavāṃ phalaṃ tīrthaphalaṃ yajñānāṃ caiva yatphalam | etatphalamavāpnoti yo naro'tithipūjakaḥ

गौओं का फल, तीर्थों का फल और यज्ञों का जो फल है, यही फल अतिथि की पूजा करनेवाला मनुष्य पाता है।

श्लोक 16 (13.188.16)

श्रोतारः श्रद्धधानाश्च येषां शुद्धं च मानसम् । तेषां व्यक्तं जिता लोकाः श्रद्दधानेन साधुना ॥

śrotāraḥ śraddhadhānāśca yeṣāṃ śuddhaṃ ca mānasam | teṣāṃ vyaktaṃ jitā lokāḥ śraddadhānena sādhunā

जो श्रोता श्रद्धावान् हैं और जिनका मन शुद्ध है, उन श्रद्धापूर्वक सुननेवाले साधु पुरुषों के लिए निश्चय ही लोक जीते हुए हैं।

श्लोक 17 (13.188.17)

मुच्यते किल्बिषाच्चैव न स पापेन लिप्यते । धर्मं च लभते नित्यं प्रेत्य लोकगतो नरः ॥

mucyate kilbiṣāccaiva na sa pāpena lipyate | dharmaṃ ca labhate nityaṃ pretya lokagato naraḥ

वह पाप से छूट जाता है और बुराई से लिप्त नहीं होता; परलोक में जाकर वह मनुष्य सदा धर्म को प्राप्त करता है।

श्लोक 18 (13.188.18)

कस्यचित्त्वथ कालस्य देवदूतो यदृच्छया । स्थितो ह्यन्तर्हितो भूत्वा पर्यभाषत वासवम् ॥

kasyacittvatha kālasya devadūto yadṛcchayā | sthito hyantarhito bhūtvā paryabhāṣata vāsavam

फिर कुछ समय बाद संयोगवश एक देवदूत अदृश्य होकर वहाँ खड़ा हुआ और उसने वासव (इन्द्र) से कहा।

देवदूत उवाच

श्लोक 19 (13.188.19)

यौ तौ कामगुणोपेतावश्विनौ भिषजां वरौ । आज्ञयाऽहं तयोः प्राप्तः सनरान्पितृदैवतान् ॥

yau tau kāmaguṇopetāvaśvinau bhiṣajāṃ varau | ājñayā'haṃ tayoḥ prāptaḥ sanarānpitṛdaivatān

जो वे दोनों अश्विनीकुमार हैं, वैद्यों में श्रेष्ठ और सब इष्ट गुणों से युक्त, उन्हीं की आज्ञा से मैं ऋषियों-सहित पितरों और देवताओं के पास आया हूँ।

श्लोक 20 (13.188.20)

कस्माद्धि मैथुनं श्राद्धे दातुर्भोक्तुश्च वर्जितम् । किमर्थं च त्रयः पिण्डाः प्रविभक्ताः पृथक्पृथक् ॥

kasmāddhi maithunaṃ śrāddhe dāturbhoktuśca varjitam | kimarthaṃ ca trayaḥ piṇḍāḥ pravibhaktāḥ pṛthakpṛthak

श्राद्ध में दाता और भोक्ता दोनों के लिए मैथुन क्यों वर्जित है? और तीन पिण्ड अलग-अलग क्यों बाँटे गए हैं?

श्लोक 21 (13.188.21)

प्रथमः कस्य दातव्यो मध्यमः क्व च गच्छति । उत्तरश्च स्मृतः कस्य एतदिच्छामि वेदितुम् ॥

prathamaḥ kasya dātavyo madhyamaḥ kva ca gacchati | uttaraśca smṛtaḥ kasya etadicchāmi veditum

पहला पिण्ड किसे देना चाहिए, बीच का कहाँ जाता है, और अन्तिम किसके लिए कहा गया है? यह मैं जानना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (13.188.22)

श्रद्दधानेन दूतेन भाषितं धर्मसंहितम् । पूर्वस्थास्त्रिदशाः सर्वे पितरः पूज्य खेचरम् ॥

śraddadhānena dūtena bhāṣitaṃ dharmasaṃhitam | pūrvasthāstridaśāḥ sarve pitaraḥ pūjya khecaram

श्रद्धावान् दूत ने धर्म से भरे ये वचन कहे; और वहाँ उपस्थित सब देवताओं तथा पितरों ने पहले उस आकाशचारी का सत्कार किया।

पितर ऊचुः

श्लोक 23 (13.188.23)

स्वागतं तेऽस्तु भद्रं ते श्रूयतां खेचरोत्तम । गूढार्थः परमः प्रश्नो भवता समुदीरितः ॥

svāgataṃ te'stu bhadraṃ te śrūyatāṃ khecarottama | gūḍhārthaḥ paramaḥ praśno bhavatā samudīritaḥ

आपका स्वागत है, आपका कल्याण हो; हे आकाशचारियों में श्रेष्ठ, सुनिए। आपने जो प्रश्न उठाया है, वह गूढ़ अर्थवाला और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

श्लोक 24 (13.188.24)

श्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च पुरुषो यः स्त्रियं व्रजेत् । पितरस्तस्य तं मासं तस्मिन्रेतसि शेरते ॥

śrāddhaṃ dattvā ca bhuktvā ca puruṣo yaḥ striyaṃ vrajet | pitarastasya taṃ māsaṃ tasminretasi śerate

जो पुरुष श्राद्ध देकर और उसमें भोजन करके स्त्री के पास जाता है, उसके पितर उस मास भर उसी वीर्य में पड़े रहते हैं।

श्लोक 25 (13.188.25)

प्रविभागं तु पिण्डानां प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । पिण्डो ह्यधस्ताद्गच्छंस्तु अप आविश्य भावयेत् ॥

pravibhāgaṃ tu piṇḍānāṃ pravakṣyāmyanupūrvaśaḥ | piṇḍo hyadhastādgacchaṃstu apa āviśya bhāvayet

मैं क्रम से पिण्डों का विभाग बताऊँगा। जो पिण्ड नीचे जाता है, वह जल में प्रवेश करके पोषण करता है।

श्लोक 26 (13.188.26)

पिण्डं तु मध्यमं तत्र पत्नीत्वेका समश्नुते । पिण्डस्तृतीयो यस्तेषां तं दद्याज्जातवेदसि । एष श्राद्धविधिः प्रोक्तो यथा धर्मो न लुप्यते ॥

piṇḍaṃ tu madhyamaṃ tatra patnītvekā samaśnute | piṇḍastṛtīyo yasteṣāṃ taṃ dadyājjātavedasi | eṣa śrāddhavidhiḥ prokto yathā dharmo na lupyate

बीच का पिण्ड वहाँ अकेली पत्नी खाती है। उनमें जो तीसरा पिण्ड है, उसे अग्नि (जातवेदा) में डालना चाहिए। यह श्राद्ध की विधि कही गई है, जिससे धर्म का लोप न हो।

श्लोक 27 (13.188.27)

पितरस्तस्य तुष्यन्ति प्रहृष्टमनसः सदा । प्रजा विवर्धते चास्य अक्षयं चोपतिष्ठति ॥

pitarastasya tuṣyanti prahṛṣṭamanasaḥ sadā | prajā vivardhate cāsya akṣayaṃ copatiṣṭhati

उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त होकर सन्तुष्ट रहते हैं; उसकी सन्तान बढ़ती है और अक्षय फल उसे प्राप्त होता है।

देवदूत उवाच

श्लोक 28 (13.188.28)

आनुपूर्व्येण पिण्डानां प्रविभागः पृथक्पृथक् । पितॄणां त्रिषु सर्वेषां निरुक्तं कथितं त्वया ॥

ānupūrvyeṇa piṇḍānāṃ pravibhāgaḥ pṛthakpṛthak | pitṝṇāṃ triṣu sarveṣāṃ niruktaṃ kathitaṃ tvayā

आपने तीनों पितरों के लिए पिण्डों का विभाग अलग-अलग, क्रम से और उसके अर्थ-सहित बता दिया।

श्लोक 29 (13.188.29)

एकः समुद्धृतः पिण्डो ह्यधस्तात्कस्य गच्छति । कं वा प्रीणयते देवं कथं तारयते पितॄन् ॥

ekaḥ samuddhṛtaḥ piṇḍo hyadhastātkasya gacchati | kaṃ vā prīṇayate devaṃ kathaṃ tārayate pitṝn

जो एक पिण्ड उठाकर नीचे जाता है, वह किसके पास जाता है? वह किस देवता को प्रसन्न करता है और पितरों को कैसे तारता है?

श्लोक 30 (13.188.30)

मध्यमं तु तदा पत्नी भुङ्क्तेऽनुज्ञातमेव हि । किमर्थं पितरस्तस्य कव्यमेव च भुञ्जते ॥

madhyamaṃ tu tadā patnī bhuṅkte'nujñātameva hi | kimarthaṃ pitarastasya kavyameva ca bhuñjate

और बीच का पिण्ड पत्नी आज्ञा पाकर ही खाती है। तब उसके पितर किसलिए कव्य ही खाते हैं?

श्लोक 31 (13.188.31)

अत्र यस्त्वन्तिमः पिण्डो गच्छते जातवेदसम् । भवते का गतिस्तस्य कं वा समनुगच्छति ॥

atra yastvantimaḥ piṇḍo gacchate jātavedasam | bhavate kā gatistasya kaṃ vā samanugacchati

और जो अन्तिम पिण्ड अग्नि के पास जाता है, उसकी क्या गति होती है और वह किसके पीछे जाता है?

श्लोक 32 (13.188.32)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पिण्डेषु त्रिषु या गतिः । फलं वृत्तिं च मार्गं च यश्चैनं प्रतिपद्यते ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ piṇḍeṣu triṣu yā gatiḥ | phalaṃ vṛttiṃ ca mārgaṃ ca yaścainaṃ pratipadyate

मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीनों पिण्डों की क्या गति है, उनका फल, उनका कार्य और उनका मार्ग क्या है, और उसे कौन प्राप्त करता है।

पितर ऊचुः

श्लोक 33 (13.188.33)

सुमहानेष प्रश्नो वै यस्त्वया समुदीरितः । रहस्यमद्भुतं चापि पृष्टाः स्म गगनेचर ॥

sumahāneṣa praśno vai yastvayā samudīritaḥ | rahasyamadbhutaṃ cāpi pṛṣṭāḥ sma gaganecara

आपने जो प्रश्न उठाया है, वह बहुत बड़ा है; हे आकाशचारी, आपने हमसे एक अद्भुत रहस्य पूछा है।

श्लोक 34 (13.188.34)

एतदेव प्रशंसन्ति देवाश्च मुनयस्तथा । तेऽप्येवं नाभिजानन्ति पितृकार्यविनिश्चयम् । वर्जयित्वा महात्मानं चिरजीविनमुत्तमम् ॥

etadeva praśaṃsanti devāśca munayastathā | te'pyevaṃ nābhijānanti pitṛkāryaviniścayam | varjayitvā mahātmānaṃ cirajīvinamuttamam

देवता और मुनि इसी की प्रशंसा करते हैं, फिर भी वे भी पितृकर्म के इस निश्चय को इस प्रकार नहीं जानते, केवल उस महात्मा, चिरंजीवी और श्रेष्ठ पुरुष को छोड़कर।

श्लोक 35 (13.188.35)

पितृभक्तस्तु यो विप्रो वरलब्धो महायशाः । त्रयाणामपि पिण्डानां श्रुत्वा भगवतो गतिम् ॥

pitṛbhaktastu yo vipro varalabdho mahāyaśāḥ | trayāṇāmapi piṇḍānāṃ śrutvā bhagavato gatim

पितरों का भक्त, महायशस्वी, वर पाया हुआ जो ब्राह्मण है, उसने भगवान् से तीनों पिण्डों की गति सुनी थी;

श्लोक 36 (13.188.36)

देवदूतेन यः पृष्टः श्राद्धस्य विधिनिश्चयः । गतिं त्रयाणां पिण्डानां शृणुष्वावहितो मम ॥

devadūtena yaḥ pṛṣṭaḥ śrāddhasya vidhiniścayaḥ | gatiṃ trayāṇāṃ piṇḍānāṃ śṛṇuṣvāvahito mama

श्राद्ध के जिस विधि-निश्चय के विषय में देवदूत ने पूछा था, तीनों पिण्डों की उस गति को ध्यान से मुझसे सुनिए।

श्लोक 37 (13.188.37)

अपो गच्छति यो ह्यत्र शशिनं ह्येष प्रीणयेत् । शशी प्रीणयते देवान्पितॄंश्चैव महामते ॥

apo gacchati yo hyatra śaśinaṃ hyeṣa prīṇayet | śaśī prīṇayate devānpitṝṃścaiva mahāmate

जो पिण्ड यहाँ जल में जाता है, वह चन्द्रमा को प्रसन्न करता है, और चन्द्रमा देवताओं तथा पितरों को प्रसन्न करता है, हे बुद्धिमान्।

श्लोक 38 (13.188.38)

भुङ्क्ते तु पत्नी यं चैषामनुज्ञाता तु मध्यमम् । पुत्रकामाय पुत्रं तु प्रयच्छन्ति पितामहाः ॥

bhuṅkte tu patnī yaṃ caiṣāmanujñātā tu madhyamam | putrakāmāya putraṃ tu prayacchanti pitāmahāḥ

बीच का पिण्ड, जिसे पत्नी आज्ञा पाकर खाती है, उससे पितामह पुत्र की इच्छा करनेवाले को पुत्र देते हैं।

श्लोक 39 (13.188.39)

हव्यवाहे तु यः पिण्डो दीयते तन्निबोध मे । पितरस्तेन तृप्यन्ति प्रीताः कामान्दिशन्ति च । एतत्ते कथितं सर्वं त्रिषु पिण्डेषु या गतिः ॥

havyavāhe tu yaḥ piṇḍo dīyate tannibodha me | pitarastena tṛpyanti prītāḥ kāmāndiśanti ca | etatte kathitaṃ sarvaṃ triṣu piṇḍeṣu yā gatiḥ

अब यह जानो कि जो पिण्ड हव्यवाहन अग्नि में दिया जाता है, उसका क्या फल है। उससे पितर तृप्त होते हैं और प्रसन्न होकर कामनाएँ देते हैं। तीनों पिण्डों की जो गति है, वह सब मैंने तुम्हें बता दी।

श्लोक 40 (13.188.40)

ऋत्विग्यो यजमानस्य पितृत्वमनुगच्छति । तस्मिन्नहनि मन्यन्ते परिहार्यं हि मैथुनम् ॥

ṛtvigyo yajamānasya pitṛtvamanugacchati | tasminnahani manyante parihāryaṃ hi maithunam

जो ऋत्विक् यजमान के पितृत्व को प्राप्त होता है, इसलिए उस दिन मैथुन का त्याग करना ही उचित माना जाता है।

श्लोक 41 (13.188.41)

शुचिना तु सदा श्राद्धं भोक्तव्यं खेचरोत्तम । ये मया कथिता दोषास्ते तथा स्युर्न चान्यथा ॥

śucinā tu sadā śrāddhaṃ bhoktavyaṃ khecarottama | ye mayā kathitā doṣāste tathā syurna cānyathā

हे आकाशचारियों में श्रेष्ठ, श्राद्ध का भोजन सदा पवित्र होकर ही करना चाहिए; जो दोष मैंने बताए हैं, वे वैसे ही होंगे, अन्यथा नहीं।

श्लोक 42 (13.188.42)

तस्मात्स्नातः शुचिः क्षान्तः श्राद्धं भुञ्जीत वै द्विजः । प्रजा विवर्धते चास्य यश्चैवं सम्प्रयच्छति ॥

tasmātsnātaḥ śuciḥ kṣāntaḥ śrāddhaṃ bhuñjīta vai dvijaḥ | prajā vivardhate cāsya yaścaivaṃ samprayacchati

इसलिए द्विज को स्नान करके, पवित्र और क्षमाशील होकर श्राद्ध का भोजन करना चाहिए; जो इस प्रकार दान देता है, उसकी सन्तान बढ़ती है।

भीष्म उवाच

श्लोक 43 (13.188.43)

ततो विद्युत्प्रभो नाम ऋषिराह महातपाः । आदित्यतेजसा तस्य तुल्यं रूपं प्रकाशते ॥

tato vidyutprabho nāma ṛṣirāha mahātapāḥ | ādityatejasā tasya tulyaṃ rūpaṃ prakāśate

तब विद्युत्प्रभ नामक महान् तपस्वी ऋषि ने कहा; उनका रूप सूर्य के तेज के समान दमक रहा था।

श्लोक 44 (13.188.44)

स च धर्मरहस्यानि श्रुत्वा शक्रमथाब्रवीत् ॥

sa ca dharmarahasyāni śrutvā śakramathābravīt

धर्म के इन रहस्यों को सुनकर उन्होंने शक्र से कहा:

विद्युत्प्रभ उवाच

श्लोक 45 (13.188.45)

तिर्यग्योनिगतान्सत्वान्मर्त्या हिंसन्ति मोहिताः । कीटान्पिपीलिकान्सर्पान्मेषान्समृगपक्षिणः । किल्बिषं सुबहु प्राप्ताः किंस्विदेषां प्रतिक्रिया ॥

tiryagyonigatānsatvānmartyā hiṃsanti mohitāḥ | kīṭānpipīlikānsarpānmeṣānsamṛgapakṣiṇaḥ | kilbiṣaṃ subahu prāptāḥ kiṃsvideṣāṃ pratikriyā

मोह में पड़े मनुष्य पशु-योनि में गए प्राणियों को मारते हैं: कीड़ों, चींटियों, साँपों, भेड़ों तथा मृगों और पक्षियों को। बहुत पाप पाकर उनका प्रायश्चित्त क्या है?

भीष्म उवाच

श्लोक 46 (13.188.46)

ततो देवगणाः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः । पितरश्च महाभागाः पूजयन्ति स्म तं मुनिम् ॥

tato devagaṇāḥ sarve ṛṣayaśca tapodhanāḥ | pitaraśca mahābhāgāḥ pūjayanti sma taṃ munim

तब सब देवगणों, तपस्या के धनी ऋषियों और महाभाग पितरों ने उन मुनि का सत्कार किया।

शक्र उवाच

श्लोक 47 (13.188.47)

कुरुक्षेत्रं गयां गङ्गां प्रभासं पुष्कराणि च । एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत्ततो जलम् । तथा मुच्यति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा ॥

kurukṣetraṃ gayāṃ gaṅgāṃ prabhāsaṃ puṣkarāṇi ca | etāni manasā dhyātvā avagāhettato jalam | tathā mucyati pāpena rāhuṇā candramā yathā

वह कुरुक्षेत्र, गया, गङ्गा, प्रभास और पुष्करों का मन से ध्यान करके जल में स्नान करे; इस प्रकार वह पाप से वैसे ही छूट जाता है जैसे राहु से चन्द्रमा।

श्लोक 48 (13.188.48)

त्र्यहं स्नातः स भवति निराहारश्च वर्तते । स्पृशते यो गवां पृष्ठं वालधिं च नमस्यति ॥

tryahaṃ snātaḥ sa bhavati nirāhāraśca vartate | spṛśate yo gavāṃ pṛṣṭhaṃ vāladhiṃ ca namasyati

तीन दिन स्नान करे और निराहार रहे; और जो गौ की पीठ का स्पर्श करता है तथा उसकी पूँछ को प्रणाम करता है —

भीष्म उवाच

श्लोक 49 (13.188.49)

ततो विद्युत्प्रभो वाक्यमभ्यभाषत वासवम् । अयं सूक्ष्मतरो धर्मस्तं निबोध शतक्रतो ॥

tato vidyutprabho vākyamabhyabhāṣata vāsavam | ayaṃ sūkṣmataro dharmastaṃ nibodha śatakrato

तब विद्युत्प्रभ ने वासव से कहा: "यह धर्म इससे भी सूक्ष्मतर है; हे शतक्रतु, इसे समझो।"

विद्युत्प्रभ उवाच

श्लोक 50 (13.188.50)

घृष्टो वटकषायेण अनुलिप्तः प्रियङ्गुणा । क्षीरेण षष्टिकान्भुक्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

ghṛṣṭo vaṭakaṣāyeṇa anuliptaḥ priyaṅguṇā | kṣīreṇa ṣaṣṭikānbhuktvā sarvapāpaiḥ pramucyate

बड़ के काढ़े से मला हुआ, प्रियङ्गु का लेप किए हुए, और दूध के साथ साठी चावल खाकर वह सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 51 (13.188.51)

श्रूयतां चापरं गुह्यं रहस्यमृषिचिन्तितम् । श्रुतं मे भाषमाणस्य स्थाणोः स्थाने बृहस्पतेः । रुद्रेण सह देवेश तन्निबोध शचीपते ॥

śrūyatāṃ cāparaṃ guhyaṃ rahasyamṛṣicintitam | śrutaṃ me bhāṣamāṇasya sthāṇoḥ sthāne bṛhaspateḥ | rudreṇa saha deveśa tannibodha śacīpate

एक और गुह्य रहस्य सुनो, जिस पर ऋषियों ने विचार किया है; मैंने स्थाणु के स्थान पर रुद्र के साथ बोलते हुए बृहस्पति से इसे सुना है। हे देवेश, हे शचीपति, उसे समझो।

श्लोक 52 (13.188.52)

पर्वतारोहणं कृत्वा एकपादो विभावसुम् । निरीक्षेत निराहार ऊर्ध्वबाहुः कृताञ्जलिः । तपसा महता युक्त उपवासफलं लभेत् ॥

parvatārohaṇaṃ kṛtvā ekapādo vibhāvasum | nirīkṣeta nirāhāra ūrdhvabāhuḥ kṛtāñjaliḥ | tapasā mahatā yukta upavāsaphalaṃ labhet

पर्वत पर चढ़कर, एक पैर पर खड़े होकर, निराहार रह, भुजाएँ ऊपर उठाए और हाथ जोड़े हुए वह सूर्य को निहारे; महान् तप से युक्त होकर वह उपवास का फल पाता है।

श्लोक 53 (13.188.53)

रश्मिभिस्तापितोऽर्कस्य सर्वपापमपोहति । ग्रीष्मकालेऽथवा शीते एवं पापमपोहति ॥

raśmibhistāpito'rkasya sarvapāpamapohati | grīṣmakāle'thavā śīte evaṃ pāpamapohati

सूर्य की किरणों से तपकर वह सब पाप दूर कर देता है; ग्रीष्म ऋतु में अथवा इसी प्रकार शीत में भी वह पाप को दूर कर देता है।

श्लोक 54 (13.188.54)

ततः पापात्प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती । तेजसा सूर्यवद्दीप्तो भ्राजते सोमवत्पुनः ॥

tataḥ pāpātpramuktasya dyutirbhavati śāśvatī | tejasā sūryavaddīpto bhrājate somavatpunaḥ

तब पाप से मुक्त होने पर उसे शाश्वत कान्ति प्राप्त होती है; वह सूर्य के समान तेज से देदीप्यमान होता है और फिर चन्द्रमा के समान शोभित होता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 55 (13.188.55)

मध्ये त्रिदशवर्गस्य देवराजः शतक्रतुः । उवाच मधुरं वाक्यं बृहस्पतिमनुत्तमम् ॥

madhye tridaśavargasya devarājaḥ śatakratuḥ | uvāca madhuraṃ vākyaṃ bṛhaspatimanuttamam

देवगणों के बीच देवराज शतक्रतु इन्द्र ने सर्वश्रेष्ठ बृहस्पति से मधुर वचन कहा।

शक्र उवाच

श्लोक 56 (13.188.56)

धर्मगुह्यं तु भगवन्मानुषाणां सुखावहम् । सरहस्याश्च ये दोषास्तान्यथावदुदीरय ॥

dharmaguhyaṃ tu bhagavanmānuṣāṇāṃ sukhāvaham | sarahasyāśca ye doṣāstānyathāvadudīraya

हे भगवन्, मनुष्यों को सुख देनेवाला जो धर्म का रहस्य है, और जो दोष रहस्य-सहित हैं, उन्हें यथावत् कहिए।

बृहस्पतिरुवाच

श्लोक 57 (13.188.57)

प्रतिमेहन्ति ये सूर्यमनिलं द्विषते च ये । हव्यवाहे प्रदीप्ते च समिधं ये न जुह्वति ॥

pratimehanti ye sūryamanilaṃ dviṣate ca ye | havyavāhe pradīpte ca samidhaṃ ye na juhvati

जो सूर्य की ओर मूत्र करते हैं, जो वायु से द्वेष करते हैं, और जो प्रज्वलित अग्नि में समिधा नहीं डालते,

श्लोक 58 (13.188.58)

बालवत्सां च ये धेनुं दुहन्ति क्षीरकारणात् । तेषां दोषान्प्रवक्ष्यामि तान्निबोध शचीपते ॥

bālavatsāṃ ca ye dhenuṃ duhanti kṣīrakāraṇāt | teṣāṃ doṣānpravakṣyāmi tānnibodha śacīpate

और जो छोटे बछड़ेवाली गाय को दूध के लिए दुहते हैं, उनके दोष मैं बताऊँगा; हे शचीपति, उन्हें सुनो।

श्लोक 59 (13.188.59)

भानुमाननिलश्चैव हव्यवाहश्च वासव । लोकानां मातरश्चैव गावः सृष्टाः स्वयंभुवा ॥

bhānumānanilaścaiva havyavāhaśca vāsava | lokānāṃ mātaraścaiva gāvaḥ sṛṣṭāḥ svayaṃbhuvā

हे वासव, सूर्य, वायु, अग्नि और लोकों की माताएँ गौएँ स्वयम्भू ने रची हैं।

श्लोक 60 (13.188.60)

लोकांस्तारयितुं शक्ता मर्त्येष्वेतेषु देवताः । सर्वे भवन्तः शृण्वन्तु एकैकं धर्मनिश्चयम् ॥

lokāṃstārayituṃ śaktā martyeṣveteṣu devatāḥ | sarve bhavantaḥ śṛṇvantu ekaikaṃ dharmaniścayam

मनुष्यों के बीच ये देवता लोकों को तारने में समर्थ हैं। आप सब एक-एक करके धर्म का निश्चय सुनिए।

श्लोक 61 (13.188.61)

वर्षाणि षडशीतिं तु दुर्वृत्ताः कुलपांसनाः । स्त्रियः सर्वाश्च दुर्वृत्ताः प्रतिमेहन्ति या रविम् ॥

varṣāṇi ṣaḍaśītiṃ tu durvṛttāḥ kulapāṃsanāḥ | striyaḥ sarvāśca durvṛttāḥ pratimehanti yā ravim

छियासी वर्ष तक दुराचारी, कुल को कलंकित करनेवाले, और वे सब दुराचारिणी स्त्रियाँ जो सूर्य की ओर मूत्र करती हैं —

श्लोक 62 (13.188.62)

अनिलद्वेषिणः शक्र गर्भस्था च्यवते प्रजा । हव्यवाहस्य दीप्तस्य समिधं ये न जुह्वति । अग्निकार्येषु वै तेषां हव्यं नाश्नाति पावकः ॥

aniladveṣiṇaḥ śakra garbhasthā cyavate prajā | havyavāhasya dīptasya samidhaṃ ye na juhvati | agnikāryeṣu vai teṣāṃ havyaṃ nāśnāti pāvakaḥ

हे शक्र, वायु से द्वेष करनेवालों की सन्तान गर्भ में ही गिर जाती है। और जो प्रज्वलित अग्नि में समिधा नहीं डालते, उनके अग्निकार्यों में अग्नि हव्य ग्रहण नहीं करता।

श्लोक 63 (13.188.63)

क्षीरं तु बालवत्सानां ये पिबन्तीह मानवाः । न तेषां क्षीरपाः केचिज्जायन्ते कुलवर्धनाः ॥

kṣīraṃ tu bālavatsānāṃ ye pibantīha mānavāḥ | na teṣāṃ kṣīrapāḥ kecijjāyante kulavardhanāḥ

जो मनुष्य यहाँ बछड़ों के पीने योग्य दूध को पी जाते हैं, उनके यहाँ कुल को बढ़ानेवाले कोई दूधमुँहे बालक उत्पन्न नहीं होते।

श्लोक 64 (13.188.64)

प्रजाक्षयेण युज्यन्ते कुलवंशक्षयेण च । एवमेतत्पुरा दृष्टं कुलवृद्धैर्द्विजातिभिः ॥

prajākṣayeṇa yujyante kulavaṃśakṣayeṇa ca | evametatpurā dṛṣṭaṃ kulavṛddhairdvijātibhiḥ

वे सन्तान के नाश और कुल-वंश के क्षय से युक्त होते हैं। ऐसा ही पूर्वकाल में कुल के वृद्ध द्विजों ने देखा था।

श्लोक 65 (13.188.65)

तस्माद्वर्ज्यानि वर्ज्यानि कार्यं कार्यं च नित्यशः । भूतिकामेन मर्त्येन सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

tasmādvarjyāni varjyāni kāryaṃ kāryaṃ ca nityaśaḥ | bhūtikāmena martyena satyametadbravīmi te

इसलिए समृद्धि चाहनेवाले मनुष्य को जो त्यागने योग्य है उसे त्यागना चाहिए और जो करने योग्य है उसे सदा करना चाहिए। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 66 (13.188.66)

ततः सर्वा महाभाग देवताः समरुद्गणाः । ऋषयश्च महाभागाः पृच्छन्ति स्म पितॄंस्ततः ॥

tataḥ sarvā mahābhāga devatāḥ samarudgaṇāḥ | ṛṣayaśca mahābhāgāḥ pṛcchanti sma pitṝṃstataḥ

तब मरुद्गणों-सहित सब देवताओं और महान् ऋषियों ने पितरों से पूछा:

देवा ऋषयश्चोचुः

श्लोक 67 (13.188.67)

पितरः केन तुष्यन्ति मर्त्यानामल्पचेतसाम् । अक्षयं च कथं दानं भवेच्चैवौर्ध्वदेहिकम् ॥

pitaraḥ kena tuṣyanti martyānāmalpacetasām | akṣayaṃ ca kathaṃ dānaṃ bhaveccaivaurdhvadehikam

अल्पबुद्धि मनुष्यों के किस कर्म से पितर प्रसन्न होते हैं? और दान तथा और्ध्वदेहिक कर्म अक्षय कैसे हो सकता है?

श्लोक 68 (13.188.68)

आनृण्यं वा कथं मर्त्या गच्छेयुः केन कर्मणा । एतदिच्छामहे श्रोतुं परं कौतूहलं हि नः ॥

ānṛṇyaṃ vā kathaṃ martyā gaccheyuḥ kena karmaṇā | etadicchāmahe śrotuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi naḥ

अथवा मनुष्य किस कर्म से ऋण से मुक्त हो सकते हैं? हम यह सुनना चाहते हैं, क्योंकि हमारी जिज्ञासा बहुत बड़ी है।

पितर ऊचुः

श्लोक 69 (13.188.69)

न्यायतो वै महाभागाः संशयः समुदाहृतः । श्रूयतां येन तुष्यामो मर्त्यानां साधुकर्मणाम् ॥

nyāyato vai mahābhāgāḥ saṃśayaḥ samudāhṛtaḥ | śrūyatāṃ yena tuṣyāmo martyānāṃ sādhukarmaṇām

हे महाभाग, आपने संशय ठीक ही उठाया है। सुनिए, धर्मात्मा मनुष्यों के किस कर्म से हम सन्तुष्ट होते हैं।

श्लोक 70 (13.188.70)

नीलषण्डप्रमोक्षेण अमावास्यां तिलोदकैः । वर्षासु दीपकैश्चैव पितॄणामनृणो भवेत् ॥

nīlaṣaṇḍapramokṣeṇa amāvāsyāṃ tilodakaiḥ | varṣāsu dīpakaiścaiva pitṝṇāmanṛṇo bhavet

नीलवृष (साँड़) को छोड़ने से, अमावास्या के दिन तिलोदक देने से और वर्षा ऋतु में दीप जलाने से मनुष्य पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 71 (13.188.71)

अक्षयं निर्व्यलीकं च दानमेतन्महाफलम् । अस्माकं परितोषश्च अक्षयः परिकीर्त्यते ॥

akṣayaṃ nirvyalīkaṃ ca dānametanmahāphalam | asmākaṃ paritoṣaśca akṣayaḥ parikīrtyate

यह दान अक्षय, निर्दोष और महान् फलवाला है; और इससे हमारा सन्तोष भी अक्षय कहा गया है।

श्लोक 72 (13.188.72)

श्रद्धधानाश्च ये मर्त्या आहरिष्यन्ति सन्ततिम् । दुर्गात्ते तारयिष्यन्ति नरकात्प्रपितामहान् ॥

śraddhadhānāśca ye martyā āhariṣyanti santatim | durgātte tārayiṣyanti narakātprapitāmahān

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक वंश-परम्परा को चलाएँगे, वे अपने प्रपितामहों को संकट से और नरक से उबारेंगे।

भीष्म उवाच

श्लोक 73 (13.188.73)

पितॄणां भाषितं श्रुत्वा हृष्टरोमा तपोधनः । वृद्धगार्ग्यो महातेजास्तानेवं वाक्यमब्रवीत् ॥

pitṝṇāṃ bhāṣitaṃ śrutvā hṛṣṭaromā tapodhanaḥ | vṛddhagārgyo mahātejāstānevaṃ vākyamabravīt

पितरों की बात सुनकर रोमाञ्चित हुए महातेजस्वी तपस्वी वृद्धगार्ग्य ने उनसे इस प्रकार कहा।

वृद्धगार्ग्य उवाच

श्लोक 74 (13.188.74)

के गुणा नीलषण्डस्य प्रमुक्तस्य तपोधनाः । वर्षासु दीपदानेन तथैव च तिलोदकैः ॥

ke guṇā nīlaṣaṇḍasya pramuktasya tapodhanāḥ | varṣāsu dīpadānena tathaiva ca tilodakaiḥ

हे तपोधनो, नीलवृष को छोड़ने के, वर्षा ऋतु में दीपदान के और वैसे ही तिलोदक के क्या गुण हैं?

पितर ऊचुः

श्लोक 75 (13.188.75)

नीलषण्डस्य लाङ्गूलं तोयमभ्युद्धरेद्यदि । षष्टिं वर्षसहस्राणि पितरस्तेन तर्पिताः ॥

nīlaṣaṇḍasya lāṅgūlaṃ toyamabhyuddharedyadi | ṣaṣṭiṃ varṣasahasrāṇi pitarastena tarpitāḥ

यदि नीलवृष की पूँछ से जल ऊपर खींचा जाए, तो उससे पितर साठ हज़ार वर्ष तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 76 (13.188.76)

यस्तु शृङ्गगतं पङ्कं कूलादुद्धृत्य तिष्ठति । पितरस्तेन गच्छन्ति सोमलोकमसंशयम् ॥

yastu śṛṅgagataṃ paṅkaṃ kūlāduddhṛtya tiṣṭhati | pitarastena gacchanti somalokamasaṃśayam

जो सींग में लगी हुई कीचड़ को तट से उठाकर खड़ा रहता है, उससे उसके पितर निःसन्देह सोमलोक को जाते हैं।

श्लोक 77 (13.188.77)

वर्षासु दीपदानेन शशिवच्छोभते नरः । तमोरूपं न तस्यास्ति दीपकं यः प्रयच्छति ॥

varṣāsu dīpadānena śaśivacchobhate naraḥ | tamorūpaṃ na tasyāsti dīpakaṃ yaḥ prayacchati

वर्षा ऋतु में दीपदान करने से मनुष्य चन्द्रमा के समान शोभित होता है; जो दीप देता है, उसके लिए अन्धकार नहीं रहता।

श्लोक 78 (13.188.78)

अमावास्यां तु ये मर्त्याः प्रयच्छन्ति तिलोदकम् । पात्रमौदुम्बरं गृह्य मधुमिश्रं तपोधन । कृतं भवति तैः श्राद्धं सरहस्यं यथार्थवत् ॥

amāvāsyāṃ tu ye martyāḥ prayacchanti tilodakam | pātramaudumbaraṃ gṛhya madhumiśraṃ tapodhana | kṛtaṃ bhavati taiḥ śrāddhaṃ sarahasyaṃ yathārthavat

हे तपोधन, जो मनुष्य अमावास्या के दिन गूलर की लकड़ी का पात्र लेकर मधु मिला हुआ तिलोदक देते हैं, उनके द्वारा रहस्य-सहित श्राद्ध यथार्थ रूप से सम्पन्न हो जाता है।

श्लोक 79 (13.188.79)

हृष्टपुष्टमनास्तेषां प्रजा भवति नित्यदा । कुलवंशस्य वृद्धिस्तु पिण्डदस्य फलं भवेत् । श्रद्दधानस्तु यः कुर्यात्पितॄणामनृणो भवेत् ॥

hṛṣṭapuṣṭamanāsteṣāṃ prajā bhavati nityadā | kulavaṃśasya vṛddhistu piṇḍadasya phalaṃ bhavet | śraddadhānastu yaḥ kuryātpitṝṇāmanṛṇo bhavet

उनकी सन्तान सदा हृष्ट-पुष्ट और प्रसन्नचित्त रहती है; पिण्ड देनेवाले को कुल-वंश की वृद्धि का फल मिलता है। जो श्रद्धापूर्वक यह करता है, वह पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 80 (13.188.80)

एवमेव समुद्दिष्टः श्राद्धकालक्रमस्तथा । विधिः पात्रं फलं चैव यथावदनुकीर्तितम् ॥

evameva samuddiṣṭaḥ śrāddhakālakramastathā | vidhiḥ pātraṃ phalaṃ caiva yathāvadanukīrtitam

इस प्रकार श्राद्ध के काल का क्रम बताया गया, और विधि, पात्र तथा फल का भी यथावत् वर्णन किया गया।

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